September 2014 ~ Balaji Kripa

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May Baba fullfill all the wishes of the Devotees.

जय श्रीराम

भगवान रामभक्त हनुमान की उपासना से जीवन के सारे कष्ट, संकट मिट जाते है। माना जाता है कि हनुमान एक ऐसे देवता है जो थोड़ी-सी प्रार्थना और पूजा से ही शीघ्र प्रसन्न हो जाते है। जहां मंगलवार और शनिवार का दिन इनके पूजन के लिए सर्वश्रेष्ठ हैं।

ॐ हं हनुमंतये नम:

मंगलवार और शनिवार के दिन हनुमान म‍ंदिर में जाकर रामभक्त हनुमान का गुणगान करें और उनसे अपने पापों के लिए क्षमायाचना करें।

Tuesday, 30 September 2014

सभी राशि के अचूक दिव्य मंत्र जिनके जाप से दूर होगे सभी प्रकार के कष्ट !!

हमेश व्यक्ति कई ज्योतिष उपाय एक साथ पढ़ने पर व्यक्ति असमंजस में पड़ जाता है कि आखिर उसके लिए क्या उचित है और क्या अनुचित। व्यक्ति अगर अपनी राशि के अनुसार मंत्र जाप करे तो निसंदेह शीघ्र सफलता मिलती है। मंत्र पाठ से व्यक्ति कई प्रकार के संकट से मुक्त रहता है। आर्थिक रूप से संपन्न हो जाता है। साथ ही जो लोग आपकी राह में बाधा उत्पन्न करते हैं वह भी कमजोर हो जाते हैं। प्रस्तुत है आपकी राशि के अनुसार अचूक दिव्य मं‍त्र, इसे जपने से या जाप करबाने के पश्चात किसी अन्य पूजा या तंत्र की आवश्यकता नहीं है।
मेष : ॐ ह्रीं श्रीं लक्ष्मीनारायण नम:
वृषभ : ॐ गौपालायै उत्तर ध्वजाय नम:
मिथुन : ॐ क्लीं कृष्णायै नम:
कर्क : ॐ हिरण्यगर्भायै अव्यक्त रूपिणे नम:
सिंह : ॐ क्लीं ब्रह्मणे जगदाधारायै नम:
कन्या : ॐ नमो प्रीं पीताम्बरायै नम:
तुला : ॐ तत्व निरंजनाय तारक रामायै नम:
वृश्चिक : ॐ नारायणाय सुरसिंहायै नम:
धनु : ॐ श्रीं देवकीकृष्णाय ऊर्ध्वषंतायै नम:
मकर : ॐ श्रीं वत्सलायै नम:
कुंभ : ॐ श्रीं उपेन्द्रायै अच्युताय नम:
मीन : ॐ क्लीं उद्‍धृताय उद्धारिणे नम:

नव ग्रह दोष दूर करने के असर दार अचूक उपाय !!


प्राचीन ज्योतिष विद्या के अनुसार किसी जातक की कुंडली व गोचर में किसी भी ग्रह की अनिष्टता के कारण उत्पन्न समस्या व उसके निवारण हेतु कई उपायों का उल्लेख है। ध्यान रहे कि प्रत्येक उपाय को कम से कम 7 दिन व अधिक से अधिक 43 दिनों तक लगातार करें। यदि प्रक्रिया का क्रम बीच में खंडित हो जाए तो पुनः विधिवत् इन प्रयोगों को फिर से पूर्ण करना चाहिए। सभी नौ ग्रहों की शांति के हेतु सूखे नारियल के अंदर घी व खांड भरकर सुनसान जगह में स्थित चीटियों के बिल के अंदर गाड़ने से तत्काल ग्रह शांति होती है। इसके अतिरिक्त सभी नौ ग्रहों के दोषों के विधिवत् उपायों से भी ग्रह शांत होते हैं।
सूर्य के अनिष्ट में होने पर करें यह उपाय : =यदि कुंडली में सूर्य छठे, सातवें व दसवें भाव में स्थित हो अथवा गोचर में निर्बल व अशुभ अवस्था में हो तो यह कार्यक्षेत्र में समस्या, दुर्घटना में हड्डी टूटने, रक्तचाप की समस्या, नेत्र में कष्ट, उदर व अग्नि-तत्व से संबंधित रोग व शारिरिक पीड़ा का कारक माना गया है।
क्या उपाय करें : =राजा, पिता व सरकारी पदाधिकारी का सम्मान करें। उदित सूर्य के समय में संभोग न करें। सूर्य से संबंधित कोई वस्तु मुफ्त में न लें। पीतल के बर्तनों का सर्वदा प्रयोग करें। रविवार के दिन दरिया की बहती जलधारा में गुड़ व तांबा प्रवाहित करें।
चंद्र के अनिष्ट में होने पर करें यह उपाय := किसी जातक की कुंडली के गोचर में चंद्र निर्बल व पाप ग्रस्त हो तथा कुंडली में छठे, आठवें, दसवें व बारहवें भाव में स्थित हो तो इस कारण मानसिक पीड़ा, जल तत्व से जुड़ा रोग व पद व गुण हानि की समस्याएं आती हैं।
क्या उपाय करें : =रात को दूध का सेवन न करें। जल व दूध को ग्रहण करते समय चांदी के पात्र का प्रयोग करें। सोमवार के दिन दरिया की बहती जलधारा में मिश्री व चावल को सफेद कपड़े में बांधकर प्रवाहित करें। सोमवार के दिन अपने दाहिने हाथ से चावल व चांदी का दान करें।
मंगल के अनिष्ट में होने पर करें यह उपाय := किसी जातक के गोचर में मंगल निर्बल व पाप ग्रस्त हो तथा कुंडली में चौथे व आठवें भाव में अकेला विराजमान हो तो इस अकारक अवस्था के कारण रक्त विकार, क्रोध, तीव्र सिर दर्द, नेत्र रोग व संतान हानि जैसी समस्याएं उत्पन्न हो जाती हैं।
क्या उपाय करें := बुआ अथवा बहन को लाल कपड़ा दान में दें। मंगलवार को दरिया की बहती जलधारा में रेवड़ी व बताशा प्रवाहित करें। मूंगा, खांड, मसूर व सौंफ का दान करें। नीम का पेड़ लगाएं। मीठी तंदूरी रोटी कुत्ते को खिलाएं। रोटी पकाने से पहले गर्म तवे पर पानी की छींटे दें।
बुध के अनिष्ट में होने पर करें यह उपाय : =किसी जातक के गोचर में बुध नीच, अस्त व पाप ग्रस्त हो तथा कुंडली में चौथे भाव में स्थित हो तो आत्मविश्वास में कमी, नशे, सट्टे व जुए की लत, बेटी व बहन को कष्ट, मानसिक तथा गले से संबंधित रोगों का सामना करना पड़ सकता है।
क्या उपाय करें : =बुधवार के दिन भीगी मूंग का दान करें। मिट्टी के घड़े या पात्र में शहद रखकर किसी वीराने स्थान पर दबाएं। कच्चा घड़ा दरिया में प्रवाहित करें। तांबे का सिक्का गले में धारण करें। सुहागिन स्त्रियों को भोजन कराएं व चूड़ी दान में दें। चौड़े हरे पत्ते वाले पौधे अपने घर की छत के ऊपर लगाएं।
गुरु के अनिष्ट में होने पर करें यह उपाय : =किसी जातक के गोचर में गुरु नीच, वक्री व निर्बल हो तथा कुंडली में छठे, सातवें व दसवें भाव में स्थित हो तो मान-सम्मान में कमी, अधूरी दक्षिणा, गंजापन, झूठे आरोप, पीलिया आदि जैसे रोग व समस्याएं उत्पन्न हो जाती हैं।
क्या उपाय करें : =माथे पर नित्य हल्दी अथवा केसर का तिलक करें। पीपल का वृक्ष लगाएं तथा केसर का तिलक करें। दरिया में गंधक प्रवाहित करें। ब्राह्मण को पीले रंग की वस्तु दान में दें।
शुक्र के अनिष्ट में होने पर करें यह उपाय : =किसी जातक के गोचर में शुक्र अशुभ हो तथा कुंडली में पहले, छठे व नौवें भाव में स्थित हो तो चर्म रोग, स्वप्न दोष, धोखा, हाथ की अंगूठी आदि निष्क्रिय होने जैसी समस्याएं उत्पन्न हो जाती हैं।
क्या उपाय करें := 43 दिनों तक किसी गंदे नाले में नीले फूल डालें। स्त्री का सम्मान करें। इत्र लगाएं। दही का दान करें। साफ सुथरे रहें तथा अपने बिस्तर की चादर को सिलवट रहित रखें।
शनि के अनिष्ट में होने पर करें यह उपाय : =गोचर में शनि के अशुभ तथा कुंडली में पहले, चौथे, पांचवें व छठे भाव में स्थित होने की अवस्था को आर्थिक हानि, कानूनी समस्या, गठिया रोग, पलकों के झड़ने, कन्या के विवाह में विलंब, आग लगने, मकान गिरने, नौकर के काम छोड़ने आदि घटनाओं का कारक माना गया है।
क्या उपाय करें : =लोहे का छल्ला अथवा कड़ा धारण करें। मछलियों को आटे की गोलियां खाने को दें। अपने भोजन का पहला कौर कौए को दें। सुनसान जगह के सतह पर सुरमा दबाएं।
राहु के अनिष्ट में होने पर करें यह उपाय := किसी जातक की कुंडली में राहु अशुभ व शत्रु ग्रह से युक्त हो तथा पहले, पांचवें, आठवें, नौवें व बारहवें भाव में स्थित हो तो शत्रुता, दुर्घटना, मानसिक पीड़ा, क्षय रोग, कारोबार में हानि, झूठे आरोप आदि की समस्याएं उत्पन्न होने लगती हैं।
क्या उपाय करें : =मूली दान में दें। जौ को दूध में धोकर दरिया में प्रवाहित करें। कच्चे कोयले को दरिया में प्रवाहित करें। हाथी के पांव के नीचे की मिट्टी कुएं में डालें।
केतु के अनिष्ट में होने पर करें यह उपाय: =किसी जातक की कुंडली व गोचर में अशुभ केतु फोड़े-फुंसी, मूत्राशय से संबंधित रोग, रीढ़ व जोड़ों का दर्द, संतान हानि आदि जैसी समस्या का कारक माना गया है।
क्या उपाय करें : =कुत्ते को मीठी रोटी खिलाएं। मकान के नीव की सतह पर शहद दबाएं। कंबल दान में दें। सफेद रेशम के धागे को कंगन की तरह हाथ में बांधे।
 

कुमारी पूजन (कन्या पूजन ) क्यों और केसे करे तथा उसका महत्व क्या होता है !!

श्री दुर्गा पूजा वर्ष में दो बार चैत्र व अश्विन माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से आरंभ होकर नवमी तिथि तक मनाई जाती है. चैत्र मास के नवरात्र को ‘वार्षिक नवरात्र’ और अश्विन माह के नवरात्र को शारदीय नवरात्र कहा जाता है. इन दिनों नवरात्र में शास्त्रों के अनुसार कन्या या कुमारी पूजन किया जाता है. जो इस प्रकार है, एक कन्या का पूजन करने से ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है, दो कन्याओं का पूजन करने से भोग और मोक्ष की प्राप्ति होती है. तीन कन्याओं की पूजा करने से धर्म, अर्थ व काम, चार कन्याओं की पूजा से राज्यपद, पांच कन्याओं की पूजा करने से विद्या, छ: कन्याओं की पूजा द्वारा छ: प्रकार की सिद्धियां प्राप्त होती हैं. सात बालिकाओं की पूजा द्वारा राज्य की, आठ कन्याओं की पूजा करने से धन-संपदा तथा नौ कन्याओं की पूजा से पृथ्वी प्रभुत्व की प्राप्ति होती है, कुमारी पूजन में दस वर्ष तक की कन्याओं का विधान है.
कुमारी पूजन (कन्या पूजन ) विधि मंत्रों सहित !!
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नवरात्रि के पावन अवसर पर अष्टमी तथा नवमी के दिन कुमारी कन्याओं का पूजन किया जाता है. कन्या या कंजक पूजन में सामर्थ्य के अनुसार इन नौ दिनों तक अथवा नवरात्रि के अंतिम दिन कन्याओं को भोजन के लिए आमंत्रित करते हैं. एक से दस वर्ष तक की कन्याओं का पूजन किया जाता है. इससे अधिक उम्र की कन्याओं को देवी पूजन में वर्जित माना गया है. कन्याओं की संख्या नौ हो तो उत्तम होती है अन्यथा कम से कम दो कन्या तो अवश्य होनी ही चाहिए.
दो वर्ष की कन्या को कुमारी कहा जाता है. इनका पूजन करने से दु:ख-दरिद्रता दूर हो जाती है.
नमस्कार मंत्र - कुमाय्यैं नम:
कुमारी पूजन का मंत्र- कुमारस्यचतत्त्‍‌वानिया सृजत्यपिलीलया। कादीनपिचदेवांस्तांकुमारींपूजयाम्यहम्॥
त्रिमूर्ति पूजन |
तीन वर्ष की कन्या को त्रिमूर्ति कहते हैं. त्रिमूर्ति पूजा से धर्म, अर्थ, काम की सिद्धि प्राप्त होती है.
नमस्कार मंत्र - त्रिमूतर्यै नम:
त्रिमूर्ति के पूजन का मंत्र-    सत्त्‍‌वादिभिस्त्रिमूर्तिर्यातैर्हिनानास्वरूपिणी।त्रिकालव्यापिनीशक्तिस्त्रिमूर्तिपूजयाम्यहम्॥
कल्याणी पूजन |
चार वर्ष की बालिका को कल्याणी कहा जाता है. कल्याणी की पूजा द्वारा विद्या, विजय तथा समस्त कामनाओं की पूर्ति होती है.
नमस्कार मंत्र - कल्याण्यै नम:
कल्याणी के पूजन का मंत्र- कल्याणकारिणीनित्यंभक्तानांपूजितानिशम्।पूजयामिचतांभक्त्याकल्याणीम्सर्वकामदाम्॥
रोहिणी पूजन |
पांच वर्ष की कन्या को रोहिणी कहते हैं.  रोहिणी की पूजा करने से अच्छे स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है तथा रोग दूर होते हैं.
नमस्कार मंत्र - रोहिण्यै नम:
रोहिणी का पूजन का मंत्र |
रोहयन्तीचबीजानिप्राग्जन्मसंचितानिवै।या देवी सर्वभूतानांरोहिणीम्पूजयाम्यहम्॥
कालिका पूजन |
छ:वर्ष की कन्या को कालिका कहा जाता है. शत्रु का शमन तथा विरोधियों को परास्त करने के लिए कालिका का पूजन करना चाहिए.
नमस्कार मंत्र - कालिकायैं नम:
कालिका के पूजन का मंत्र-  काली कालयतेसर्वब्रह्माण्डंसचराचरम्।कल्पान्तसमयेया तांकालिकाम्पूजयाम्यहम॥
चण्डिका पूजन |
सात साल की कन्या को चण्डिका कहते हैं. इनके पूजन से धन-सम्पत्ति की प्राप्ति होती है,
नमस्कार मंत्र- चण्डिकायै नम:
चण्डिका पूजन का मंत्र |
चण्डिकांचण्डरूपांचचण्ड-मुण्डविनाशिनीम्।तांचण्डपापहरिणींचण्डिकांपूजयाम्यहम्॥
शाम्भवी पूजन |
आठ वर्ष की कन्या को शाँभवी कहा जाता है. शांभवी की पूजा द्वारा निर्धनता दूर होती है, व्यक्ति को वाद-विवाद में विजय प्राप्त होती है.
नमस्कार मंत्र - शाम्भव्यै नम:
शाम्भवी पूजन मंत्र |
अकारणात्समुत्पत्तिर्यन्मयै:परिकीर्तिता।यस्यास्तांसुखदांदेवींशाम्भवींपूजयाम्यहम्॥
दुर्गा पूजन |
नौ वर्ष की कन्या को दुर्गा कहते हैं, जो भक्तों को संकट से बचाती हैं, कठिन कार्य को सिद्धि करती हैं, इनकी पूजा करने से साधक को किसी प्रकार का भय नहीं सताता.
नमस्कार मंत्र - दुर्गायै नम:
दुर्गा पूजन मंत्र |
दुर्गात्त्रायतिभक्तंया सदा दुर्गार्तिनाशिनी।दुज्र्ञेयासर्वदेवानांतांदुर्गापूजयाम्यहम्॥
सुभद्रा पूजन |
दस वर्ष की कन्या को सुभद्रा कहते हैं यह भक्तों का कल्याण करती हैं. इनकी पूजा से लोक-परलोक दोनों में सुख प्राप्त होता है.
नमस्कार मंत्र - सुभद्रायै नम:
सुभद्रा के पूजन का मंत्र |
सुभद्राणि चभक्तानांकुरुतेपूजितासदा। अभद्रनाशिनींदेवींसुभद्रांपूजयाम्यहम्॥
यह नौ कन्याएं नवदुर्गा की साक्षात् प्रतिमूर्ति हैं.
विशेष :============
कन्या पूजन में सर्वप्रथम कन्याओं के पैर धुलाकर उन्हें आसन पर एक पंक्ति में बिठाते हैं. मंत्र द्वारा कन्याओं का पंचोपचार पूजन करते हैं. विधिवत कुंकुम से तिलक करने के उपरांत छोटी बच्चीयों की कलाईयों पर कलावा बांधा जाता है. इसके पश्चात उन्हें हलवा, पूरी तथा रुचि के अनुसार भोजन कराते हैं. पूजा करने के पश्चात जब कन्याएं भोजन ग्रहण कर लें तो उनसे आशीर्वाद प्राप्त करें तथा यथासामर्थ्य कोई भी भेंट तथा दक्षिणा दें कर विदा करें.इस प्रकार विधि-विधान द्वारा कन्या पूजन करने से माँ भगवती अत्यंत प्रसन्न होती हैं तथा भक्तों को सांसारिक कष्टों से मुक्ति प्रदान करती हैं.

Monday, 29 September 2014

नवरात्रि में 9 विशेष प्रसाद, जिनसे होती है मनोकामना पूरी !!प्रतिएक दिन लगाएं मां को विशेष भोग !!

प्रथम नवरात्रि के दिन मां के चरणों में गाय का शुद्ध घी अर्पित करने से आरोग्य का आशीर्वाद मिलता है। तथा शरीर निरोगी रहता है।
दूसरे नवरात्रि के दिन मां को शक्कर का भोग लगाएं व घर में सभी सदस्यों को दें। इससे आयु वृद्धि होती है।
तृतीय नवरात्रि के दिन दूध या दूध से बनी मिठाई खीर का भोग मां को लगाकर ब्राह्मण को दान करें। इससे दुखों की मुक्ति होकर परम आनंद की प्राप्ति होती है।
मां दुर्गा को चौथी नवरात्रि के दिन मालपुए का भोग लगाएं। और मंदिर के ब्राह्मण को दान दें। जिससे बुद्धि का विकास होने के साथ-साथ निर्णय लेने की शक्ति बढ़ती है।
नवरात्रि के पांचवें दिन मां को केले का भोग लगाने  से शरीर स्वस्थ रहता है।
छठवीं नवरात्रि के दिन मां को शहद का भोग लगाएं। जिससे आपके आकर्षण शक्त्ति में वृद्धि होगी।
सातवें नवरात्रि पर मां को गुड़ का भोग लगाने  व उसे ब्राह्मण को दान करने से शोक से मुक्ति मिलती है एवं आकस्मिक आने वाले संकटों से रक्षा भी होती है।
नवरात्रि के आठवें दिन माता रानी को नारियल का भोग लगाएं व नारियल का दान कर दें। इससे संतान संबंधी परेशानियों से छुटकारा मिलता है।
नवरात्रि की नवमी के दिन तिल का भोग लगाकर ब्राह्मण को दान दें। इससे मृत्यु भय से राहत मिलेगी। साथ ही अनहोनी होने की घटनाओं से बचाव भी होगा।

नवरात्रि का पूजन क्यों करते है !!

 : 'नवरात्र' शब्द में नव संख्यावाचक होने से नवरात्र के दिनों की संख्या 9 तक ही सीमित होनी चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं है। कुछ देवताओं के 7 दिनों के, तो कुछ देवताओं के 9 या 13 दिनों के नवरात्र हो सकते हैं। सामान्यतया कुल देवता और इष्ट देवता का नवरात्र संपन्न करने का कुलाचार है। किसी देवता का अवतार तब होता है, जब उसके लिए कोई निमित्त होता है। यदि कोई दैत्य उन्मत्त होता है, भक्तजन परम संकट में फंस जाते हैं अथवा इसी प्रकार की कोई अन्य आपत्ति आती है तो संकट का काल 7 दिनों से लेकर 13 दिनों तक रहता है। ऐसी काल अवधि में उस देवता की मूर्ति या प्रतिमा का टांक-चांदी के पत्र या नागवेली के पत्ते पर रखकर नवरात्र बैठाए जाते हैं। उस समय स्थापित देवता की षोडशोपचार पूजा की जाती है। अखंड दीप प्रज्वलन माला बंधन देवता के माहात्म्य का पठन, उपवास तथा जागरण आदि विविध कार्यक्रम करके अपनी शक्ति एवं कुलदेवता के अनुसार नवरात्र महोत्सव संपन्न किया जाता है। यदि भक्त का उपवास हो तो भी देवता को हमेशा की तरह अन्न का नैवेद्य देना ही पड़ता है। इस काल अवधि में उत्कृष्ट आचार के एक अंग के स्वरूप हजामत न करना और कड़े ब्रह्मचर्य का पालन करना होता है। असुरों के नाश का पर्व नवरात्रि, नवरात्र मनाने के पीछे बहुत-सी रोचक कथाएं प्रचलित हैं।
कहा जाता है कि दैत्य गुरु शुक्राचार्य के कहने पर दैत्यों ने घोर तपस्या कर ब्रह्माजी को प्रसन्न किया और वर मांगा कि उन्हें कोई पुरुष, जानवर और उनके शस्त्र न मार सकें। वरदान मिलते ही असुर अत्याचार करने लगे, तब देवताओं की रक्षा के लिए ब्रह्माजी ने वरदान का भेद बताते हुए बताया कि असुरों का नाश अब स्त्री शक्ति ही कर सकती है। ब्रह्माजी के निर्देश पर देवों ने 9 दिनों तक मां पार्वती को प्रसन्न किया और उनसे असुरों के संहार का वचन लिया। असुरों के संहार के लिए देवी ने रौद्र रूप धारण किया था इसीलिए शारदीय नवरात्र शक्ति-पर्व के रूप में मनाया जाता है। लगभग इसी तरह चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से 9 दिनों तक देवी के आह्वान पर असुरों के संहार के लिए माता पार्वती ने अपने अंश से 9 रूप उत्पन्न किए। सभी देवताओं ने उन्हें अपने शस्त्र देकर शक्ति संपन्न किया। इसके बाद देवी ने असुरों का अंत किया। यह संपूर्ण घटनाक्रम चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से 9 दिनों तक घटित हुआ इसलिए चैत्र नवरात्र मनाए जाते हैं।

दुर्गा सप्तशती : एक विशेष परिचय शक्ति उपासना का श्रेष्ठ ग्रंथ है सप्तशती

भुवनेश्वरी संहिता में कहा गया है- जिस प्रकार से 'वेद' अनादि है, उसी प्रकार 'सप्तशती' भी अनादि है। जिस प्रकार योग का सर्वोत्तम ग्रंथ गीता है उसी प्रकार 'दुर्गा सप्तशती' शक्ति उपासना का श्रेष्ठ ग्रंथ माना जाता है। 'दुर्गा सप्तशती' के सात सौ श्लोकों को तीन भागों प्रथम चरित्र (महाकाली), मध्यम चरित्र (महालक्ष्मी) तथा उत्तम चरित्र (महा सरस्वती) में विभाजित किया गया है। प्रत्येक चरित्र में सात-सात देवियों का स्तोत्र में उल्लेख मिलता है प्रथम चरित्र में काली, तारा, छिन्नमस्ता, सुमुखी, भुवनेश्वरी, बाला, कुब्जा, द्वितीय चरित्र में लक्ष्मी, ललिता, काली, दुर्गा, गायत्री, अरुन्धती, सरस्वती तथा तृतीय चरित्र में ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, नारसिंही तथा चामुंडा (शिवा) इस प्रकार कुल 21 देवियों के महात्म्य व प्रयोग इन तीन चरित्रों में दिए गए हैं। नन्दा, शाकम्भरी, भीमा ये तीन सप्तशती पाठ की महाशक्तियां तथा दुर्गा, रक्तदन्तिका व भ्रामरी को सप्तशती स्तोत्र का बीज कहा गया है। तंत्र में शक्ति के तीन रूप प्रतिमा, यंत्र तथा बीजाक्षर माने गए हैं। शक्ति की साधना हेतु इन तीनों रूपों का पद्धति अनुसार समन्वय आवश्यक माना जाता है। सप्तशती के सात सौ श्लोकों को तेरह अध्यायों में बांटा गया है प्रथम चरित्र में केवल पहला अध्याय, मध्यम चरित्र में दूसरा, तीसरा व चौथा अध्याय तथा शेष सभी अध्याय उत्तम चरित्र में रखे गए हैं। प्रथम चरित्र में महाकाली का बीजाक्षर रूप ॐ 'एं है। मध्यम चरित्र (महालक्ष्मी) का बीजाक्षर रूप 'ह्रीं' तथा तीसरे उत्तम चरित्र महासरस्वती का बीजाक्षर रूप 'क्लीं' है। अन्य तांत्रिक साधनाओं में 'ऐं' मंत्र सरस्वती का, 'ह्रीं महालक्ष्मी का तथा 'क्लीं' महाकाली बीज है। तीनों बीजाक्षर ऐं ह्रीं क्लीं किसी भी तंत्र साधना हेतु आवश्यक तथा आधार माने गए हैं।तंत्र मुखयतः वेदों से लिया गया है ऋग्वेद से शाक्त तंत्र, यजुर्वेद से शैव तंत्र तथा सामवेद से वैष्णव तंत्र का अविर्भाव हुआ है यह तीनों वेद तीनों महाशक्तियों के स्वरूप हैं तथा यह तीनों तंत्र देवियों के तीनों स्वरूप की अभिव्यक्ति हैं।

माता रानी से छमा - प्रार्थना

परेशा होके ये दाती तरे दरबार आया हूँ तेरे दरबार आया हूँ
गुनाहों को मेरे बख्सो मै खुद को हार आया हूँ तेरे दरबार आया हूँ
परेशा होके ये दाती तरे दरबार आया हूँ तेरे दरबार आया हूँ

न कोई राह वर दाती ,शिवा एक आप के मइया 
बड़ी मुश्किल से दर पाया, करो इंसाफ ये मइया
हजारों गम उठा कर मै एक लाचार आया हूँ,तेरे दरबार आया हूँ

परेशा होके ये दाती तरे दरबार आया हूँ तेरे दरबार आया हूँ
गुनाहों को मेरे बख्सो मै खुद को हार आया हूँ तेरे दरबार आया हूँ

गमो कि काली रातो से, मेरा दिल भर गया दाती
ये तन पे जान बाकी है, मै जीते जी मर गया दाती
तेरे दर का भिखारी बन के; सेवा दार आया हूँ तेरे दरबार आया हूँ

परेशा होके ये दाती तरे दरबार आया हूँ तेरे दरबार आया हूँ
गुनाहों को मेरे बख्सो मै खुद को हार आया हूँ तेरे दरबार आया हूँ

जो होना है वो हो जाये, नहीं अब डर रहा दिल मै
फक्त एक आसरा तेरा, दुआ करता हूँ मै दिल मै
तेरी कृपा जो हो जाये, मै मुक्ति पाने आया हूँ तेरे दरबार आया हूँ

परेशा होके ये दाती तरे दरबार आया हूँ तेरे दरबार आया हूँ
गुनाहों को मेरे बख्सो मै खुद को हार आया हूँ तेरे दरबार आया हूँ

रुद्राक्ष क्या है तथा कितने प्रकार का होता है !!


एक बार भगवान् कलािग्ररूद्र ने त्रिपुरासुर नामक राक्षस को मारने के लिये आँखे बंद कर समाधिस्थ हुए उसी समय आँखों से जल की बूंदे प्रथ्वी पर गिरी वे बूंदे रुद्राक्ष बन गयी.सबके कल्याण की कामना से बता रहा हूँ की जो रुद्राक्ष का नाम भी लेता है उसे दस गौओं के दान करने का फल प्राप्त होता है तथा उसका दर्शन और स्पर्श कर लेने से उसका भी दो गुना फल प्राप्त होता है इससे जादा किया कहें इसके बारे में श्लोक कहे गए हैं .रुद्राक्ष कहाँ स्थित है? किया नाम है ? इसे मनुष्य को कैसे धरण करना चाहिए? कितने प्रकार के भेद हैं ?किन-२ मन्त्रों से धारण करना चाहिए ?.शहस्त्र दिव्यवर्ष व्यतीत हो जाने पर जिस समय नेत्र खोले उसी समय कलािग्ररूद्र की आँखों से  जल की बूंदे निकली और प्रथ्वी पर गिरी वही  बूंदे महारुद्राक्ष का पेड़ बनकर भक्तों पर कृपा करने के लिये अचल हो गयीं.जो भक्त इसको धारण करता है यह उसके दिन एवम रात में किए हुए पापों का हरण कर लेता है इसके दर्शन से लाख गुना तथा धारण करने से कोटि गुना फल प्राप्त होता है उसे धारण करने से मनुष्य को उसका सौकोटि गुना पुण्य फल प्राप्त होता है इतना ही नहीं मनुष्य रुद्राक्ष धारण करके रूद्र(शंकर जी) का जप करने का फल प्राप्त कर लेता है.आमले के बराबर का रुद्राक्ष श्रेस्ठ माना गया है .जो रुध्राक्ष बेर के बराबर हो मध्यम और चने के सामान वाले रुद्राक्ष को विद्वानों ने अधम कहा है.मंगलकारी रुद्राक्ष  ब्राह्मण ,छत्रिय ,वैश्य तथा सूद्र जाति के रूप में उन-२ जातियों के कल्याण के लिये भगवान शिव की आज्ञा से प्रथ्वी पर उत्पन्न हुआ .शुवेत को ब्राह्मण वर्ण, रक्त को छत्रिय वर्ण,पीत को वैश्य वर्ण तथा काले को सूद्र वर्ण का रुद्राक्ष कहा गया है ,शुवेत रुद्राक्ष को ब्राह्मण वर्ण, रक्त को छत्रिय वर्ण,पीत को वैश्य वर्ण,काले को सूद्र वर्ण को धारण करना चाहिये.मजबूत ,चिकने ,सामान  रूप से गोलाई लिये हुए मोटे काँटों युक्त इस प्रकार के रुद्राक्ष को सुभ कहा जाता है ,जिसमें कीड़ा लगा हुआ हो,जो टुटा-फूटा हुआ हो ,जो काँटों से रहित हो ,जिसमें छेद हो तथा जो ठीक न लगता हो,ये छ: प्रकार के रुद्राक्ष त्याज्य हैं जिसमें प्राकृतिक छेद हो उसे उत्तम रुद्राक्ष कहा गया है.माला में पिरोने के लिये जिसमें छेद किया जाता है उसे मध्यम कहा जाता है, धारण करने के लिये समान रूप वाले,चिकने,द्रण,मोटे रुद्राक्षों को रेशमी धागे में पिरोना चाहिये ,सभी का आकार सामान्य,सौम्य और एक रूप होना चाहियें जिसमें स्वर्ण जैसी रेखा झलकती हो,शिव भक्तों को उसी प्रकार का रुद्राक्ष धारण करना चाहियें. एक रुद्राक्ष चोटी में एवम माला में पिरोकर सिरपर तीस रुद्राक्ष धारण करें, छत्तीस रुद्राक्ष कंठ में , १६-१६ रुद्राक्ष दोनों भुजाओं में,बारह रुद्राक्ष हांथ की कलाई में तथा पंद्रह रुद्राक्ष कंधे पर धारण करना चाहिए .गले में १०८ दानो की माला उपवीत की तरह धारण करना चाहिये,२,३,५, अथवा ७ लड़ियों की माला गले में धारण करनी चाहिये.कान की बाली कुंडल एवम मुकुट के रूप में भी रुद्राक्ष धारण करना चाहियें,विशेष सूत्र में पिरोई हुई माला को बाजूबंद में सोते जागते सर्वदा धारण किए रहना चाहियें.एक शहस्त्र रुद्राक्ष धारण करने को उत्तम ,५०० को मध्यम ,३०० रुद्राक्ष को अधम कहा गया है इसलिए इस प्रकार भेद समझकर धारण करना चाहियें.रुद्राक्ष के १४ भेद होते हैं-:
१)एक मुखी का रुद्राक्ष साक्षात् परम तत्व का रूप है,इन्द्रियों को वशीभूत करते हुए जो भी उसे धारण करता है वह परात्परंतत्व शिव में लीन हो जाता है !
२) दो मुखी  वाले रुद्राक्ष को अर्ध्नारीश्वर रूप कहा गया है ,जो सदैव धारण किए रहते हैं उनपर निरंतर अर्ध्नारीश्वर भगवान् शिव की कृपा बनी रहती है !
३)तीन मुखी  वाले रुद्राक्ष को अग्रिएत्रह स्वरुप माना जाता है ,उसको धारण किए रहने पर सदैव अग्रि भगवान् की कृपा  बनी रहती है !
४)चतुर्मुख भगवान् के रूप में चार मुखी रुद्राक्ष कहा गया है,उसको धारण करने वाले पर चतुर्मुख भगवान् की कृपा सदैव बनी रहती है !
५)पंचमुखी रुद्राक्ष को पंचब्रह्म अर्थात् पांच मुह वाले शिव का रूप कहा जाता है,उसको धारण करने पर स्वयं ब्रह्मरूप भगवान् शिव पुरुष की हत्या के दोष को समाप्त कर देते हैं !
६)षष्ठमुखी रुद्राक्ष को कार्तिके का स्वरुप कहा जाता है ,उसको धारण करने वाले पर महालक्ष्मी की कृपा होती है एवम उत्तम अरोग्य प्राप्त होता है.कुछ लोग इसको गणेश का रूप भी मानते है इसलिए बुद्धिमान मनुष्य इसको विद्या, बुद्धि एवम लक्ष्मी की वृधि के लिये धारण करते हैं !
७)सप्त,मुखी रुद्राक्ष सातलोक ,सप्त मात्र शक्ति का स्वरुप होता है ,इसके धारण करने मात्र से महान सम्प्पति एवम अतिउत्तम अरोग्य की प्राप्ति होती है !
८)अष्ठमुखी रुद्राक्ष को आठ माताओं का स्वरुप कहा जाता है एवम इसे अष्ठवसु प्रिय भी कहा गया है यह गंगा जी को भी प्रतिकार है, सत्यवादी मनुष्य को इसे धारण करने पर तीनो की कृपा प्राप्त होती है एवम महान ज्ञान एवम सम्पत्ति प्राप्त होती है !
९)नौमुखी रुद्राक्ष को नौ शक्तिओं वाला देवता कहा जाता है इसे धारण करने वाले को नौ शक्तियों की प्रसन्नता-कृपा प्राप्त होती है !
१०)दस मुखी रुद्राक्ष को यम देवता का स्वरुप कहा जाता है जिसका दर्शन ही शांति देने वाला एवम धारण करना परम शांति प्रदाता है इसमें तनिक भी संसय नहीं है !
११)ग्यारह मुखी रुद्राक्ष को एकादस रूद्रदेवता का स्वरुप कहा जाता है वे एकादस रूद्र देव सदैव सौभाग्य ,संवर्धन करने वाले होते हैं !
१२)द्वादश मुखी रुद्राक्ष को ,महाविष्णु का स्वरुप कहा जाता है इसे द्वादश आदित्यों का स्वरुप भी मानते हैं,इसको धारण करने पर व्यक्ति तत्पर अर्थात महाविष्णु और द्वादश आदित्य परायण हो जाता है !
१३)तेरह मुखी रुद्राक्ष को मनोकामना एवम सिद्धयों का प्रदाता कहा गया है,इसके धारण मात्र से काम देव की कृपा प्राप्त होती है,इसे सब प्रकार से सुभ कहा गया है
१४)चौदह मुखी रुद्राक्ष की उत्पत्ति साक्षात् रूद्र भगवान् के नेत्रों से हुई है ,यह परम अरोग्य दायक एवम सर्वरोग हारी है !
अमावस्या ,पुरान्माशी,अयन योग के समय ,संक्रांति के समय जब दिन और रात बराबर होते हैं जब दिन पूर्ण हो रहा हो एवम ग्रहण,सूर्य-चन्द्र के समय रुद्राक्ष धारण किया जाये तो मनुष्य अति शीघरह पापों से मुक्त हो जाता है !
साबधानियाँ :-===========
रुद्राक्ष धारण करने वाले भक्त को लहसुन,प्याज,कुकुरमुत्ता जैसा पदार्थ.शराब,मॉस, परायी स्त्री,अभछय वस्तुओं का त्याग कर देना चाहियें तो रुद्राक्ष का लाभ मिलता है और भगवान शिव की साक्षात् कृपा होती है
               

Tuesday, 23 September 2014

सुन्दर काण्ड का अद्भुत अनुष्ठान


इस अनुष्ठान से सभी प्रकार की मनोकामनाएँ निश्चय ही पूर्ण होती है । अनेक व्यक्तियों द्वारा यह अनुभूत है ।
सर्वप्रथम अपने पूजा स्थान में श्रीहनुमान जी का एक सुन्दर चित्र विधि-वत् प्रतिष्ठित कर लें । उस चित्र के सम्मुख दीपक एवं धूपबत्ती जलाकर रखें । चित्र का यथा-शक्ति भक्ति-भाव के साथ पूजन करें ।
पूजन कर चुकने पर ‘श्रीराम-चरित-मानस‘ के ‘किष्किन्धा-काण्ड‘ की निम्न-लिखित पंक्तियों का पाठ हाथ जोड़ कर 11 बार करें -
“कहइ रीछ-पति-’सुनु हनुमाना ! का चुप साधि रहेहु बलवाना ?
पवन-तनय बल पवन समाना , बुधि विवेक विग्यान निधाना ।।
कौन-सी काजु कठिन जग माँहीं, जो नहीं होत तात तुम पाहीं ।”
11 पाठ कर चुकने पर ‘सुन्दर-काण्ड‘ का आद्योपान्त पाठ करें । तदनन्तर पुनः उक्त पंक्तियों का पाठ 11 बार करें । इस प्रकार यह ‘एक पाठ‘ हुआ ।
उक्त पाठ को 45 बार करना है । इस अनुष्ठान को किसी भी मंगलवार के दिन श्रीहनुमान जी के दर्शन करने के बाद प्रारम्भ करना चाहिए । प्रतिदिन तीन पाठ करें, तो 15 दिनों में अनुष्ठान पूरा हो जाएगा । यदि तीन पाठ न कर सकें, तो प्रतिदिन एक ही पाठ कर 45 दिनों में अनुष्ठान पूर्ण कर सकते हैं ।
अनुष्ठान काल में अपनी दिन-चर्या इस प्रकार बितानी चाहिए, जिससे श्रीहनुमान जी प्रसन्न हों अर्थात् ब्रह्मचर्य, सत्य-वादिता, भगवान् श्रीराम का गुणानुवाद, सत्संग आदि में तत्पर रहे ।

कैसा है आपका हाथ मिलाने का तरीका, जानें अपना व्यक्तित्व...



प्रतिदिन हम तरह-तरह के लोगों से मिलते हैं किंतु कौन ऐसा है, जिसे हम पहली मुलाकात में जान नहीं पाते हैं किंतु यह काम कोई कठिन नहीं है। आजकल ज्योतिष, वैज्ञानिक हर चीज पर शोध, अध्ययन करते हैं, उनकी इसी अध्ययन की कड़ी में एक शोध किया गया हाथ मिलाने के तरीकों पर। 
कसकर हाथ मिलाने वाला व्यक्ति :-
से व्यक्ति अच्छे होते हैं। सामने वाले को आदर देते हैं। बराबरी का दर्जा देते हैं। आदर देते हैं एवं आदर पाने की आकांक्षा रखते हैं। समझदार होते हैं। भरोसेमंद होते हैं। दूसरों पर भरोसा करते हैं। पूर्ण परिपक्व एवं सभ्य होते हैं।
ढीलेपन से हाथ मिलाने वाला व्यक्ति :-
स्वार्थी होगा, चालक होगा, लापरवाह होगा, सामने वाले व्यक्ति में रुचि नहीं लेगा। वह संकुचित विचारों वाला होगा, शंकालु प्रवृत्ति का होगा। सामने वाले को तुच्छ समझने वाला भी हो सकता है। घमंडी होगा। स्वयं को ज्यादा होशियार समझेगा। जिद्दी एवं तानाशाही प्रवृत्ति का होगा। वह जिस व्यक्ति से संपर्क करेगा, उसमें उसका स्वार्थ रहेगा। कभी ऐसा भी हो सकता है कि हाथ मिलाते समय उसके हाथ में दर्द हो या वह छुआछूत की बीमारी से डरता हो। इसलिए भी वह ढीले तरीके से हाथ मिला सकता है। कुल मिलाकर ऐसे व्यक्तियों में अहं भाव या सुपीरियरीटी कॉम्प्लेक्स ज्यादा पाया जाता है।
नीचे हाथ रखकर दूसरे हाथ से कसकर हाथ मिलाने वाले व्यक्ति :-
ऐसे व्यक्ति अनुशासन रखते हैं एवं अनुशासन चाहते हैं। ऐसे व्यक्ति दूसरों का उनके स्तर या पद के अनुसार सम्मान करते हैं एवं स्वीकार करते हैं। दिल के साफ होते हैं। स्पष्टवादी होते हैं। कर्तव्यशील होते हैं। ईमानदार व वफादार होते हैं। इंसान से इंसान की तरह मिलने वाले होते हैं।
एक हाथ मिलाते हुए दूसरा हाथ सामने वाले के हाथ पर किसी जगह रखने वाला व्यक्ति :-
मानो कोई व्यक्ति किसी दूसरे से हाथ मिलाता है। हाथ मिलाते समय दूसरा हाथ सामने वाले के हाथ पर जैसे- कलाई, बाजू या कंधे पर रखे तो वह निम्न स्वभाव वाला होगा। यह सामने वाले का हितैषी होगा। सामने वाले की अच्छाई चाहेगा। उसकी खुशी, उसकी उन्नति, उसकी समृद्धि चाहेगा। उसे अच्छा मार्गदर्शन देगा एवं यथाशक्ति मदद करेगा। सामने वाले के सुख-दुख में, हंसी-खुशी में, अच्छे-बुरे में साथ देगा एवं सामने वाले का शुभचिंतक होगा।
सैंडविच (तरीके से) हाथ मिलाने वाला व्यक्ति :-
ऐसा व्यक्ति अत्यंत धूर्त एवं चालक होगा। कपटी होगा, बाहर से मीठी-मीठी बातें करेगा परंतु अंदर ही अंदर जड़ काटेगा। वह सब कार्यों में माहिर रहेगा। वह किसी भी किस्म के व्यक्ति से बात करके उससे अपना मतलब सिद्ध कर सकता है। अवसरवादी होगा। किसी भी बिजनेस में ऐसे व्यक्ति सफल रहते हैं क्योंकि स्वभाव में लचीलापन होता है। ऐसे लोगों में गजब की शक्ति होती है तथा अपना काम निकालने के लिए ये सभी हथकंडे प्रयोग करके सफल हो जाते हैं। उनमें दूसरों को अपनी ओर आकर्षित करने में महारत होती है।
हाथ मिलाकर लगातार हाथ हिलाने वाला व्यक्ति :-
वह बहुत लापरवाह होगा। उसे पता ही नहीं होता है कि आसपास क्या हो रहा है। संसार में क्या हो रहा है, इसकी उसे चिंता ही नहीं होती हैं। वह बहुत सुस्त होता है, दिखने में बड़ा होता है, परंतु बुद्धि छोटे बच्चों के समान रहती है। दिल का साफ होता है, कपटी बिलकुल नहीं होता है। गैर-जिम्मेदार होता है, इसलिए कोई भी जिम्मेदारी का काम उसे देना ठीक नहीं होता है। अदूरदर्शी होगा। उसे आसानी से मूर्ख बनाया जा सकता है। ऐसे लोगों में एक सचाई यह होती है कि जिससे ये हाथ मिलाते हैं, उसके प्रति प्रेम-भाव रखते हैं एवं संवेदनशील होते हैं।
सामने वाले की हथेली को ऊपर से दबाकर हाथ मिलाने वाला व्यक्ति :-
यदि कोई व्यक्ति सामने वाले की हथेली को ऊपर से दबाकर हाथ मिलाता है तो वह निम्न स्वभाव का होगा। वह गुस्सैल एवं घमंडी होगा। सुपीरियरीटी कॉम्प्लेक्स उसमें कूट-कूटकर भरा होता है। सामने वालेको तुच्छ या नहीं के बराबर मानता है। अपने आपको सभी से उच्च समझता है। दूसरों की चिंता नहीं करता। दूसरों पर अपना प्रभाव जमाकर या दबाब डालकर काम करवाता है। तानाशाही प्रवृत्ति का होता है। वह चाहता है कि लोग उसे मानें, जानें एवं सम्मान दें। चाहे वह कैसा भी हो, हर जगह अपने को उच्च मानता है।
हथेली यदि मुलायम हो तो :-
ऐसे व्यक्ति की सभी आवश्यकताएं आसानी से पूर्ण हो जाएंगी। वह किसी अमीर घर का व्यक्ति हो सकता है। ऐसा व्यक्ति सुस्त होगा तथा मेहनत पसंद नहीं होगा। फिर भी वह इतना किस्मत वाला होगा कि सभी कुछ सही समय पर सहजता से प्राप्त होगा। दिल का कोमल परंतु अय्याश किस्म का होगा। उसकी कुछ खास चुनिंदा आदतें होंगी। कामचोर होगा। वह चाहे जिस परिस्थिति में से आया हो, खुशकिस्मत ही रहेगा।
सख्त या कठोर हथेली वाला व्यक्ति :-
ऐसी हथेली वाले व्यक्ति को अपनी किसी भी प्रकार की आवश्यकता की पूर्ति के लिए मेहनत करनी पड़ेगी। वह शारीरिक एवं मानसिक दोनों प्रकार की मेहनत करने वाला होगा। रोजी-रोटी परिश्रम से पाएगा। उसकी जिंदगी संघर्षमय होगी या यूं कहिए कि उसकी जिंदगी श्रममय होगी। वह जल्दी ही गरम परंतु जल्दी ही ठंडा हो जाने वाला रहेगा।
नीचे से खुली हथेली से हाथ मिलाने वाला व्यक्ति :-
वह सहज स्वभाव का होगा। सबसे सरलता से मिलेगा। सामने वाले को स्वीकारेगा एवं सम्मान करेगा। कभी-कभी सामने वाले से अपने को हीन समझेगा। एक अच्छा मेजबान भी होगा। वह डरपोक होगा। बहुत जल्दी विचलित होगा। सामनेवाला उसे आसानी से अपने वश में कर सकता है और अपनी बात से सहमत करवा सकता है। वह हीनभावना से ग्रस्त होगा। बहुत अच्छा सहयोगी भी हो सकता है। मिलनसार होगा, शांतिप्रिय होगा, परंपरा का पालन करेगा। कुल मिलाकर दिल का साफ होगा।
अंगूठे तथा प्रथम अंगुली के मध्य ज्यादा अंतर हो तो :-
यह व्यक्ति खुले दिल एवं दिमाग वाला होगा। दूसरों को मदद करेगा। वह अत्यंत भावुक एवं संवेदनशील होगा। उसका दिल बहुत जल्दी पसीज जाता है। वह खर्चीला होगा, अदूरदर्शी होगा तथा बिना सोचे-समझे कदम उठाने वाला रहेगा। धार्मिक प्रवृत्ति वाला होगा, अंधविश्वासी होगा तथा मानव प्रेमी होगा। सहज स्वभाव का होगा तथा जल्दी ही किसी के प्रभाव में आने वाला होगा। अति कल्पनाशील या अवास्तविकता में जीने वाला होगा।
अंगूठे तथा प्रथम अंगुली के मध्य कम अंतर हो तो :-
संकुचित विचारों वाला तथा कंजूस प्रवृत्ति का होगा। दिल का कठोर होगा तथा इच्छा शक्ति दृढ़ होगी। जिद्दी एवं अव्यावहारिक होगा। भावनाओं में बहने वाला नहीं होगा तथा प्रत्येक कदम फूंक-फूंककर रखने वाला होगा। स्वस्थ एवं स्पष्टवादी होगा। अवसरों एवं लोगों को अपने फायदे के लिए उपयोग करने वाला होगा। घमंडी एवं असहयोगी होगा।
अंगूठे एवं प्रथम अंगुली के मध्य न ज्यादा न कम अंतर हो तो :-
ऐसा व्यक्ति समझदार होगा, संतुलित होगा, यशस्वी होगा, मितव्ययी होगा तथा वास्तविकता में जीने वाला होगा, रचनात्मक होगा। समयानुसार या परिस्थिति अनुसार नरम-गरम होगा। सहयोगी एवं कर्तव्य-निष्ठ होगा। पक्षपात नहीं करेगा तथा जीवन को वास्तविक तरीके से जीने वाला होगा।

शिवलिंग यानी शिवजी का साक्षात स्वरूप।


शिवलिंग की पूजा से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं। शिवलिंग यानी शिवजी का साक्षात स्वरूप। शिवलिंग का पूजन विधि-विधान से करने पर महादेव के साथ ही सभी देवी-देवताओं की कृपा प्राप्त होती है। शिवलिंग पूजन के संबंध में कई नियम बताए गए हैं, जिनका पालन करने पर भेालेनाथ जल्दी ही भक्त पर कृपा बरसाते हैं। वैसे तो शिवलिंग पर कई प्रकार की चीजें अर्पित की जाती हैं, लेकिन हमें हल्दी नहीं चढ़ानी चाहिए। हल्दी शिवलिंग पर नहीं, बल्कि जलाधारी पर अर्पित की जानी चाहिए। यहां जानिए शिवलिंग पूजा के सामान्य नियम से जुड़ी खास बातें...
शास्त्रों के अनुसार, सभी देवी-देवताओं के विधिवत पूजन आदि कर्मों में बहुत सी सामग्रियां शामिल की जाती हैं। इन सामग्रियों में हल्दी भी है। पूजन कर्म में हल्दी का महत्वपूर्ण स्थान है। कई पूजन विधियां ऐसी हैं जो हल्दी के बिना पूर्ण नहीं मानी जा सकती। हल्दी शिवजी के अतिरिक्त अधिकतर सभी देवी-देवताओं को अर्पित की जाती है। हल्दी स्त्रियों से संबंधित वस्तु है। इसका उपयोग सौंदर्य प्रसाधन संबंधी कार्यों में मुख्य रूप से किया जाता है। शास्त्रों के अनुसार शिवलिंग पुरुष तत्व का प्रतीक है। हल्दी स्त्री तत्व से संबंधित वस्तु है, इसी वजह से महादेव को हल्दी नहीं चढ़ाई जाती है।

Jai baba ki

jai bala ji sarkar