रुद्राक्ष क्या है तथा कितने प्रकार का होता है !! ~ Balaji Kripa

Monday, 29 September 2014

रुद्राक्ष क्या है तथा कितने प्रकार का होता है !!


एक बार भगवान् कलािग्ररूद्र ने त्रिपुरासुर नामक राक्षस को मारने के लिये आँखे बंद कर समाधिस्थ हुए उसी समय आँखों से जल की बूंदे प्रथ्वी पर गिरी वे बूंदे रुद्राक्ष बन गयी.सबके कल्याण की कामना से बता रहा हूँ की जो रुद्राक्ष का नाम भी लेता है उसे दस गौओं के दान करने का फल प्राप्त होता है तथा उसका दर्शन और स्पर्श कर लेने से उसका भी दो गुना फल प्राप्त होता है इससे जादा किया कहें इसके बारे में श्लोक कहे गए हैं .रुद्राक्ष कहाँ स्थित है? किया नाम है ? इसे मनुष्य को कैसे धरण करना चाहिए? कितने प्रकार के भेद हैं ?किन-२ मन्त्रों से धारण करना चाहिए ?.शहस्त्र दिव्यवर्ष व्यतीत हो जाने पर जिस समय नेत्र खोले उसी समय कलािग्ररूद्र की आँखों से  जल की बूंदे निकली और प्रथ्वी पर गिरी वही  बूंदे महारुद्राक्ष का पेड़ बनकर भक्तों पर कृपा करने के लिये अचल हो गयीं.जो भक्त इसको धारण करता है यह उसके दिन एवम रात में किए हुए पापों का हरण कर लेता है इसके दर्शन से लाख गुना तथा धारण करने से कोटि गुना फल प्राप्त होता है उसे धारण करने से मनुष्य को उसका सौकोटि गुना पुण्य फल प्राप्त होता है इतना ही नहीं मनुष्य रुद्राक्ष धारण करके रूद्र(शंकर जी) का जप करने का फल प्राप्त कर लेता है.आमले के बराबर का रुद्राक्ष श्रेस्ठ माना गया है .जो रुध्राक्ष बेर के बराबर हो मध्यम और चने के सामान वाले रुद्राक्ष को विद्वानों ने अधम कहा है.मंगलकारी रुद्राक्ष  ब्राह्मण ,छत्रिय ,वैश्य तथा सूद्र जाति के रूप में उन-२ जातियों के कल्याण के लिये भगवान शिव की आज्ञा से प्रथ्वी पर उत्पन्न हुआ .शुवेत को ब्राह्मण वर्ण, रक्त को छत्रिय वर्ण,पीत को वैश्य वर्ण तथा काले को सूद्र वर्ण का रुद्राक्ष कहा गया है ,शुवेत रुद्राक्ष को ब्राह्मण वर्ण, रक्त को छत्रिय वर्ण,पीत को वैश्य वर्ण,काले को सूद्र वर्ण को धारण करना चाहिये.मजबूत ,चिकने ,सामान  रूप से गोलाई लिये हुए मोटे काँटों युक्त इस प्रकार के रुद्राक्ष को सुभ कहा जाता है ,जिसमें कीड़ा लगा हुआ हो,जो टुटा-फूटा हुआ हो ,जो काँटों से रहित हो ,जिसमें छेद हो तथा जो ठीक न लगता हो,ये छ: प्रकार के रुद्राक्ष त्याज्य हैं जिसमें प्राकृतिक छेद हो उसे उत्तम रुद्राक्ष कहा गया है.माला में पिरोने के लिये जिसमें छेद किया जाता है उसे मध्यम कहा जाता है, धारण करने के लिये समान रूप वाले,चिकने,द्रण,मोटे रुद्राक्षों को रेशमी धागे में पिरोना चाहिये ,सभी का आकार सामान्य,सौम्य और एक रूप होना चाहियें जिसमें स्वर्ण जैसी रेखा झलकती हो,शिव भक्तों को उसी प्रकार का रुद्राक्ष धारण करना चाहियें. एक रुद्राक्ष चोटी में एवम माला में पिरोकर सिरपर तीस रुद्राक्ष धारण करें, छत्तीस रुद्राक्ष कंठ में , १६-१६ रुद्राक्ष दोनों भुजाओं में,बारह रुद्राक्ष हांथ की कलाई में तथा पंद्रह रुद्राक्ष कंधे पर धारण करना चाहिए .गले में १०८ दानो की माला उपवीत की तरह धारण करना चाहिये,२,३,५, अथवा ७ लड़ियों की माला गले में धारण करनी चाहिये.कान की बाली कुंडल एवम मुकुट के रूप में भी रुद्राक्ष धारण करना चाहियें,विशेष सूत्र में पिरोई हुई माला को बाजूबंद में सोते जागते सर्वदा धारण किए रहना चाहियें.एक शहस्त्र रुद्राक्ष धारण करने को उत्तम ,५०० को मध्यम ,३०० रुद्राक्ष को अधम कहा गया है इसलिए इस प्रकार भेद समझकर धारण करना चाहियें.रुद्राक्ष के १४ भेद होते हैं-:
१)एक मुखी का रुद्राक्ष साक्षात् परम तत्व का रूप है,इन्द्रियों को वशीभूत करते हुए जो भी उसे धारण करता है वह परात्परंतत्व शिव में लीन हो जाता है !
२) दो मुखी  वाले रुद्राक्ष को अर्ध्नारीश्वर रूप कहा गया है ,जो सदैव धारण किए रहते हैं उनपर निरंतर अर्ध्नारीश्वर भगवान् शिव की कृपा बनी रहती है !
३)तीन मुखी  वाले रुद्राक्ष को अग्रिएत्रह स्वरुप माना जाता है ,उसको धारण किए रहने पर सदैव अग्रि भगवान् की कृपा  बनी रहती है !
४)चतुर्मुख भगवान् के रूप में चार मुखी रुद्राक्ष कहा गया है,उसको धारण करने वाले पर चतुर्मुख भगवान् की कृपा सदैव बनी रहती है !
५)पंचमुखी रुद्राक्ष को पंचब्रह्म अर्थात् पांच मुह वाले शिव का रूप कहा जाता है,उसको धारण करने पर स्वयं ब्रह्मरूप भगवान् शिव पुरुष की हत्या के दोष को समाप्त कर देते हैं !
६)षष्ठमुखी रुद्राक्ष को कार्तिके का स्वरुप कहा जाता है ,उसको धारण करने वाले पर महालक्ष्मी की कृपा होती है एवम उत्तम अरोग्य प्राप्त होता है.कुछ लोग इसको गणेश का रूप भी मानते है इसलिए बुद्धिमान मनुष्य इसको विद्या, बुद्धि एवम लक्ष्मी की वृधि के लिये धारण करते हैं !
७)सप्त,मुखी रुद्राक्ष सातलोक ,सप्त मात्र शक्ति का स्वरुप होता है ,इसके धारण करने मात्र से महान सम्प्पति एवम अतिउत्तम अरोग्य की प्राप्ति होती है !
८)अष्ठमुखी रुद्राक्ष को आठ माताओं का स्वरुप कहा जाता है एवम इसे अष्ठवसु प्रिय भी कहा गया है यह गंगा जी को भी प्रतिकार है, सत्यवादी मनुष्य को इसे धारण करने पर तीनो की कृपा प्राप्त होती है एवम महान ज्ञान एवम सम्पत्ति प्राप्त होती है !
९)नौमुखी रुद्राक्ष को नौ शक्तिओं वाला देवता कहा जाता है इसे धारण करने वाले को नौ शक्तियों की प्रसन्नता-कृपा प्राप्त होती है !
१०)दस मुखी रुद्राक्ष को यम देवता का स्वरुप कहा जाता है जिसका दर्शन ही शांति देने वाला एवम धारण करना परम शांति प्रदाता है इसमें तनिक भी संसय नहीं है !
११)ग्यारह मुखी रुद्राक्ष को एकादस रूद्रदेवता का स्वरुप कहा जाता है वे एकादस रूद्र देव सदैव सौभाग्य ,संवर्धन करने वाले होते हैं !
१२)द्वादश मुखी रुद्राक्ष को ,महाविष्णु का स्वरुप कहा जाता है इसे द्वादश आदित्यों का स्वरुप भी मानते हैं,इसको धारण करने पर व्यक्ति तत्पर अर्थात महाविष्णु और द्वादश आदित्य परायण हो जाता है !
१३)तेरह मुखी रुद्राक्ष को मनोकामना एवम सिद्धयों का प्रदाता कहा गया है,इसके धारण मात्र से काम देव की कृपा प्राप्त होती है,इसे सब प्रकार से सुभ कहा गया है
१४)चौदह मुखी रुद्राक्ष की उत्पत्ति साक्षात् रूद्र भगवान् के नेत्रों से हुई है ,यह परम अरोग्य दायक एवम सर्वरोग हारी है !
अमावस्या ,पुरान्माशी,अयन योग के समय ,संक्रांति के समय जब दिन और रात बराबर होते हैं जब दिन पूर्ण हो रहा हो एवम ग्रहण,सूर्य-चन्द्र के समय रुद्राक्ष धारण किया जाये तो मनुष्य अति शीघरह पापों से मुक्त हो जाता है !
साबधानियाँ :-===========
रुद्राक्ष धारण करने वाले भक्त को लहसुन,प्याज,कुकुरमुत्ता जैसा पदार्थ.शराब,मॉस, परायी स्त्री,अभछय वस्तुओं का त्याग कर देना चाहियें तो रुद्राक्ष का लाभ मिलता है और भगवान शिव की साक्षात् कृपा होती है
               

1 comment:

  1. nice page i like the concept of playing such bhajans while reading

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