2014 ~ Balaji Kripa

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May Baba fullfill all the wishes of the Devotees.

जय श्रीराम

भगवान रामभक्त हनुमान की उपासना से जीवन के सारे कष्ट, संकट मिट जाते है। माना जाता है कि हनुमान एक ऐसे देवता है जो थोड़ी-सी प्रार्थना और पूजा से ही शीघ्र प्रसन्न हो जाते है। जहां मंगलवार और शनिवार का दिन इनके पूजन के लिए सर्वश्रेष्ठ हैं।

ॐ हं हनुमंतये नम:

मंगलवार और शनिवार के दिन हनुमान म‍ंदिर में जाकर रामभक्त हनुमान का गुणगान करें और उनसे अपने पापों के लिए क्षमायाचना करें।

Monday, 29 December 2014

वर्ष 2015 जन्म लग्न से जानिए अपना वार्षिक भविष्यफल !!

 मेष लग्न :=
 जिन जातकों का मेष लग्न है उनके लिए यह वर्ष काफी उत्साहजनक व लाभकारी रहेगा। राजनीति से जुड़े लोगों को राजयोग मिलेगा। व्यापारी वर्ग के लिए यह साल उत्तम व उन्नतिदायक रहेगा। नौकरीपेशा व्यक्ति भी उन्नति पाएंगे। बेरोजगार युवक-युवतियां रोजगार पाने में समर्थ होंगी। विद्यार्थी वर्ग के लिए समय उत्तम है। जो नवदंपति है व संतान की अभिलाषा रखते हैं उन्हें संतान सुख की प्राप्ति होगी। स्वास्थ्य ठीक रहेगा। कर्ज की स्थिति यथावत रहेगी, बढ़ने की संभावना नहीं है। पारिवारिक समय मिला-जुला रहेगा। पिता के स्वास्थ्य की चिंता रह सकती है। प्रभाव क्षेत्र में वृद्धि होगी व शत्रु पक्ष प्रभावहीन होंगे। दांपत्य जीवन में मधुर वातावरण बना रहेगा। आर्थिक पक्ष में मिली-जुली स्थिति रहेगी लेकिन आवश्यक पूर्ति होती रहेगी। मकान संबंधित समस्या का समाधान होगा।
वृषभ लग्न : -
जिन जातकों का वृषभ लग्न है, उनके लिए यह वर्ष भाग्यवर्धक और सफलताओं से भरपूर रहेगा। थोड़ा परिश्रम करना पड़ेगा लेकिन भाग्य साथ देगा। आपको अपने जीवनसाथी के मामलों में सावधानी रखना होगी। यात्रा करते वक्त भी सतर्कता बरतनी होगी। अध्यात्म की ओर रुझान रह सकता है। विद्यार्थी वर्ग के लिए समय परिश्रम का रहेगा। बगैर परिश्रम के उत्तम सफलता के आसार नहीं हैं। संतान पक्ष के मामलों में स्थिति ठीक रहेगी। पारिवारिक मामलों में संभलकर चलना होगा। आपको अपने परिश्रम पर अधिक भरोसा करना चाहिए, वही आपको सफलता दिलाएगा। प्रेम संबंधी मामलों में संभलकर चलना होगा। मातृ पक्ष के मामलों में सावधानी रखना होगी विशेषकर स्वास्थ्य संबंधित मामलों में। संचार माध्यम से शुभ समाचार भी मिलेगा। शत्रु पक्ष प्रभावहीन होंगे।
मिथुन लग्न : -
जिन जातकों का मिथुन लग्न है उनके लिए यह साल परिश्रम के साथ संघर्ष का रहेगा। आपको अपने नजदीकियों की पहचान ऐसे वक्त ही होगी। पारिवारिक मामलों में सावधानी रखना होगी। मातृपक्ष का स्वास्थ्य ठीक नहीं रहेगा। दांपत्य जीवन में मधुर वातावरण बना रहेगा। दैनिक व्यवसाय से जुडे़ व्यक्ति अनुकूल स्थिति पाएंगे। भाग्योन्नति में रुकावटों के बाद थोड़ी सफलता के योग हैं। विद्यार्थी वर्ग के लिए समय परिश्रम का रहेगा। बगैर पढ़ाई करे उत्तम सफलता की आस नहीं रहेगी। संतान पक्ष को सहयोग देना पड़ सकता है। यात्रा करते वक्त सावधानी रखना होगी। कर्ज न ले तो ही उत्तम रहेगा। शत्रु वर्ग से जहां तक हो सके, बचकर ही चलें। आर्थिक मामलों में मिली-जुली स्थिति रहेगी। व्यापार-व्यवसाय में परिश्रम पूर्ण सफल रहेंगे। नौकरीपेशा अपने कार्य पर ध्यान दें। पन्ना गले में पहनें, लाभ होगा।
कर्क लग्न : -
जिन जातकों का कर्क लग्न है उनके लिए यह साल पारिवारिक मामलों में अनुकूल स्थिति का रहेगा। मकान, वाहनादि खरीद-फरोख्त हो सकती है। मातृ पक्ष से लाभ की उम्मीद की जा सकती है। घर-परिवार में शुभ कार्य होंगे। प्रभाव में भी वृद्धि होगी, महत्वपूर्ण कार्य बनेंगे। अविवाहितों के लिए यह साल प्रसन्नता का रहेगा। संतान की चाहत रखने वालों को संतान सुख मिलेगा। दैनिक व्यवसाय के मामलों में प्रगति होगी। दांपत्य जीवन में मधुर वातावरण बना रहेगी। संचार माध्यम से शुभ समाचार भी मिलेगा। व्यापार-व्यवसाय में नवीन योजना बन सकती है। नौकरीपेशा व्यक्ति भी प्रगति पाएंगे। किसी महत्वपूर्ण कार्य में सफलता मिल सकती है। विद्यार्थी वर्ग को समय का ध्यान रखकर चलना होगा। शत्रु पक्ष प्रभावहीन होंगे।
सिंह लग्न : -
जिन जातकों का सिंह लग्न है उनके लिए यह साल मिला-जुला व प्रगतिवर्धक का रहेगा। संतान पक्ष का सहयोग मिलने से प्रसन्नता रहेगी। विद्यार्थी वर्ग भी लाभान्वित होंगे। मकान संबंधित समस्या रह सकती है। पारिवारिक मामलों में मिली-जुली स्थिति रहेगी। माता के स्वास्थ्य की चिंता रह सकती है। शत्रुवर्ग प्रभावहीन होंगे। कोर्ट-कचहरी के मामलों में सफलता मिलेगी। व्यापार- व्यवसाय में संभलकर चलना उत्तम रहेगा। नौकरीपेशा व्यक्ति सहयोग लेकर चलें। स्वास्थ्य का ध्यान रखें। आर्थिक मामलों में सतर्कता रखकर चलें। यात्रा हो सकती है। साझेदारी के कार्य में समझदारी से काम लेना होगा। जीवनसाथी के मामलों में मिली-जुली स्थिति रहेगी। आपको अपनी वाणी के प्रभाव का लाभ मिलेगा।
कन्या लग्न : -
जिन जातकों का कन्या लग्न है उनके लिए यह साल पारिवारिक दृष्टि से उत्तम है। शुभ कार्य होंगे। मातृ पक्ष का सहयोग मिलेगा। मकान-भूमि संबंधित कार्य बनेंगे। स्थानीय राजनीति में सफलता के योग उत्तम हैं। संतान पक्ष से प्रसन्नताभरा वर्ष रहेगा। विद्यार्थी वर्ग के लिए उत्साहजनक समय रहेगा। मनोरंजन के साधनों में वृद्धि होगी। जीवनसाथी से मनमुटाव हो सकता है। शत्रु वर्ग से राहत मिलेगी। स्वास्थ्य की दृष्टि से समय ठीक कहा जा सकता है। व्यापार-व्यवसाय की स्थिति में सुधार रहेगा व आशाजनक स्थिति भी पाएंगे। नौकरीपेशा व्यक्तियों के लिए उन्नतिदायक वर्ष रहेगा। बेरोजगार रोजगार पाने में समर्थ होंगे। राजनीतिज्ञों के लिए समय ठीक कहा जा सकता है। किसी कार्य में पिता का सहयोग सफलता का कारक बनेगा।
तुला लग्न : -
जिन जातकों का तुला लग्न है उनके लिए यह साल उत्तम रहेगा। पारिवारिक समय सुखद रहकर प्रगतिभरा रहेगा। वाहनादि सुख में वृद्धि होगी। मातृ पक्ष का सहयोग मिलेगा। स्थानीय राजनीति में राजनीतिज्ञों को सफलता मिलेगी। मकान की समस्या हल होगी। इष्ट मित्रों, भाइयों का सहयोग मिलेगा। साझेदारी के मामलों में सफल होंगे। संचार माध्यम से शुभ समाचार मिलेगा जिससे प्रसन्नता रहेगी। जीवनसाथी का सहयोग मिलेगा। व्यापार-व्यवसाय में ध्यान रखकर उत्तम सफलता के योग हैं। नौकरीपेशा व्यक्तियों के लिए समय सावधानी का है। शत्रु पक्ष प्रभावहीन होंगे। आर्थिक प्रयासों में परिश्रम द्वारा सफलता के योग उत्तम हैं। किसी महत्वपूर्ण पद की उम्मीद कर सकते हैं। प्रभाव में वृद्धि होगी। अविवाहित विवाहित होंगे।
वृश्चिक लग्न : -
जिन जातकों का वृश्चिक लग्न है उनके लिए यह साल पराक्रम द्वारा उत्तम सफलता प्राप्ति का रहेगा। पारिवारिक मामलों में सहयोग देना पड़ सकता है। धन की बचत के आसार हैं। कुटुम्बजनों का सहयोग मिलने से प्रसन्नता रहेगी। दैनिक व्यवसाय में सफल होंगे। जीवनसाथी के मामलों में सहयोग देना होगा। स्वास्थ्य की दुष्टि से समय ठीक कहा जा सकता है। शत्रु पक्ष पर प्रभाव बना रहेगा। संचार माध्यम से शुभ समाचार के योग हैं। साझेदारी के मामलों में सफलता मिलेगी। नौकरीपेशा व्यक्तियों के लिए समय उत्तम व्यतीत होगा। संतान पक्ष से प्रसन्नता मिलेगी। भाग्योन्नति में प्रगति के आसार हैं। राजनीतिज्ञों के लिए समय सुखद है। बेरोजगार रोजगार पाने में समर्थ होंगे।
धनु लग्न : -
जिन जातकों का धनु लग्न है उनके लिए यह साल खुशहाली लेकर आया है। जहां भाग्य साथ देगा वहीं प्रभावशील भी होंगे। अविवाहितों के लिए प्रसन्नतादायक समाचार यह है कि वे विवाह के बंधन में बंधेंगे। विवाहित दंपति सुखद अनुभव करेंगे। पारिवारिक मामलों में समय यथावत स्थिति होकर जुलाई से उत्तम रहेगा। विद्यार्थी वर्ग के लिए समय उत्तम व सफलताओं से भरा रहेगा। मनोरंजन के साधनों में वृद्धि होगी। आपको अपनी वाणी के प्रभाव से आर्थिक सफलता मिलेगी। कुटुम्बीजनों का सहयोग मिलेगा। व्यापार-व्यवसाय की स्थिति में सुधार आएगा। नौकरीपेशा व्यक्ति उन्नति पाएंगे। शत्रु पक्ष पर प्रभाव बना रहेगा। इष्ट मित्रों का सहयोग मिलने से प्रसन्नता रहेगी। जीवनसाथी से लाभजनक स्थिति के साथ सहयोग मिलेगा।
मकर लग्न : -
जिन जातकों का मकर लग्न है उनके लिए यह वर्ष उत्साहभरा रहेगा। प्रारंभ में मानसिक चिंता रह सकती है, परंतु जनवरी बाद सुधार रहेगा। पारिवारिक मामलों में समय सुखद व लाभदायक रहेगा। व्यापार-व्यवसाय की स्थिति अनुकूल रहेगी। नौकरीपेशा व्यक्ति सहयोग के साथ आत्मविश्वास में वृद्धि पाएंगे। बेरोजगार युवक-युवतियां रोजगार पाने में समर्थ होंगे। कलात्मक वस्तुओं के व्यापार में सफलता मिलेगी। आर्थिक लाभ भी रहेगा। जीवनसाथी के मामलों में सुखद स्थिति के साथ सहयोगात्मक स्थिति रहेगी। विद्यार्थी वर्ग के लिए समय उत्तम रहेगा। मनोरंजन के साधनों में वृद्धि होगी। अधिकारी वर्ग के लिए समय ठीक कहा जा सकता है। शत्रु वर्ग प्रभावहीन होंगे। राजनीति से जुड़े व्यक्तियों के लिए समय ठीक-ठीक कहा जा सकता है।
कुंभ लग्न : -
जिन जातकों का कुंभ लग्न है उन्हें इस यह साल सावधानी रखकर चलना होगा। व्यापार-व्यवसाय की स्थिति में सोच- विचारकर कदम बढ़ाएं। नौकरीपेशा व्यक्तियों के लिए अपने काम पर ध्यान रखना होगा। जो व्यक्ति जन्म स्थान से दूर हैं, उनके लिए साल सुखद व प्रगतिदायक रहेगा। राजनीति से जुड़े व्यक्तियों के लिए समय कुछ कमजोर कहा जा सकता है। शत्रु पक्ष प्रभावहीन रहेंगे। पराक्रम में वृद्धि होगी, वहीं भाइयों व ईष्ट मित्रों का सहयोग मिलेगा। आर्थिक प्रयासों में सफलता हेतु श्रम करना होगा। किसी गुप्त बीमारी से परेशान रह सकते हैं, सावधानी ही बचाव का उपाय है। आपको अपने जीवनसाथी से लाभदायक स्थिति रहेगी। दैनिक व्यवसाय से जुड़े व्यक्ति भी अनुकूल स्थिति पाएंगे। अविवाहितों के लिए समय सुखद रहेगा।
मीन लग्न : -
जिन जातकों का जन्म लग्न मीन है उनके लिए यह साल मिला-जुला कहा जा सकता है। व्यापार-व्यवसाय की स्थिति अनुकूल व लाभदायक रहेगी। संचार माध्यम से सुखद समाचार मिलेगा वहीं भाइयों का सहयोग रहेगा। पारिवारिक मामलों में सहयोग देना होगा। पिता का सहयोग मिलने से प्रसन्नता रहेगी। नौकरीपेशा व्यक्तियों के लिए समय ठीक रहेगा। जीवनसाथी से मंत्रणा कर कोई भी कार्य करें, सफल होंगे। शत्रु पक्ष पर प्रभाव बना रहेगा। राजनीति से जुड़े व्यक्ति भी अनुकूल स्थिति पाएंगे। संतान से प्रसन्नता रहेगी। आर्थिक मामलों में प्रयासों द्वारा सफलता पाएंगे। साझेदारी के व्यवसाय में अनुकूल सफलता पाएंगे। जिनका प्रमोशन बाकी है, वे लाभान्वित होंगे। यात्रा करते वक्त सावधानी रखकर चलना होगा। वाक् चातुर्य से अपना काम निकालें। उपरोक्त वर्षफल वर्षारंभ के गोचर ग्रहों पर आधारित है।
विशेष :==जन्म के ग्रहों की अनुकूल व प्रतिकूल स्थिति से बदलाव आ सकता है !!

जानिए क्या कहते हैं महिलाओं के लिए वर्ष 2015 के ग्रह !!

वर्ष 2015 शुक्र प्रधान है। शुक्र ग्रह स्त्री का कारक ग्रह है। अत: यह वर्ष विशेष महिलाओं के लिए लाभदायक रहेगा। शुक्र, सूर्य के नक्षत्र उत्तराषाढ़ा में है। सूर्य, शुक्र के नक्षत्र पूर्वाषाढ़ा में है। इस प्रकार एक-दूसरे के नक्षत्र में ग्रहों की स्थिति है। शुक्र वर्षारंभ में धन, कुटुंब, वाणी के भाव में उच्च के मंगल के साथ विराजमान है। इस साल महिलाओं की बेहतरी के लिए कारगर योजनाएं बनेगी व उन पर अमल भी होगा।राजनीति में महिला वर्ग की विशेष भागीदारी रहेगी। आर्थिक रूप से महिलाएं सुदृढ़ होंगी। जिन युवतियों की जन्म तारीख 6, 15, 24 हैं, वे विशेष रूप से हर क्षेत्र में प्रगति करने में सक्षम रहेंगी। इन जन्म दिनांक वाली युवतियों, महिलाओं को ओपल
पहनना अति शुभ रहेगा। जो युवतियां अविवाहित हैं और उपरोक्त जन्म तारीखों में उनका जन्म हुआ है वे विवाह के बंधन में बंधेंगी। बेरोजगार युवतियां भी रोजगार पाने में सफल होंगी। इस वर्ष युवतियों व महिलाओं को थोड़ी सावधानी भी रखनी होगी। अप्रिय घटना से बचाव के लिए सावधानी व सतर्कता जरूरी है। इस वर्ष कन्या संतति अधिक होगी। जिनके जन्म के समय शुक्र की स्थिति मजबूत होगी, वे सफलता अधिक पाएंगी। शुक्र की दशा अनुकूल व लाभदायक होगी। सौन्दर्य के प्रति महिलाओं का रुझान अधिक रहेगा। आभूषणों की खरीदारी अधिक होगी। इस वर्ष महिला वर्ग में साहस बल अधिक दिखेगा।

Saturday, 27 December 2014

जानिए, प्रमुख देवताओ को कौन से फूल चढ़ाने से होती है कामना पूरी !!

हिंदू धर्म के अंतर्गत विभिन्न धार्मिक कर्मकांडों में फूलों का विशेष महत्व है। धार्मिक अनुष्ठान, पूजन, आरती आदि कार्य बिना फूल के अधूरे ही माने जाते हैं। फूलों के संबंध में शारदा तिलक नामक पुस्तक में कहा गया है-
दैवस्य मस्तकं कुर्यात्कुसुमोपहितं सदा।
अर्थात- देवता का मस्तक सदैव पुष्प से सुशोभित रहना चाहिए।

वैसे तो किसी भी भगवान को कोई भी फूल चढ़ाया जा सकता है, लेकिन कुछ फूल देवताओं को विशेष प्रिय होते हैं। इन फूलों का वर्णन विभिन्न धर्म ग्रंथों में मिलता है। मान्यता है कि देवताओं को उनकी पसंद के फूल चढ़ाने से वे अति प्रसन्न होते हैं और साधक की हर मनोकामना पूरी कर सकते हैं। आज हम आपको बता रहे हैं कि किस देवता के पूजन में कौन से फूल चढ़ाना चाहिए-
भगवान श्रीगणेश- आचार भूषण ग्रंथ के अनुसार भगवान श्रीगणेश को तुलसीदल को छोड़कर सभी प्रकार के फूल चढाएं जा सकते हैं। इससे भगवान श्रीगणेश अपने भक्तों पर प्रसन्न होकर उनकी हर मनोकामना पूरी कर देते हैं।
भगवान शिव- भगवान शंकर को धतूरे के फूल, हरसिंगार, व नागकेसर के सफेद पुष्प, सूखे कमल गट्टे, कनेर, कुसुम, आक, कुश आदि के फूल चढ़ाने का विधान है।
भगवान विष्णु- इन्हें कमल, मौलसिरी, जूही, कदम्ब, केवड़ा, चमेली, अशोक, मालती, वासंती, चंपा, वैजयंती के पुष्प विशेष प्रिय हैं।
सूर्य देव - इनकी उपासना कुटज के पुष्पों से की जाती है। इसके अलावा कनेर, कमल, चंपा, पलाश, आक, अशोक आदि के पुष्प भी इन्हें प्रिय हैं।
भगवान श्रीकृष्ण- अपने प्रिय पुष्पों का उल्लेख महाभारत में युधिष्ठिर से करते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं- मुझे कुमुद, करवरी, चणक, मालती, पलाश व वनमाला के फूल प्रिय हैं।
भगवती आदिशक्ति - शंकर भगवान को चढऩे वाले पुष्प मां भगवती को भी प्रिय हैं। इसके अलावा बेला, सफेद कमल, पलाश, चंपा ,गुड़हल के फूल भी चढ़ाए जा सकते हैं।
लक्ष्मीजी- इनका सबसे अधिक प्रिय पुष्प कमल है।
भगबान हनुमानजी- गुलाब ,चम्पा ,चमेली ,गुड़हल ,बेला ,कनेर ,गेंदा के फूल चड़ाये जाते है !

Tuesday, 23 December 2014

क्या होते हैं कुंडली के 12 भाव, कैसे करते हैं हमें प्रभावित !!

विधि का विधान है कि मनुष्य जन्म पाकर मोक्ष तक पहुंचे अर्थात् प्रथम भाव से द्वादश भाव तक पहुंचे। किसी भी मनुष्य के जीवनारंभ से लेकर मृत्यु तक जो भी सांसारिक अथवा जिन अन्य वस्तुओं आदि की आवश्यकता मनुष्य को पड़ती है उसका संबंध प्रथम (पहले) भाव से द्वादश (बारहवें) भाव से होता है। मनुष्य के लिए संसार में सबसे पहली घटना उसका इस पृथ्वी पर जन्म है, इसीलिए प्रथम भाव जन्म भाव कहलाता है। जन्म लेने पर जो वस्तुएं मनुष्य को प्राप्त होती हैं उन सब वस्तुओं का विचार अथवा संबंध प्रथम भाव से होता है जैसे- रंग-रूप, कद, जाति, जन्म स्थान तथा जन्म समय की बातें।मनुष्य को शरीर तो प्राप्त हो गया, किंतु शरीर को गतिमान बनाए रखने के लिए खाद्य पदार्थों, धन अथवा कुटुंब की आवश्यकता होती है। इसीलिए खाद्य पदार्थ, धन, कुटुंब आदि का संबंध द्वितीय भाव से है।धन अथवा अन्य आवश्यकता की वस्तुएं बिना श्रम के प्राप्त नहीं हो सकतीं और बिना परिश्रम के धन टिक नहीं सकता। धन-धान्य इत्यादि वस्तुएं आदि रखने के लिए बल आदि की आवश्यकता होती है इसीलिए तृतीय भाव का संबंध, बल, परिश्रम व बाहु से होता है।शरीर, परिश्रम, धन आदि तभी सार्थक होंगे जब कार्य करने की भावना होगी, रूचि होगी अन्यथा सब व्यर्थ है। अत: कामनाओं, भावनाओं को चतुर्थ भाव रखा गया है। चतुर्थ भाव का संबंध मन-भावनाओं के विकास से है। मनुष्य के पास शरीर, धन, परिश्रम, शक्ति, इच्छा सभी हों, किंतु कार्य करने की तकनीकी जानकारी का अभाव हो अर्थात् वैचारिक शक्ति का अभाव हो अथवा कर्म विधि का ज्ञान न हो तो जीवन में उन्नति मिलना मुश्किल है। पंचम भाव का संबंध मनुष्य की वैचारिक शक्ति के विकास से है।यदि मनुष्य अड़चनों, विरोधी शक्तियों, मुश्किलों आदि से लड़ न पाए तो जीवन निखरता नहीं है। अत: षष्ठ भाव शत्रु, विरोध, कठिनाइयों आदि से संबंधित है। मनुष्य में यदि दूसरों से मिलकर चलने की शक्ति न हो और वीर्य शक्ति न हो तो वह जीवन में असफल समझा जाएगा। अत: मिलकर चलने की आदत व वीर्यशक्ति आवश्यक है और उसके लिए भागीदार, जीवनसाथी की आवश्यकता होती ही है। अत: वीर्य जीवनसाथी, भागीदार आदि का विचार सप्तम भाव से किया जाता है। यदि मनुष्य अपने साथ आयु लेकर न आए तो उसका रंग-रूप, स्वास्थ्य, गुण, व्यापार आदि कोशिशें सब बेकार अर्थात् व्यर्थ हो जाएंगी। अत: अष्टम भाव को आयु भाव माना गया है। आयु का विचार अष्टम से करना चाहिए।नवम स्थान को धर्म व भाग्य स्थान माना है। धर्म-कर्म अच्छे होने पर मनुष्य के भाग्य में उन्नति होती है और इसीलिए धर्म और भाग्य का स्थान नवम माना गया है।दसवें स्थान अथवा भाव को कर्म का स्थान दिया गया है। अत: जैसा कर्म हमने अपने पूर्व में किया होगा उसी के अनुसार हमें फल मिलेगा।एकादश स्थान प्राप्ति स्थान है। हमने जैसे धर्म-कर्म किए होंगे उसी के अनुसार हमें प्राप्ति होगी अर्थात् अर्थ लाभ होगा, क्योंकि बिना अर्थ सब व्यर्थ है आज इस अर्थ प्रधान युग में।द्वादश भाव को मोक्ष स्थान माना गया है। अत: संसार में आने और जन्म लेने के उद्देश्य को हमारी जन्मकुंडली क्रम से इसी तथ्य को व्यक्त करती है।

भगबान शिव का सब संकट का एक अचूक उपाय !!

जब मनुष्य पर हर ओर से संकट आ जाता है और जीवन में अधंकार छा जाता है तो शिवभक्ति रूपी नैया से सभी बाधाएं और कष्ट मिटते हैं। सुखद जीवन के लिए आप भी भोलेभंडारी की शरण में जाएं, अपनाएं यह आसान उपाय !सुबह स्नान कर यथासंभव सफेद वस्त्र पहन घर या शिवालय में शिवलिंग को पवित्र जल से स्नान कराएं।स्नान के बाद यथाशक्ति गन्ने के रस की धारा शिवलिंग पर नीचे लिखें मंत्र या पंचाक्षरी मंत्र नम: शिवाय बोलकर अर्पित करें -
रूपं देहि जयं देहि भाग्यं देहि महेश्वर:।
पुत्रान् देहि धनं देहि सर्वान्कामांश्च देहि मे।।

गन्ने के रस से अभिषेक के बाद पवित्र जल से स्नान कराकर गंध, अक्षत, आंकड़े के फूल, बिल्वपत्र शिव को अर्पित करें। सफेद व्यंजनों का भोग लगाएं। किसी शिव मंत्र का जप करें। धूप, दीप व कर्पूर आरती करें। अंत में क्षमा मांगकर दुखों से मुक्ति व रक्षा की कामना करें।सत्-प्रतिशत आप के संकट दूर होगे !

Sunday, 21 December 2014

अपनी राशि के अनुसार जपे दिव्य मंत्र और पाए सभी प्रकार की सफलता !!

अक्सर कई ज्योतिष उपाय एक साथ पढ़ने पर व्यक्ति असमंजस में पड़ जाता है कि आखिर उसके लिए क्या उचित है और क्या अनुचित। व्यक्ति अगर अपनी राशि के अनुसार मंत्र जाप करे तो निसंदेह शीघ्र सफलता मिलती है। मंत्र पाठ से व्यक्ति कई प्रकार के संकट से मुक्त रहता है। आर्थिक रूप से संपन्न हो जाता है।साथ ही जो लोग आपकी राह में बाधा उत्पन्न करते हैं वह भी कमजोर हो जाते हैं। प्रस्तुत है आपकी राशि के अनुसार अचूक दिव्य मं‍त्र, इसे जपने के पश्चात किसी अन्य पूजा या तंत्र की आवश्यकता नहीं है।
मेष : ॐ ह्रीं श्रीं लक्ष्मीनारायण नम:
वृषभ : ॐ गौपालायै उत्तर ध्वजाय नम:
मिथुन : ॐ क्लीं कृष्णायै नम:
कर्क : ॐ हिरण्यगर्भायै अव्यक्त रूपिणे नम:
सिंह : ॐ क्लीं ब्रह्मणे जगदाधारायै नम:
कन्या : ॐ नमो प्रीं पीताम्बरायै नम:
तुला : ॐ तत्व निरंजनाय तारक रामायै नम:
वृश्चिक : ॐ नारायणाय सुरसिंहायै नम:
धनु : ॐ श्रीं देवकीकृष्णाय ऊर्ध्वषंतायै नम:
मकर : ॐ श्रीं वत्सलायै नम:
कुंभ : ॐ श्रीं उपेन्द्रायै अच्युताय नम:
मीन : ॐ क्लीं उद्‍धृताय उद्धारिणे नम:

1 जनवरी को ही क्यों माना जाता है नया साल !!क्रिसमस डे है इतना खास, जिसके मनाने के लिए रचा गया 1 जनवरी का कैलेंडर !!

1 जनवरी से मनाए जाने वाले नए साल की शुरुआत 15 अक्टूंबर 1582 से की गई। 1 जनवरी से शुरु होने वाले कैलेंडर का नाम ग्रिगोरियन कैलेंडर है। ग्रिगोनियन कैलेंडर की शुरुआत ईसाईयों के सबसे खास त्योहार ईस्टर यानी कि क्रिसमस डे के आयोजन की तिथि को निश्चित करने के लिए की गई। उस समय में रूस का जूलियन कैलेंडर प्रचलन में था। जूलियन कैलेंडर में गणना संबंधी त्रुटियां रह जाती थी। जिसके कारण क्रिसमस डे साल में कभी कई दिनों पहले, तो कभी कई दिनों बाद मनाया जाता था। क्रिसमस डे को एक निश्चित दिन आयोजित किया जा सकें। इसीलिए अमेरिका के नेपल्स  के फिजीशियन एलायसिअस लिलिअस ने एक नया कैलेंडर प्रस्तावित किया। कुछ सुधारों के बाद 24 फरवरी 1582 को राजकीय आदेश से औपचारिक तौर पर अपना लिया गया। राजकीय आदेश पोप ग्रिगोरी ने दिया था। ग्रिगोरी के नाम के आधार पर ही इस कैलेंडर का नाम ग्रिगोरियन रखा गया। गणना संबंधी त्रुटियों को दूर कर इसे 15 अक्टूंबर 1582 को लागू किया गया। तभी से इसे लागू माना जाता है।आज ग्रिगोरियन कैलेंडर पूरी दुनिया में मशहूर है। जिसके आधार पर ही प्रभु यीशु का जन्मदिन 25 दिसंबर को मनाना सुनिश्चित किया गया ।

शनिवार को करे काले तिल और सरसों के तेल का उपयोग, मिलेंगे ये शुभ फल !!

शनि देव का असर !! 
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार शनि ऐसा ग्रह है जो एक साथ पांच राशियों पर सीधा असर डालता है। एक ही समय में शनि की तीन राशियों पर साढ़ेसाती और दो राशियों पर ढय्या रहती है। वर्तमान में तुला, वृश्चिक और धनु राशि पर साढ़ेसाती और मेष तथा सिंह राशि पर ढय्या बनी हुई है। शनिदेव का स्वभाव क्रूर माना गया है। शनि की साढ़ेसाती और ढय्या के समय में प्रभावित राशि के लोगों को कड़ी मेहनत करना पड़ती है।जिस व्यक्ति की कुंडली में शनि अशुभ फल देने वाला है, उसे किसी भी कार्य में आसानी से सफलता प्राप्त नहीं होती है। साथ ही, राहु-केतु भी बुरा प्रभाव दे सकते हैं। पिता-पुत्र में वाद-विवाद हो सकता है। परिवार में भी अशांति रहती है। साढ़ेसाती और ढय्या के समय इस प्रकार की परेशानियां और अधिक बढ़ सकती हैं।
उपाय इस प्रकार करे !!
हर रोज नहाना हमारे स्वास्थ्य के लिए बहुत फायदेमंद है, लेकिन इसके साथ ही शास्त्रों में बताए गए उपाय किए जाए तो बुरे समय से मुक्ति पाई जा सकती है। शनिदेव के बुरे प्रभावों से निजात पाने के लिए कई उपाय बताए गए हैं। ज्योतिष के अनुसार शनिवार शनिदेव की आराधना के लिए खास दिन माना गया है। इस दिन शनि के निमित्त पूजन-कर्म करने से विशेष लाभ प्राप्त होता है। शनिवार को स्नान के संबंध में ये खास उपाय बताया गया है।शनिवार के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर नित्य क्रियाओं से निवृत्त हो जाएं, इसके बाद पूरे शरीर पर तेल लगाएं। अच्छे से तेल की मालिश करें। नहाने के पानी में थोड़े से काले तिल डाल लें। इसके बाद इस पानी से स्नान करें। स्नान के बाद तेल का दान करें। ऐसी मान्यता है कि इस उपाय शनि के दोष शांत होते हैं। काले तिल और तेल, शनि की वस्तुएं मानी गई हैं।

Saturday, 20 December 2014

भगबान श्रीराम के चरणों के शुभ चिह्न



भगबान के सभी चिह्न मंगलकारी हैं। भक्त श्री भारतेन्दु हरीश्चंद्रजी ने भी श्री रामचन्द्रजी के इन्हीं 48 चरण चिह्नों का अपने काव्य में वर्णन किया है और कहा है कि श्रीरामजी के दाएं चरण में जो चिह्न हैं, वे श्री जानकीजी के बाएं चरण कमल में हैं और जो चिह्न श्रीरामजी के बाएं चरण में हैं वे श्री जानकीजी के दाएं चरण में हैं। ये चिह्न समस्त विभूतियों, ऐश्वर्यों तथा भक्ति-मुक्ति के अक्षय कोष हैं। जिन प्राणियों को भगवान श्रीराम के चरण-कमल चिह्नों का ध्यान एवं चिंतन प्रिय है, उनका जीवन वस्तुत: धन्य, पुण्यमय, सफल तथा सार्थक है। भगवान के चरणारविन्द की महिला उनके चिह्नों की कल्याणकारी विशिष्ट गरिमा से समन्वित है। ये चरण चिह्न संत-महात्माओं तथा भक्तों के लिए सदैव सहायक और रक्षक हैं।
 चरणों के शुभ चिह्न इस प्रकार है ==========
1. सरयू- इसका रंग श्वेत है। इसके अवतार विरजा-गंगा आदि हैं। जो व्यक्ति इस चिह्न का ध्यान करते हैं, उन्हें भगवान श्रीराम की भक्ति की प्राप्ति होती है तथा कलि मूल का नाश होता है।
2. गोपद- इसका रंग सफेद और लाल है। इसका अवतार कामधेनु है। जो प्राणी इस चिह्न का ध्यान करते हैं, वे पुण्य, भगवद् भक्ति तथा मुक्ति के अधिकारी होते हैं।  
3. पृथि‍वी- इसका रंग पीला और लाल है। इसका अवतार कमठ है। जो व्यक्ति इस चिह्न का ध्यान करते हैं, उनके मन में क्षमाभाव बढ़ता है।
4. कलश- यह सुनहला और श्याम रंग का है। इसे श्वेत भी कहा जाता है। इसका अवतार अमृत है। इसका ध्यान करने वालों को भक्ति, जीवन्मुक्ति तथा अमरता प्राप्त होती है।
5. पताका- इसका रंग विचित्र है। इसके ध्यान से मन पवित्र होता है। इस ध्वजा चिह्न से कलि का भय नष्ट होता है।
6. जम्बू फल- इसका रंग श्याम है। इसके अवतार गरूड़ हैं। यह मंगलकारक होता है। इसका ध्यान करने वालों को अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
7. अर्धचन्द्र- इसका रंग उजला है। इसके अवतार वामन भगवान् हैं। जो व्यक्ति इसका ध्यान करते हैं, उनके मन के दोष दूर होते हैं, त्रिविध ताप नष्ट होते हैं, प्रेमाभक्ति बढ़ती है और भक्ति, शांति एवं प्रकाश की प्राप्ति होती है।
8. शंख- इसका रंग लाल तथा सफेद है। इसके अवतार वेद, हंस, शंख आदि हैं। इसका ध्यान करने से दंभ, कपट एवं मायाजाल से छुटकारा मिलता है, विजय प्राप्त होती है और बुद्धि का विकास होता है। यह अनाहत-अनहद नाद का कारण है।
9. षट्कोण- इसका रंग श्वेत है, लाल भी कहा जाता है। इसके अवतार श्री कार्तिकेय हैं। इसका जो ध्यान करते हैं, उनके षटविकार- काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद एवं मत्सर का नाश होता है। यह यंत्ररूप है। इसका ध्यान षट्संपत्ति- शम, दम, उपरति, तितिक्षा, श्रद्धा एवं समाधान का प्रदाता है।
10. त्रिकोण- यह भी यंत्र रूप है। इसका रंग लाल है। इसके अवतार परशुरामजी और हयग्रीव हैं। इसका ध्यान करने वालों को योग की प्राप्ति होती है।
11. गदा- इसका रंग श्याम है। अवतार महाकाली और गदा हैं। इसका ध्यान करने से विजय प्राप्त होती है तथा दुष्टों का नाश होता है।
12. जीवात्मा- इसका रंग प्रकाशमय है और अवतार जीव है। इसका ध्यान शुद्धता बढ़ाने वाला होता है।
13. बिंदु- इसका रंग पीला तथा अवतार सूर्य एवं माया है। इसका ध्यान करने वाले के वश में भगवान हो जाते हैं, समस्त पुरुषार्थों की सिद्धि होती है और पाप नष्ट हो जाते हैं। इसका स्थान अंगूठा है।
14. शक्ति- यह श्वाम-सित-रक्त वर्ण का होता है। इसे लाल, गुलाबी और पीला भी कहा जाता है। इसके अवतार मूल प्रकृति, शारदा, महामाया हैं। इसका ध्यान करने से श्री-शोभा और संपत्ति की प्राप्ति होती है।
15. सुधा कुंड- इसका रंग सफेद एवं लाल है। इसका ध्यान अमरता प्रदान करता है।
16. त्रिवली- यह तीन रंग का होता है- हरा, लाल और सफेद। इसके अवतार श्री वामन हैं। इसका चिह्न वेद रूप है। जो व्यक्ति इसका ध्यान करते हैं, वे कर्म, उपासना और ज्ञान से संपन्न हो भक्तिरस का आस्वादन करने के अधिकारी होते हैं।
17. मीन- इसका रंग उजला एवं रुपहला होता है। यह काम की ध्वजा है, वशीकरण है। इसका ध्यान करने वाले को भगवान के प्रति प्रेम की प्राप्ति होती है।
18. पूर्ण चन्द्र- इसका रंग पूर्णत: श्वेत है तथा अवतार चंद्रमा है। इसका ध्यान करने से मोहरूपी तम तथा तीनों तापों का नाश होता है और मानसिक शांति, सरलता एवं प्रकाश की वृद्धि होती है।
19. वीणा- इसका रंग पीला, लाल तथा उजला है। इसके अवतार श्री नारदजी हैं। इसका ध्यान करने से रा‍ग-रागिनी में निपुणता आती है और भगवान् के
यशोगान में सफलता मिलती है।
20. वंशी (वेणु)- इसका रंग चित्र-विचित्र है और अवतार महानाद है। इसका ध्यान मधुर शब्द से मन को मोहित करने में सफलता प्रदान करता है।  
21. धनुष- इसका रंग हरा-पीला और लाल है। इसके अवतार पिनाक और शार्ङ्ग हैं। इसका ध्यान मृत्युभय का निवारण करता है तथा शत्रु का नाश करता है।
22. तूणीर- यह चि‍त्र-विचित्र रंग का होता है और इसके अवतार श्री परशुरामजी हैं। इसके ध्यान से भगवान् के प्रति सख्य रस बढ़ता है। ध्यान का फल सप्त भूमि-ज्ञान है।
23. हंस- इसका रंग श्वेत एवं गुलाबी और सर्व रंगमय है। अवतार हंसावतार है। इसके ध्यान से विवेक तथा ज्ञान बढ़ता है। संत-महात्माओं के लिए इसका ध्यान सुखद होता है।
24. चन्द्रिका- इसका रंग सफेद, पीला और लाल है। इसका ध्यान कीर्ति बढ़ाने में सहायक होता है।

 

Friday, 19 December 2014

क्यों नहीं करना चाहिए महिलाओं को हनुमानजी की पूजा !!

हनुमान जी सदा ब्रह्मचारी रहें। शास्त्रों में हनुमान जी की शादी होने का वर्णन मिलता है। लेकिन ये शादी भी हनुमान जी ने वैवाहिक सुख प्राप्त करने की इच्छा से नहीं की। बल्कि उन 4 प्रमुख विद्याओं की प्राप्ति के लिए की थी। जिन विद्याओं का ज्ञान केवल एक विवाहित को ही दिया जा सकता था। इस कथा के अनुसार हनुमान जी ने सूर्य देवता को अपना गुरु बनाया था। सूर्य देवता ने नौ प्रमुख विद्याओं में से पांच विद्या अपने शिष्य हनुमान को सिखा दी थी। लेकिन जैसे ही बाकी चार विद्याओं को सिखाने की बारी आई। तब सूर्य देव ने हनुमान जी से शादी कर लेने के लिए कहा क्योंकि ये विद्याओं का ज्ञान केवल एक विवाहित को ही दिया जा सकता था। अपने गुरु की आज्ञा से हनुमान ने विवाह करने का निश्चय कर लिया। हनुमान जी से विवाह के लिए किस कन्या का चयन किया जाए, जब यह समस्या सामने आई। तब सूर्य देव ने अपनी परम तेजस्वी पुत्री सुवर्चला से हनुमान को शादी करने की प्रस्ताव दिया। हनुमान जी और सुवर्चला की शादी हो गई। सुवर्चला परम तपस्वी थी। शादी होने के बाद सुवर्चला तपस्या में मग्न हो गई। उधर हनुमान जी अपनी बाकी चार विद्याओं के ज्ञान को हासिल करने में लग गए। इस प्रकार विवाहित होने के बाद भी हनुमान जी का ब्रह्मचर्य व्रत नहीं टूटा। हनुमान ने प्रत्येक स्त्री को मां समान दर्जा दिया है। यही कारण है कि किसी भी स्त्री को अपने सामने प्रणाम करते हुए नहीं देख सकते बल्कि स्त्री शक्ति को वो स्वयं नमन करते हैं। यदि महिलाएं चाहे तो हनुमान जी की सेवा में दीप अर्पित कर सकती हैं। हनुमान जी की स्तुति कर सकती हैं। हनुमान जी को प्रसाद अर्पित कर सकती हैं। लेकिन 16 उपचारों जिनमें मुख्य स्नान, वस्त्र, चोला चढ़ाना आते हैं, ये सब सेवाएं किसी महिला के द्वारा किया जाना या उन को छूना हनुमान जी स्वीकार नहीं करते हैं।

क्यों चढ़ाया जाता हैं हनुमान जी को सिंदूर का चोला !!

हनुमान जी श्री राम भक्त है। अष्टचिरंजीवी में से एक चिरंजीवी हनुमान भी है। जो हनुमान जी का पूजन करता है। उसकी उम्र में वृद्धि होती है। मंगल ग्रह की पीड़ा भी हनुमान जी को सिंदूर अर्पित करने से दूर होती है।शास्त्रों में हनुमान जी को सिंदूर का चोला चढ़ाए जाने के विषय में वर्णन मिलता है कि जब रावण को मारकर राम जी सीता जी को लेकर अयोध्या आए थे। तब हनुमान जी ने भी भगवान राम और माता सीता के साथ आने की जिद की। राम ने उन्हें बहुत रोका। लेकिन हनुमान जी थे कि अपने जीवन को श्री राम की सेवा करके ही बिताना चाहते थे। हनुमान दिन -रात यही प्रयास करते थे कि कैसे श्री राम को खुश रखा जाए। एक बार उन्होंनें माता सीता को मांग में सिंदूर भरते हुए देखा। तो माता सीता से इसका कारण पूछ लिया। माता सीता ने उनसे कहा कि वह प्रभु राम को प्रसन्न रखने के लिए सिंदूर लगाती हैं। हनुमान जी को श्री राम को प्रसन्न करने की ये युक्ति बहुत भा गई। उन्होंने सिंदूर का एक बड़ा बक्सा लिया और स्वयं के ऊपर उड़ेल लिया। और श्री राम के सामने पहुंच गए। तब श्री राम उनको इस तरह से देखकर आश्चर्य में पड़ गए। उन्होंने हनुमान से इसका कारण पूछा। हनुमान जी ने श्री राम से कहा कि प्रभु मैंने आपकी प्रसन्नता के लिए ये किया है। सिंदूर लगाने के कारण ही आप माता सीता से बहुत प्रसन्न रहते हो। अब आप मुझसे भी उतने ही प्रसन्न रहना। तब श्री राम को अपने भोले-भाले भक्त हनुमान की युक्ति पर बहुत हंसी आई। और सचमुच हनुमान के लिए श्री राम के मन में जगह और गहरी हो गई।और श्री राम ने वरदान दिया कि जो भी आप के ऊपर सिंदूर लगायेगा उस से हम बहुत खुश होगे !!

Wednesday, 17 December 2014

सिंदूर से बिछिया तक जानिए स्त्रियों के श्रृंगार का धार्मिक और बैज्ञानिक राज !!



शादी के बाद सुहागन स्त्रियां मांग में सिंदूर सजाती हैं क्योंकि यह सुहाग का चिन्ह माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि इससे पति की उम्र लंबी होती है। जबकि वैज्ञानिक दृष्टिकोण यह है कि सिंदूर माथे पर उस स्थान पर लगाया जाता है जहां भावनाओं को नियंत्रित करने वाली ग्रंथी मौजूद होती है। इससे मन और भावनाओं पर नियंत्रण बढ़ता है। साथ ही सिंदूर में मौजूद तत्व रक्त संचार के साथ ही यौन क्षमताओं को भी बढ़ाने का भी काम करते हैं जो वैवाहिक जीवन के लिए जरुरी माना जाता है।महिलाएं अपने पैरों का श्रृंगार करने के लिए पाजेब और पायल पहनती हैं। इसका कारण यह है कि पायल न सिर्फ उनके पैरों की खूबसूरती को बढ़ाने का काम करता है बल्कि यह पैरों में एक रिंग का काम भी करता है। इस रिंग की वजह से शरीर से निकले वाली विद्घुत उर्जा वापस शरीर में लौट जाती है और पैरों में होने वाली कई परेशानियों से भी बचाती है। यह भी माना जाता है कि पायल पेट और शरीर के पिछले भाग में चर्बी को बढ़ने से रोकता है जिससे उनका शरीरिक गठन आकर्षक बना रहता है।कानों में बाली और झुमके इसलिए नहीं पहनती हैं लड़कियां कि उनकी सुंदरता की तारीफ हो। असल में इसका वैज्ञानिक कारण है। चिकित्सा विज्ञान के अनुसार कान में ईयर रिंग धारण करने से चेहरे की त्वचा में कसापन आता है जिससे त्वचा पर ग्लो आता है। कर्ण छेदन करवाने से बौद्घिक क्षमता और सोचने समझने की क्षमता बढ़ जाती है।आपने देखा होगा कि सुहागन स्त्रियां हाथों में अंगूठी पहने या नहीं पहने पैरों में अंगूठी जैसे दिखने वाला गहना जिसे बिछुआ कहा जाता है जरुर पहनती हैं। इसका धार्मिक कारण सुहाग की लंबी उम्र से है जबकि वैज्ञानिक दृष्टिकोण यह कहता है कि पैरों में अंगूठे के बाद जो दूसरी उंगली होती है उसकी ग्रंथी गर्भाशय और हृदय से होकर गुजरती है। बिछुआ पहनने से गर्भाशय को बल मिलता है और यौन क्षमता बढ़ती है साथ ही मासिक धर्म के समय होने वाली परेशानियों में कमी आती है।शादी हो या तीज त्योहार महिलाएं अपने हाथों और पैरों में मेंहदी जरुर लगाती हैं। इसका कारण सिर्फ सौंदर्य बढ़ाना नहीं है बल्कि इसका संबंध स्वास्थ्य से है। मेंहदी का इस्तेमाल आयुर्वेद में कई रोगों की औषधी के रुप में किया जाता है। यह तनाव को दूर करने में कारगर होता है। यौन इच्छाओं को भी नियंत्रित करता है जो इन अवसरों पर आवश्यक माना जाता है।महिलाएं अपनी कलाई को सजाने के लिए चूड़िया पहनती हैं। लेकिन महिलाओं के अन्य श्रृंगार साधन की तरह चूड़ियां धारण करने का भी वैज्ञानिक कारण है। विज्ञान के अनुसार चूड़ियों के कारण कलाई में एक घर्षण उत्पन्न होता है जिससे कलाइयों में सुचारु रुप से रक्त संचार होता है। जिससे कलाईयों में होने वाली स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों से बचाव होता है। साथ ही चूड़ियां शरीर से निकलने वाली उर्जा को वापस शरीर के अंदर पहुंचाने का भी काम करती है।महिलाओं के सोलह श्रृंगार में नथिया और नोज पिन भी शामिल है। इन्हें महिलाएं अपने नाक के आगे के हिस्से में लगाती हैं। इससे उनकी खूबसूरती में चार चांद तो लगता ही है। यह उनके स्वास्थ्य के लिए भी फायदेमंद है। विज्ञान की दृष्टि से नोज पिन सांस लेने की क्रिया में धूल मिट्टी के साथ आने वाले कीटाणुओं से बचाव करता होता है। यह नाक और श्वसन तंत्र को स्वस्थ्य रखने में भी सहायक होता है।मंगलसूत्र सुहाग की निशानी मानी जाती है इसलिए महिलाएं इसे अपने गले में धारण किए रहती हैं। मान्यता है कि इससे कपड़ों से ढककर रखना चाहिए। इससे पीछे कारण यह है कि आमतौर पर भारतीय महिलाएं पुरुषों से अधिक परिश्रम करती हैं। मंगलसूत्र रक्तसंचार को सुचारु बनाकर उनके तनाव और थकान को दूर करने में सहायक होता है। मंगलसूत्र सोने का बना होता है स्वर्ण का शरीर से स्पर्श शुभ और स्वास्थ्यवर्द्घक होता है। ज्योतिष की दृष्टि से यह धन और सुख बढ़ाने वाला होता है। इसलिए महिलाएं मंगलसूत्र धारण करती हैं।

ब्रह्मा जी की एक गलती से पैदा हुए काशी के कालभैरव !!

शिव की क्रोधाग्नि का विग्रह रूप कहे जाने वाले कालभैरव का अवतरण मार्गशीर्ष कृष्णपक्ष की अष्टमी को हुआ। इनकी पूजा से घर में नकारत्मक ऊर्जा, जादू-टोने, भूत-प्रेत आदि का भय नहीं रहता। शिव पुराण में कहा है कि भैरव परमात्मा शंकर के ही रूप हैं। इस मंत्र, अतिक्रूर महाकाय कल्पान्त दहनोपम्, भैरव नमस्तुभ्यं अनुज्ञा दातुमर्हसि को रोज ग्यारह बार जपने से उसका अभीष्ट जरूर मिलता है। कथा के अनुसार एक बार देवताओं ने ब्रह्मा और विष्णु जी से बारी-बारी से पूछा कि जगत में सबसे श्रेष्ठ कौन है तो स्वाभाविक ही उन्होंने अपने को श्रेष्ठ बताया। देवताओं ने वेदशास्त्रों से पूछा तो उत्तर आया कि जिनके भीतर चराचर जगत, भूत, भविष्य और वर्तमान समाया हुआ है, अनादि अंनत और अविनाशी तो भगवान रूद्र ही हैं।वेद शास्त्रों से शिव के बारे में यह सब सुनकर ब्रह्मा ने पांचवें मुख से शिव के बारे में भला-बुरा कहा। इससे वेद दुखी हुए। इसी समय एक दिव्यज्योति के रूप में भगवान रूद्र प्रकट हुए। ब्रह्मा ने कहा कि हे रूद्र, तुम मेरे ही सिर से पैदा हुए हो।अधिक रुदन करने के कारण मैंने ही तुम्हारा नाम 'रूद्र' रखा है अतः तुम मेरी सेवा में आ जाओ, ब्रह्मा के इस आचरण पर शिव को भयानक क्रोध आया और उन्होंने भैरव को उत्पन्न करके कहा कि तुम ब्रह्मा पर शासन करो। उन दिव्य शक्ति संपन्न भैरव ने अपने बाएं हाथ की सबसे छोटी अंगुली के नाख़ून से शिव के प्रति अपमान जनक शब्द कहने वाले ब्रह्मा के पांचवे सर को ही काट दिया। शिव के कहने पर भैरव काशी को प्रस्थान किया जहां ब्रह्म हत्या से मुक्ति मिली। रूद्र ने इन्हें काशी का कोतवाल नियुक्त किया। आज भी ये काशी के कोतवाल के रूप में पूजे जाते हैं। इनका दर्शन किये वगैर विश्वनाथ का दर्शन अधूरा रहता है।

Tuesday, 16 December 2014

अगर आप का बच्चा नहीं पढता है तो करे ये उपाय !!

आमतौर पर यह देखने में आता है कि बच्चे पढ़ाई से जी चुराते हैं। यह सिर्फ आपके घर का नहीं बल्कि कई घरों का यही हाल है।अगर आपके बच्चों के साथ भी यही सबकुछ हो रहा है, तो आपको घबराने की कोई आवश्यकता नहीं है। बस एक छोटा-सा उपाय अपनाएं ! आपकी परेशानी दूर हो जाएगी। एक हरे रंग के तोते वाला पोस्टर खरीद कर घर लेकर आए और उसे उत्तर दिशा में लगा दें और प्रयास करे आप का बच्चा ज्यादा उस को देखे ।वास्तु शास्त्र के अनुसार तोते की फोटो को उत्तर दिशा में लगाने से आपके बच्चों की पढ़ाई में रूचि बढ़ने लगेगी, साथ ही उसके स्मरणशक्ति में भी बढ़ोतरी होगी। तोता पालने से भी बुध ग्रह की अनुकूलता बढ़ती है।कुछ ही दिनों में आपको इसका परिणाम दिखाई देगा कि आपके बच्चे का मन पढ़ाई के प्रति जागृत हो गया है। अब वह खेलने-कूदने के साथ-साथ पढ़ाई में भी उतनी ही दिलचस्पी लेने लगेगा।
 

क्या आप जानते है चारो युगो में हनुमानजी कहां रहते हैं !!

श्रीहनुमान श्रीराम-भक्तों के परमधार, रक्षक और श्रीराम-मिलन के अग्रदूत हैं। रुद्र अवतार श्रीहनुमान का बल, पराक्रम, ऊर्जा, बुद्धि, सेवा व भक्ति के अद्भुत व विलक्षण गुणों से भरा चरित्र सांसारिक जीवन के लिए आदर्श माना जाता हैं। यही वजह है कि शास्त्रों में श्रीहनुमान को 'सकलगुणनिधान' भी कहा गया है। हिन्दू पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक श्रीहनुमान 8 चिरंजीवी, सरल शब्दों में कहें तो अमर व दिव्य चरित्रों में एक है। हनुमान उपासना के महापाठ श्रीहनुमान चालीसा में गोस्वामी तुलसीदास ने भी लिखा है कि -
'चारो जुग परताप तुम्हारा है परसिद्ध जगत उजियारा।'
इस चौपाई में साफ संकेत है कि श्रीहनुमान ऐसे देवता है, जो हर युग में किसी न किसी रूप, शक्ति और गुणों के साथ जगत के लिए संकटमोचक बनकर मौजूद रहते हैं। हनुमानजी से जुड़ी यही विलक्षण और अद्भुत बात उनके प्रति आस्था और श्रद्धा गहरी करती है। अब जानिए, श्रीहनुमान किस युग में किस तरह जगत के लिए संकटमोचक बनें और खासतौर पर कलियुग यानी इस युग में श्रीहनुमान कहां बसते हैं !
सतयुग - श्री हनुमान रुद्र अवतार माने जाते हैं। शिव का दु:खों को दूर करने वाला रूप ही रुद्र है। इस तरह कहा जा सकता है कि सतयुग में हनुमान का शिव रुप ही जगत के लिए कल्याणकारी और संकटनाशक रहा।
त्रेतायुग - इस युग में श्री हनुमान को भक्ति, सेवा और समर्पण का आदर्श माना जाता है। शास्त्रों के मुताबिक विष्णु अवतार श्री राम और रुद्र अवतार श्री हनुमान यानी पालन और संहार शक्तियों के मिलन से जगत की बुरी और दुष्ट शक्तियों का अंत हुआ।
द्वापर युग - इस युग में श्रीहनुमान नर और नारायण रूप भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के साथ धर्मयुद्ध में रथ की ध्वजा में उपस्थित रहे। यह प्रतीकात्मक रूप में संकेत है कि श्रीहनुमान इस युग में भी धर्म की रक्षा के लिए मौजूद रहे।
कलियुग - पौराणिक मान्यतओं में कलियुग में श्रीहनुमान का निवास गन्धमादन पर्वत (वर्तमान में रामेश्वरम धाम के नजदीक) पर है। यही नहीं, माना जाता है कि कलियुग में श्रीहनुमान जहां-जहां अपने इष्ट श्रीराम का ध्यान और स्मरण होता है, वहां अदृश्य रूप में उपस्थित रहते हैं। शास्त्रों में उनके गुणों की स्तुति में लिखा भी गया है कि -
'यत्र-यत्र रघुनाथकीर्तनं तत्र-तत्र कृत मस्तकांजलिं।'
 इस तरह श्रीहनुमान का स्मरण हर युग में अलग-अलग रूप और शक्तियों के साथ संकटमोचक बन जगत को विपत्तियों से उबारते रहे हैं।

जीवन का असली उद्देश्य क्या है जानिए !!

जीवन का उद्देश्य नहीं है, केवल खाना-पीना।जीवन का उद्देश्य है जग में, जगना और जगाना।
जगने और जगाने का मतलब है संसार के लोगों को ईश्वरोन्मुख करना। यह कार्य वही कर सकता है जिसे ब्रह्म की अनुभूति हो और जिसमें सेवा समर्पण और परोपकार का भाव हो :-
खुद कमाओ, खुद खाओ- यह मानव की प्रकृति है।
कमाओ नहीं, छीनकर खाओ- यह मानव की विकृति है।
खुद कमाओ, दूसरों को खिलाओ- यही हमारी संस्कृति है।
मानव जीवन की सफलता के लिए समय का सदुपयोग करें। दौलत से रोटी मिल सकती है पर भूख नहीं। दौलत से बिस्तर मिल सकते हैं, पर नींद नहीं। दौलत से गीता की पुस्तक मिल सकती है पर ज्ञान नहीं। दौलत से मंदिर मिल सकता है पर भगवान नहीं।आश्चर्य की बात है कि रुपए बर्बाद होने पर आज के मनुष्य को उसका दुख तो होता है। परंतु व्यर्थ ही इधर-उधर की बातों में समय को बर्बाद करने पर उसको दुख क्यों नहीं होता?जब की ईश्वर ने मानब को बुद्धिमान, ज्ञानवान,बलबान इस लिए नहीं बनाया कि खुद कमाओ खुद खाओ !जब कि उद्देश्य है अपने साथ दूसरे जीवो का भी पालन-पोषण और ईश्वर के सन्मुख रहो !! 

Monday, 15 December 2014

मनुष्य आखिर किसी चीज से डरता है !!

डर से बचने के लिए आपको किसी भगबान की कोई जरूरत नहीं है। आपको बस इतना करना है कि अपने शरीर से थोड़ी सी दूरी बनानी है। आपको अपने मन से भी थोड़ी दूरी बनानी है। एक बार अगर थोड़ी दूरी बन गई, तो फिर आपको भला किस बात का डर होगा !मान लीजिए, आपके पास एक बहुत पुराना कमरा है, आपको हमेशा यह बताया गया कि यह बहुत खराब है इस में कोई अन्दर ना जाये । अगर मैं आकर उस कमरे में चला जाऊ तो क्या होगा? आपके दिल में डर बैठ जाएगा कि अब आपके साथ बुरा होने वाला है। डर जीवन से पैदा नहीं होता है, बल्कि यह आपके भ्रमित मन की उपज है।आप वास्तव में भविष्य के बारे में कुछ नहीं जानते। आप सिर्फ अतीत का एक टुकड़ा लेकर उसे कुछ शक्ल देने की कोशिश करते हैं और सोचते हैं कि यही भविष्य है। आप भविष्य की योजना बना सकते हैं, लेकिन उसमें जी नहीं सकते।लोग भविष्य में जी रहे हैं और यही चीज उनके डर की वजह है। बचने का एक ही तरीका है कि आप वास्तविकता के धरातल पर उतरें। आप पाएंगे कि आप हमेशा ये सोचकर डरते हैं कि आने वाले समय में क्या होगा। आपका डर उस बात को लेकर, जो अभी हुई नहीं है। इसका मतलब है कि फिलहाल इसका कोई अस्तित्व नहीं है। डरने का मतलब है कि आप ऐसी चीज से परेशान हो रहे हैं, जो वास्तव में मौजूद ही नहीं है।

क्या आप को पता है श्रीराम ने सीता का दान किया था !!



अश्वमेघ यज्ञ के दौरान श्रीराम ने घोषणा की कि यदि कोई व्यक्ति अयोध्या का राज्य, पुष्पक विमान, कौस्तुभ मणि, कामधेनु गाय या सीता को मांगेगा तो मैं उसे दे दूंगा। यज्ञ की समाप्ति हुई। फिर श्रीराम ने अपने गुरु वशिष्ठ को चिंतामणि और कामधेनु को दान करने की तैयारी की।वशिष्ठजी के मन में आया कि यदि मैं एक अपूर्व लीला कर श्रीराम की उदारता का प्रदर्शन कराकर उनकी कीर्ति अक्षय कर दूं तो..! ऐसा विचार कर वे बोले- राघव, इस गोदान से मेरी तृप्ति नहीं होगी, तुम्हें देना ही हो तो सभी प्रकार के आभूषणों से सज्जित सीता को दान करो। यह सुन प्रजा में हाहाकार मच गया।इसी बीच श्रीराम ने हंसकर सीताजी को बुलाया और उनका हाथ पकड़कर कहने लगे, हां अब आप स्त्री दान का मंत्र बोलें। मैं सीता को दान कर रहा हूं। वशिष्ठ ने यथाविधि इसका उपक्रम कर दिया। सभी लोग चकित रह गए। इसके बाद श्रीराम ने वशिष्ठ को कामधेनु गाय भी लेने का आग्रह किया, तब वशिष्ठ बोले- श्रीराम मैंने तो तुम्हारी उदारता के प्रदर्शन के लिए यह कौतुहल रचा था।अब तुम सीता का आठ गुना सोना तौलकर इसे वापस ले लो और आज से मेरी आज्ञा से कामधेनु, चिंतामणि, कौस्तुभ मिण, सीता, पुष्पक विमान, अयोध्यापुरी तथा संपूर्ण राज्य किसी को न देना। इन सातों के अतिरिक्त तुम जो चाहो दान करना। श्रीराम ने गुरु की आज्ञा मानकर यज्ञ की शेष प्रक्रिया पूरी की। सार यह है कि धर्मसंकट की स्थिति में भी धर्य रखने से सही निर्णय लेने की क्षमता उत्पन्न होती है और सही निर्णय सकारात्मक परिणाम देता है।

दूध के इन उपायों से दूर हो सकती है दरिद्रता दूर !!


ऐसा माना जाता है कि ज्योतिष के तंत्र शास्त्र में बताए गए उपाय बहुत जल्दी असर दिखाना शुरू कर देते हैं। ये उपाय करते समय सावधानी और विधि का ध्यान रखना चाहिए। ऐसे उपायों की गोपनीयता भी बनाए रखना जरूरी है। जो भी व्यक्ति ये उपाय करता है, उसे किसी अन्य व्यक्ति से इस संबंध में चर्चा नहीं करनी चाहिए। अन्यथा ये उपाय निष्फल हो जाते हैं।
सोमबार को इस प्रकार करे उपाय  !!
शिवजी की कृपा से धन संबंधी बाधाएं दूर करने के लिए कच्चे दूध का यह उपाय करें। हर सोमवार सुबह जल्दी उठें। उठने के बाद नित्य कर्मों से निवृत्त होकर पवित्र हो जाएं। सूर्य को जल अर्पित करें। घर में स्थित देवी-देवताओं का पूजन करें। इसके बाद आपके घर के आसपास किसी भी शिव मंदिर जाएं और वहां शिवलिंग पर कच्चा दूध चढ़ाएं।कच्चा दूध अपने घर से ही साथ लेकर जाएं। शिवलिंग पर दूध चढ़ाने के बाद स्वच्छ जल अर्पित करें। इसके बाद अक्षत, कुमकुम, बिल्व पत्र आदि पूजन सामग्री चढ़ाएं। शिव मंत्र का जप करें। मंत्र- ऊँ नम: शिवाय।शास्त्रों के अनुसार हर सोमवार यह उपाय किया जाए तो आपकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो सकती हैं।
रविवार को करें दूध का इस प्रकार उपाय !!
उपाय के अनुसार आपको रविवार की रात सोते समय 1 गिलास में दूध भरकर अपने सिर के पास रखना है। दूध सावधानी से रखें, नींद में दूध ढुलना नहीं चाहिए।सुबह उठने के बाद नित्य कर्मों से निवृत्त हो जाएं। सूर्य को जल अर्पित करें और इष्टदेवी-देवताओं का पूजन करें। इसके बाद दूध को किसी बबूल के पेड़ की जड़ में डाल दें। ऐसा हर रविवार की रात की कर सकते हैं।
शनिवार को करे दूध का करे इस प्रकार उपाय !!
यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में शनि या राहु-केतु के दोष होते हैं तो उसे कार्यों में आसानी से सफलता नहीं मिल पाती है। इन दोषों को दूर करने के लिए हर शनिवार ये उपाय करें। उपाय के अनुसार किसी पीपल की जड़ में कच्चा दूध अर्पित करें। इसके बाद जल अर्पित करें और पीपल का पूजन करें। पूजन के साथ ही पीपल की कम से कम सात परिक्रमा करें। इस उपाय से शनि दोषों के साथ ही राहु-केतु के दोष भी दूर हो जाते हैं। कालसर्प दोष का असर कम हो जाता है और बुरा समय टल जाता है। इन ग्रहों के दोषों के कारण आ रही धन संबंधी बाधाएं भी दूर हो सकती हैं।

Sunday, 14 December 2014

जानिए धन, विवाह, प्रेम,उन्नति और वीमारी से जुड़े सवालों के जबाव हनुमान ज्योतिष यंत्र से !!

वर्तमान समय में आम आदमी दांपत्य सुख, विवाह में देरी, धन प्राप्ति, प्रेम में सफलता-असफलता, रोगों से मुक्ति आदि कई समस्याओं में उलझा रहता है। इन सभी विषयों को लेकर उसके मन में अनेक सवाल आते हैं, लेकिन कई बार चाहकर भी उसे इन सवालों के जवाब नहीं मिल पाते। कई लोग जन्मपत्रिका, हस्तरेखा, प्रश्न कुंडली, शकुन-अपशकुन के माध्यम से भी इन सवालों के जवाब जानने का प्रयास करते हैं।श्रीहनुमान ज्योतिष यंत्र के माध्यम से व्यक्ति को अपने उन सभी प्रश्नों का उत्तर तुरंत मिल सकता है, जो वह जानना चाहता है। जरूरत है तो बस इस यंत्र पर पूर्ण विश्वास करने की। 
इस यंत्र की उपयोग विधि इस प्रकार है-
यह श्रीहनुमान ज्योतिष यंत्र है, जिसमें सात खाने (कॉलम) हैं। इसका उपयोग करने से पहले पहले पांच बार ऊं रां रामाय नम: मंत्र का तथा बाद में 11 बार ऊं हनुमते नम: मंत्र का जाप करें। इसके बाद आंख बंद करके अपनी मनोकामना के बारे में पूछते हुए इस यंत्र पर कर्सर घुमाएं। जिस खाने में यह कर्सर रुक जाए, उस अंक का फलादेश देखकर ही कार्य करें। यह कार्य पूरी श्रद्धा व विश्वास से करें।
वर्तमान समय में जीवन की सबसे बड़ी आवश्यकता धन है। धन के अभाव में जीवन नरक के समान लगने लगता है। आपके जीवन में कब धन का आगमन होगा। इसका उत्तर इस प्रकार है-
1- धन प्राप्ति में विलंब होगा।
2- दूसरों की मदद करने से लाभ मिलेगा।
3- आपके पास धन है और धन की प्राप्ति होगी।
4- कर्म पर ध्यान दें। इसी से धन की प्राप्ति होगी।
5- हर कार्य खुशी से करें। लक्ष्मी अवश्य प्रसन्न होगी।
6- आपका धन सुरक्षित है। चिंता न करें।
7- धन के लिए किसी से विवाद न करें। समय आने पर धन की प्राप्ति होगी।
आज के समय में पति-पत्नी के रिश्तों में दूरियां बढ़ती जा रही है। दांपत्य जीवन एकदम नीरस हो चुका है। दांपत्य जीवन से संबंधी प्रश्नों के उत्तर इस प्रकार हैं-
1- दांपत्य प्रेम में वृद्धि होगी।
2- आपका दांपत्य जीवन सुखपूर्वक बीतेगा।
3- जीवनसाथी के आने से भाग्योदय होगा और प्रेम भी बढ़ेगा।
4- परायों के कारण परेशानी होगी।
5- वाणी में मधुरता रखें अन्यथा मतभेद और बढ़ेंगे। ऊं नम: शिवाय मंत्र का जाप करें।
6- पैसों को लेकर तनाव और कलह रहेगी।
7- दाम्पत्य में खुशियां मिलेंगी।
हर किसी के जीवन में ऐसे अवसर जरूर आता है कि जब उसे यह जानने की उत्सुकता रहती है कि उसे प्यार में सफलता मिलेगी या असफलता हाथ लगेगी। प्रेम से संबंधित प्रश्नों के उत्तर इस प्रकार हैं-
1- प्रेम में सफलता का योग है।
2- तीसरे व्यक्ति के बीच से हटने के बाद ही सफलता मिलेगी।
3- अभी सफलता प्राप्त होने में देरी है।
4- प्रेम विवाह का परिणाम अच्छा रहेगा।
5- प्रेम विवाह में बाधा होगी।
6- सफलता मिलेगी, लेकिन देरी से।
7- आसानी से सफलता मिलेगी।
हर व्यक्ति के जीवन में अच्छा व बुरा समय आता है। ऐसे में हर व्यक्ति यह जानना चाहता है कि बुरा समय कब समाप्त होगा। जानिए आपका बुरा समय कब समाप्त होगा-
1- आलस्य छोड़ें, काम करें। छ: माह में सफलता मिलने लगेगी।
2- अपनों की सलाह से चलें, मनमानी और जिद छोड़ें।
3- भाग्य अभी साथ नहीं है। थोड़े समय बाद अनुकूल होगा।
4- बुजुर्गों का आदर करें तथा दान-पुण्य करें, लाभ मिलेगा।
5- पत्नी की सहायता से बुरा समय जल्दी ही कट जाएगा।
6- दो साल तक और अच्छे समय का इंतजार करना पड़ेगा।
7- शीघ्र ही आपका समय अच्छा आने वाला है।
कभी-कभी रोग इंसान को इतना परेशान कर देते हैं कि वह अपने आप को असहाय समझने लगता है। रोग से संबंधित आपके प्रश्न के उत्तर इस प्रकार हैं-
1- रोग का उपाय करें, लाभ मिलेगा।
2- भक्ति में ही शक्ति है, इष्टदेव की भक्ति एवं उपासना करें। रोग से मुक्ति मिलेगी।
3- रोग गंभीर है, भारी परेशानी रहेगी।
4- अभी स्वस्थ होने में कम से कम छ: माह लगेंगे।
5- उपचार में परिवर्तन करें, शीघ्र लाभ मिलेगा।
6- दूसरे स्थान पर जाएं, जलवायु बदलने से लाभ मिलेगा।
7- प्रारब्ध का फल है। मुक्ति मिलना कठिन है।

Thursday, 11 December 2014

प्रिय भक्तो विवाह का मांगलिक प्रसंग हो या परिवार में नन्हे मेहमान के आगमन की खुशी, व्यापार हो या कोई जीवन का कोई भी महत्वपूर्ण कार्य सनातन धर्म में ज्योतिष शास्त्र के अनुसार ही सभी कार्य संपन्न होते हैं । बालाजी कृपा अपने भक्तो के लिए पत्रिका मिलान और जन्मकुंडली बनाने की, कुण्डली देखने की तथा सभी प्रकार के दोषो का निवारण की सुविधा उपलब्ध करवा रहा है। इसके लिए आप बालाजी कृपा पर सम्पर्क कर सकते है !!और किसी भी प्रकार की जानकारी बहुत आशानी से प्राप्त कर सकते है !!

मंत्र-जप कैसे करें और कहा पर करे !!


मंत्र तो हम सभी जपते है। लेकिन अगर कुछ बातों का ध्यान रखा जाए तो वे मंत्र हमारे लिए बहुत फायदेमंद साबित हो सकते हैं। जप तीन प्रकार का होता है- वाचिक, उपांशु और मानसिक। वाचिक जप धीरे-धीरे बोलकर होता है। उपांशु-जप इस प्रकार किया जाता है, जिसे दूसरा न सुन सके। मानसिक जप में जीभ और ओष्ठ नहीं हिलते। तीनों जपों में पहले की अपेक्षा दूसरा और दूसरे की अपेक्षा तीसरा प्रकार श्रेष्ठ है। प्रातःकाल दोनों हाथों को उत्तान कर, सायंकाल नीचे की ओर करके तथा मध्यान्ह में सीधा करके जप करना चाहिए। प्रातःकाल हाथ को नाभि के पास, मध्यान्ह में हृदय के समीप और सायंकाल मुँह के समानांतर में रखे। घर में जप करने से एक गुना, गौशाला में सौ गुना, पुण्यमय वन या बगीचे तथा तीर्थ में हजार गुना, पर्वत पर दस हजार गुना, नदी-तट पर लाख गुना, देवालय में करोड़ गुना तथा शिवलिंग के निकट अनंत गुना फल प्राप्त होता है। जप की गणना के लिए लाख, कुश, सिंदूर और सूखे गोबर को मिलाकर गोलियाँ बना लें। जप करते समय दाहिने हाथ को जप माली में डाल लें अथवा कपड़े से ढँक लेना आवश्यक होता है। जप के लिए माला को अनामिका अँगुली पर रखकर अँगूठे से स्पर्श करते हुए मध्यमा अँगुली से फेरना चाहिए। सुमेरु का उल्लंघन न करें। तर्जनी न लगाएँ। सुमेरु के पास से माला को घुमाकर दूसरी बार जपें।
विशेष :=====
जप करते समय हिलना, डोलना, बोलना, क्रोध न करें, मन में कोई गलत विचार या भावना न बनाएँ अन्यथा जप करने का कोई भी फल प्राप्त न होगा।

Wednesday, 10 December 2014

घर में मंदिर बनाते समय और पूजा करते समय ध्यान रखना चाहिए ये नियम !!

अधिकांश घरों में देवी-देवताओं के लिए एक अलग स्थान होता है। कुछ घरों में छोटे-छोटे मंदिर बनवाए जाते हैं। नियमित रूप से घर के मंदिर में पूजन करने पर चमत्कारी रूप से शुभ फल प्राप्त होते हैं। वातावरण पवित्र बना रहता है, जिससे महालक्ष्मी सहित सभी दैवीय शक्तियां घर पर अपनी कृपा बनाए रखती हैं। यहां कुछ ऐसी बातें बताई जा रही हैं जो घर के मंदिर ध्यान रखनी चाहिए। यदि इन छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखा जाता है तो पूजन का श्रेष्ठ फल प्राप्त होता है और लक्ष्मी की कृपा से घर में धन-धान्य की कमी नहीं होती है।
पूजा करते समय किस दिशा की ओर होना चाहिए अपना मुंह !!
घर में पूजा करने वाले व्यक्ति का मुंह पश्चिम दिशा की ओर होगा तो बहुत शुभ रहता है। इसके लिए पूजा स्थल का द्वार पूर्व की ओर होना चाहिए। यदि यह संभव ना हो तो पूजा करते समय व्यक्ति का मुंह पूर्व दिशा में होगा, तब भी श्रेष्ठ फल प्राप्त होते हैं।
कैसी मूर्तियां रखनी चाहिए मंदिर में !!
घर के मंदिर में ज्यादा बड़ी मूर्तियां नहीं रखनी चाहिए। शास्त्रों के अनुसार बताया गया है कि यदि हम मंदिर में शिवलिंग रखना चाहते हैं तो शिवलिंग हमारे अंगूठे के आकार से बड़ा नहीं होना चाहिए। शिवलिंग बहुत संवेदनशील होता है और इसी वजह से घर के मंदिर में छोटा-सा शिवलिंग रखना शुभ होता है। अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियां भी छोटे आकार की ही रखनी चाहिए। अधिक बड़ी मूर्तियां बड़े मंदिरों के लिए श्रेष्ठ रहती हैं, लेकिन घर के छोटे मंदिर के छोटे-छोटे आकार की प्रतिमाएं श्रेष्ठ मानी गई हैं।
मंदिर तक पहुंचनी चाहिए सूर्य की रोशनी और ताजी हवा !!
घर में मंदिर ऐसे स्थान पर बनाया जाना चाहिए, जहां दिनभर में कभी भी कुछ देर के लिए सूर्य की रोशनी अवश्य पहुंचती हो। जिन घरों में सूर्य की रोशनी और ताजी हवा आती रहती है, उन घरों के कई दोष स्वत: ही शांत हो जाते हैं। सूर्य की रोशनी से वातावरण की नकारात्मक ऊर्जा खत्म होती है और सकारात्मक ऊर्जा में बढ़ोतरी होती है।
पूजन सामग्री से जुड़ी खास बातें !!
पूजा में बासी फूल, पत्ते अर्पित नहीं करना चाहिए। स्वच्छ और ताजे जल का ही उपयोग करें। इस संबंध में यह बात ध्यान रखने योग्य है कि तुलसी के पत्ते और गंगाजल कभी बासी नहीं माने जाते हैं। अत: इनका उपयोग कभी भी किया जा सकता है। शेष सामग्री ताजी ही उपयोग करनी चाहिए। यदि कोई फूल सूंघा हुआ है या खराब है तो वह भगवान को अर्पित न करें।
पूजन कक्ष में नहीं ले जाना चाहिए ये चीजें !!
घर में जिस स्थान पर मंदिर है, वहां चमड़े से बनी चीजें, जूते-चप्पल नहीं ले जाना चाहिए। मंदिर में मृतकों और पूर्वजों के चित्र भी नहीं लगाना चाहिए। पूर्वजों के चित्र लगाने के लिए दक्षिण दिशा क्षेत्र रहती है। घर में दक्षिण दिशा की दीवार पर मृतकों के चित्र लगाए जा सकते हैं, लेकिन मंदिर में नहीं रखना चाहिए।
पूजन कक्ष में पूजा से संबंधित सामग्री ही रखना चाहिए। अन्य कोई वस्तु रखने से बचना चाहिए।
पूजन कक्ष के आसपास शौचालय नहीं होना चाहिए !!
घर के मंदिर के आसपास शौचालय होना भी अशुभ रहता है। अत: ऐसे स्थान पर पूजन कक्ष बनाएं, जहां आसपास शौचालय न हो।यदि किसी छोटे कमरे में पूजा स्थल बनाया गया है तो वहां कुछ स्थान खुला होना चाहिए, जहां आसानी से बैठा जा सके।
रोज रात को मंदिर पर ढंके पर्दा !!
रोज रात को सोने से पहले मंदिर को पर्दे से ढंक देना चाहिए। जिस प्रकार हम सोते समय किसी प्रकार का व्यवधान पसंद नहीं करते हैं, ठीक उसी भाव से मंदिर पर पर्दा ढंक देना चाहिए।
सभी मुहूर्त में करें गौमूत्र का ये उपाय !!
वर्षभर में जब भी श्रेष्ठ मुहूर्त आते हैं, तब पूरे घर में गौमूत्र का छिड़काव करना चाहिए। गौमूत्र के छिड़काव से पवित्रता बनी रहती है और वातावरण सकारात्मक हो जाता है। शास्त्रों के अनुसार गौमूत्र बहुत चमत्कारी होता है और इस उपाय घर पर दैवीय शक्तियों की विशेष कृपा होती है।
खंडित मूर्तियां ना रखें !!
शास्त्रों के अनुसार खंडित मूर्तियों की पूजा वर्जित की गई है। जो भी मूर्ति खंडित हो जाती है, उसे पूजा के स्थल से हटा देना चाहिए और किसी पवित्र बहती नदी में प्रवाहित कर देना चाहिए। खंडित मूर्तियों की पूजा अशुभ मानी गई है। इस संबंध में यह बात ध्यान रखने योग्य है कि सिर्फ शिवलिंग कभी भी, किसी भी अवस्था में खंडित नहीं माना जाता है।
पूजन के बाद पूरे घर में कुछ देर बजाएं घंटी !!
 यदि घर में मंदिर है तो हर रोज सुबह और शाम पूजन अवश्य करना चाहिए। पूजन के समय घंटी अवश्य बजाएं। साथ ही, एक बार पूरे घर में घूमकर भी घंटी बजानी चाहिए। ऐसा करने पर घंटी की आवाज से नकारात्मकता नष्ट होती है और सकारात्मकता बढ़ती है।

Monday, 8 December 2014

बर्ष 2015 में किस पर रहेगी शनि की नजर और किसे होगा फायदा, जानिए !

ज्योतिष शास्त्र में शनिदेव को न्याय का देवता माना गया है क्योंकि मनुष्यों को उनके अच्छे-बुरे कर्मों का दंड शनिदेव ही देते हैं। साल 2015 में शनि वृश्चिक राशि में चलायमान रहेगा। इस दौरान 14 मार्च से 15 अगस्त 2015 तक शनि की स्थिति वक्रीय रहेगी। जानिए साल 2015 में शनिदेव किस प्रकार आपकी राशि को प्रभावित करेंगे-
मेष राशि:====
साल 2015 में शनिदेव आपकी राशि से आठवे स्थान में चलायमान रहेंगे। शनि की ढय्या आप पर चल रही है। अष्टम शनि के प्रभाव से शत्रु पीड़ा पहुंचाएंगे। अष्टम शनि जहां एक ओर स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं रहेगा वहीं दूसरी ओर दशम भाव पर दृष्टि भी व्यवसाय व नौकरी में उतार-चढ़ाव की स्थिति निर्मित करेगा। नौकरी व व्यवसाय में लक्ष्य प्राप्ति बहुत कठिनता से होगी।14 मार्च से 15 अगस्त से बीच शनि वक्र स्थिति में रहेगा। इस दौरान कोई बड़ी हानि हो सकती है। परिवार में या किसी नजदीकी रिश्तेदार या मित्र की क्षति भी संभव है। कोई काम होते-होते रह जाएगा। संपत्ति से संबंधित विवाद भी हो सकते हैं। शनि की पंचम स्थान पर दृष्टि संतान के प्रति चिंता बढ़ाएगी। अधिकारी आपके काम से नाखुश रहेंगे।

उपाय:====
1- सवा पांच रत्ती का नीलम या उपरत्न (नीली) सोना, चांदी या तांबे की अंगूठी में अभिमंत्रित करवा कर धारण करें।
2- शनि यंत्र के साथ नीलम या फिरोजा रत्न गले में लॉकेट की आकृति में पहन सकते हैं, यह उपाय भी उत्तम है।
3- किसी भी विद्वान ब्राह्मण से या स्वयं शनि के तंत्रोक्त, वैदिक मंत्रों के 23000 जाप करें या करवाएं। ये है शनि का तंत्रोक्त मंत्र- ऊँ प्रां प्रीं स: श्नैश्चराय नम:
4- शनिवार को व्रत रखें। चींटियों को आटा डालें।
5- जूते, काले कपड़े, मोटा अनाज व लोहे के बर्तन दान करें।
वृषभ राशि:====
साल 2015 में शनिदेव आपकी राशि से गोचरवश सातवे स्थान पर गतिशील रहेंगे। इसके कारण आपके स्वास्थ्य में सुधार रहेगा, लेकिन परिवार में किसी को रोग होने की संभावना बन सकती है, जिसके कारण आप चिंतित रहेंगे। इस साल परिवार के लोगों में विवाद बढ़ेंगे। पति-पत्नी के बीच भी दूरियां बढ़ सकती हैं। हालांकि व्यापार व नौकरी के लिए साल 2015 ठीक रह सकता है। इस साल आपको लाभ के प्रबल योग बन रहे हैं।नौकरी व कार्यक्षेत्र में सहकर्मी आपके काम की प्रशंसा करेंगे। वहीं अधिकारी भी आपके काम से खुश रहेंगे। घर-परिवार में किसी बुजुर्ग सदस्य का गिरता हुआ स्वास्थ्य आपकी चिंता का कारण बन सकता है। किसी पर जरूरत से ज्यादा भरोसा हानि का कारण बन सकता है। शनि की वक्र स्थिति (14 मार्च से 15 अगस्त) में कोई भी निर्णय बड़ी सोच-समझकर लें। पैरों से संबंधित कष्ट हो सकते हैं।

उपाय:====
1- शनिवार के दिन काले घोड़े की नाल या समुद्री नाव की कील से लोहे की अंगूठी बनवाएं। उसे तिल्ली के तेल में सात दिन शनिवार से शनिवार तक रखें तथा उस पर शनि मंत्र के 23000 जाप करें। शनिवार के दिन शाम के समय इसे धारण करें।
2- यह अंगूठी मध्यमा (शनि की अंगुली) में ही पहनें तथा इसके लिए पुष्य, अनुराधा, उत्तरा, भाद्रपद एवं रोहिणी नक्षत्र सर्वश्रेष्ठ है।
3- किसी भी विद्वान ब्राह्मण से या स्वयं शनि के तंत्रोक्त, वैदिक मंत्रों के 23000 जाप करें या करवाएं।
मंत्र-  ऊं ऐं ह्लीं श्रीशनैश्चराय नम:।
मिथुन राशि:====
साल 2015 मिथुन राशि वालों के लिए उन्नति प्रदान करने वाला रहेगा। साल भर छठे भाव में शनि की स्थिति से शत्रु व षडय़ंत्र करने वाले परास्त हो जाएंगे। इस साल आपको कई उपलब्धियां मिलेंगी। मिथुन राशि के लोग इस साल जीतोड़ मेहनत करेंगे और उसका फल भी उन्हें मिलेगा। व्यापार बढ़ाने की जो योजना आप बना रहे थे, उसे पूरा करने का समय अब आ गया है। नौकरी व कार्यक्षेत्र में भी आपको आगे बढऩे के अवसर मिलेंगे। अधिकारी आपके काम से खुश रहेंगे। 14 मार्च से 15 अगस्त के बीच शनि की वक्र स्थिति में परिवार के किसी बुजुर्ग सदस्य के स्वास्थ्य को लेकर चिंता रहेगी। अगस्त के बाद धन का निवेश करेंगे, उसका फायदा आपको आगे जाकर मिलेगा। अगस्त के बाद का समय घर-परिवार के लिए भी सुख-समृद्धि देने वाला रहेगा।

उपाय:====
 1- शनि के दुष्प्रभाव को कम करने के लिए 7 प्रकार के अनाज व दालों को मिश्रित करके पक्षियों को चुगाएं।
2- बैंगनी रंग का सुगंधित रूमाल अपने पास रखें।
3- शनिदेव के सामने खड़े रहकर दर्शन न करें। एक ओर खड़े रहकर दर्शन करें जिससे की शनिदेव की दृष्टि सीधे आप पर नहीं पड़े।
4- सवा पांच रत्ती का नीलम या उपरत्न (नीली) सोना, चांदी या तांबे की अंगूठी में अभिमंत्रित करवा कर धारण करें।
कर्क राशि:====
साल 2015 में शनि का परिभ्रमण आपकी राशि में पंचम स्थान में रहेगा। इसलिए ये साल आपके लिए उन्नति देने वाला रहेगा। मित्र व सहयोगी आपके काम में सहायता करेंगे। नौकरी व व्यवसाय में नई तकनीक व हुनर का इस्तेमाल कर आप अपनी महत्त्वकांक्षा पूरी करेंगे। कार्यक्षेत्र में आपको नए अवसर मिलने की पूरी-पूरी संभावना बन रही है।नौकरी में प्रमोशन भी हो सकता है। कर्क राशि के विद्यार्थियों को इस समय पूरा ध्यान अपनी पढ़ाई पर लगाना चाहिए। पति-पत्नी के बीच संबंध मधुर होंगे। भाइयों में विवाद संभव है। स्वास्थ्य भी अपेक्षाकृत ठीक ही रहेगा। खान-पान पर विशेष ध्यान रखें। क्रोध व आवेश में आकर कोई गलत कदम न उठाएं। शत्रु व षडयंत्रकारियों से सावधान रहें।

उपाय:====
1- प्रत्येक शनिवार को शाम के समय बड़ (बरगद) और पीपल के पेड़ के नीचे सूर्योदय से पहले स्नान आदि करने के बाद सरसों के तेल का दीपक लगाएं और दूध एवं धूप आदि अर्पित करें।
2- काले धागे में बिच्छू घास की जड़ को अभिमंत्रित करवा कर शनिवार के दिन श्रवण नक्षत्र में या शनि जयंती के शुभ मुहूर्त में धारण करने से भी शनि संबंधी सभी कार्यों में सफलता मिलती है।
3- शनिवार के दिन इन 10 नामों से शनिदेव का पूजन करें-
कोणस्थ पिंगलो बभ्रु: कृष्णो रौद्रोन्तको यम:।
सौरि: शनैश्चरो मंद: पिप्पलादेन संस्तुत:।।
अर्थात: 1- कोणस्थ, 2- पिंगल, 3- बभ्रु, 4- कृष्ण, 5- रौद्रान्तक, 6- यम, 7, सौरि, 8- शनैश्चर, 9- मंद व 10- पिप्पलाद। इन दस नामों से शनिदेव का स्मरण करने से सभी शनि दोष दूर हो जाते हैं।
सिंह राशि:====
साल 2015 में शनि की ढय्या का प्रभाव आपकी राशि पर रहेगा। इसलिए ये साल आपके लिए अच्छा नहीं कहा जा सकता। व्यापार व कार्यक्षेत्र में हानि के योग बन रहे हैं। कोई नया काम करने की योजना बनेगी, लेकिन बात बनते-बनते रुक जाएगी। इस साल अधिकारी की नाराजगी का खामियाजा आपको उठाना पड़ सकता है। इसलिए अपना काम मन लगाकर करते रहे। हालांकि पारिवारिक दृष्टिकोण से समय अनुकूल है।घर-परिवार के लोग मुश्किल समय में आपका साथ देंगे। विद्यार्थी मन लगाकर सिर्फ पढ़ाई पर ध्यान दें। संतान का व्यवहार, अध्ययन, विवाह आदि आपकी चिंता का कारण रहेगा। कामकाज की भागदौड़ में स्वास्थ्य का ध्यान रखें। वाहन का प्रयोग सावधानी से करें। व्यापार में निवेश से पहले अच्छी तरह से सोच लें।

उपाय:====
1- काली गाय की सेवा करने से शनिदेव प्रसन्न होते हैं। उसके शीश पर रोली लगाकर सींगों में कलावा बांधकर धूप-आरती करनी चाहिए। फिर परिक्रमा करके गाय को बूंदी के चार लड्डू खिला दें।
2- हर शनिवार उपवास रखें। सूर्यास्त के बाद हनुमानजी का पूजन करें। पूजन में सिंदूर, काली तिल्ली का तेल, इस तेल का दीपक एवं नीले रंग के फूल का प्रयोग करें।
3- सवा पांच रत्ती का नीलम या उपरत्न(नीली) सोना, चांदी या तांबे की अंगूठी में अभिमंत्रित करवा कर धारण करें।
4- जूते, काले कपड़े, मोटा अनाज व लोहे के बर्तन दान करें।
कन्या राशि:====
साल 2015 कन्या राशि वालों के लिए अनुकूल फल देने वाला रहेगा। हालांकि स्वास्थ्य को लेकर चिंता जरूर रहेगी, पुराने रोग फिर से उभर सकते हैं। नौकरी व व्यापार में स्थितियां आपके पक्ष में रहेंगी। व्यापार में कोई बड़ा फायदा होने के योग बन सकते हैं। आर्थिक स्थिति पहले से बेहतर रहेगी। पैसों की आवक बनी रहेगी। घर-परिवार में हालात संतोषजनक रहेंगे। पति-पत्नी में आपसी सामंजस्य बना रहेगा। नौकरी में कोई महत्वपूर्ण पद या कार्य आपको मिल सकता है। कुछ लोग आपकी तरक्की से जलकर षडय़ंत्र रच सकते हैं इसलिए बचकर रहें तो बेहतर रहेगा। माता-पिता के स्वास्थ्य को लेकर चिंता बनी रहेगी। इस वर्ष यात्राओं के योग बन रहे हैं। ये यात्राएं परेशानी बढ़ाने वाली रहेगी। विद्यार्थियों के लिए समय अनुकूल रहेगा।

उपाय:====
1- शनिवार के दिन बंदरों और काले कुत्तों को लड्डू खिलाने से भी शनि का कुप्रभाव कम हो जाता है अथवा काले घोड़े की नाल या नाव में लगी कील से बना छल्ला धारण करें।
2- शुक्रवार की रात काले चने पानी में भिगो दे। शनिवार को ये चने, कच्चा कोयला, हल्की लोहे की पत्ती एक काले कपड़े में बांधकर मछलियों के तालाब में डाल दें। यह टोटका पूरा एक साल करें। इस दौरान भूल से भी मछली का सेवन न करें।
3- किसी भी विद्वान ब्राह्मण से या स्वयं शनि के तंत्रोक्त, वैदिक मंत्रों के 23000 जाप करें या करवाएं। ये है शनि का तंत्रोक्त मंत्र-  ऊं प्रां प्रीं स: श्नैश्चराय नम:
4- शनिवार को व्रत रखें। चींटियों को आटा डालें। 
तुला राशि:====
शनि की साढ़ेसाती का प्रभाव साल 2015 में तुला राशि पर साफ-साफ दिखाई दे रहा है। इस साल स्वास्थ्य को लेकर आपकी परेशानियां बढ़ सकती हैं साथ ही धन भाव में शनि की स्थिति के कारण धन नाश के योग भी बन रहे हैं। नौकरी व व्यापार में भी स्थिति अनुकूल नहीं रहेगी। प्रत्येक काम में अड़चन आएगी और निराशा हाथ लगेगी। नौकरीपेशा लोग सावधान रहें, शत्रु आपके विरुद्ध षडय़ंत्र रच सकते हैं या झूठा आरोप लगा सकते हैं। घर-परिवार में खुशहाली रहेगी, पारिवारिक दृष्टिकोण से यह साल अच्छा रहेगा। विपरीत परिस्थिति में घर वाले आपकी हरसंभव मदद करेंगे। स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए योग-व्यायाम करेंगे तो ठीक रहेगा। वाहन सावधानी से चलाएं।

उपाय:====
1- शनिवार के दिन सवा-सवा किलो काले चने अलग-अलग तीन बर्तनों में भिगो दें। इसके बाद नहाकर, साफ वस्त्र पहनकर शनिदेव का पूजन करें और चनों को सरसौं के तेल में छौंक कर इनका भोग शनिदेव को लगाएं और अपनी समस्याओं के निवारण के लिए प्रार्थना करें। इसके बाद पहला सवा किलो चना भैंसे को खिला दें। दूसरा सवा किलो चना कुष्ट रोगियों में बांट दें और तीसरा सवा किलो चना अपने ऊपर से उतारकर किसी सुनसान स्थान पर रख आएं। इस टोटके को करने से शनिदेव के प्रकोप में अवश्य कमी होगी।
2- सवा किलो काला कोयला, एक लोहे की कील एक काले कपड़े में बांधकर अपने सिर पर से घुमाकर बहते हुए जल में प्रवाहित कर दें।
वृश्चिक राशि:====
वृश्चिक राशि वालों को साल 2015 में शनि की साढ़ेसाती का प्रभाव रहेगा। नौकरी व व्यापार में संघर्ष की स्थिति बन सकती है। लक्ष्यों को पूरा करने का दबाव आप पर बना रहेगा। आप जीतोड़ मेहनत करने के बाद भी अपने अधिकारियों को खुश नहीं कर पाएंगे। 14 मार्च से 15 अगस्त के बीच शनि वक्रीय होकर स्वास्थ्य संबंधित परेशानियां उत्पन्न करेगा।पारिवारिक दृष्टि से साल 2015 आपके लिए ठीक रहेगा। परिवार में मांगलिक प्रसंग हो सकता है। नौकरी में अधिकारी के साथ तालमेल का अभाव रह सकता है। विरोधियों से सावधान रहें तो बेहतर रहेगा। व्यापार में निवेश करते समय सोच-समझकर निर्णय लें। फिजूलखर्ची पर नियंत्रण रखें। जितनी मेहनत करेंगे, फल उतना नहीं मिलने से परेशान रहेंगे।

उपाय:====
1- शनिवार के दिन शनि यंत्र की स्थापना व पूजन करें। इसके बाद प्रतिदिन इस यंत्र की विधि-विधान पूर्वक पूजा करने से शनिदेव प्रसन्न होते हैं। प्रतिदिन यंत्र के सामने सरसों के तेल का दीप जलाएं। नीला या काला पुष्प चढ़ाएं ऐसा करने से लाभ होगा।
2- शनिवार या शनि जयंती के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर कुश (एक प्रकार की घास) के आसन पर बैठ जाएं। सामने शनिदेव की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें व उसकी पंचोपचार से विधिवत पूजन करें। इसके बाद रुद्राक्ष की माला से नीचे लिखे किसी एक मंत्र की कम से कम पांच माला जाप करें तथा शनिदेव से सुख-संपत्ति के लिए प्रार्थना करें। यदि प्रत्येक शनिवार को इस मंत्र का इसी विधि से जप करेंगे तो शीघ्र लाभ होगा।
वैदिक मंत्र- ऊँ शन्नोदेवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये शन्योरभिस्त्रवन्तु न:।
धनु राशि:====
साल 2015 में धनु राशि पर शनि की साढ़ेसाती का प्रभाव रहेगा, जिसके चलते स्वास्थ्य में निराशा व नकारात्मकता रहेगी। कोई पुराना रोग फिर से उभर सकता है। नौकरी व व्यापार में स्थितियां आपके पक्ष में नहीं रहेंगी। बिजनेस पार्टनर आपको धोखा दे सकता है। कर्मचारियों की गतिविधियों पर नजर रखें। मित्र व सहयोगी आपकी सहायता करेंगे। घर के किसी सदस्य का स्वास्थ्य कमजोर हो सकता है।आप जी-तोड़ मेहनत करेंगे, लेकिन परिणाम आपके पक्ष में नहीं रहेंगे। अगर आप व्यापार बढ़ाने के बारे में सोच रहें हैं तो इसमें परेशानियां आएंगी। आर्थिक स्थिति भी कमजोर रहेगी। किसी से कर्ज लेना पड़ सकता है। कुल मिलाकर शनि की साढ़ेसाती का प्रभाव व्यापार, नौकरी, घर-परिवार, स्वास्थ्य सभी पर दिखाई देगा।

उपाय:====
1- शनिवार के दिन किसी हनुमान मंदिर में जाकर हनुमान चालीसा का पाठ करें और शनि दोष की शांति के लिए हनुमानजी से प्रार्थना करें। बूंदी के लड्डू का भोग भी लगाएं।
2- शनिवार के दिन ग्यारह साबूत नारियल बहते हुए जल में प्रवाहित करें और शनिदेव से जीवन को सुखमय बनाने के लिए प्रार्थना करें।
3- प्रत्येक शनिवार को शाम के समय बड़ (बरगद) और पीपल के पेड़ के नीचे सूर्योदय से पहले स्नान आदि करने के बाद कड़वे तेल का दीपक लगाएं और दूध एवं धूप आदि अर्पित करें।
4- सवा पांच रत्ती का नीलम या उपरत्न(नीली) सोना, चांदी या तांबे की अंगूठी में अभिमंत्रित करवा कर धारण करें।
मकर राशि:====
साल 2015 मकर राशि वालों के लिए उन्नति देने वाला रहेगा। इस साल आपको कोई शुभ समाचार भी मिल सकता है। शनि इस वर्ष आपकी राशि में एकादश स्थान में गतिशील रहेंगे। 14 मार्च से 15 अगस्त के बीच शनि वक्र स्थिति में आपके लिए परेशानी खड़ी कर सकता है। इस दौरान वाहन सावधानी से चलाएं।स्वास्थ्य की दृष्टि से यह साल आपके लिए अपेक्षाकृत ठीक रहेगा। व्यापार में भी अतिविश्वास हानि का कारण बन सकता है। मित्रों व सहयोगियों का इस साल आपको सहयोग मिलेगा। शत्रु भी आपके आगे टिक नहीं पाएंगे। हालांकि साल भर पैसों का उतार-चढ़ाव बना रहेगा। घर-परिवार का वातावरण आपके अनुकूल रहेगा।

उपाय:====
1- शमी वृक्ष की जड़ को विधि-विधान पूर्वक घर लेकर आएं। शनिवार के दिन श्रवण नक्षत्र में या शनि जयंती के दिन किसी योग्य विद्वान से अभिमंत्रित करवा कर काले धागे में बांधकर गले या बाजू में धारण करें। शनिदेव प्रसन्न होंगे तथा शनि के कारण जितनी भी समस्याएं हैं, उनका निदान होगा।
2- काले धागे में बिच्छू घास की जड़ को अभिमंत्रित करवा कर शनिवार के दिन श्रवण नक्षत्र में या शनि जयंती के शुभ मुहूर्त में धारण करने से भी शनि संबंधी सभी कार्यों में सफलता मिलती है।
3- शनिवार के दिन इन 10 नामों से शनिदेव का पूजन करें-
कोणस्थ पिंगलो बभ्रु: कृष्णो रौद्रोन्तको यम:।
सौरि: शनैश्चरो मंद: पिप्पलादेन संस्तुत:।।
अर्थात: 1- कोणस्थ, 2- पिंगल, 3- बभ्रु, 4- कृष्ण, 5- रौद्रान्तक, 6- यम, 7, सौरि, 8- शनैश्चर, 9- मंद व 10- पिप्पलाद। इन दस नामों से शनिदेव का स्मरण करने से सभी शनि दोष दूर हो जाते हैं। 
कुंभ राशि:====
साल 2015 में शनि आपकी राशि से दसवे भाव में चलायमान रहेगा। शनि का यह परिभ्रमण आपके लिए शुभ फल देने वाला रहेगा। इस साल आपके आय के स्त्रोत बढ़ सकते हैं। व्यापार बढ़ाने की जो योजना आप काफी समय से बना रहे हैं, उसे साकार करने का समय आ गया है। आर्थिक रूप से भी यह साल आपके लिए अच्छा ही रहेगा।इस साल मित्र आपको भरपूर सहयोग देंगे। शनि की वक्र स्थिति (14 मार्च से 15 अगस्त) में कोई बुरा समाचार मिल सकता है। इस दौरान स्वास्थ्य का भी ध्यान रखें। सरकारी नौकरी वाले लोगों को काम में लापरवाही बरतने पर नुकसान हो सकता है। विद्यार्थियों के लिए भी इस साल सफलता का कोई विशेष योग नहीं बन रहे हैं।

उपाय:====
1- शनिवार के दिन बंदरों और काले कुत्तों को लड्डू खिलाने से भी शनि का कुप्रभाव कम हो जाता है अथवा काले घोड़े की नाल या नाव में लगी कील से बना छल्ला धारण करें।
2- शनि यंत्र के साथ नीलम या फिरोजा रत्न गले में लॉकेट की आकृति में पहन सकते हैं, यह उपाय भी उत्तम है।
3- बैंगनी रंग का सुगंधित रूमाल अपने पास रखें।
4- शनिदेव के सामने खड़े रहकर दर्शन न करें, एक ओर खड़े रहकर दर्शन करें, जिससे की शनिदेव की दृष्टि सीधे आप पर नहीं पड़े।
5- शनिवार के दिन हनुमानजी को चोला चढ़ाएं। चोले में सरसों या चमेली के तेल का उपयोग करें और इन तेलों से ही दीपक भी जलाएं।
मीन राशि:====
साल 2015 में शनि आपकी राशि से नवम भाव में चलायमान रहेगा। भाग्योदय व उन्नति के अवसर आपको इस साल मिल सकते हैं। जो काम आप हाथ में लेंगे, उसे पूरा करके ही दम लेंगे। इस साल परिश्रम के साथ-साथ भाग्य भी आपका साथ दे रहा है। व्यापार में विस्तार को जो योजना आपने बनाई है, वह पूरी हो सकती है। नौकरी में आगे बढऩे के अवसर मिलेंगे। अधिकारी भी आपके काम से खुश होंगे। इस साल आप किसी महत्वपूर्ण कार्य की योजना बनाएंगे। शनि की वक्र स्थिति (14 मार्च से 15 अगस्त) के दौरान शत्रु आपके विरुद्ध षडय़ंत्र रच सकते हैं। स्वास्थ्य व पारिवारिक सुख की दृष्टि से भी यह साल आपके लिए शुभ रहेगा। मित्रों से सहयोग मिलेगा।

उपाय:====
1- चोकर युक्त आटे की 2 रोटी बनाएं। उनमें से एक पर तेल और दूसरी पर घी लगा दें। घी वाली रोटी पर थोड़ा मिष्ठान या शक्कर रखकर काली गाय को खिला दें तथा दूसरी रोटी काले कुत्ते को खिला दें और शनिदेव का स्मरण करें।
2- शनिवार के दिन एक कांसे की कटोरी में तिल का तेल भर कर उसमें अपना मुख देख कर और काले कपड़े में काले उड़द, सवा किलो अनाज, दो लड्डू, फल, काला कोयला और लोहे की कील रख कर डाकोत(शनि का दान लेने वाला) को दान कर दें।
3- शनिवार के दिन किसी हनुमान मंदिर में जाकर हनुमान चालीसा का पाठ करें और शनि दोष की शांति के लिए हनुमानजी से प्रार्थना करें। बूंदी के लड्डू का भोग भी लगाएं।
4- शनिवार के दिन ग्यारह साबूत नारियल बहते हुए जल में प्रवाहित करें और शनिदेव से जीवन को सुखमय बनाने के लिए प्रार्थना करें।
5- किसी भी विद्वान ब्राह्मण से या स्वयं शनि के तंत्रोक्त, वैदिक मंत्रों के 23000 जाप करें या करवाएं। ये है शनि का तंत्रोक्त मंत्र-
ऊं प्रां प्रीं स: श्नैश्चराय नम:



Sunday, 7 December 2014

कैसा रहेगा सभी राशियो का बर्ष २०१५ और जिनका शुभ ना हो वो करे ये उपाय !!

मेष व वृश्चिक राशि-  इन राशियों का स्वामी मंगल है व वर्षारंभ में मंगल सूर्योदयी लग्न से मकर में उच्च राशि का होकर द्वितीय भाव में है। मंगल की शुभ स्थिति में साहस बल में वृद्धि, राजनीति के क्षेत्र में सफलता, पुलिस, सेना में उच्च पद, मकान भूमि से लाभ मिलता है। अशुभ स्थिति में बलहीनता, राजनीति में असफल, गुस्सैल स्वभाव, मकान भूमि से नुकसान या इनके व्यवसाय में हानि होती है।
शुभ फल प्राप्ति के उपाय : अशुभ प्रभाव दूर करने हेतु पत्रिका दिखाकर मूंगा वजनानुसार पहनें। प्रति 10 किलो पर 1 कैरेट के हिसाब से पहनें। मूंगा चांदी व तांबे में पहना जा सकता है। सोना भी उत्तम रहेगा। प्रति मंगलवार लाल गाय को सवा पाव गुड़ खिलाएं, अवश्य लाभ होगा।

वृषभ व तुला राशि- इन राशियों का स्वामी शुक्र वर्षारंभ में सूर्योदयी लग्न से होने से यह मकर के द्वितीय वाणी भाव में स्थित है। इसकी शुभता होने पर आर्थिक लाभ, शत्रुओं पर विजय मिलती है व इसकी अशुभता से आर्थिक नुकसान, धन की बचत का न होना, कर्ज का बढ़ना जैसी समस्या से दो-चार होना पड़ता है।
शुभ फल प्राप्ति के उपाय :  इसकी अशुभता को दूर करने हेतु शुक्रवार को एक स्टील की कटोरी शकर लक्ष्मीजी के मंदिर में रख आएं व शुक्रवार को शुभ मुहूर्त में सवा 10 कैरेट का ओपल मध्यमा अंगुली में धारण करें। विवाह न होने पर स्नान करने के जल में थोड़ा-सा दही मिलाकर प्रति शुक्रवार को स्नान करें व खीर कन्याओं को शुक्रवार के दिन बांटें।

मिथुन व कन्या राशि- इन राशियों का स्वामी बुध है। वर्षारंभ में बुध शत्रु का होकर गुरु की राशि धनु में है। अशुभ फल में व्यापार में घाटा, नौकरी में परेशानी, जीवनसाथी से लाभ, रोजगार हेतु परिश्रम अधिक करना पड़ता है।
शुभ फल प्राप्ति के उपाय :  अशुभ प्रभाव को दूर करने हेतु सवा पाव खड़े मूंग की दाल गणेशजी के मंदिर में बुधवार को हरे कपड़े में बांधकर रख आएं। शुक्ल पक्ष के बुधवार को सवा 10 रत्ती का पन्ना कनिष्ठा में पहनें। प्रति बुधवार गणेशजी का दर्शन करें व एक हरा कपड़ा अवश्य पहनें। बिगड़े काम में सफलता मिलेगी।

कर्क राशि- इस राशि का स्वामी चन्द्र है। उसके शुभ प्रभाव से माता से लाभ, दूध-दही के व्यापार में सफलता, चांदी के व्यवसाय से लाभ होता है। अशुभ प्रभाव में माता को कष्ट, बेचैनी, अशांति, सफेद वस्तुओं के व्यापार से नुकसान की आशंका रहती है।
 शुभ फल प्राप्ति के उपाय : अशुभ प्रभाव को दूर करने हेतु माता से चांदी का छल्ला दान में लेकर अपने पास रखें या पहनें। मोती सवा सात रत्ती का मून स्टोन के साथ बनवाकर सोमवार को धारण करें। चांदी का छल्ला भी पहन सकते हैं। सफेद गाय को पक्के चावल बनवाकर सोमवार को खिलाएं। माता को न सताएं व उनका आशीर्वाद लें। इस प्रकार चन्द्र के अशुभ प्रभाव को दूर किया जा सकता है।

सिंह राशि- इस राशि का स्वामी सूर्य है। इसके शुभ प्रभाव से साहसी, महत्वाकांक्षी, सरकारी नौकरी में सफलता, राजनीति में सफल होते हैं व अशुभ प्रभाव होने पर साहस की कमी, जल्द घबरा जाना, सरकारी कामकाज में रुकावटें आती हैं।
शुभ फल प्राप्ति के उपाय :  इसे दूर करने हेतु रविवार को दूध-मिश्री मिला जल सूर्यदेव को चढ़ाएं व सवा सात रत्ती का माणिक अनामिका अंगुली में तांबे या सोने में बनवाकर रविवार को 9.00 से 11.15 तक पहनें। बहती नदी में तांबे का सिक्का बहाएं। इस प्रकार सूर्यजनित कष्टों से बचा जा सकता है।

धनु व मीन- इन राशियों का स्वामी गुरु है, जो वर्षारंभ में उच्च का होकर वक्री है। वक्री ग्रह कार्य में बाधा, खंडित राजयोग देता है, मान-सम्मान में भी कमी का कारण बनता है। राजभय बना रहता है।
शुभ फल प्राप्ति के उपाय :  इसकी अशुभता दूर करने हेतु सवा 6 रत्ती का पीला पुखराज तर्जनी में गुरुवार सुबह धारण करें। प्रति गुरुवार को 7 केले किसी मंदिर या नि:शक्तजनों को दें। चने की दाल पीली गाय को खिलाएं। इस प्रकार गुरु के अशुभ प्रभाव से बचा जा सकता है।

मकर व कुंभ- इन राशियों का स्वामी शनि है। वर्षारंभ में शनि सम राशि वृश्चिक का होकर द्वादश भाव में है। इसकी अशुभता से बाहरी मामलों में बाधा, धन की बचत का न होना, पराक्रम में कमी, भाइयों से मनमुटाव, साझेदारी में नुकसान होता है।
शुभ फल प्राप्ति के उपाय : इसकी शुभता पाने के लिए कच्ची जमीन पर सरसों या तिल को तेल एक चम्मच डालें व पत्रिका दिखाकर सवा 5 कैरेट नीलम या कटैला धारण करें। खड़े उड़द काले कपड़े में बांधकर शनि मंदिर पर शनिवार को रख आएं। काला कंबल नि:शक्तजन को दें।

इस प्रकार राशिनुसार ग्रहों के अशुभ प्रभाव को दूर कर सकते हैं।

हनुमान जी के नाम का अर्थ केसे बना हनुमान सब्द औरहनुमान जी केसे है संकट मोचन !!

परंपरागत रूप से हनुमान को बल, बुद्धि, विद्या, शौर्य और निर्भयता का प्रतीक माना जाता है। संकटकाल में हनुमानजी का ही स्मरण किया जाता है। वह संकटमोचन कहलाते हैं। हनुमान को शिवावतार अथवा रुद्रावतार भी माना जाता है। रुद्र आँधी-तूफान के अधिष्ठाता देवता भी हैं और देवराज इंद्र के साथी भी। विष्णु पुराण के अनुसार रुद्रों का उद्भव ब्रह्माजी की भृकुटी से हुआ था। हनुमानजी वायुदेव अथवा मारुति नामक रुद्र के पुत्र थे।
'हनुमान' शब्द का ह ब्रह्मा का, नु अर्चना का, मा लक्ष्मी का और न पराक्रम का द्योतक है।
हनुमान को सभी देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त था। वे सेवक भी थे और राजदूत, नीतिज्ञ, विद्वान, रक्षक, वैय्यारकरण, वक्ता, गायक, नर्तक, बलवान और बुद्धिमान भी। शास्त्रीय संगीत के तीन आचार्यों में से एक हनुमान भी थे। अन्य दो थे शार्दूल और कहाल। 'संगीत पारिजात' हनुमानजी के संगीत-सिद्धांत पर आधारित है। कहते हैं कि सर्वप्रथम रामकथा हनुमानजी ने लिखी थी और वह भी शिला पर। यह रामकथा वाल्मीकिजी की रामायण से भी पहले लिखी गई थी और हनुमन्नाटक के नाम से प्रसिद्ध है। तुलसी और वाल्मीकि द्वारा वर्णित हनुमान-चरित की तुलना में कई अन्य रामकथाओं में वर्णित चरित इतना भिन्ना है कि सर्वथा मिथ्या और काल्पनिक प्रतीत होता है।तांत्रिकगण हनुमान की पूजा एक शिर, पंचशिर और एकादश शिर, संकटमोचन, सर्व हितरत और ऋद्धि-सिद्धि के दाता के रूप में करते हैं। आनंद रामायण के अनुसार हनुमानजी की गिनती आठ अमरों में होती है। अन्य सात हैं अश्वत्थामा, बलि, व्यास, विभीषण, नारद, परशुराम और मार्कण्डेय।

'हनुमानजी' सिखाते है जीवन प्रबंधन और लक्ष्य पाने की कला !!

राम भक्त हनुमान एक कुशल प्रबंधक भी थे। वे मानव संसाधन का बेहतर उपयोग करना जानते थे।रामायणी गुरुओं के मुताबिक, संपूर्ण रामचरित मानस में ऐसे कई उदाहरण हैं जिससे साबित होता है कि महाबली हनुमान में प्रबंधन की जबर्दस्त क्षमता थी।
समुद्र को पार करना :=
श्रीराम के परम भक्त हनुमान के प्रबंधन से भगवान ने रावण पर विजय प्राप्त की। हनुमानजी ने सेना से लेकर समुद्र को पार करने तक जो कार्य कुशलता व बुद्धि के साथ किया वह उनके विशिष्ट प्रबंधनको दर्शाता है।
हर काम में निपुणता :=
भगवान राम से परिचय के बाद से हनुमानजी को जो भी कार्य सौंपा वह उन्होंने पूर्ण कुशलता के साथ संपन्न किए। इस प्रकार हनुमानजी को प्रबंधन के क्षेत्र में एक कुशल स्तंभ माना जा सकता है।
सही योजनाये :=
श्री हनुमानजी ऊर्जा प्रदान करने वाले शक्ति और समर्पण के पुंज हैं। आज के युवा प्रबंधको को अंजनी पुत्र हनुमानजी से कई प्रकार की प्रेरणा मिलती है। बुद्धि के साथ सही योजना बनाने  की उनमें गजब की क्षमता है।
दूरदर्शिता :=
हनुमान जी ने सहज और सरल वार्तालाप के अपने गुण से कपिराज सुग्रीव से श्रीराम की मैत्री कराई। उनकी दूरदर्शिता का ही परिणाम था कि सुग्रीव रामजी के सहयोगी बने। हनुमान जी की कुशलता एवं चतुरता आगे चल कर सही दिखाई पड़ती है जब सुग्रीव श्रीराम के काम आते हैं और रामजी की मदद से सुग्रीव को अपना राज्य मिलता है।
नीति कुशलता :=
राजकोष व पराई नारी प्राप्त कर सुग्रीव मैत्रीधर्म भुला देते हैं तो हनुमानजी उसे चारों विधियों साम, दाम, दण्ड, भेद नीति का प्रयोग कर श्रीराम के कार्यों की याद दिलाते हैं। यहाँ उनकी स्मरण शक्ति, सजगता, सतर्कता तथा लक्ष्य की दिशा में तत्परता श्रीराम को प्रभावित करती है। हनुमानजी का प्रबंधन यह सीख देता हैं कि अगर लक्ष्य महान हो और उसे पाना सभी के हित में हो तो हर प्रकार की नीति अपनाई जा सकती है, और यह भी कि कोई अपने कर्तव्यों और अहसानों को भूल रहा है तो उसे सही राह पर लाने के लिए भी हर तरह की नीति लागू की जा सकती है।
मार्ग दर्शक हो तो हनुमान जैसा :=
उनकी सहज विनम्रता, और सब को साथ लेकर चलने की क्षमता श्रीराम पहचान लेते हैं। कठिनाइयों में जो निर्भयता और साहसपूर्वक साथियों का सहायक और मार्गदर्शक बन सके लक्ष्य प्राप्ति हेतु जिसमें उत्साह और जोश, धैर्य और लगन हो, कठिनाइयों पर विजय पाने, परिस्थितियों को अपने अनुकूल कर लेने का संकल्प और क्षमता हो वही तो नेतृत्व कर सकता है।
सबकी सलाह सुनने का गुण :=
हनुमानजी का राम-काज हेतु उत्साह और वह जामवंत से मार्गदर्शन चाहना भी प्रबंधन का तत्व है। सबको सम्मानित करना, सक्रिय और ऊर्जा संपन्न होकर कार्य में निरंतरता बनाए रखने की क्षमता भी कार्यसिद्धि का गुरुमंत्र है।
दुश्मन पर पैनी नजर :=
विरोधी के असावधान रहते ही उसके रहस्य को जान लेना दुश्मनों के बीच दोस्त खोज लेने की दक्षता विभीषण प्रसंग में दिखाई देती है। हनुमानजी उससे भ्राता का संबंध जोड़कर अपना और उसका भी कार्य सिद्ध करने में सफल होते हैं। उनके हर कार्य में सोच और फुर्ती  का अद्भुत मिश्रण है।
नैतिक साहस :=
परिस्थितियों से विचलित हुए बिना दृढ़ इच्छाशक्ति को बनाए रखना प्रबंधन कला का महान गुण है। रावण को सीख देने में उनकी निर्भीकता, दृढ़ता, स्पष्टता और निश्चिंतता अप्रतिम है। उनमें न कहीं दिखावा है, न छल कपट। व्यवहार में पारदर्शिता है, कुटिलता नहीं। उनमें अपनी बात को कहने का नैतिक साहस हैं। हनुमानजी की शीलता और निर्भयता की प्रशंसा रावण भी करता है।हर हाल में मस्तरावण को हनुमानजी 'रामचरन पंकज उर धरहू लंका अचल राज तुम्ह करहू' का मंत्र देते हैं। लेकिन वह अभिमानवश उनकी सलाह की उपेक्षा करता है परंतु विनम्र विभीषण उसी को मानकर लंका के राजा बनते है। इन सबके साथ ही उनमें आज की सबसे अनिवार्य प्रबंधन छमता है कि वे अपना विनोदी स्वभाव हर हालत में बनाए रखते हैं। हर हाल में मस्त रहना आज की सबसे बड़ी जरूरत है।

Saturday, 6 December 2014

नव वर्ष २०१५ में सभी राशियों के लिए केसी रहेगी सफलता !!

नया साल 2015 युवा वर्ग के लिए करियर के मामलों में उत्तम कहा जा सकता है। वर्ष का अंक 6 शुक्र प्रधान है। शुक्र कला, फिल्म जगत, इलेक्ट्रॉनिक्स, मोबाइल, इंजीनियर, आईटी, आभूषण, होटल व्यवसाय, सौंदर्य प्रसाधन आदि का कारक है।
मेष राशि := मेष राशि वालों के लिए शुक्र द्वितीयेश व सप्तमेश होने से कुछ परेशानियों के बाद थोड़ी सफलता का साल रहेगा विशेषकर दैनिक व्यवसाय के मामलों में। शुक्र इस राशि वालों के लिए मारकेश है। हीरा या ओपल न पहनें।
वृषभ राशि := वृषभ राशि वालों के लिए शुक्र लग्नेश व षष्टेश है। लग्नेश होने से शुभत्व ज्यादा है। वृषभ राशि वालों के लिए यह साल नई सौगात लेकर आया है। जो आईटी से संबंधित हैं उन्हें लाभ के अवसर ज्यादा रहेंगे। चिकित्सा, कला जगत, शुक्र से संबंधित व्यवसाय में सफलता मिलेगी।
मिथुन राशि := मिथुन राशि वालों के लिए शुक्र पंचमेश व द्वादशेश होने से शुभ रहेगा। बाहरी यात्राओं से लाभ, विद्या के क्षेत्र में सफलता, मनोरंजन के साधनों में वृद्धि होगी।
कर्क राशि := कर्क राशि वालों के लिए शुक्र की स्थिति चतुर्थेश व एकादशेश होने से स्थानीय व्यवसाय के क्षेत्र में सफलता के अवसर अधिक हैं। आर्थिक लाभ भी मिलेगा। इस वर्ष नवीन व्यापार भी शुरू हो सकता है।
सिंह राशि := सिंह राशि वालों के लिए शुक्र तृतीयेश व दशमेश होगा। पराक्रम द्वारा सफलता मिलेगी। संचार सेवाओं में सफल हो सकते हैं। नौकरी के क्षेत्र में आईटी, इलेक्ट्रिक व कम्प्यूटर इंजीनियरिंग में भी सफलता मिल सकती है।
कन्या राशि := कन्या राशि वालों के लिए तृतीयेश व भाग्येश होने से इस वर्ष सफलता के योग अधिक हैं विशेषकर कलात्मक क्षेत्र में शुक्र से संबंधित व्यवसाय में।
तुला राशि := तुला राशि वालों के लिए शुक्र लग्नेश होकर अष्टमेश होगा लेकिन लग्नेश होने से शुभत्व रहेगा। आप जितना प्रयास करेंगे उतनी अधिक सफलता के अवसर आएंगे। शुक्र से संबंधित व्यवसाय, नौकरी में सफल होंगे
वृश्चिक राशि:= वृश्चिक राशि वालों के लिए सप्तमेश व द्वादशेश होने से आप करियर के मामलों में परेशानियों का सामना करने के बाद मनमाफिक सफलता से दूर रहेंगे, फिर भी गुजारे लायक काम बन जाएगा। पके चावल या खीर कन्याओं में बांटें।
धनु राशि := धनु राशि वालों के लिए षष्टेश व एकादशेश होने से परेशानियां रहेंगी। आर्थिक लाभ कम रहेगा। शेयर मार्केट में धन लगाने से बचना होगा। जिस काम से लगे हैं उसमें लगे रहें, बदले नहीं। नवीन कार्ययोजना संभलकर बनाएं।
मकर राशि := मकर राशि वालों के लिए शुक्र की स्थिति पंचमेश होकर दशमेश होने से आपके सोचे कार्यों में सफलता के साथ लाभजनक स्थिति रहेगी। नौकरी आदि में सफल होंगे वही नया साल सौभाग्यशाली रहेगा।
कुंभ राशि := कुंभ राशि वालों के लिए चतुर्थेश व भाग्येश होने से आपका भाग्य इस वर्ष प्रबल रहेगा। करियर के क्षेत्र में नई उड़ान पाएंगे। सफलता निश्चित ही कदम चूमेगी। नौकरी, नवीन व्यापार, उन्नति के अवसर आएंगे।
मीन राशि : = मीन राशि वालों के लिए तृतीयेश व अष्टमेश होने से परिश्रम अधिक रहेगा व लाभ की स्थिति कम रहेगी। करियर के मामलों में कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा। एक स्टील की कटोरी में शकर भरकर 9 शुक्रवार मंदिर में रखें, लाभ होगा।

अपनी हर कामना के लिए पूजें अलग अलग बस्तु से बने शिवलिंग !!

सोमवार के दिन शिव मंत्र जप-हवन-पूजन अभिषेक का बड़ा महत्व है। यदि मंदिर में पूजन इत्यादि करें तो ठीक अन्यथा घर पर भी पूजन कार्य किया जा सकता है। घर में पूजा के लिए आवश्यक है शिवलिंग । जिस बस्तु से शिव लिंग नहीं बन सकते तो उस बस्तु को मिट्टी में मिलाकर शिव लिंग बनाले ! नंदी को एक बड़े पात्र में रखें। शिव जी की जलाधारी का मुंह उत्तर दिशा की ओर रखते हुए पूजन प्रारंभ किया जा सकता है।
 

शिवलिंग कई प्रकार के उपयोग में लाए जाते हैं हर शिवलिंग का फल अलग-अलग है।
 

1. पार्थिव शिवलिंग- हर कार्य सिद्धि के लिए।

2. गुड़ के शिवलिंग- प्रेम पाने के लिए।

3. भस्म से बने शिवलिंग- सर्वसुख की प्राप्ति के लिए।

4. जौ या चावल या आटे के शिवलिंग- दाम्पत्य सुख, संतान प्राप्ति के लिए।

5. दही से बने शिवलिंग-‍ ऐश्वर्य प्राप्ति के लिए।

6. पीतल, कांसी के शिवलिंग- मोक्ष प्राप्ति के लिए।

7. सीसा इत्यादि के शिवलिंग- शत्रु संहार के लिए।

8. पारे के शिवलिंग- अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष के लिए।



अपनी पसंद का जीवनसाथी चाहते है तो कीजिए राशिनुसार सरल उपाय !!

अपनी  पसंद का जीवनसाथी पाना हर युवा की आंख का सपना होता है । चाहे लड़की हो या लड़का अगर आप की अभी तक शादी नहीं हुई है !तो कीजिए अपनी राशि के अनुसार यह अचूक उपाय। नियमित रूप से उपाय करने पर आपके घर भी बज उठेगी मंगल शहनाई।
इस प्रकार कीजिए सरल उपाय व मंत्र... 
 
1. मेष राशि बाले - सातवें स्थान के स्वामी शुक्र के मंत्र की नित्य एक माला 'ॐ शुं शुक्राय नम:' तथा अर्गला के 11 पाठ  नित्य स्त्री तथा पुरुष दोनों के लिए लाभकारी है। शुक्रवार का व्रत करें।

2. वृषभ राशि बाले- मंगल मंत्र 'ॐ क्रां क्रीं क्रौं स: भौमाय नम:' का जप तथा हनुमान चालीसा तथा मंगल चंडिका का पाठ  करें। मंगलवार का व्रत करें।लड़किया किसीऔर से जाप और पाठ करबा सकती है !

3. मिथुन राशि बाले- बृहस्पति के मंत्र 'ॐ ज्रां ज्रीं ज्रौं स: बृहस्पतये नम:' का जप तथा  केसर का तिलक लगाएं। गुरुवार का व्रत करें।

4. कर्क राशि बाले- शनैश्चर देवता के मंत्र करें व तेल का दान दें। पीपल की परिक्रमा नित्य कर दीपदान करें। मंत्र- ॐ प्रां  प्री प्रौं स: शनैश्चराय नम:।शनिवार का व्रत करें।

5. सिंह राशि बाले- शनि देवता का मंत्र 'ॐ प्रां प्रीं प्रौं स: शनैश्चराय नम:' जपें तथा तेल का दान कर हनुमान मंदिर में शनिवार को दीपक संध्या समय लगाएं। सूर्य को अर्घ्य दें। रविवार का व्रत करें।

6. कन्या राशि बाले- बृहस्पति के मंत्र जपें तथा स्नान के जल में 1-2 चुटकी हल्दी-चंदन मिलाकर स्नान करें। सूर्य को  अर्घ्य दें। मंत्र 'ॐ ज्रां ज्रीं ज्रौं स: बृहस्पतये नम:' जपें।

7. तुला राशि बाले- मंगल स्तोत्र का पाठ करें तथा मंगलवार का व्रत करें। मंत्र 'ॐ क्रां क्रीं क्रौं स: भौमाय नम:'जपें।

8. वृश्चिक राशि बाले- शुक्रवार व्रत रखें तथा शुक्र मंत्र 'ॐ द्रां द्रीं द्रौं स: शुक्राय नम:' जपें। दुग्ध मिश्रित जल से स्नान करें।

9. धनु राशि बाले- बुध का उपवास रखें। 'ॐ गं गणपतये नम:' तथा 'ॐ ब्रां ब्रीं ब्रौं स: बुधाय नम:' का जप करें।

10. मकर राशि बाले- सूर्य को अर्घ्य दें तथा चंद्र को अर्घ्य दूध मिलाकर दें। सोमवार का व्रत करें। रुद्राभिषेक दूध से करवाएं  तथा चंद्र का मंत्र जपें- 'ॐ श्रां श्रीं श्रों स: चन्द्रमसे नम:।।'

11. कुम्भ राशि बाले- सूर्य मंत्र- 'ॐ ह्रां ह्रीं हौं स: सूर्याय नम:' का जप करें। सूर्य को लाल फूल तथा कुमकुम  मिलाकर प्रात: अर्घ्य दें। रविवार का व्रत करें।

12. मीन राशि बाले - गणपति मंत्र 'ॐ गं गणपतये नम:' तथा 'ॐ ब्रां ब्रीं ब्रौं स: बुधाय नम:' का जप करें। बुधवार का  व्रत करें।