October 2014 ~ Balaji Kripa

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May Baba fullfill all the wishes of the Devotees.

जय श्रीराम

भगवान रामभक्त हनुमान की उपासना से जीवन के सारे कष्ट, संकट मिट जाते है। माना जाता है कि हनुमान एक ऐसे देवता है जो थोड़ी-सी प्रार्थना और पूजा से ही शीघ्र प्रसन्न हो जाते है। जहां मंगलवार और शनिवार का दिन इनके पूजन के लिए सर्वश्रेष्ठ हैं।

ॐ हं हनुमंतये नम:

मंगलवार और शनिवार के दिन हनुमान म‍ंदिर में जाकर रामभक्त हनुमान का गुणगान करें और उनसे अपने पापों के लिए क्षमायाचना करें।

Friday, 31 October 2014

बालाजी सरकार को बुलाने का भजन !!

 जरा सामने तो आओ हनुमत छुप छुप छलने मे क्या राज हैं
तुम छुप ना सकोगे परमात्मा मेरी आत्मा की ये आवाज है।

हम तुमहें चाहें तुम नहीं चाहो ऐसा कभी नहीं हो सकता
पिता अपने बालक से बिछुड़कर सुख से कभी नही सो सकता
हमें डरने की जग में कया बात है जब हाथ मे तुम्हारे मेरी लाज है
                                                                            तुम छुप ना सकोगे ......
प्रेम की यह आग बाबा जो इधर उठे और उधर जले
प्यार के हैं यह तार प्रभु जो इधर सजे और उधर बजे
तेरी प्रभुता पर हमें बड़ा नाज है इस दुनिया का तू ही सरताज है
                                                                           तुम छुप ना सकोगे ......

भजन श्री बालाजी सरकार !!


भक्ती के रगे रंग मे हनुमान नजर आये
जिस दिन चीरा सीना सिया राम नजर आये

रावण ने चुराई सीता लंका में रखी जाके
उनका पता लगाने हनुमान नजर आये
                                          भक्ती के रगे रंग मे.......
लक्ष्मण के लगी शक्ति घायल हुये वो रण मे
तव बूटी लाने को हनुमान नजर आये
                                           भक्ती के रगे रंग मे........
अहिरावण ने राम लखन रखे पातालपुरी जाकर
उनका पता लगाने को हनुमान नजर आये
                                             भक्ती के रगे रंग मे...........

श्री बालाजी सरकार से भजन के द्वारा प्रार्थना !!


मेरा कोई ना सहारा बिन तेरे सुन पवनपुत्र प्रभु मेरे ।

बाबा तेरे बिन मेरा कौन यहा प्रभु तुमहें छोड़ मै जाऊ कहा
मै तो आन पड हुं दर तेरे सुन पवनपुत्र प्रभु मेरे
                                                   मेरा कोई ना...................

मैंने जन्म लिया जग मै आया प्रभु तेरी दया से सबकुछ पाया
तुने किये उपकार घनेरे सुन पवनपुत्र प्रभु मेरे
                                                   मेरा कोई ना................

हरि आ जाओ बाबा आ जाओ अब और ना मुझको तरसाओ
काटो दुख के दिनो के फेरे सुन पवनपुत्र प्रभु मेरे
                                                   मेरा कोई ना.............

जिस दिन से दुनिया मे आया मैने पलभर चैन नही पाया
सहे कष्ट पे कष्ट घनेरे सुन पवनपुत्र प्रभु मेरे
                                                   मेरा कोई ना.................
मेरा धरम का मारग छूट  गया प्रभु कष्ट ने मुझको घेर लिया
मैने जतन किये बहुतेरे सुन पवनपुत्र प्रभु मेरे
                                                     मेरा कोई ना..............

मेरे सारे सहारे छूट  गये बाबा तुम भी मुझस रूठ गये
आओ करने  दूर अधेरे सुन पवनपुत्र प्रभु मेरे
                                                 मेरा कोई ना..............

भजन श्री बालाजी महाराज !!


खाली नहीं गया कोई बालाजी के द्वार से
मेरे बालाजी झोली भरते है सबकी प्यार से..

भक्तों के मतवाले बाबा भण्डारे भरपूर करे 
दान दया का देने वाले दुनिया मे मशहूर करे 
लाखों प्राणी तर गये है इनके उपकार से

मेरे बाला जी ..........................................

शंकर का अवतारी बाबा बड़ा ही देव महान है
राम नाम की जपते माला इनकी ये पहचान है
धरती गूजें अम्बर गूजें इनकी जय-जय कार से

मेरे बाला जी ..........................................

एक पते की बात बताऊ इनसे नेह लगाओ जी
ऐ भक्तों कुछ करके तुम भी इनसे काम निकालो जी
जो मागो सो मिल जाता शिव के अवतार से

मेरे बाला जी ..........................................

खाली नहीं गया कोई बाला जी के द्वार से
मेरे बाला जी झोली भरते है सबकी प्यार से

श्री बालाजी सरकार का भजन !!


मुझे ऐसा दो वरदान कि तेरा करते रहे गुणगान !
तेरा नाम ही ले-ले  कर  मेरे तन से निकले प्राण !!

मुझे ऐसा दो वरदान...................................

मैंने आकर के अर्ज लगाई है, सारी विपदा तुम्हें सुनाई है !
अब गौर करो मेरी अर्जी पर, बाबा आप पिता समान !!

मुझे ऐसा दो वरदान...................................

मैंने आकर के जोत जलाई है, तेरे दर्श की आस लगाई है !
मुझे दर्श दिखा दो बालाजी, बाबा आप हो दया निधान !!

मुझे ऐसा दो वरदान...................................

सारे जग से मै घबराया हू अब शरण तुम्हारी आया हूँ !
मुझे दास बनालो चरणों का बाबा आप हो बड़े महान !!

मुझे ऐसा दो वरदान...................................

मेरे बिगड़े काम है पड़े हुए, कर जोड़ शरण हम खड़े हुए !
बस एक नजर से देख लो तुम, मेरे पुरन हो सब काम !!

मुझे ऐसा दो वरदान...................................

श्री बालाजी चालीसा !!


श्री बालाजी चालीसा के  पाठ का विधि- विधान से  रोजाना सात बार करने से किसी भी प्रकार का संकट हो (आर्थिक ,मानसिक ,शारीरिक ,प्रेतादिक )४१ दिन में लाभ होजाता है !!
 

!! दोहा !!

श्री गुरू चरण चितलाय के धरें ध्यान हनुमान !
बालाजी चालीसा लिखें दास स्नेही कल्याण !!
विश्व विदित वर दानी संकट हरण हनुमान !
मेंहदीपुर प्रकट भये बालाजी भगवान !!

!! चोपाई !!

जय हनुमान बालाजी देवा, प्रकट भए यहाँ तीनों देवा !
प्रेतराज भैरव बलवाना, कोतवाल कप्तान हनुमाना !!
मेहदीपुर अवतार लिया है, भक्तो का उध्दार किया है !
बालरूप प्रकटे है यहां पर, संकट वाले आते है जहाँ पर !!
डाकनि, शाकनि अरु जिन्दनी, मशान चुडैल भूत भूतनी !
जाके भय से सब भाग जाते, स्याने भोपे यहाँ घबराते !!
चौकी बंधन सब कट जाते, दूत मिले आनंद मनाते !
सच्चा है दरबार तिहारा, शरण पडे सुख पावे भारा !!
रूप तेज बल अतुलित धामा, सन्मुख जिनके सिय रामा !
कनक मुकुट मणि तेज प्रकाशा, सवकी होवत पूर्ण आशा !!
महंत गणेशपुरी गुणीले, भए सुसेवक राम रंगीले !
अदभुत कला दिखाई कैसी, कलयुग ज्योति जलाई जैसी !!
ऊँची ध्वज पताका नभ में, स्वर्ण कलश है उन्नत जग मे !
धर्म सत्य का डंका बाजे, सियाराम जय शंकर राजे !!
आना फिराया मुगदर घोटा, भूत जिंद पर पडते सोटा !
राम लक्ष्मण सिय ह्रदय कल्याणा, बाल रूप प्रकटे हनुमाना !!
जय हनुमंत हठीले देवा, पुरी परिवार करत है सेवा !
लड्डू, चूरमा, मिश्री, मेवा, का भोग लगाकर होती है सेवा !!
लड्डू, चूरमा, मिश्री, मेवा, अर्जी दरखास्त लगाऊँ देवा !
दया करे सब विधि बालाजी, संकट हरण प्रकटे बालाजी !!
जय बाबा की जन-जन उचारे, कोटिक जन आए तेरे द्वारे !
बाल समय रवि भक्षहि लीन्हा, तिमिर मय जग कीन्ही तीन्हा !!
देवन विनती की अति भारी, छाँड दियो रवि कष्ट निहारी !
लाँघि उदधि सिया सुधि लाए, लक्ष्मण हित संजीवन लाए !!
रामानुज प्राण दिवाकर, शंकर सुवन माँ अंजनी चाकर !
केसरी नंदन दुख भव भंजन, रामानंद सदा सुख सुख संदन !!
सिया राम के प्राण प्यारे, जय बाबा की भक्तउचारे !
संकट दुख भंजन भगवाना, दया करहुँ हे कृपा निधाना !!
सुमर बाल रूप कल्याणा, करे मनोरथ पूर्ण कामा !
अष्ट सिध्दि नव निधि दातारी, भक्त जन आवे बहु भारी !
मेवा अरु मिष्ठान प्रवीना, भेट चढावें धनि अरु दीना !!
नृत्य करे नित न्यारे -न्यारे, रिध्दि-सिध्दियाँ जाके द्वारे !
अर्जी का आदेश मिलते ही, भैरव भूत पकडते तब ही !!
कोतवाल कप्तान कृपाणी, प्रेतराज संकट कल्याणी !
चौकी बंधन कटते भाई, जो जन करते है सेवकाई !!
रामदास बाल भगवंता, मेहदीपुर प्रकटे हनुमंता !
जो जन बालाजी मे आते है, जन्म-जन्म के पाप नशाते !!
जल पावन लेकर घर आते, निर्मल हो आनंद मनाते !
क्रूर कठिन संकट भगजावे, सत्य धर्म पथ राह दिखावे !!
जो सत पाठ करे चालीसा, तापर प्रसन्न होय बागीसा !
कल्याण स्नेही, स्नेह से गावे, सुख समृध्दि रिध्दि सिध्दि पावे !!

!! दोहा !!

मंद बुध्दि मम जानके क्षमा करो गुणखान !
संकट मोचन क्षमहु मम दास स्नेही कल्याण !!

श्री प्रेतराज जी चालीसा !!

 श्री प्रेतराज जी का चालीसा का नित्य पाठ करने से सभी प्रकार के संकट दूर होते है !
|| दोहा ||
गणपति की कर वंदना , गुरू चरनन चित लाय !
प्रेतराज जी का लिखूँ, चालीसा हरषाय !!
जय जय भूतादिक प्रबल, हरण सकल दुख भार !
वीर शिरोमणि जयति , जय प्रेतराज सरकार !!
चालीसा:=========

जय जय प्रेत्रराज जगपावन, महा प्रबल त्रय ताप नसावन !
विकट वीर करूणा के सागर , भक्त कष्ट हर सब गुण आगर !!
रतन जडित सिहासन सोहे , देखत सुर नर मुनि मन मोहे !
जगमग सिर पर मुकुट सुहावना, कनन कुण्डल अति मनभावन !!
धनुष कृपाण बाण अरु भाला, वीर वेष अति भृकुटि कराला !
गजारूढ संग सेना भारी, बाजत ढोल मृदंग जुझारी !!
छ्त्र चँवर पंखा सिर डोले , भक्त वृंद मिल जय जय बोले !
भक्त शिरोमणि वीर प्रचण्डा, दुष्ट दलन शोभीत भुजदण्डा !!
चलत सैन कांपत भूतलहूँ , दर्शन करत मिटत कलिमलहूँ !
घाटा मेहदीपुर मे आकर, प्रकटे प्रेतराज गुण सागर !!
लाल ध्वजा उड रही गगन मे, नाचत भक्त मगन हो मन मे !
भक्त कामना पुरन स्वामी, बजरंगी के सेवक नामी !!
इच्छा पुरन करने वाले , दुख संकट सब हरने वाले !
वो जिस इच्छा से आते है , वे सब मनवाछित फल पाते है !!
रोगी सेवा मे जो आते , शीघ्र स्वस्थ होकर घर जाते !
भूत, पिशाच, जिन्न बेताला, भागे देखत रुप कराला !!
भौतिक शारीरिक सब पीडा, मिटा शीघ्र करते है क्रीडा !
कठिन काज जग मे है जेते, रटत नाम पूरा सब होते !!
तन मन धन से सेवा करते , उनके सकल कष्ट प्रभू हरते !
हे करुणामय स्वामी मेरे, पडा हुआ हूँ चरण में तेरे !!
या विधि अरज करे तन मन से , छूटत रोग शोक सब तन से !
मेहदीपुर अवतार लिया है, भक्तो का दुख दूर किया है !!
रोगी पागल सान्ति हीना, भूत व्याधि अरु धन छीना !
जो जो तेरे द्वारे आते , मनवांछित फल पा घर जाते है !!
महिमा भूतल पर छाई है, भक्तो ने लीला गाई है !
महंत गणेश पूरी तपधारी, पूजा करते तन मन वारी !!
हाथो मे ले मुगदर घोटे , दूत खडे रहते है मोटे !
लाल देह सिन्दूर बदन मे, कापत थर- थर भूत भवन में !!
जो कोई प्रेतराज चालीसा, पाठ करत नित एक अरु बीसा !
प्रतः काल स्नान करावै, तेल और सिन्दूर लगावै !
चंदन इत्र फुलेल चढावै, पुष्पन की माला पहनावै !!
चंदन इत्र फुलेल चढावै, पुष्पन की माला पहनावै !
ले कपूर आरती उतारे, करे प्रार्थना जयति उचारे !!
इच्छा पूरण करते जन की , होती सफल कामना मन की !
भक्त कष्ट हर अरि कुल घातक, ध्यान करत छूटत सब पातक !!
जय जय जय प्रेताधिराज जय, जयति भूपति संकट हर जय !
जो नर पढत प्रेत चालीसा, रहत न कबहुँ दु:ख लवलेशा !!
कह सुखराम ध्यानधर मन मे , प्रेतराज पावन चरनन में !
दोहा ---
दुष्ट दलन जग अध हरन, समन सकल भव शूल !
जयति भक्त रक्षक प्रबल, प्रेतराज सुख मूल !!
कष्ट हरो सब जनन के , प्रेतराज बल धाम !
बसु निरंतर मम ह्रदय, कहत दास सुखराम !!


श्री भैरव जी चालीसा !!


श्री भैरव जी का रोजाना चालीसा का पाठ करने से श्री भैरव जी की कृपा से सारे कास्ट दूर हो जाते हैं !!
 ||दोहा ||
बटुकनाथ भैरव प्रभु गल मुण्डन की माल !
निज जन पर कर  कृपा श्री जगदम्बा के लाल !!
जय जय जय काली के लाला, करौ कृपा संतन प्रतिपाला !
गल सोहे मुण्डन की माला, कर सोहे त्रिशूल विशाला !!
श्याम स्वरुप वर्ण विशाला, पीकर मद रहते मतवाला !
एक हाथ मे खप्पर राजे, दूजे कर त्रिशूल विराजे !!
श्वान स्वारी भक्तन सोहे, रुद्र बटुक भक्तन मन मोहे !
संग साथ भूतन की सेना, रहे मस्त मतवारे नैना !!
चक्र तुण्ड अमरेश पियारा, त्रास- हरन है नाम तिहारा !
प्रेतराज श्मशान बिराजे, जय जय श्री स्वामी की गाजै !!
भैरव भीषण भीम कपाली, क्रोधी भूतेश भुजंगी हाली !
त्रास हरन है नाम तुम्हारा ,दुष्ट दलन है काल तुम्हारा !!
शिव अखिलेश चन्ड के स्वामी, काशी के कोतवाल नमामी !
अश्वनाथ क्रोधेश नमामी, भैरव काल जगत के स्वामी !!
क्षेत्रपाल दुख पान कहाए, चक्रनाथ मंजुल कहलाए !
दुष्टन के संहारक स्वामी, नमो नमामि अंतरयामी !!
करहु भक्त के पूरण काजा, सुर असुरन के हो तुम राजा !
नाथ पिशाचन के हो प्यारे , संकट काटे सकल हमारे !!
जगत पति उन्नत आडम्बर, रहते निशिदिन नाथ दिगम्बर !
संहारक सुनन्द तुम नामा ,करहु जनम के पूरन कामा !!
तुम्हारी कृपा सकल आनन्दा , भक्त जनन के काटो फंदा !
नमो नमो जय जय मन रंजन , कारण लम्ब आप भय भंजन !!
हो तुम देव त्रिलोचन नाथा, भक्त के चरणो मे नावत माथा !
ताप विमोचन अरिदल नासै, भक्त के मन कमल विकासै !!
भाल चंद्रमा तिलक विराजै, श्वान सवारी पै प्रभु गाजै !
महाकाल कालो के काला, शंकर के अवतार कृपाला !!
त्व अष्टांग रुद्र के लाला, रहो मस्त पी मद का प्याला !
श्वेत , लाल अरु काल शरीर , मस्तक मुकुट शीश पर चीरा !!
जो जन तुम्हारे यश को गावे, संकट टार सकल सुख पावे !
भोपा करे आपकी सेवा, दोनों हाथ लुटावत मेवा !
रविवार है वार तिहारो, संकत हरो सकल जन भारो !!
धूप दीप नैवेध्द चढावै , सुंदर लड्डुन को भोग लगावै !
दरशन कर भक्त सिंहासन राजत, मंदिर घण्टा सुरिले बाजत !!
नमोनमामि अन्तर्यामी, नमो नमो काशी के स्वामी !
भस्म जनन के काटो फन्दा, नाम जपे सो होय अनंदा !!
जो जन तुम्हारे यस कूँ गावे, बस बैकुण्ठ अमर पद पावै !
नर-नारी जो तुम को ध्यावाहि, मन्वांछित इच्छा फल पावहि !!
जो सत वार पढै चालीसा, भैरव कृपा पावै सुखराशी !
काली के लाला बलधारी, कहाँ तक शोभा कहूँ तुम्हारी !!
तुम्हारी कृपा तुम्हे जो ध्यावै , शत्रु पक्ष पर विजय है पावै !
दोहा---
जय जय श्री भैरव बटुक, शंभू के अवतारा !
भक्तन पर कीजै कृपा, जन के संकट टार !!
जो भैरव चालीसा पढै, प्रेम सहित सत वार !
श्री भैरव की हो कृपा, संपत्ति बढे अपार !!

Thursday, 30 October 2014

सप्ताह के 7 दिन, किस दिन क्या करें ! जिस से खुशी और सफलता मिले !!

ज्योतिष में सप्ताह के सात दिनों की प्रकृति और स्वभाव बताए गए हैं। इन सात दिनों पर ग्रहों का अपना प्रभाव होता है। अगर आप इन दिनों की प्रकृति और स्वभाव के अनुसार कार्यों को करें तो जरूर आपकी किस्मत साथ देगी। निश्चित ही हर काम में सफलता मिलेगी। अगर आपके सोचे हुए काम पूरे नही होते या उनका कोई परिणाम नही मिलता तो आप उन कार्यों को पुराणों, मुहूर्त ग्रंथों और फलति ज्योतिष ग्रंथों के अनुसार बताए गए वार को करें। आप जरूर सफल होंगे।

किस वार को क्या कार्य करे !!

* रविवार को क्या करें- यह सूर्य देव का वार माना गया है। इस दिन नवीन गृह प्रवेश और सरकारी कार्य करना चाहिए।विज्ञान, इंजीनियरिंग, सेना, उद्योग बिजली, मेडिकल एवं प्रशासनिक शिक्षा उत्तम, नवीन वस्त्र धारण, सोने और तांबे की वस्तुओं के नवीन आभूषण धारण शुभ है।
व्यापार संबंधित - राज्य प्रशासनिक कार्य, सेनाधिकारी, औषधि, शस्त्र, अग्नि, अनाज, सोना, तांबा, चांदी, गाय, बैलादि का क्रय-विक्रय, मेडिकल, इलेक्ट्रिकल, मंत्रानुष्ठान, यज्ञादि कार्य।
* सोमवार को क्या करें - सरकारी नौकरी वालों के लिए पद ग्रहण करने के लिए यह दिन बहुत महत्वपूर्ण है।ग्रह शुभारंभ ,लेखनादि कार्य, मेडिकल शिक्षा, सौंदर्य प्रसाधन, औषधि निर्माण व योजना संबंधित, आभूषण धारण, तेल लगाना, हजामत बनाना, नया जूता पहनना शुभ है।
व्यापार संबंधित - कृषि, गाय, भैस, दूध, घी, डेयरी, फार्म, औषधि, तरल पदार्थ, शंख, मोती, धन संपदा, सौंदर्य प्रसाधन, सुगंधित वस्तुओं का क्रय-विक्रय, विदेशी पत्राचार आदि शुभ है।
* मंगलवार को क्या करें- मंगल देव के इस दिन विवाद एवं मुकद्दमे से संबंधित कार्य करने चाहिए। बिजली से संबंधित कार्य, सर्जरी की शिक्षा, शस्त्र विद्या सीखना, अग्नि स्पोर्टस, भूगर्भ विज्ञान, दंत चिकित्सा, मुकदमा दायर करना शुभ है।
व्यापार संबंधित - शक्ति, अग्नि एवं बिजली से संबंधित कार्य, बेकरी, स्पोटर्स, सोना, तांबा, मूंगा, पीतलादि का क्रय, सभी प्रकार की धातुओं का क्रय विक्रय करना चाहिए।भूमि, सर्जरी एवं रक्षा सामग्री, संधि विच्छेदादि कार्य।
* बुधवार को क्या करें- इस दिन यात्रा करना, मध्यस्थता करना, दलाली, योजना बनाना आदि काम करने चाहिए।गणित, लेखनादि, बौद्धिक कार्य, बैंक, वकालत, तकनीकी हुनर, ज्योतिष, विज्ञान, वाहनादि चलाना सीखना, नवीन वस्त्र धारण, नवीन आभूषण धारण, तेल लगाना विशेष शुभ, हजामत, नया जूता पहनना, मुकदमा दायर करना शुभ है।
व्यापार संबंधित - कृषि एवं व्यापारिक वस्तुओं का क्रय-विक्रय, शेयरों का क्रय, पुस्तक, लेखन प्रकाशन, व्यापारिक लेखा कार्य, शिक्षण, वकालत, शिल्प एवं संपादन कार्य वाहन क्रय-विक्रय।
* गुरुवार को क्या करें - बृहस्पति देव के इस दिन यात्रा, धार्मिक कार्य, विद्याध्ययन और बैंक से संबंधित कार्र्य करना चाहिए।दर्शन-शास्त्र, धर्म मंत्र, ज्योतिष, वकालत, उच्च पद प्रशासनिक, शिक्षा, वैद्यकी कार्य, नवीन वस्त्र धारण, नवीन आभूषण धारण शुभ है।
व्यापार संबंधित - धर्मिक अनुष्ठान, उच्च प्रशासनिक कार्य, उच्च शिक्षा के कार्य, आभूषण, औषधि, लकड़ी, भूमि, वाहनादि का लेन-देन, विदेश यात्रादि कार्य।
* शुक्रवार को क्या करें - शुक्रवार के दिन गृह प्रवेश, कन्या दान, करने का महत्व है। शुक्र देव भौतिक सुखों के स्वामी है। इसलिए इस दिन सुख भोगने के साधनों का उपयोग करें।नृत्य, वाद्य, गायन, कल, संगीत, एक्टिंग, गीत-काव्य, स्त्रियों एवं सौंदर्य संबंधित, नवीन वस्त्र धारण अतिशुभ, नवीन आभूषण, तेल लगाना, हजामत बनवाना, नया जूता पहनना शुभ है।
व्यापार संबंधित - संगीत, सिनेमा, विदेश के कार्य, टेलीविजन, स्त्रियों एवं श्रृंगारित वस्तुओं से संबंधित कार्य, रूई, कपड़ा, बैकिंग, चांदी, जवाहरात, रसायन, शराब, सोडा, सुगंधित द्रव्य, वाहनादि क्रय-विक्रय, खुशबूदार वस्तु, एक्टिंग आदि।
* शनिवार को क्या करें- मकान बनाना, गृह प्रवेश, ऑपरेशन, तकनीकी शिल्प कला, मशीनरी संबंधित ज्ञान, अंग्रेजी, उर्दू, फारसी का ज्ञान सीखना, तेल लगाना विशेष शुभ, मुकदमा दायर करना शुभ है।
व्यापार संबंधित - मशीनरी, लोहा, लकड़ी, चमड़ा, सीमेंट, तेल, पेट्रोल, पत्थर, भूमि, ठेकेदारी, शस्त्रों का क्रय-विक्रय, अन्वेषण एवं आप्रेशन कार्य, अधीनस्थ कर्मचारी, वाहनादि प्रयोग, विदेश-यात्रादि कार्य।



  

Wednesday, 29 October 2014

क्या होती है दशा महादशा-अन्तर्दशा परिचय !!

भारतीय ज्योतिष के अनुसार नो ग्रह  माने गए हैं और इन नों ग्रहों को 12 राशियों में बाँटा गया है। सूर्य और चन्द्र के पास एक-एक राशि का स्वामी है, अन्य ग्रहों के पास दो- दो राशियों का स्वामित्व है। विंशोत्तरी गणना के अनुसार ज्योतिष में आदमी की कुल उम्र 120 वर्ष की मानी गई है और इन 120 वर्षों में आदमी के जीवन में सभी ग्रहों की दशा और महादशा पूर्ण हो जाती हैं।
 
दशा और महादशा क्या होती हैं !!

दशा और महादशा दोनों ही ज्योतिष में जातक को मिलने वाले शुभ और अशुभ फल का समय और अवधि जानने में विशेष सहायक हैं। इसलिए ज्योतिष में इन्हें विशेष स्थान और महत्व दिया गया है।प्रत्येक ग्रह अपने गुण-धर्म के अनुसार एक निश्चित अवधि तक जातक पर अपना विशेष प्रभाव बनाए रखता है जिसके अनुसार जातक को शुभाशुभ फल प्राप्त होता है। ग्रह की इस अवधि को हमारे महर्षियों ने ग्रह की दशा का नाम दे कर फलित ज्योतिष में विशेष स्थान दिया है। फलित ज्योतिष में इसे दशा पद्ध ति भी कहते हैं महादशा शब्द का अर्थ है वह विशेष समय जिसमें कोई ग्रह अपनी प्रबलतम अवस्था में होता है और कुंडली में अपनी स्थिति के अनुसार शुभ-अशुभ फल देता है। इन वर्षों में मुख्य ग्रहों की महादशा में अन्य ग्रहों को भी भ्रमण का समय दिया जाता है जिसे अन्तर्दशा कहा जाता है। इस समय में मुख्य ग्रह के साथ अन्तर्दशा स्वामी के भी प्रभाव फल का अनुभव होता है। जिस ग्रह की महादशा होगी, उसमे उसी ग्रह की अन्तर्दशा पहले आएगी, फिर नीचे दिए गए क्रम से अन्य ग्रह भ्रमण करेंगे।
 
ग्रहों की महादशा का समय निम्नानुसार है !!

सूर्य- 6 वर्ष, चन्द्र-10 वर्ष, मंगल- 7 वर्ष, राहू- 18 वर्ष, गुरु- 16 वर्ष, शनि- 19 वर्ष, बुध- 17वर्ष, केतु- 7 वर्ष, शुक्र- 20 वर्ष।
 
विशेष :==========

सामान्य रूप से 6, 8,12 स्थान में गए ग्रहों की दशा अच्छी नहीं होती। इसी तरह इन भावों के स्वामी की दशा भी कष्ट देती है।
किसी ग्रह की महादशा में उसके शत्रु ग्रह की, पाप ग्रह की और नीचस्थ ग्रह की अन्तर्दशा अशुभ होती है। शुभ ग्रह में शुभ ग्रह की अन्तर्दशा अच्छा फल देती है।जो ग्रह 1, 4, 5, 7, 9 वें भावों में गए हो उनकी दशा अच्छा फल देती है। स्वग्रही, मूल त्रिकोणी या उच्च के ग्रह की दशा शुभ होती है, नीच, पाप प्रभावी या अस्त ग्रह की दशा भाव फल का नाश करती है। शनि, राहू आदि ग्रह अपनी दशा की बजाय मित्र ग्रहों की दशा में अधिक अच्छा फल देते है।

कुंडली में मंगली दोष कैसे होता है और उसके प्रभाब क्या होते हैं !!


जब मंगल कुंडली के 1, 4, 7, 8 या 12 वें स्थान पर हो तो यह मंगल दोष है और ऐसे ब्यक्ति को मांगलिक कहा जाता है। हमारे समाज में मंगल दोष की उपस्थिति एक बहुत बड़ा डर या भ्रम बन गया है। मंगल दोष को अनदेखा नहीं किया जा सकता। यह वैवाहिक जीवन में समस्याएं पैदा कर सकता है। इसलिए विवाह से पहले मंगल दोष के लिए कुंडली मिलाना अनिवार्य है। यह भी जरुरी है कि कुंडली का विश्लेषण करें और यह पता लगाएं कि कुंडली में मंगल दोष है या नहीं।

जाने कैसे होते है मंगली दोष से पीड़ित !!

यदि मंगल पहले स्थान पर हो तो 4, 7 और 8 घर पर दृष्टि करता है। तो वो घर व्यक्ति के चरित्र व को दर्शाता है। इस कारण से व्यक्ति बहुत आवेगी और तुरंत गुस्सा करनेवाला हो सकता है। मंगल की द्रष्टि से चतुर्थ स्थान ,घर, गाड़ी, अग्नि, रसायन या बिजली से दुर्घटना को दर्शाता है। मंगल कि द्रष्टि से सप्तम स्थान में वैवाहिक जीवन में बाधायें आती हैं। अष्टम स्थान में होने से भयंकर दुर्घटना हो सकती है। इस प्रकार लग्न में मंगल का बैठना अशुभ माना जाता है। यदि मंगल चतुर्थ स्थान में बैठा है तो यह 4 के साथ 7, 10 और 11 घर को भी प्रभावित करेगा। हमने 4 और 7 घरों के प्रभावित प्रभावों को जाना है। मगल से प्रभावित दशम घर व्यवसाय में तेजी से बदलाव, अनिद्रा और पिता से तनाव का कारण हो सकता है। ग्यारहवें घर के प्रभावित होने से चोरी या दुर्घटना में हानि हो सकती है। इसलिए चतुर्थ घर में मंगल बहुत अच्छा नहीं है। यदि मंगल सात बे घर में हो तो यह 10, 1 और 2 घर को प्रभावित करता है। सात बा घर वैवाहिक जीवन और जीवनसाथी का स्थान होता है। इसलिए यहां मंगल का होना वैवाहिक जीवन में कठिनाइयों का सूचक है। दूसरे घर में मंगल पारिवारिक सदस्यों के बीच विवाद पैदा करता है। मतभेद के कारण परिवार में ख़ुशी की कमी और समस्याएं आ सकती हैं। पैसे खो सकते हैं या खर्च की अधिकता हो सकती है। इसलिए 7 वें भाव में मंगल कठिनाइयों को बढ़ा सकता है। यदि मंगल अष्ट्म घर में बैठा है तो यह 11, 2 और 3 घर को प्रभावित करेगा। व्यक्ति आग, रसायन या बिजली से जानलेवा दुर्घटना का शिकार हो सकता है। यदि तीसरा घर मंगल से दृष्ट है तो भाई बहन में तनाव होता है। यह व्यक्ति को बहुत कठोर और हठी बना देता है। इसलिए अष्टम घर में मंगल का होना अच्छा नहीं है। अगर मंगल 12 वें घर में हो तो यह 3, 6 और 7 घर को प्रभावित करता है। 12 वां घर व्यक्ति की आदतों को दर्शाता है। इससे व्यक्ति खर्च की अधिकता के बोझ तले दब जाता है। व्यक्ति को हाई ब्लड प्रेसर और टेंसन के साथ ही पेट से जुड़ी और खून से जुड़ी बीमारियां हो सकती हैं। इसलिए 12 बे घर में मंगल का होना भी अशुभ है।इस प्रकार मंगल दोष कई तरह की समस्यायों का कारण है जो सभी नहीं दी गयी है यहाँ जिन के परिणाम और भी खराब है । लेकिन परेशान होने की आवश्यकता नहीं हैं। प्रतियेक समस्या का समाधान जरुर होता हैं लेकिन कुडली की समग्र शक्ति, ग्रहों की शक्ति, उपयोगी पहलू और मंगल की शक्ति पर अवश्य विचार किया जाना चाहिए।

मंगल दोष के लिए  पूजन , व्रत और अनुष्ठान !!
 

जिनकी राशि में मंगल अशुभ फल देने वाला है उनके लिए हम यहां कुछ अचूक उपाय बता रहे हैं जिन्हें अपनाने से मंगल आपके अनुकूल हो जाएगा व्यवसाय और जीवन में चार चांद लग जाएंगे:—-
मंगल शांति के लिए मंगल का दान (लाल रंग का बैल, सोना, तांबा, मसूर की दाल, बताशा, लाल वस्त्र आदि) किसी गरीब जरूरतमंद व्यक्ति को दें।
मंगल का मंत्र: ऊँ अंगारकाय विद्महे शक्तिहस्ताये धीमहि तन्नौ भौम: प्रचोदयात्। इस मंत्र का नित्य जप करें।
मंगलवार का व्रत रखें।
मंगलवार को किसी गरीब को पेटभर खाना खिलाकर तृप्त करें।
अपने घर में भाई-बहनों का विशेष ध्यान रखें। मंगलवार को उन्हें कुछ विशेष उपहार दें
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार मंगल हमारे शरीर के रक्त में स्थित माना गया है। अत: ऐसा खाना खाएं जिससे आपका रक्त शुद्ध बना रहे।
मंगल प्रभावित व्यक्ति क्रोधी स्वभाव का, चिढ़-चिढ़ा हो जाता है, अत: प्रयत्न करें की क्रोध आप पर हावी न हो।
लाल बैल दान करें।
मंगल परम मातृभक्त हैं। वह सभी माता-पिता का सेवा-सम्मान करने वाले लोगों पर विशेष स्नेह रखते हैं अत: मंगलवार को अपनी माता को लाल रंग का विशेष उपहार दें।
मंगल से संबंधित वस्तुएं उपहार में भी ना लें।
लाल रंग मंगल का विशेष प्रिय रंग हैं अत: कम से कम को मंगलवार खाने में ऐसा खाना खाएं जिसका रंग लाल हो, जैसे इमरती, मसूर की दाल, सेवफल आदि।
अगर कुण्डली में मंगल दोष का निवारण ग्रहों के मेल से नहीं होता है तो व्रत और अनुष्ठान द्वारा इसका उपचार करना चाहिए. मंगला गौरी और वट सावित्री का व्रत सौभाग्य प्रदान करने वाला है. अगर जाने अनजाने मंगली कन्या का विवाह इस दोष से रहित वर से होता है तो दोष निवारण हेतु इस व्रत का अनुष्ठान करना लाभदायी होता है.
जिस कन्या की कुण्डली में मंगल दोष होता है वह अगर विवाह से पूर्व गुप्त रूप से घट से अथवा पीपल के वृक्ष से विवाह करले फिर मंगल दोष से रहित वर से शादी करे तो दोष नहीं लगता है.
प्राण प्रतिष्ठित विष्णु प्रतिमा से विवाह के पश्चात अगर कन्या विवाह करती है तब भी इस दोष का परिहार हो जाता है.
मंगलवार के दिन व्रत रखकर सिन्दूर से हनुमान जी की पूजा करने एवं हनुमान चालीसा का पाठ करने से मंगली दोष शांत होता है.
कार्तिकेय जी की पूजा से भी इस दोष में लाभ मिलता है.
महामृत्युजय मंत्र का जप सर्व बाधा का नाश करने वाला है. इस मंत्र से मंगल ग्रह की शांति करने से भी वैवाहिक जीवन में मंगल दोष का प्रभाव कम होता है.
लाल वस्त्र में मसूर दाल, रक्त चंदन, रक्त पुष्प, मिष्टान एवं द्रव्य लपेट कर नदी में प्रवाहित करने से मंगल अमंगल दूर होता है.

Tuesday, 28 October 2014

क्या आप भगबान भारत में ही अवतार क्यों लेते है !!

परमात्मा एक है या अनेक,क्या विष्णु और शिव मे भेद है भगबान के समस्त अबतार भारत भूमि पर ही क्यों हुए जब कि ये सम्पूर्ण जगत के पालक एबं रक्षक है ! ब्रह्मा ,बिष्णु ,शिव ,यम, इन्द्र ,दुर्गा आदि परमात्मा के अनेक नाम है कोई विष्णु रूप मे परमात्मा की पूजा करता है तो कोई शिव रूप मे कही उन परमब्रह्म परमात्मा को दुर्गा रूप मे पूजते है कही काली के रूप में तात्पर्य यह है की परमात्मा एक है किन्तु अलग-अलग अनेक रूपों में पूजा होती है ! भगबान श्री हरि विष्णु और त्रिशूलधारी भगबान शिव एक दूसरे के पूरक है रामेश्वरम सेतु बांध बांधने से पहले भगवान श्री विष्णु के अंशावतार भगबान श्री रामचंद्र जी ने सागर तट पर बालू रेत के शिवलिंग की स्थापना करके भगवान शिव की पूजा की भस्मासुर दैत्य को लेकर शिव जी पर जब विपत्ति आई उस समय पार्वती का रूप धारण करके विष्णु जी ने उनकी रक्षा की शिव जी हमेशा विष्णु जी के ध्यान में मग्न रहते है ! और विष्णु जी भी शिव की स्तुति पूजा करते रहते है ! इस तरह इनमे कोई भेद नहीं है जो प्राणी इनके बीच में भेद समझता है ! उसका कभी कल्याण नहीं हो सकता है ! भगवान को अवतरित होने के लिए पवित्र भूमि चाहिए ! अर्थात जहा यज्ञ, पूजा-पाठ, आराधना-उपासना नित्य होती है ! ऐसी ही पवित्र भूमि पर नारायण का अवतरण होता है ! जहा ऋषि-मुनियो एबं वेदज्ञ ब्राम्हण सदेव मंत्रोच्चाररण करते हो ऐसी पवित्र एबं पुण्यमयी भारत भूमि ही है ! भारतबासियो को इसका गौरव होना चाहिए भारत भूमि में अवतरित होकर भी भगवान ने अन्य देशो में रहने वाले अपने भक्तो की रक्षा की ! भगवान श्री कृष्ण जी ने यूनान के कालयवन का चीन में भगदत्त का वध करके प्रथ्वी पर शांति की स्थापना की ! भगवती दुर्गा ने यूरोप के विदालाक्षा और अमेरिका के रक्तबीज का संहार किया !और पूरे संसार का पालन किया !!

ग्रहों के अनुसार देखेव्यापार करने कि छमता !!

आज के समय मै जीविका चलाने के लिए व्यापार के क्षेत्र में सफलता व उन्नति प्राप्त करने के लिये व्यक्ति में अनेक गुण होने चाहिए, सभी गुण एक ही व्यक्ति में पाये जाने संभव नहीं है ! किसी के पास योग्यता है तो किसी व्यक्ति के पास अनुभव पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है ! अपनी कार्यशक्ति व दक्षता के सर्वोतम उपयोग करने पर ही इस व्यापार प्रतियोगिता में आगे बढने का साहस कर सकता है ! और यह जानकर ही व्यापार करे कि कोन सा ग्रह मेरे किस गुण में साहयक है तो सफलता सत्-प्रतिशत मिलेगी ! अब जानिए ज्योतिष शास्त्र के अनुसार कौन से ग्रह से व्यक्ति में किस गुण का विकास होता है !
1-!! कामकाज की जानकारी व समझ !!
काम छोटा हों या बडा हों, उसे करने का तरीका सबका एक समान हों यह आवश्यक नहीं, प्रत्येक व्यक्ति कार्य को अपनी योग्यता के अनुसार करता है ! जब किसी व्यक्ति को अपने कामकाज की अच्छी समझ न हों तो उसे कार्यक्षेत्र में दिक्कतों का सामना करना पड सकता है ! व्यक्ति के कार्य को उत्कृ्ष्ट बनाने के लिये ग्रहों में गुरु ग्रह को देखा जाता है ! कुण्डली में जब गुरु बली होकर स्थिति हो तथा वह शुभ ग्रहों के प्रभाव में हों तो व्यक्ति को अपने क्षेत्र का उतम ज्ञान होने की संभावनाएं बनती है ! गुरु जन्म कुण्डली में नीच राशि में वक्री या अशुभ ग्रहों के प्रभाव में हों तो व्यक्ति में कामकाज की जानकारी संबन्धी कमी रहने की संभावना रहती है ! सभी ग्रहों में गुरु को ज्ञान का कारक ग्रह कहा गया है ! गुरु ग्रह व्यक्ति की स्मरणशक्ति को प्रबल करने में भी सहयोग करता है ! इसलिये जब व्यक्ति की स्मरणशक्ति अच्छी होंने पर व्यक्ति अपनी योग्यता का सही समय पर उपयोग कर पाता है !
 2-!! कार्यक्षमता व दक्षता !!
किसी भी व्यक्ति में कार्यक्षमता का स्तर देखने के लिये कुण्डली में शनि की स्थिति देखी जाती है कुण्डली में शनि दशम भाव से संबन्ध रखते हों तो व्यक्ति को कार्यक्षेत्र में अत्यधिक कार्यभार का सामना करना पड सकता है ! कई बार ऎसा होता है कि व्यक्ति में उतम योग्यता होती है ! परन्तु उसका कार्य में मन नहीं लगता है ! इस स्थिति में व्यक्ति अपनी योग्यता का पूर्ण उपयोग नहीं कर पाता है. या फिर व्यक्ति का द्वादश भाव बली हों तो व्यक्ति को आराम करना की चाह अधिक होती है ! जिसके कारण वह आराम पसन्द बन जाता है ! इस स्थिति में व्यक्ति अपने उतरदायित्वों से भागता है ! यह जिम्मेदारियां पारिवारिक, सामाजिक व आजिविका क्षेत्र संबन्धी भी हो सकती है ! शनि बली स्थिति में हों तो व्यक्ति के कार्य में दक्षता आती है.
 3-!! कार्यके प्रति निष्ठा !!
 जन्म कुण्डली के अनुसार व्यक्ति में कार्यनिष्ठा का भाव देखने के लिये दशम घर से शनि का संबन्ध देखा जाता है अपने कार्य के प्रति अनुशासन देखने के लिये सूर्य की स्थिति देखी जाती है ! शनि व सूर्य की स्थिति के अनुसार व्यक्ति में अनुशासन का भाव पाया जाता है ! शनि व्यक्ति को अपनी जिम्मेदारियों के प्रति सजग बनाता है ! कुण्डली में शनि जब बली होकर स्थित होंने पर व्यक्ति अपने कार्य को समय पर पूरा करने का प्रयास करता है !
4-!! स्नेह, सहयोगपूर्ण व्यवहार !!
 कई बार व्यक्ति योग्यता भी रखता है उसमें दक्षता भी होती है ! परन्तु वह अपने कठोर व्यवहार के कारण व्यवसायिक जगत में अच्छे संबध नहीं बना पाता है ! व्यवहार में मधुरता न हों तो कार्य क्षेत्र में व्यक्ति को टिक कर काम करने में दिक्कतें होती है ! चन्द्र या शुक्र कुण्डली में शुभ भावों में स्थित होकर शुभ प्रभाव में हों तो व्यक्ति में कम योग्यता होने पर भी उसे सरलता से सफलता प्राप्त हो जाती है ! अपनी स्नेहपूर्ण व्यवहार के कारण वह सबका शीघ्र दिल जीत लेता है ! बिगडती बातों को सहयोगपूर्ण व्यवहार से संभाल लेता है ! चन्द्र पर किसी भी तरह का अशुभ प्रभाव होने पर व्यक्ति में सहयोग का भाव कम रहने की संभावनाएं बनती है !
 5-!! यान्त्रिक योग्यता !!
आज के समय में सफलता प्राप्त करने के लिये व्यक्ति को कम्प्यूटर जैसे: यन्त्रों का ज्ञान होना भी जरूरी हो ! किसी व्यक्ति में यन्त्रों को समझने की कितनी योग्यता है ! यह गुण मंगल व शनि का संबन्ध बनने पर आता है ! केतु को क्योकि मंगल के समान कहा गया है ! इसलिये केतु का संबन्ध मंगल से होने पर भी व्यक्ति में यह योग्यता आने की संभावना रहती है ! इस प्रकार जब जन्म कुण्डली में मंगल,शनि व केतु में से दो का भी संबन्ध आजिविका क्षेत्र से होने पर व्यक्ति में यन्त्रों को समझने की योग्यता होती है !
6-!! वाकशक्ति !!
 बुध जन्म कुण्डली में सुस्थिर बैठा हों तो व्यक्ति को व्यापारिक क्षेत्र में सफलता मिलने की संभावनाएं बनती है !इसके साथ ही बुध का संबन्ध दूसरे भाव से भी बन रहा हों तो व्यक्ति की वाकशक्ति उतम होती है ! वाकशक्ति प्रबल होने पर व्यक्ति को इस से संबन्धित क्षेत्रों में सफलता प्राप्त करने में सरलता रहती है !

Monday, 27 October 2014

कालसर्प दोष के प्रकार और उन के फल !!

 कालसर्प दोष कितने प्रकार का होता है और इस के होने से जातक पर क्या असर पढता है जनिये विस्तार से !!
१-अनंत कालसर्प दोष !!
जब कुंडली के पहले घर में राहू , सातवे घर केतु और बाकि के सात गृह राहू और केतु के मध्य स्थित हो तो वह अनंत कालसर्प दोष कहलाता है ! अनंत कालसर्प दोष जातक की शादीशुदा जिन्दगी पर बहुत बुरा असर डालता है ! बितते वक्त के साथ जातक और जातक के जीवन साथी के बीच तनाव बढता जाता है ! जातक के नाजायज़ सम्बन्ध बाहर हो सकते है ! इसी कारण बात तलाक तक पहुच सकती है! जातक के अपने जीवन साथी के साथ संबंधों में मधुरता नहीं होती ! अनंत कालसर्प दोष के कारण जातक जीवन भर संघर्ष करता है और पूर्णतया फल प्राप्त नहीं करता ! संधि व्यापार में सफलता नहीं मिलती और भागिदार दोखा कर जाते है !
२-कुलीक कालसर्प दोष !!
जब कुंडली के दुसरे घर में राहू और आठवें घर में केतु और बाकी के सातों गृह राहू और केतु के मध्य स्थित हो तो यह कुलीक कालसर्प दोष कहलाता है ! जिस जातक की कुडली में कुलीक कालसर्प दोष होता है, वह जातक खाने और शराब पिने की गलत आदतों को अपना लेता है ! तम्बाकू , सिगरेट आदि का भी सेवन करता है, जातक को यह आदते बचपन से ही लग जाती है इस कारण जातक का पढाई से ध्यान हट कर अन्य गलत कार्यों में लग जाता है ! ऐसे जातकों को मुह और गले के रोग अधिक होते है, इन जातको का वाणी पर नियंत्रण नहीं होता इसलिए समाज में बदनामी भी होती है ! कुलीक कालसर्प से ग्रस्त जातकों की शराब पीकर वाहन चलाने से भयंकर दुर्घटना हो सकती है !
३-वासुकी कालसर्प दोष !!
जब कुंडली में राहू तीसरे घर में, केतु नौवें घर में और बाकी के सभी गृह इन दोनों के मध्य में स्थित हो  तो वासुकी काल्सर्प् दोष का निर्माण होता है ! जिन जातकों की कुंडली में वासुकी कालसर्प दोष होता है उन्हें जीवन के सभी क्षेत्र में बुरी किस्मत की मार खानी पड़ती है, कड़ी मेहनत और इमानदारी के बाउजूद असफलता हाथ आती है ! जातक के छोटे भाई और बहनों पर बुरा असर पड़ता है ! जातक को लम्बी यात्राओं से कष्ट उठाना पड़ता है और धर्म कर्म के कामों में विशवास नहीं रहता ! वासुकी कालसर्प दोष के कारण जातक की कमाई भी बहुत कम हो सकती है इस कारण से जातक गरीबी और लाचारी का जीवन व्यतीत करता है !
४-शंखफल कालसर्प दोष !!
कुंडली में राहू चौथे घर में, केतु दसवें घर में और बाकी सभी गृह राहू और केतु के मध्य स्थित हो तो शंखफल कालसर्प दोष का निर्माण होता है ! जिन जातकों की कुंडली में शंख फल कालसर्प दोष होता है वें जातक बचपन से ही गलत कार्यों में पड़कर बिगड़ जाते है, जैसे पिता की जेब से पैसे चुराना, विद्यालय से भाग जाना, गलत संगत में रहना और चोरी चाकरी और जुआ आदि खेलना ! यदि माता पिता द्वारा समय रहते उपाय किये जाए तो बच्चों को बिगड़ने से बचाया जा सकता है ! शंख फल कालसर्प से गृह्सित जातक की माता को जीवन बहुत परेशानिया झेलनी पड़ती है, यह परेशिनिया मानसिक और शारीरिक दोनों हो सकती है ! जातक को विवाह का सुख भी अधिक नहीं मिलता, पति या पत्नी से हमेशा दूरियां और अनबन बनी रहती है !
५-पदम् कालसर्प दोष !!
कुंडली में जब राहू पांचवे घर में , केतु ग्यारहवें घर में और बाकि के सभी गृह इन दोनों के मध्य स्थित होते है तो पदम् कालसर्प दोष का निमाण होता है ! कुंडली में पदम् कालसर्प स्थित होने से जातक को जीवन में कई कठनाइयों का सामना करना पड़ता है ! शुरवाती जीवन में जातक की पढाई में किसी कारण से बाधा उत्पन्न होती है, यदि शिक्षा पूरी न हो तो नौकरी मिलने में परेशनिया उत्पन्न होती है ! विवाह के उपरान्त बच्चो के जन्म में कठनाई और बच्चों का बीमार रहना जैसी परेशानियों का सामना करना पड़ता है ! पदम् कालसर्प के बुरे प्रभाव से प्रेम में धोखा मिल सकता है, इस दोष का विद्यार्थियों के जीवन पर बहुत बुरा असर पड़ता है, उन्हें इस काल सर्प का उपाय अवश्य करना चाहिए क्योकि हमारा पूरा जीवन अच्छी शिक्षा पर आधारित होता है !
६-महापदम कालसर्प दोष !!
कुंडली में महापदम् कालसर्प का निर्माण तब होता है जब राहू छठे घर में , केतु बारहवें घर में और बाकि के सभी गृह इन दोनों के मध्य स्थित हो ! महापदम् कालसर्प दोष जातक के जीवन में नौकरी , पेशा, बीमारी, खर्चा, जेल यात्रा जैसी गंभीर समस्याओं को जन्म देता है ! जातक जीवन भर नौकरी पेशा बदलता रहता है क्योकि उसके सम्बन्ध अपने सहकर्मियों से हमेशा ख़राब रहते है ! हमेशा किसी न किसी सरकारी और अदालती कायवाही में फसकर जेल यात्रा तक करनी पढ़ सकती है ! तरह तरह की बिमारियों के कारण जातक को आये दिन अस्पतालों के चक्कर काटने पड़ते है ! इस प्रकार महापदम् काल सर्प दोष जातक का जीना दुश्वार कर देता है !
७ - तक्षक कालसर्प दोष !!
कुंडली के सातवे घर में राहू , पहले घर में केतु और बाकि गृह इन दोनों के मध्य आ जाने से तक्षक कालसर्प दोष का निर्माण होता है ! सबसे पहले तो तक्षक काल सर्प का बुरा प्रभाव उसकी सेहत पर पड़ता है ! जातक के शरीर में रोगों से लड़ने की शक्ति बहुत कम होती है और इसलिए वह बार-बार बीमार पड़ता रहता है ! दूसरा बुरा प्रभाव जातक के वैवाहिक जीवन पर पड़ता है, या तो जातक के विवाह में विलम्ब होता है और यदि हो भी जाये तो विवाह के कुछ सालों के पश्चात् पति पत्नी में इतनी दूरियाँ आ जाती है की एक घर में रहने के पश्चात् वे दोनों अजनबियों जैसा जीवन व्यतीत करते है! जातक को अपने व्यवसाय में सहकर्मियों द्वारा धोखा मिलता है और को भरी आर्थिक नुक्सान उठाना पड़ता है!
८- कर्कोटक कालसर्प दोष !!
कुंडली में जब राहू आठवें घर में , केतु दुसरे घर में और बाकि सभी गृह इन दोनों के मध्य फसे हो तो कर्कोटक कालसर्प दोष का निर्माण होता है ! कर्कोटक कालसर्प दोष के प्रभाव से जातक के जीवन पर बहुत बुरा असर पड़ता है, जातक हमेशा सभी के साथ कटु वाणी का प्रयोग करता है, जिस वजह से उसके सम्बन्ध अपने परिवार से बिगड़ जाते है और वह उनसे दूर हो जाता है ! कई मामलों में पुश्तैनी जायजाद से भी हाथ धोना पड़ता है! जातक खाने पिने की गलत आदतों की वजह से अपनी सेहत बिगाड़ लेता है, कई बार ज़हर खाने की वजह से मौत भी हो सकती है ! पारिवारिक सुख न होने की वजह से कई बार विवाह न होने, विवाह देरी जैसे फल मिलते है, लेकिन इस दोष की वजह से जातक को शारीरिक संबंधो की हमेशा कमी रहती है और वह विवाह का पूर्ण आनंद नहीं प्राप्त करता !
९- शंखनाद कालसर्प दोष !!
राहू कुंडली के नौवें घर में, केतु तीसरे घर में और बाकि गृह इन दोनों के मध्य फसे हो तो इसे शंखनाद कालसर्प कहते है ! शंखनाद कालसर्प दोष का जातक के जीवन पर बहुत बुरा असर पड़ता है, जातक को जीवन के किसी भी क्षेत्र में किस्मत या भाग्य का साथ नहीं मिलता, बने बनाये काम बिना किसी कारण के बिगड़ जाते है! जातक को जीवन चर्या के लिए अधिक महनत करनी पड़ती है! जातक के बचपन में उसके पिता पर इस दोष का बुरा असर पड़ता है और लोग कहते है की इस बच्चे के आने के बाद घर में समस्याए आ गयी ! यह कालसर्प एक तरह का पितृ दोष का निर्माण भी करता है, जिसके प्रभाव से जातक नाकामयाबी और आर्थिक संकट जैसी परेशानियों से जूझना पड़ता है !
१० -घटक कालसर्प दोष !!
कुंडली में जब राहू दसवें घर में और केतु चौथे घर में और बाकि सभी गृह इन दोनों के मध्य फसे हो तो घटक कालसर्प दोष का निर्माण होता है ! घटक कालसर्प जातक के जीवन पर बहुत बुरा प्रभाव डालता है, जातक हमेशा व्यवसाय और नौकरी की परेशानियों से जूझता रहता है, यदि वह नौकरी करता है तो उसके सम्बन्ध उच्च अधिकारीयों से ठीक नहीं बनते, तरक्की नहीं होती, कई कई वर्षों तक एक ही पद पर कार्यरत रहना पड़ता है ! और इसीलिए किसी भी काम से शंतुष्टि नहीं होती, और बार बार व्यवसाय या नौकरी बदलनी पड़ती है ! इस कालसर्प का माता पिता की सेहत पर भी बुरा असर पड़ता है और किसी कारण से जातक को उनसे पृथक होकर रहना पड़ता है !
११- विषधर कालसर्प दोष !!
राहू ग्यारहवे स्थान पर, केतु पाचवें स्थान पर और बाकी सभी गृह इन दोनों के मध्य फसे होने से कुंडली में विषधर कालसर्प दोष का निर्माण होता है ! विषधर कालसर्प दोष जातक के जीवन बहुत बुरा प्रभाव डालते है ! इस दोष के कारण जातक को आँख और हृदय रोग होते है, बड़े भाई बहनों से सम्बन्ध अच्छे नहीं चलते ! जातक की याददाश्त कमज़ोर होती है, इसीलिए वह पढाई ठीक से नहीं कर पाते! जातक को हमेशा व्यवसाय में उचित लाभ नहीं मिलता , जातक अधिक पैसा लगाकर कम मुनाफा कमाता है ! इस योग के चलते जातक आर्थिक परेशानियाँ बनी रहती है ! प्रेम सम्बन्ध में धोखा मिलता है और विवाह के उपरान्त बच्चों के जन्म में समस्याएं आती है, जन्म के बाद बच्चों की सेहत भी खराब रहती है !
१२-शेषनाग कालसर्प दोष !!
कुंडली के बारहवें घर में राहू, छठे घर में केतु और बाकी सभी गृह इन दोनों के मध्य फसे होने से शेषनाग कालसर्प दोष का निर्माण होता है ! शेषनाग कालसर्प दोष जातक के जीवन में कई समस्याएं उत्पन्न करता है ! जातक हमेशा गुप्त दुश्मनों डर में रहता है, उसके गुप्त दुश्मन अधिक होते है जो उसे समय समय पर नुक्सान पहुचाते रहते है! जातक हमेशा कोई न कोई स्वास्थ्य समस्या से घिरा रहता है इसलिए उसके इलाज पर अधिक खर्चा होता है! इस दोष के कारण जातक जन्म स्थान से दूर रहना पड़ता है, गलत कार्यों में भाग लेने से जेल यात्रा भी संभव है !

कल सर्प योग का अर्थ और कैसे बना काल सर्प योग !!


ज्योतिषशास्त्र के अनुसार सूर्य से लेकर शनि तक सभी ग्रह जब राहु और केतु के मध्य आ जाते हैं तो कालसर्प योग बन जाता है। ज्योतिष मान्यताओं के अनुसार जिस व्यक्ति की जन्म कुण्डली में यह योग होता है उसके जीवन में काफी उतार चढ़ाव आते रहते हैं। मूल रूप से इस योग को इसलिए देखा जाता है क्योंकि यह व्यक्ति को झटके में आसमान से ज़मीन पर लाकर खड़ा कर देता है। 
क्या है काल सर्प योग :===========
ज्योतिष के आधार पर काल सर्प दो शब्दों से मिलकर बना है "काल और सर्प"। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार काल का अर्थ समय होता है और सर्प का अर्थ सांप इसे एक करके देखने पर जो अर्थ निकलकर सामने आता है वह है समय रूपी सांप। इस योग को ज्योतिषशास्त्र में अशुभ माना गया है। इस योग को अधिकांश ज्योतिषशास्त्री अत्यंत अशुभ मानते हैं !!
काल सर्प योग से कैसे बना :=================  
पौराणिक कथा के अनुसार सिंघिका नामक राक्षस का पुत्र स्वरभानु था जो बहुत ही शक्तिशाली था। स्वरभानु ने ब्रह्मा जी की कठोर तपस्या की। तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने स्वरभानु को वरदान दिया जिससे उसे ग्रह मंडल में स्थान प्राप्त हुआ। स्वरभानु किस प्रकार राहु केतु के नाम से जाना गया इसकी कथा सागर मंथन से जुड़ा है। सागर मंथन के समय देवताओं और दानवों में एक समझौता हुआ जिसके तहत दोनों ने मिलकर सागर मंथन किया। इस मंथन के दौरान सबसे अंत में भगवान धनवन्तरी अमृत कलश लेकर प्रकट हुए। अमृत पाने के लिए देवताओं और दानवों में संघर्ष की स्थिति पैदा होने लगी। भगवान विष्णु तब मोहिनी रूप धारण करके उनके बीच प्रकट हुए और देवताओं व दानवों को अलग अलग पंक्तियों में बैठाकर अमृत बांटने लगे। अपनी चतुराई से मोहिनी रूप धारण किये हुए भगवान विष्णु केवल देवताओं को अमृत पिला रहे थे जिसे दानव समझ नहीं पा रहे थे परंतु स्वरभानु मोहिनी की चतुराई का समझकर देवताओं की टोली में जा बैठा।अमृत वितरण के क्रम में मोहिनी ने स्वरभानु को देवता समझकर उसे भी अमृत पान करा दिया परंतु सूर्य और चन्द्रमा ने उसे पहचान लिया तब विष्णु ने सुदर्शन चक्र से स्वरभानु का सिर धड़ से अलग कर दिया। चुंकि अमृत स्वरभानु के जीभ और गर्दन को छू गया था अत: वह सिर कट जाने पर भी जीवित रहा। ब्रह्मा जी ने स्वरभानु से कहा कि तुम्हारा सिर राहु के नाम से जाना जाएगा और धड़ जो सांप की तरह है वह केतु के रूप में जाना जाएगा। इस घटना के बाद से ही स्वरभानु राहु केतु के रूप में विख्यात हुआ। सूर्य और चन्द्रमा के कारण ही उसे इस स्थिति से गुजरना पड़ा था इसलिए वह उसे अपना शत्रु मानने लगा। पौराणिक कथा के अनुसार राहु केतु सूर्य और चन्द्रमा को निगल लेता है जिससे सूर्य ग्रहण और चन्द्र ग्रहण होता है।अन्य ग्रहों की अपेक्षा राहु और केतु में एक महत्वपूर्ण अन्तर यह है कि जहां अन्य ग्रह घड़ी की विपरीत दिशा में चलते हैं वहीं राहु केतु घड़ी की दिशा में भ्रमण करते हैं। राहु केतु में एक अन्य विशेषता यह है कि दोनों एक दूसरे से सातवें घर में स्थित रहते हैं. दोनों के बीच 180 डिग्री की दूरी बनी रहती है।ऋग्वेद के अनुसार राहु केतु ग्रह नहीं हैं बल्कि असुर हैं। अमावस्या के दिन सूर्य और चन्द्र दोनों आमने सामने होते हैं उस समय राहु अपना काम करता है जिससे सूर्य ग्रहण होता है। उसी प्रकार पूर्णिमा के दिन केतु अपना काम करता है और चन्द्रग्रहण लगता है। वैदिक परम्परा में विष्णु को सूर्य भी कहा गया है जो दीर्घवृत्त के समान हैं। राहु केतु दो सम्पात बिन्दु हैं जो इस दीर्घवृत्त को दो भागों में बांटते हैं। इन दो बिन्दुओं के बीच ग्रहों की उपस्थिति होने से कालसर्प योग बनता है जो व्यक्ति के पतन का कारक माना जाता है।कालसर्प योग की गणना में ध्यान देने वाली बात यह भी है कि सभी ग्रह एक अर्घवृत्त के अंदर होने चाहिए अगर कोई ग्रह एक डिग्री भी बाहर है तो यह योग नहीं बनेगा। उदाहरण के तौर पर राहु अगर कर्क राशि से 15 डिग्री पर है और उसी राशि से चन्द्रमा अगर 16 डिग्री पर है तो इस स्थिति में यह योग नहीं बनेगा।काल सर्प योग के ज्योतिषशास्त्री अशुभ योग मानते है परंतु बहुत से ऐसे व्यक्ति हैं जिनकी कुण्डली में यह योग होने से वह सम्मानित पदों पर विराजमान हुए हैं। लेकिन इस योग के विषय में यह भी तय है कि जिनकी कुण्डली में यह योग होता है वह भले ही कितनी भी उंचाई पर पहुंच जाएं परंतु एक दिन उन्हें ज़मीन पर आना ही होता है।

हनुमान चालीसा में चालीस दोहे ही क्यों !!

केवल हनुमान चालीसा ही नहीं सभी देवी-देवताओं की प्रमुख स्तुतियों में चालीस ही दोहे होते हैं? विद्वानों के अनुसार चालीसा यानि चालीस, संख्या चालीस, हमारे देवी-देवीताओं की स्तुतियों में चालीस स्तुतियां ही सम्मिलित की जाती है। जैसे श्री हनुमान चालीसा, दुर्गा चालीसा, शिव चालीसा आदि। इन स्तुतियों में चालीस दोहे ही क्यों होती है? इसका धार्मिक दृष्टिकोण है। इन चालीस स्तुतियों में संबंधित देवता के चरित्र, शक्ति, कार्य एवं महिमा का वर्णन होता है। चालीस चौपाइयां हमारे जीवन की संपूर्णता का प्रतीक हैं, इनकी संख्या चालीस इसलिए निर्धारित की गई है क्योंकि मनुष्य जीवन 24 तत्वों से निर्मित है और संपूर्ण जीवनकाल में इसके लिए कुल 16 संस्कार निर्धारित किए गए हैं। इन दोनों का योग 40 होता है।
24 तत्वों इस प्रकार है :================
5 ज्ञानेंद्रिय, 5 कर्मेंद्रिय, 5 महाभूत, 5 तन्मात्रा, 4 अन्त:करण शामिल है।
सोलह संस्कार इस प्रकार है :============
 गर्भाधान संस्कार, पुंसवन संस्कार, सीमन्तोन्नयन संस्कार, जातकर्म संस्कार, नामकरण संस्कार, निष्क्रमण संस्कार, अन्नप्राशन संस्कार, चूड़ाकर्म संस्कार, विद्यारम्भ संस्कार, कर्णवेध संस्कार, यज्ञोपवीत संस्कार, वेदारम्भ संस्कार, केशान्त संस्कार, समावर्तन संस्कार, पाणिग्रहण संस्कार, अन्त्येष्टि संस्कार !
भगवान की इन स्तुतियों में हम उनसे इन तत्वों और संस्कारों का बखान तो करते ही हैं, साथ ही चालीसा स्तुति से जीवन में हुए दोषों की क्षमायाचना भी करते हैं। इन चालीस चौपाइयों में सोलह संस्कार एवं 24 तत्वों का भी समावेश होता है। जिसकी वजह से जीवन की उत्पत्ति है।

भगवान शिव सिखाते है जीवन जीने का तरीका !!

शिव जी की जटा :-  जो कि शरीर और आत्मा का सामंजस्य दिखाता है अगर आपको एक अच्छा विद्यार्थी बनाना है तो उसके लिए आपके दिमाग और आत्मा का स्वस्थ होना बहुत जरुरी है। और उसके लिए अपने मन, शरीर और आत्मा के बीच संतुलन रखना होगा। जिससे आप किसी भी परेशानी से लड़ सकते हैं।
तीसरी आंख :- मन की आंखों से देखे अगर हमे ज़िन्दगी में कुछ बनना है तो जो सोचा है उसे पूरा करना होगा। यही हमे ज़िन्दगी जीना सिखाता है। जो हमे लग रहा है कि यह हम नहीं कर पायेंगे और उसे पाने के लिए जी जान से कोशिश कर के हासिल कर लें तो शयद आपको को भी अपने ऊपर आश्चर्य हो। यही सिख हमे मिलती है भगवन शिव से जो हो रहा है उसके परे की सोचें और उसे हासिल करने में लग जाएँ।
त्रिशूल :- मन, बुद्धि और अहंकार पर नियंत्रण अगर आपको ज़िन्दगी बहुत सारी परेशानियों के बाद या सिर्फ हार के डर से आपने कुछ पाया है, तो यहीँ से आपके अंदर अहंकार आने लगता है। और अगर आपको ज़िन्दगी में आगे सफल होना है तो इसे नियंत्रण में रखना जरुरी है। जिस इंसान में अहंकार नहीं होता है उसकी बुद्धि और मन बेहतर तरीके से काम करते हैं।
ध्यान मुद्रा :- मन की शांति दिमाग की शांति का बहुत बड़ा महत्व है हमारी ज़िन्दगी में। यह हमे रोज़मरा की परेशानियों से लड़ने की ताकत देता है और हमारे दिमाग को स्वस्थ रहने में मदद करता है।
शरीर पर राख : - सब कुछ अस्थायी है, यहां तक ​​कि हमारा शरीर भी आज कल औरतें ही नहीं बल्कि आदमी भी अपनी खूबसूरती के लिए ना जाने कितने पैसे खर्च करते हैं। क्या यह सही है। यह जानेते हुए भी कि सब कुछ अस्थायी। पर इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि आप अपने स्वास्थ को नज़रंदाज़ करें। बाहरी सुंदरता से नहीं अपनी अंदर की सुंदरता को बहार निकलने की कोशिश करें।
नीलकंठ :- बुराई (गुस्से) को ख़त्म करना गुस्सा हम सब का सबसे बड़ा दुश्मन है, इसे खत्म या नियंत्रण करना भी हमारी ही ज़िमेदारी है। गुस्सा अगर अंदर रहा जाये तो ज़हर है और बहार निकले तो दुसरो के लिए हानिकारक हो सकता है। तो अगली बार गुस्सा आये तो बहार टहलने चले जाये या गुस्से को नियंत्रण रखने के लिए शान्त रहे।
डमरू :-शरीर की सभी इच्छाओं से मुक्ति भगवन शिव का डमरू यह दिखाता की आप कि इच्छा शक्ति मजबूत हो जिससे आप अपनी सारी बुराईयों पर काबू पा सके। और यह सब आपको हासिल होगा सही खान पान और सही व्यायाम से।
गंगा :- अज्ञानता का अंत और ज्ञान तथा शांति की सुबह सही ज्ञान ही इंसान को एक बेहतर मनुष्य बनाता है। और अपने ऊपर विश्वास करना सिखाता है। जिससे आप ज़िन्दगी उन सारी समस्यों से लड़ सकते है और अपनी ज़िन्दगी को और बेहतर बना सकते हैं।
कमंडल :- शरीर से सब बुराइयों को हटाना अपने मन और शरीर दोनों से बुरे विचार, नकारात्मकता और गन्दगी को बहार निकल देना ही अच्छी और बेहतर सोच को जन्म देता है। इसे आपका दिमाग अच्छे से काम और नयी सोच को विकसित करने में मदद करता है।
गले में नाग :-अहंकार पर नियंत्रण अहंकार आपका सबसे बड़ा दुश्मन है, और यह क्रोध को जन्म दे कर आपका स्वास्थ ख़राब करता है। तो अपने अहंकार को खत्म करें और मानसिक और शारीरिक रूप से शांत रहने की कोशिश करें।



Sunday, 26 October 2014

अपनी जन्म कुंडली से जानें विवाह में देरी बाधा के योग विस्तार से !!शादी विशेष !!


वर्तमान में युवक-युवतियां का उच्च शिक्षा या अच्छा करियर बनाने के चक्कर में अधिक उम्र के हो जाने पर विवाह में काफी विलंब हो जाता है। उनके माता-पिता भी असुरक्षा की भावनावश अपने बच्चों के अच्छे खाने-कमाने और आत्मनिर्भर होने तक विवाह न करने पर सहमत हो जाने के कारण विवाह में विलंब-देरी हो जाती है।इस समस्या के निवारणार्थ अच्छा होगा की किसी विद्वान ज्योतिषी को अपनी जन्म कुंडली दिखाकर विवाह में बाधक ग्रह या दोष को ज्ञात कर उसका निवारण करें।
ज्योतिषीय दृष्टि से जब विवाह योग बनते हैं, तब विवाह टलने से विवाह में बहुत देरी हो जाती है। वे विवाह को लेकर अत्यंत चिंतित हो जाते हैं। वैसे विवाह में देरी होने का एक कारण बच्चों का मांगलिक होना भी होता है। इनके विवाह के योग 27, 29, 31, 33, 35 व 37वें वर्ष में बनते हैं। जिन युवक-युवतियों के विवाह में विलंब हो जाता है, तो उनके ग्रहों की दशा ज्ञात कर, विवाह के योग कब बनते हैं, जान सकते हैं। जिस वर्ष शनि और गुरु दोनों सप्तम भाव या लग्न को देखते हों, तब विवाह के योग बनते हैं। सप्तमेश की महादशा-अंतर्दशा या शुक्र-गुरु की महादशा-अंतर्दशा में विवाह का प्रबल योग बनता है। सप्तम भाव में स्थित ग्रह या सप्तमेश के साथ बैठे ग्रह की महादशा-अंतर्दशा में विवाह संभव है।
अन्य योग निम्नानुसार हैं-
(1) लग्नेश, जब गोचर में सप्तम भाव की राशि में आए।
(2) जब शुक्र और सप्तमेश एक साथ हो, तो सप्तमेश की दशा-अंतर्दशा में।
(3) लग्न, चंद्र लग्न एवं शुक्र लग्न की कुंडली में सप्तमेश की दशा-अंतर्दशा में।
(4) शुक्र एवं चंद्र में जो भी बली हो, चंद्र राशि की संख्या, अष्टमेश की संख्या जोड़ने पर जो राशि आए, उसमें गोचर गुरु आने पर।
(5) लग्नेश-सप्तमेश की स्पष्ट राशि आदि के योग के तुल्य राशि में जब गोचर गुरु आए।
(6) दशमेश की महादशा और अष्टमेश के अंतर में।
(7) सप्तमेश-शुक्र ग्रह में जब गोचर में चंद्र गुरु आए।
(8) द्वितीयेश जिस राशि में हो, उस ग्रह की दशा-अंतर्दशा में।
विवाह में बाधक योग :=
जन्म कुंडली में 6, 8, 12 स्थानों को अशुभ माना जाता है। मंगल, शनि, राहु-केतु और सूर्य को क्रूर ग्रह माना है। इनके अशुभ स्थिति में होने पर दांपत्य सुख में कमी आती है। सप्तमाधिपति द्वादश भाव में हो और राहू लग्न में हो, तो वैवाहिक सुख में बाधा होना संभव है। सप्तम भावस्थ राहू युक्त द्वादशाधिपति से वैवाहिक सुख में कमी होना संभव है। द्वादशस्थ सप्तमाधिपति और सप्तमस्थ द्वादशाधिपति से यदि राहू की युति हो तो दांपत्य सुख में कमी के साथ ही अलगाव भी उत्पन्न हो सकता है। लग्न में स्थित शनि-राहू भी दांपत्य सुख में कमी करते हैं। सप्तमेश छठे, अष्टम या द्वादश भाव में हो, तो वैवाहिक सुख में कमी होना संभव है। षष्ठेश का संबंध यदि द्वितीय, सप्तम भाव, द्वितीयाधिपति, सप्तमाधिपति अथवा शुक्र से हो, तो दांपत्य जीवन का आनंद बाधित होता है। छठा भाव न्यायालय का भाव भी है। सप्तमेश षष्ठेश के साथ छठे भाव में हो या षष्ठेश, सप्तमेश या शुक्र की युति हो, तो पति-पत्नी में न्यायिक संघर्ष होना भी संभव है।यदि विवाह से पूर्व कुंडली मिलान करके उपरोक्त दोषों का निवारण करने के बाद ही विवाह किया गया हो, तो दांपत्य सुख में कमी नहीं होती है। किसी की कुंडली में कौन सा ग्रह दांपत्य सुख में कमी ला रहा है। इसके लिए किसी विशेषज्ञ की सलाह लें।
विवाह योग के लिये जो कारण  मुख्य है वे इस प्रकार हैं-
सप्तम भाव का स्वामी खराब है या सही है वह अपने भाव में बैठ कर या किसी अन्य स्थान पर बैठ कर अपने भाव को देख रहा है। सप्तम भाव पर किसी अन्य पाप ग्रह की द्रिष्टि नही है। कोई पाप ग्रह सप्तम में बैठा नही है। यदि सप्तम भाव में सम राशि है। सप्तमेश और शुक्र सम राशि में है। सप्तमेश बली है। सप्तम में कोई ग्रह नही है। किसी पाप ग्रह की द्रिष्टि सप्तम भाव और सप्तमेश पर नही है। दूसरे सातवें बारहवें भाव के स्वामी केन्द्र या त्रिकोण में हैं,और गुरु से द्रिष्ट है। सप्तमेश की स्थिति के आगे के भाव में या सातवें भाव में कोई क्रूर ग्रह नही है।
विवाह नही होगा अगर :=
सप्तमेश शुभ स्थान पर नही है। सप्तमेश छ: आठ या बारहवें स्थान पर अस्त होकर बैठा है। सप्तमेश नीच राशि में है। सप्तमेश बारहवें भाव में है,और लगनेश या राशिपति सप्तम में बैठा है। चन्द्र शुक्र साथ हों,उनसे सप्तम में मंगल और शनि विराजमान हों। शुक्र और मंगल दोनों सप्तम में हों। शुक्र मंगल दोनो पंचम या नवें भाव में हों। शुक्र किसी पाप ग्रह के साथ हो और पंचम या नवें भाव में हो। शुक्र बुध शनि तीनो ही नीच हों। पंचम में चन्द्र हो,सातवें या बारहवें भाव में दो या दो से अधिक पापग्रह हों। सूर्य स्पष्ट और सप्तम स्पष्ट बराबर का हो।
विवाह में देरी :—-
सप्तम में बुध और शुक्र दोनो के होने पर विवाह वादे चलते रहते है,विवाह आधी उम्र में होता है। चौथा या लगन भाव मंगल (बाल्यावस्था) से युक्त हो,सप्तम में शनि हो तो कन्या की रुचि शादी में नही होती है।सप्तम में शनि और गुरु शादी देर से करवाते हैं।
चन्द्रमा से सप्तम में गुरु शादी देर से करवाता है,यही बात चन्द्रमा की राशि कर्क से भी माना जाता है। सप्तम में त्रिक भाव का स्वामी हो,कोई शुभ ग्रह योगकारक नही हो,तो पुरुष विवाह में देरी होती है।सूर्य मंगल बुध लगन या राशिपति को देखता हो,और गुरु बारहवें भाव में बैठा हो तो आध्यात्मिकता अधिक होने से विवाह में देरी होती है।लगन में सप्तम में और बारहवें भाव में गुरु या शुभ ग्रह योग कारक नही हों,परिवार भाव में चन्द्रमा कमजोर हो तो विवाह नही होता है,अगर हो भी जावे तो संतान नही होती है।महिला की कुन्डली में सप्तमेश या सप्तम शनि से पीडित हो तो विवाह देर से होता है।राहु की दशा में शादी हो,या राहु सप्तम को पीडित कर रहा हो,तो शादी होकर टूट जाती है,यह सब दिमागी भ्रम के कारण होता है।
विवाह का समय  ;—–
सप्तम या सप्तम से सम्बन्ध रखने वाले ग्रह की महादशा या अन्तर्दशा में विवाह होता है।कन्या की कुन्डली में शुक्र से सप्तम और पुरुष की कुन्डली में गुरु से सप्तम की दशा में या अन्तर्दशा में विवाह होता है।सप्तमेश की महादशा में पुरुष के प्रति शुक्र या चन्द्र की अन्तर्दशा में और स्त्री के प्रति गुरु या मंगल की अन्तर्दशा में विवाह होता है।सप्तमेश जिस राशि में हो,उस राशि के स्वामी के त्रिकोण में गुरु के आने पर विवाह होता है।गुरु गोचर से सप्तम में या लगन में या चन्द्र राशि में या चन्द्र राशि के सप्तम में आये तो विवाह होता है।गुरु का गोचर जब सप्तमेश और लगनेश की स्पष्ट राशि के जोड में आये तो विवाह होता है। सप्तमेश जब गोचर से शुक्र की राशि में आये और गुरु से सम्बन्ध बना ले तो विवाह या शारीरिक सम्बन्ध बनता है। सप्तमेश और गुरु का त्रिकोणात्मक सम्पर्क गोचर से शादी करवा देता है,या प्यार प्रेम चालू हो जाता है।चन्द्रमा मन का कारक है,और वह जब बलवान होकर सप्तम भाव या सप्तमेश से सम्बन्ध रखता हो तो चौबीसवें साल तक विवाह करवा ही देता है।
दाम्पत्य-वैवाहिक सुख के उपाय :—-
१॰ यदि जन्म कुण्डली में प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, द्वादश स्थान स्थित मंगल होने से जातक को मंगली योग होता है इस योग के होने से जातक के विवाह में विलम्ब, विवाहोपरान्त पति-पत्नी में कलह, पति या पत्नी के स्वास्थ्य में क्षीणता, तलाक एवं क्रूर मंगली होने पर जीवन साथी की मृत्यु तक हो सकती है। अतः जातक मंगल व्रत। मंगल मंत्र का जप, घट विवाह आदि करें।
२॰ सप्तम गत शनि स्थित होने से विवाह बाधक होते है। अतः “ॐ शं शनैश्चराय नमः” मन्त्र का जप ७६००० एवं ७६०० हवन शमी की लकड़ी, घृत, मधु एवं मिश्री से करवा दें।
३॰ राहु या केतु होने से विवाह में बाधा या विवाहोपरान्त कलह होता है। यदि राहु के सप्तम स्थान में हो, तो राहु मन्त्र “ॐ रां राहवे नमः” का ७२००० जप तथा दूर्वा, घृत, मधु व मिश्री से दशांश हवन करवा दें। केतु स्थित हो, तो केतु मन्त्र “ॐ कें केतवे नमः” का २८००० जप तथा कुश, घृत, मधु व मिश्री से दशांश हवन करवा दें।
४॰ सप्तम भावगत सूर्य स्थित होने से पति-पत्नी में अलगाव एवं तलाक पैदा करता है। अतः जातक आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ रविवार से प्रारम्भ करके प्रत्येक दिन करे तथा रविवार कप नमक रहित भोजन करें। सूर्य को प्रतिदिन जल में लाल चन्दन, लाल फूल, अक्षत मिलाकर तीन बार अर्ध्य दें।
५॰ जिस जातक को किसी भी कारणवश विवाह में विलम्ब हो रहा हो, तो नवरात्री में प्रतिपदा से लेकर नवमी तक ४४००० जप निम्न मन्त्र का दुर्गा जी की मूर्ति या चित्र के सम्मुख करें।
“ॐ पत्नीं मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम्।
तारिणीं दुर्ग संसार सागरस्य कुलोद्भवाम्।।”
६॰ किसी स्त्री जातिका को अगर किसी कारणवश विवाह में विलम्ब हो रहा हो, तो श्रावण कृष्ण सोमवार से या नवरात्री में गौरी-पूजन करके निम्न मन्त्र का २१००० जप करना चाहिए-
“हे गौरि शंकरार्धांगि यथा त्वं शंकर प्रिया।
तथा मां कुरु कल्याणी कान्त कान्तां सुदुर्लभाम।।”
७॰ किसी लड़की के विवाह मे विलम्ब होता है तो नवरात्री के प्रथम दिन शुद्ध प्रतिष्ठित कात्यायनि यन्त्र एक चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर स्थापित करें एवं यन्त्र का पंचोपचार से पूजन करके निम्न मन्त्र का २१००० जइ लड़की स्वयं या किसी सुयोग्य पंडित से करवा सकते हैं।
“कात्यायनि महामाये महायोगिन्यधीश्वरि। नन्दगोप सुतं देवि पतिं मे कुरु ते नमः।।”
८॰ जन्म कुण्डली में सूर्य, शनि, मंगल, राहु एवं केतु आदि पाप ग्रहों के कारण विवाह में विलम्ब हो रहा हो, तो गौरी-शंकर रुद्राक्ष शुद्ध एवं प्राण-प्रतिष्ठित करवा कर निम्न मन्त्र का १००८ बार जप करके पीले धागे के साथ धारण करना चाहिए। गौरी-शंकर रुद्राक्ष सिर्फ जल्द विवाह ही नहीं करता बल्कि विवाहोपरान्त पति-पत्नी के बीच सुखमय स्थिति भी प्रदान करता है।
“ॐ सुभगामै च विद्महे काममालायै धीमहि तन्नो गौरी प्रचोदयात्।।”
९॰ “ॐ गौरी आवे शिव जी व्याहवे (अपना नाम) को विवाह तुरन्त सिद्ध करे, देर न करै, देर होय तो शिव जी का त्रिशूल पड़े। गुरु गोरखनाथ की दुहाई।।”
उक्त मन्त्र की ११ दिन तक लगातार १ माला रोज जप करें। दीपक और धूप जलाकर ११वें दिन एक मिट्टी के कुल्हड़ का मुंह लाल कपड़े में बांध दें। उस कुल्हड़ पर बाहर की तरफ ७ रोली की बिंदी बनाकर अपने आगे रखें और ऊपर दिये गये मन्त्र की ५ माला जप करें। चुपचाप कुल्हड़ को रात के समय किसी चौराहे पर रख आवें। पीछे मुड़कर न देखें। सारी रुकावट दूर होकर शीघ्र विवाह हो जाता है।
१०॰ जिस लड़की के विवाह में बाधा हो उसे मकान के वायव्य दिशा में सोना चाहिए।
११॰ लड़की के पिता जब जब लड़के वाले के यहाँ विवाह वार्ता के लिए जायें तो लड़की अपनी चोटी खुली रखे। जब तक पिता लौटकर घर न आ जाए तब तक चोटी नहीं बाँधनी चाहिए।
१२॰ लड़की गुरुवार को अपने तकिए के नीचे हल्दी की गांठ पीले वस्त्र में लपेट कर रखे।
१३॰ पीपल की जड़ में लगातार १३ दिन लड़की या लड़का जल चढ़ाए तो शादी की रुकावट दूर हो जाती है।
१४॰ विवाह में अप्रत्याशित विलम्ब हो और जातिकाएँ अपने अहं के कारण अनेल युवकों की स्वीकृति के बाद भी उन्हें अस्वीकार करती रहें तो उसे निम्न मन्त्र का १०८ बार जप प्रत्येक दिन किसी शुभ मुहूर्त्त से प्रारम्भ करके करना चाहिए।
“सिन्दूरपत्रं रजिकामदेहं दिव्ताम्बरं सिन्धुसमोहितांगम् सान्ध्यारुणं धनुः पंकजपुष्पबाणं पंचायुधं भुवन मोहन मोक्षणार्थम क्लैं मन्यथाम।
महाविष्णुस्वरुपाय महाविष्णु पुत्राय महापुरुषाय पतिसुखं मे शीघ्रं देहि देहि।।”
१५॰ किसी भी लड़के या लड़की को विवाह में बाधा आ रही हो यो विघ्नकर्ता गणेशजी की उपासना किसी भी चतुर्थी से प्रारम्भ करके अगले चतुर्थी तक एक मास करना चाहिए। इसके लिए स्फटिक, पारद या पीतल से बने गणेशजी की मूर्ति प्राण-प्रतिष्टित, कांसा की थाली में पश्चिमाभिमुख स्थापित करके स्वयं पूर्व की ओर मुँह करके जल, चन्दन, अक्षत, फूल, दूर्वा, धूप, दीप, नैवेद्य से पूजा करके १०८ बार “ॐ गं गणेशाय नमः” मन्त्र पढ़ते हुए गणेश जी पर १०८ दूर्वा चढ़ायें एवं नैवेद्य में मोतीचूर के दो लड्डू चढ़ायें। पूजा के बाद लड्डू बच्चों में बांट दें।
यह प्रयोग एक मास करना चाहिए। गणेशजी पर चढ़ये गये दूर्वा लड़की के पिता अपने जेब में दायीं तरफ लेकर लड़के के यहाँ विवाह वार्ता के लिए जायें।
१६॰ तुलसी के पौधे की १२ परिक्रमायें तथा अनन्तर दाहिने हाथ से दुग्ध और बायें हाथ से जलधारा तथा सूर्य को बारह बार इस मन्त्र से अर्ध्य दें- “ॐ ह्रीं ह्रीं सूर्याय सहस्त्र किरणाय मम वांछित देहि-देहि स्वाहा।”
फिर इस मन्त्र का १०८ बार जप करें-
“ॐ देवेन्द्राणि नमस्तुभ्यं देवेन्द्र प्रिय यामिनि। विवाहं भाग्यमारोग्यं शीघ्रलाभं च देहि मे।”
१७॰ गुरुवार का व्रत करें एवं बृहस्पति मन्त्र के पाठ की एक माला आवृत्ति केला के पेड़ के नीचे बैठकर करें।
१८॰ कन्या का विवाह हो चुका हो और वह विदा हो रही हो तो एक लोटे में गंगाजल, थोड़ी-सी हल्दी, एक सिक्का डाल कर लड़की के सिर के ऊपर ७ बार घुमाकर उसके आगे फेंक दें। उसका वैवाहिक जीवन सुखी रहेगा।
१९॰ जो माता-पिता यह सोचते हैं कि उनकी पुत्रवधु सुन्दर, सुशील एवं होशियार हो तो उसके लिए वीरवार एवं रविवार के दिन अपने पुत्र के नाखून काटकर रसोई की आग में जला दें।
२० ॰ किसी भी शुक्रवार की रात्रि में स्नान के बाद १०८ बार स्फटिक माला से निम्न मन्त्र का जप करें-
“ॐ ऐं ऐ विवाह बाधा निवारणाय क्रीं क्रीं ॐ फट्।”
२१ ॰ लड़के के शीघ्र विवाह के लिए शुक्ल पक्ष के शुक्रवार को ७० ग्राम अरवा चावल, ७० सेमी॰ सफेद वस्त्र, ७ मिश्री के टुकड़े, ७ सफेद फूल, ७ छोटी इलायची, ७ सिक्के, ७ श्रीखंड चंदन की टुकड़ी, ७ जनेऊ। इन सबको सफेद वस्त्र में बांधकर विवाहेच्छु व्यक्ति घर के किसी सुरक्षित स्थान में शुक्रवार प्रातः स्नान करके इष्टदेव का ध्यान करके तथा मनोकामना कहकर पोटली को ऐसे स्थान पर रखें जहाँ किसी की दृष्टि न पड़े। यह पोटली ९० दिन तक रखें।
२२ ॰ लड़की के शीघ्र विवाह के लिए ७० ग्राम चने की दाल, ७० से॰मी॰ पीला वस्त्र, ७ पीले रंग में रंगा सिक्का, ७ सुपारी पीला रंग में रंगी, ७ गुड़ की डली, ७ पीले फूल, ७ हल्दी गांठ, ७ पीला जनेऊ- इन सबको पीले वस्त्र में बांधकर विवाहेच्छु जातिका घर के किसी सुरक्षित स्थान में गुरुवार प्रातः स्नान करके इष्टदेव का ध्यान करके तथा मनोकामना कहकर पोटली को ऐसे स्थान पर रखें जहाँ किसी की दृष्टि न पड़े। यह पोटली ९० दिन तक रखें।
२३ ॰ श्रेष्ठ वर की प्राप्ति के लिए बालकाण्ड का पाठ करे।
वास्तु दोष तो नहीं हें कारण आपके विवाह में देरी?
आजकल अनेक अभिभावक अपने बच्चों की शादी-विवाह को लेकर बहुत परेशान-चिंतित रहते हें और पंडितों तथा ज्योतिर्विदों के पास जाकर परामर्श-सलाह लेते रहते है किन्तु क्या कभी आपने सोचा की विवाह में विलंब के कई कारण हो सकते हैं? इनमे से एक मुख्य कारण वास्तु दोष भी हो सकता है। यदि आप भी अपनी संतान के विवाह बाधा देरी की वजह से चिंतित हैं तो इन वास्तु दोषों पर विचार करें-
1- जिन विवाह योग्य युवक-युवतियों का विवाह नहीं हो पा रहा हें उनको उत्तर या उत्तर-पश्चिम दिशा में स्थित कमरे में रहना चाहिए। इससे विवाह के लिए रिश्ते आने लगते हैं।उस कमरे में उन्हें सोते समय अपना सर हमेशा पूर्व दिशा में रखना चाहिए…
2- जिन विवाह योग्य युवक-युवतियों का विवाह नहीं हो पा रहा हें को ऐसे कक्ष में नहीं रहना चाहिए जो अधूरा बना हुआ हो अथवा जिस कक्ष में बीम लटका हुआ दिखाई देता हो।
3- जिन विवाह योग्य युवक-युवतियों का विवाह नहीं हो पा रहा हें तो उनके शयन कक्ष/ कमरे एवं दरवाजा का रंग गुलाबी, हल्का पीला, सफेद(चमकीला) होना चाहिए।
4- जिन विवाह योग्य युवक-युवतियों का विवाह नहीं हो पा रहा हें तो उन्हें विवाह के लिए अपने कमरे में पूर्वोत्तर दिशा में पानी का फव्वारा रखना चाहिए।
5- कई बार ऐसा भी होता की कोई युवक या युवती विवाह के लिए तैयार/राजी नहीं होते हें हो तो उसके कक्ष के उत्तर दिशा की ओर क्रिस्टल बॉल कांच की प्लेट अथवा प्याली में रखनी चाहिए।
नोट ;= जिन युवक-युवतियों का विवाह नहीं हो पा रहा है शादी में बिलम्भ हो रहा हैं वो बालाजी कृपा से शीघ्र सम्पर्क करे !!

भगवान जगन्नाथ जी मन्दिर का सक्षिप्त परिचय !!


उड़ीसा राज्य के तटवर्ती शहर पुरी शहर में जगन्नाथ मंदिर स्थित है। यह मंदिर भगवान जगन्नाथ (श्रीकृष्ण) को समर्पित है। जगन्नाथ मंदिर एक हिन्दू मंदिर है। जगन्नाथ शब्द का अर्थ जगत के स्वामी होता है। इनकी नगरी ही जगन्नाथपुरी या पुरी कहलाती है। पुरी के महान मन्दिर में तीन मूर्तियाँ हैं -
मन्दिर में मूर्तियाँ : -
भगवान जगन्नाथ,(श्री कृष्ण )
बलभद्र व( बलराम )
उनकी बहन सुभद्रा की।
मूर्तियों की विशेषता :=
ये सभी मूर्तियाँ काष्ठ की बनी हुई हैं।
मन्दिर की स्थापना :=
 इन मूर्तियों की प्राण प्रतिष्ठा राजा इन्द्रद्युम्न ने मंत्रोच्चारण व विधि - विधान से की थी। महाराज इन्द्रद्युम्न मालवा की राजधानी अवन्ति से अपना राज–पाट चलाते थे।
रथ यात्रा :=
भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा प्रत्येक वर्ष आषाढ़ मास में शुक्ल द्वितीया को होती है। यह एक विस्तृत समारोह है। जिसमें भारत के विभिन्न भागों से आए लोग सहभागी होते हैं। दस दिन तक यह पर्व मनाया जाता है। इस यात्रा को 'गुण्डीय यात्रा' भी कहा जाता है। गुण्डीच का मन्दिर भी है। 
पुरी में जगन्नाथ मंदिर के 8 अजूबे इस प्रकार हैं :-
1.मन्दिर के ऊपर झंडा हमेशा हवा के विपरीत दिशा में लहराता है।
2.पुरी में किसी भी जगह से आप मन्दिर के ऊपर लगे सुदर्शन चक्र को देखेंगे तो वह आपको सामने ही लगा दिखेगा।
3.सामान्य दिन के समय हवा समुद्र से जमीन की तरफ आती है और शाम के दौरान इसके विपरीत, लेकिन पुरी में इसका उल्टा होता है।
4.पक्षी या विमानों को मंदिर के ऊपर उड़ते हुए नहीं पायेगें।
5.मुख्य गुंबद की छाया दिन के किसी भी समय अदृश्य है.
6.मंदिर के अंदर पकाने के लिए भोजन की मात्रा पूरे वर्ष के लिए रहती है। प्रसाद की एक भी मात्रा कभी भी यह व्यर्थ नहीं जाएगी, चाहे कुछ हजार लोगों से 20 लाख लोगों को खिला सकते हैं.
7. मंदिर में रसोई (प्रसाद)पकाने के लिए 7 बर्तन एक दूसरे पर रखा जाता है और लकड़ी पर पकाया जाता है. इस प्रक्रिया में शीर्ष बर्तन में सामग्री पहले पकती है फिर क्रमश: नीचे की तरफ एक के बाद एक पकती जाती है।
8.मन्दिर के सिंहद्वार में पहला कदम प्रवेश करने पर (मंदिर के अंदर से) आप सागर द्वारा निर्मित कोई भी ध्वनि नहीं सुन सकते. आप (मंदिर के बाहर से) एक ही कदम को पार करें जब आप इसे सुन सकते हैं. इसे शाम को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।
कुछ और विशेषता भी जाने :-
मन्दिर का रसोई घर दुनिया का सबसे बड़ा रसोइ घर है। प्रति दिन सांयकाल मन्दिर के ऊपर लगी ध्वजा को मानव द्वारा उल्टा चढ़ कर बदला जाता है।मन्दिर का क्षेत्रफल चार लाख वर्ग फिट में है।मन्दिर की ऊंचाई 214 फिट है।विशाल रसोई घर में भगवान जगन्नाथ को चढ़ाने वाले महाप्रसाद को बनाने 500 रसोईये एवं 300 उनके सहयोगी काम करते है।
" जय जगन्नाथ जय जय जगन्नाथ "

Saturday, 25 October 2014

"श्री मद्-भगवत गीता" के बारे में सक्षिप्त ज्ञान !!

गीता का दूसरा नाम क्या है? = गीता का दूसरा नाम गीतोपनिषद है !
गीता की गिनती किन धर्म-ग्रंथो में आती है? = गीता की गिनती उपनिषदों में आती है !
गीता किस महाग्रंथ का भाग है?= गीता महाभारत के एक अध्याय शांति-पर्व का एक हिस्सा है।
गीता किसको किसने सुनाई?= गीता श्रीकृष्ण ने अर्जुन को सुनाई।
गीता कब सुनाई गयी?= गीता आज से लगभग 7 हज़ार साल पहले सुनाई।
भगवान ने किस दिन गीता सुनाई?= गीता रविवार के दिन सुनाई गयी ।
गीता कोनसी तिथि को सुनाई गयी?= गीता एकादशी तिथि को सुनाई गयी !
गीता कहा सुनाई गयी?= गीता कुरुक्षेत्र की रणभूमि में सुनाई गयी ।
गीता कितनी देर में सुनाई गयी ? = गीता लगभग 45 मिनट में सुनाई गयी !
गीता क्यों सुनाई गयी ? कर्त्तव्य से भटके हुए अर्जुन को कर्त्तव्य सिखाने के लिए और आने वाली पीढियों को धर्म-ज्ञान सिखाने के लिए।
गीता में कितने अध्याय है?= गीता में कुल 18 अध्याय है !
गीता में कितने श्लोक है?= गीता में 700 श्लोक हैं !
गीता में क्या-क्या बताया गया है?= ज्ञान-भक्ति-कर्म योग मार्गो की विस्तृत व्याख्या की गयी है, इन मार्गो पर चलने से व्यक्ति निश्चित ही परमपद का अधिकारी बन जाता है।
गीता को अर्जुन के अलावा और किन किन लोगो ने सुना?=गीता को अर्जुन के अलावा धृतराष्ट्र एवं संजय ने सुनी !
अर्जुन से पहले गीता का पावन ज्ञान किन्हें मिला था? उ.- अर्जुन से पहले गीता का ज्ञान भगवान सूर्यदेव को मिला था !
गीतोपनिषद गीता का सार क्या है? गीता का सार प्रभु श्रीकृष्ण की शरण लेना है !
गीता में किसने कितने श्लोक कहे है? गीता में श्रीकृष्ण ने- 574 अर्जुन ने- 85 धृतराष्ट्र ने- 1 संजय ने- 40.

   

आज आपको भगवान श्री राम जी के वंश के बारे में बताता हूं ।।

ब्रह्माजी की उन्चालिसवी पीढ़ी में भगवाम श्रीराम का जन्म हुआ था । हिंदू धर्म में श्री राम को श्रीहरि विष्णु का सातवाँ अवतार माना जाता है। वैवस्वत मनु के दस पुत्र थे - इल, इक्ष्वाकु, कुशनाम, अरिष्ट, धृष्ट, नरिष्यन्त,करुष, महाबली, शर्याति और पृषध।श्री राम का जन्म इक्ष्वाकु के कुल में हुआ था और जैन धर्म के तीर्थंकर निमि भी इसी कुल के थे। मनु के दूसरे पुत्र इक्ष्वाकु से विकुक्षि, निमि और दण्डक पुत्र उत्पन्न हुए। इस तरह से यह वंश परम्परा चलते-चलते हरिश्चन्द्र, रोहित, वृष, बाहु और सगरतक पहुँची। इक्ष्वाकु प्राचीन कौशल देश के राजा थे और इनकी राजधानी अयोध्या थी। रामायण के बालकांड में गुरु वशिष्ठजी द्वारा राम के कुल का वर्णन किया गया है जो इस प्रकार है !
                                                    श्री राम जी की वंशावली का वर्णन!!
१ - ब्रह्माजी जी के पुत्र मरीचि हुए।
२ - मरीचि के पुत्र कश्यप हुए।
३ - कश्यप के पुत्र विवस्वान थे।
४ - विवस्वान के पुत्र वैवस्वत मनु हुए !
                                                 वैवस्वत मनु के समय जल प्रलय हुआ था।
५ - वैवस्वतमनु के दस पुत्र हुये उनमे में से एक का नाम इक्ष्वाकु था। इक्ष्वाकु ने अयोध्या को अपनी राजधानी बनाया और इस प्रकार इक्ष्वाकु कुलकी स्थापना की।
६ - इक्ष्वाकु के पुत्र कुक्षि हुए।
७ - कुक्षि के पुत्र का नाम विकुक्षि था।
८ - विकुक्षि के पुत्र बाण हुए।
९ - बाण के पुत्र अनरण्य हुए।
१०- अनरण्य से पृथु हुए
११- पृथु से त्रिशंकु का जन्म हुआ।
१२- त्रिशंकु के पुत्र धुंधुमार हुए।
१३- धुन्धुमार के पुत्र का नाम युवनाश्व था।
१४- युवनाश्व के पुत्र मान्धाता हुए।
१५- मान्धाता से सुसन्धि का जन्म हुआ।
१६- सुसन्धि के दो पुत्र हुए- ध्रुवसन्धि एवं प्रसेनजित।
१७- ध्रुवसन्धि के पुत्र भरत हुए।
१८- भरत के पुत्र असित हुए।
१९- असित के पुत्र सगर हुए।
२०- सगर के पुत्र का नाम असमंज था।
२१- असमंज के पुत्र अंशुमान हुए।
२२- अंशुमान के पुत्र दिलीप हुए।
२३- दिलीप के पुत्र भगीरथ हुए। भागीरथ ने ही गंगा को पृथ्वी पर उतारा था !
२४- भागीरथ के पुत्र ककुत्स्थ थे।
२४- ककुत्स्थ के पुत्र रघु हुए।
                                                         रघु  वंश की स्थापना !!
 रघु के अत्यंत तेजस्वी और पराक्रमी नरेश होने के कारण उनके बाद इस वंश का नाम रघुवंश हो गया,तब से श्री राम के कुल को रघु कुल भी कहा जाता है।
२५- रघु के पुत्र प्रवृद्ध हुए।
२६- प्रवृद्ध के पुत्र शंखण थे।
२७- शंखण के पुत्र सुदर्शन हुए।
२८- सुदर्शन के पुत्र का नाम अग्निवर्ण था।
२९- अग्निवर्ण के पुत्र शीघ्रग हुए।
३०- शीघ्रग के पुत्र मरु हुए।
३१- मरु के पुत्र प्रशुश्रुक थे।
३२- प्रशुश्रुक के पुत्र अम्बरीष हुए।
३३- अम्बरीष के पुत्र का नाम नहुष था।
३४- नहुष के पुत्र ययाति हुए।
३५- ययाति के पुत्र नाभाग हुए।
३६- नाभाग के पुत्र का नाम अज था।
३७- अज के पुत्र दशरथ हुए।
३८- दशरथ के चार पुत्र राम, भरत, लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न हुए।
इस प्रकार ब्रह्मा की उन्चालिसवी पीढ़ी में श्रीराम का जन्म हुआ !!

Friday, 24 October 2014

महाबली हनुमान के पूजन से करे बड़ी से बड़ी मुश्किलों का अंत !!


रुद्रावतार श्री हनुमान को बजरंगबली भी कहा जाता जाता है। उनका यह नाम उनके वज्र के समान बलवान शरीर या अनेक शक्तियों के स्वामी होने के कारण ही नहीं बल्कि युग-युगान्तर से जारी हनुमान भक्ति और उनके प्रति आस्था का वह प्रभाव भी है, जो भक्तों को तन, मन और धन से सबल बनाती आ रही है। चूंकि मानव जीवन भी उतार-चढ़ाव से भरा है, जिसमें दु:ख और सुख आते जाते हैं। इसलिए हर इंसान सुखों की चाहत और दु:खों से बचने के लिए देव उपासना करता है। ऐसे संकट, मुसीबतों और दु:खों से बचने के लिए ही श्री हनुमान जी की उपासना सर्व श्रेष्ठ हैं ! जो लोग हनुमान जी की उपासना तन, मन, धन और पूरी आस्था विश्वास के साथ करते है उन को कभी किसी प्रकार के संकट का सामना नहीं करना पढ़ता है ! शनिवार और मंगलवार के दिन श्री हनुमान की उपासना जप और भी असरदार होता है। क्योंकि शास्त्रों में हनुमान भक्ति नव ग्रहदोष शांति और खासतौर पर शनि दशा के बुरे प्रभाव से बचने के लिए बहुत ही शुभ मानी गई है। श्री हनुमान भक्ति में विश्वास और आस्था को बल देने वाले ही ऐसे 5 मंत्र यहां बताए जा रहे हैं। जिन के पूजन और जाप से सारे दुःख दूर हो जाते है !

                                                          हनुमान पूजा और मंत्र जाप की सरल विधि !
 

शनिवार और मंगलवार के दिन सुबह स्नान करें । इस दिन शरीर, कपडे, बोल और आचरण की पवित्रता का खास ध्यान रखें। देवालय या हनुमान मंदिर में श्री हनुमान की प्रतिमा पर चमेली या गाय के घी का मिश्रित सिंदूर चढ़ाकर गंध, अक्षत, लाल फूल, श्रीफल यानी नारियल अर्पित करें। गुग्गल धूप लगाकर लाल आसन पर बैठकर इन हनुमान मंत्रो का जप करें !
 
मंत्र :=====

ॐ बलसिद्धिकराय नम:
ॐ वज्रकायाय नम:
ॐ महावीराय नम:
ॐ रक्षोविध्वंसकाराय नम:
ॐ सर्वरोगहराय नम:

विशेष := मंत्र जप के बाद यथासंभव श्री हनुमान चालीसा पाठ का पाठ करें। श्री हनुमान की दीप और कपूर से आरती करें। पूजा, मंत्र जप और आरती के दौरान हुए जाने-अनजाने दोषों के लिए क्षमा प्रार्थना कर सारी परेशानियों और चिंतामुक्ति के लिए कामना करें।
 

बिना पूजा पाठ करें भी आप के घर हो सकती है नव ग्रह शांति !!

 आपके घर में रहने वाले सदस्यों में हमेशा अनबन रहती है, घर में लड़ाई झगड़ा होता है, एक दूसरे के जान के दुश्मन बने हुये है बच्चे अपनी इच्छा अनुसार चल रहे है अपने मन की करते है ! कोई एक दूसरे की बात मानने तैयार नहीं हैं कोई सदस्य हमेशा बीमार रहता है। सारा पैसा बीमारी में चला जाता है या घर में पैसों की बरकत नही होती है। आपके घर में शांति नही है तो बिना पूजा पाठ एवं तंत्र मंत्र से आप ग्रहों की शांति कर सकते है। अगर आप राशि के अनुसार कुछ छोटे छोटे प्रयोग करें तो निश्चित ही आपके घर में शांति हो जाएगी । नीचे राशि अनुसार कुछ उपाय दिए जा रहे है जिन के करने से सभी ग्रहों की शान्ति हो जाती है !!

                                          किस राशि वाले क्या उपाय करें?

मेष :-  मेष राशि वाले लोग अपनी राशि के अनुसार घर में लाल गाय का गौमूत्र छीटें और शाम को गुग्गल का धूप दें।
वृष :- आपकी राशि का स्वामी शुक्र है इसलिए आपको लक्ष्मी जी के मन्दिर में गाय का घी दान देना चाहिए।
मिथुन :- अगर आप बुध से संबंधीत वस्तुओं का दान दें तो आपके घर में निश्चित ही शांति रहेगी। आप किन्नरों को हरे वस्त्र के साथ हरी चुड़ीयां दान दें।
कर्क :- आप पर चंद्रमा का विशेष प्रभाव है चंद्रमा के शुभ प्रभाव के लिए आप 10 वर्ष से कम उम्र की कन्याओं को भोजन कराएं और दक्षिणा दें।
सिंह :- आपकी राशि का स्वामी सूर्य है और आप पर सूर्य का विशेष प्रभाव है। इसलिए आप रोज सूर्योदय के समय तांबे के पात्र से सूर्य को जल चढ़ाए।
कन्या :- कन्या राशि वाले लोगों को गले हुए मूंग गाय को खिलाना चाहिए। इससे आपके धर में शांति बनी रहेगी।
तुला :- आपकी राशि शुक्र की राशि है इसलिए आप नव विवाहित वधू को भोजन कराएं तो आप पर लक्ष्मी जी प्रसन्न होंगी और घर में बरकत बनी रहेगी।
वृश्चिक :- आपकी राशि का स्वामी मंगल है इसलिए आप रोज रात को तांबे के बर्तन में पानी भर कर उसे अपने सिरहाने रख कर सोए और सुबह कांटेदार वृक्ष में डाल दें तो आपके घर में शांति रहेगी और सारी नकारात्मकता खत्म हो जाएगी।
धनु :- धनु राशि वाले गुरु के उपाय करें यानी रोज पीली गाय को चारा दें और हर गुरुवार को किसी ब्राह्मण को भोजन कराए।
मकर :- घर मे शांति बनाए रखने के लिए आप किसी जरूरतमंद व्यक्ति को काला कंबल दान दें।
कुंभ :- आपकी राशि पर शनि देव का विशेष प्रभाव है इसलिए आप चिंटीयों को आटा और चिनी खिलाए।
मीन :- अपनी राशि के अनुसार आपको रोज मछलियों को आटे की गोलियां खिलाना चाहिए या दाना डालना चाहिए। 

Thursday, 23 October 2014

सत्य ही धर्म का मूल रूप है !!

 जीवन में टेढ़े-मेढ़े रास्ते अनेक हो सकते हैं। दो बिंदुओं को मिलाने वाली सीधी रेखा एक ही होती है। एक से ज्यादा नहीं हो सकतीं। ठीक इसी प्रकार आत्मा को परमात्मा से मिलाने वाला या अनुभूति करवाने वाला धर्म भी एक ही हो सकता है। जो मानव मात्र ही नहीं प्राणी मात्र के प्रति बिना किसी भेद भाव के न्याय युक्त ढंग से सब का हित व कल्याण करने वाला हो। ऐसी सर्वहितकारी भावना वैदिक सनातन धर्म में निहित है। मानव मात्र का धर्म वही हो सकता है जो सृष्टि के आरंभ से चला आया हो। यदि हम सृष्टि की रचना के करोड़ों वर्षों बाद में चलें धर्म को मानव धर्म मान भी लें तब हमें यह मानना ही पड़ेगा कि सृष्टि के आदि से चला हुआ धर्म ही मानव मात्र का धर्म हो सकता है। यह धर्म सृष्टि के आरंभ में ईश्वर ने चार ऋषियों अग्नि, वायु आदित्य व अंगिरा के हृदय में क्रमशः चारों वेदों ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद व अथर्ववेद के ज्ञान का प्रकाश किया। उन चारों ने उस वेद ज्ञान को आम लोगों में उच्चारित करके सुनाया, लोगों ने उस ज्ञान को सुनकर कंठस्थ कर लिया और अपनी संतानों को सुनाते रहे। इस प्रकार यह क्रम करोड़ों वर्षों तक चला। फिर ये लिपिबद्ध कर दिए गए। इसीलिए वेदों को श्रुति भी कहते हैं यानि सुनकर याद किया हुआ ज्ञान। वेद ज्ञान एक प्रकार की आचार संहिता है जिससे मनुष्य अपने कर्तव्य का बोध करता है उसे अपने जीवन में क्या काम करने चाहिए और क्या काम नहीं करने चाहिए, इसका बोध वेद करवाते हैं। जिस प्रकार एक वैज्ञानिक कोई यंत्र तैयार करता है और फिर उस यंत्र का प्रयोग किस प्रकार किया जाएगा, उसकी एक लघु पुस्तिका तैयार करता है जिसको पढ़कर मनुष्य उसका सुचारू रूप से प्रयोग कर सके और उसका रखरखाव का ढंग भी जान सके। ठीक इसी प्रकार ईश्वर ने जब मनुष्यों के लिए यह सृष्टि रची तब पहले उसने आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, सूर्य, चंद्रमा, पेड़, पौधे व वनस्पतियां आदि बनाईं, फिर मनुष्य को एक इस प्रकार का ज्ञान दिया जिससे वह स्वयं भी सुखी रह सके और दूसरों को भी सुखी रख सके। साथ ही मनुष्य के चार पुरुषार्थ जिससे काम को करते हुए उसका अंतिम लक्ष्य मोक्ष प्राप्त हो सके, यह सब ज्ञान देने के लिए ईश्वर ने चार वेदों के ज्ञान का प्रकाश किया। इस प्रकार वैदिक धर्म सृष्टि के आदि से चला हुआ धर्म है। ईश्वर सृष्टि का रचयिता है इसलिए हम सबका पिता है और सारे जीवन उसके पुत्रवत हैं। पिता अपने पुत्रों में कभी भी भेदभाव नहीं रखेगा। वह जो कुछ करेगा वह सबके हित के लिए करेगा। इसलिए वैदिक धर्म किसी एक वर्ग समुदाय, जाति व राष्ट्र के लिए नहीं अपितु मानव मात्र के हित व कल्याण के लिए है। वैसे तो यह धर्म प्राणी मात्र के हित के लिए है परंतु मनुष्य अपने कर्मों के अनुसार ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति है। इसको अन्य प्राणियों की अपेक्षा बुद्धि विशेष रूप से अधिक दी है जिससे अच्छे बुरे का विचार व चिंतन मनन कर सके और जो अपने तथा दूसरों के हित में हो वह काम कर सके और जो दोनों के हित में न हो वह न करे। इसलिए मनुष्य को ही अच्छे करते हुए मोक्ष प्राप्त करने का अधिकार दिया है। अन्य प्राणी सिर्फ भोग योनियों में जन्म लेते हुए मनुष्य योनि तक पहुंच सकते हैं। मनुष्य योनि कर्म करने में स्वतंत्र और फल पाने में परतंत्र है और यह योनि कर्म व भोग दोनों है। अन्य पशु-पक्षी, कीट व पतंग सिर्फ भोग योनि हैं वह सिर्फ अपने किए हुए कर्मों का फल भोगते हैं। इनको कर्म करने की स्वतंत्रता नहीं है। इसीलिए मोक्ष को प्राप्त नहीं कर सकते। वस्तुतः मोक्ष मानव के कर्मों का फल होता है। मोक्ष सिर्फ मनुष्य ही प्राप्त कर सकता है। मोक्ष प्राप्त करना मनुष्य की पूर्ण सफलता है। इसलिए हर मनुष्य को मोक्ष प्राप्त करने के लिए प्रयत्न करते रहना चाहिए। ईश्वर भी मनुष्य को पृथ्वी पर इसीलिए भेजता है कि तू अपने सद्विचार, सद्व्यवहार, सद् आचार और सद्आहार से अपने आपको सुखी रखता हुआ साथ ही दूसरे प्राणियों को भी सुखी रखता हुआ मोक्ष के परम आनंद को प्राप्त कर। इस प्रकार वेद मानव को मोक्ष प्राप्त होने तक की शिक्षाओं व उपदेशों का संग्रह है। इसमें किसी के प्रति भेदभाव या पक्षपात नहीं है, यह सबके हित और भलाई के लिए है। जैसे ईश्वर के बनाए हुए सूर्य, चंद्रमा, पृथ्वी, वायु, जल, अग्नि आदि सबके लिए हैं वैसे ही वेदों का ज्ञान भी सबके लिए है। यह प्राणी मात्र की आत्मा को अपनी आत्मा के समान समझने की शिक्षा देता है इसलिए सबसे प्रेम रखना सिखाता है और 'वसुधैव कुटुम्बकम्‌' का पाठ पढ़ा कर विश्व को एक परिवार के समान समझने की प्रेरणा देता है। 'माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्या' अर्थात्‌ पृथ्वी सबकी माता है और हम उसके पुत्र हैं कह कर मानव मात्र को परस्पर भाईचारे का संदेश देता है। वस्तुतः धर्म कोई बाहरी चिह्न व आडंबर का नाम नहीं है बल्कि उन शाश्वत गुणों का नाम है जिनको जीवन में धारण करने से मनुष्य स्वयं तो सुखी बनकर उन्नति व समृद्धि की ओर अग्रसर होता ही है साथ ही अन्य प्राणियों को भी सुखी बनाता है। जैसे सत्य बोलना, सद्व्यवहार करना, किसी से द्वेष, ईर्ष्या व घृणा न करना, परोपकार करना आदि। यह सभी गुण पूर्ण रूप से वैदिक धर्म में मिलते हैं। जिसमें सत्य प्रतिष्ठित है इसीलिए वह- 'सत्यं शिवं सुंदरं' को चरितार्थ कर लोकधर्म बन गया।
 

भगवान का गुणगान और समर्पण से ही सार्थक होगा जीवन !!


जन्म-जन्मांतरों का सुकृत पुण्य जब उदय होता है, तभी हमारे जीवन में भगवान के मंगलमय लीला चरित्र के गुणगान का सौभाग्य मिलता है। हमारे जीवन का वही क्षण कृतार्थ है, जिसमें भगवान का गुण गान होता है। जीवन की सार्थकता भगवान की लीला श्रवण में है। भगवान नाम का संकीर्तन, कथा श्रवण, भगवान  के गुणों का गान दर्शन ही हमारे जीवन का परम महोत्सव है। परंतु दुर्भाग्य से यह महोत्सव हमारे जीवन में संपन्न नहीं होता। अन्य विविध प्रकार के उत्सव मनाने का हमें अनुभव है। बड़ा उल्लास होता है उत्सवों में। कितना प्रकाश, कितना शोर, कितनी मेहमानी मेजबानी होती है। परंतु इन सारे उत्सवों की रात गुजर जाने के बाद सुबह का सूरज हमारी जिंदगी में कुछ अंधेरी रेखाएं और खींच जाता है कभी ऐसा उत्सव हमारी जिंदगी में नहीं आया है जिसके पीछे हमें कोई आनंद, उल्लास मिला हो। दिखावे में प्रदर्शन में हम पार्टियां करते हैं, अपनी हैसियत से ज्यादा खर्च कर देते हैं और जब मांगने वाले द्वार पर खड़े होते हैं तो हम चीखते-चिल्लाते तनाव से भर जाते हैं। एक के बाद एक हमारा उत्सव चलता है। परंतु उल्लास हमसे छिन जाता है। जो शांति जो चेतना, जो प्रकाश हमारे जीवन में मिला था हम अपने ही अज्ञान के कारण उससे वंचित हो जाते हैं। भगवान की कथा नाम संकीर्तन में ही वह शक्ति है कि शोक का समुद्र भी हो तो सूख जाता है। जीवन परम आनंद तथा शांति को उपलब्ध हो जाता है। समस्याएं और संकट तो जीवन में आते ही हैं। क्योंकि उसके साथ हमारा प्रारब्ध जुड़ा हुआ है। जब तक शरीर है, शरीर से बने हुए संबंध हैं, कहीं संयोग होगा तो कहीं वियोग होगा। कहीं हर्ष होगा तो कहीं विषाद होगा। दोनों से हमें जो परे कर दे ऐसा जो नित्य नवनवायमान परम महोत्सव है- 'तदेव शाश्वन्मनसो महोत्सवम्‌' अर्थात् वही हमारे मन का शाश्वत महोत्सव है। शरीर का उत्सव नहीं है, विवाह का उत्सव नहीं है, जन्मदिन का उत्सव नहीं है, वह तो शाश्वत महोत्सव है हमारे मन का जो शोक सागर का भी शोषण करने में समर्थ नहीं है। जिसने अपने को प्रभु के चरणों में समर्पित कर दिया है, उसके जीवन में कौन-सा शोक आ सकता है, कौन-सी आपत्तियां-विपत्तियां आ सकती हैं। और यदि आई भी हैं तो प्रभु चरणों में समर्पित कर देना है कि प्रभु यह सब तुम्हारी ही लीला है। तुम जानो तुम्हारा काम जाने। फिर हम हैं कहां बीच में। अगर हम बीच में आ जाते हैं तो सहना पड़ेगा, झेलना पड़ेगा। हमारा वस्तुतः हम बीच में आ ही जाते हैं, क्योंकि समर्पण नहीं है अपने प्रियतम प्रभु के प्रति हमारे जीवन में। समर्पण क्यों नहीं है? क्योंकि विश्वास नहीं हैं। जरा-सी संकट की घड़ी आई नहीं कि भागने लगे इधर से उधर। परीक्षा की घड़ी आती है तो विश्वास हमारा टूट जाता है। श्रद्धा समर्पण भरे हृदय से शुद्ध भाव से  भगवान के श्रीचरणों में हमारा समर्पण हो जाए तो जीवन सार्थक हो जाए।

ज्योतिष मै प्रेतादिक संकट का योग कैसे बनता है और उसको दूर करने के उपाय !!


हम जहां रहते हैं वहां कई ऐसी शक्तियां होती हैं, जो हमें दिखाई नहीं देतीं किंतु बहुधा हम पर प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं जिससे हमारा जीवन अस्त-व्यस्त हो उठता है और हम दिशाहीन हो जाते हैं। इन अदृश्य शक्तियों को ही आम जन प्रेत बाधाओं की संज्ञा देते हैं। भारतीय ज्योतिष में ऐसे कतिपय योगों का उल्लेख है जिनके घटित होने की स्थिति में ये शक्तियां शक्रिय हो उठती हैं और उन योगों के जातकों के जीवन पर अपना प्रतिकूल प्रभाव डाल देती हैं। यहां प्रेत बाधाओं के कुछ ऐसे ही प्रमुख योगों तथा उनसे बचाव के उपायों का उल्लेख प्रस्तुत है।
ग्रहों के प्रभाव से योग :=
लग्न में राहु तथा चंद्र और त्रिकोण में मंगल व शनि हों, तो जातक को प्रेत प्रदत्त पीड़ा होती है।
चंद्र पाप ग्रह से दृष्ट हो, शनि सप्तम में हो तथा कोई शुभ ग्रह चर राशि में हो, तो प्रेत  से पीड़ा होती है।
शनि तथा राहु लग्न में हो, तो जातक को प्रेत  सताता है।
लग्नेश या चंद्र से युक्त राहु लग्न में हो, तो प्रेत योग होता है।
यदि दशम भाव का स्वामी आठवें या एकादश भाव में हो और संबंधित भाव के स्वामी से दृष्ट हो, तो उस स्थिति में भी प्रेत योग होता है।
प्रेतादिक संकट योग  का प्रभाव :=
उक्त योगों के प्रभाव से जातकों के आचरण और व्यवहार में बदलाव आने लगता है। वो किसी की बात ना तो सुनना पसन्द करते है ना मानना और अपने मन की करते है तथा कुछ लोग चारित्रिक रूप से भ्रष्ट होजाते है, कुछ मानसिक और शारीरिक बीमारियों के शिकार हो जाते है और मृत्यु तक पहुच जाते है 
योगों के दुष्प्रभावों से मुक्ति हेतु ये उपाय करने चाहिए।
                                        
                                                        दुर्गा सप्तशती से

संकट निवारण हेतु पान, पुष्प, फल, हल्दी, पायस एवं इलाइची के हवन से दुर्गासप्तशती के बारहवें अध्याय के तेरहवें श्लोक सर्वाबाधा..न संशयः मंत्र से संपुटित नवचंडी यज्ञ कराएं।
दुर्गा सप्तशती के चौथे अध्याय के चौबीसवें श्लोक का पाठ करते हुए पलाश की समिधा से घृत और सीलाभिष की आहुति दें, कष्टों से रक्षा होगी।
शक्ति तथा सफलता की प्राप्ति हेतुग्यारहवें अध्याय के ग्यारहवें श्लोक सृष्टि स्थिति विनाशानां..का उच्चारण करते हुए घी की आहुतियां दें।
 शत्रु शमन हेतु सरसों, काली मिर्च, दालचीनी तथा जायफल की हवि देकर अध्याय के उनचालीसवें श्लोक का संपुटित प्रयोग तथा हवन कराएं।
 महाकाली या भद्रकाली माता के मंत्रानुष्ठान कराएं और कार्यस्थल या घर पर हवन कराएं।
                   
                                                     अन्य पूजनदेवो के पूजन से उपाय

महामृत्युंजय मंत्र का विधिवत्‌ अनुष्ठान कराएं। जप के पश्चात्‌ हवन अवश्य कराएं।
गुग्गुल का धूप देते हुए हनुमान चालीस तथा बजरंग बाण का पाठ करें।
उग्र देवी या देवता के मंदिर में नियमित श्रमदान करें, सेवाएं दें तथा साफ सफाई करें।
यदि घर के छोटे बच्चे पीड़ित हों, तो मोर पंख को पूरा जलाकर उसकी राख बना लें और उस राख से बच्चे को नियमित रूप से तिलक लगाएं तथा थोड़ी-सी राख चटा दें।

नोट := यदि फिर भी इन उपायों से संतुष्टी नहीं मिलती है तो  बालाजी कृपा से सम्पर्क करे !!

Wednesday, 22 October 2014

दीपावली की बधाई !!


बालाजी कृपा परिवार की ओर से सभी भक्तो को दीपावली की आपको हार्दिक शुभकामनाएं....शुभकामनायें, बधाईयाँ एंव मंगलकामनायें..आप स्वस्थ्य व दीर्घायु रहें और बुलंदियों के शिखर पर पहुंचे ! आप के जीवन में खुशियाँ दीपावली के प्रकाश की तरह जगमगाती रहे ! यही कामना करते है हम !!जय श्री राम

अगर आप के मन में बुरे विचार उठते है तो उनको ऐसे रोकिये !!

आज के समय में लोगो को अपने मन को निंयत्रित करना और उसमें उठते बुरे और अनुचित खयालात को रोक देना असंभव नहीं तो बेहद कठिन तो अवश्य ही है । आज मनुष्य के जीवन में परेशानियों और कठिनाइयों का अम्बार लगा हुआ है जिससे मनुष्य का मन भटकता ही रहता है। और बुरे कर्मो की तरफ बढ़ जाता है जैसे-जैसे समय बदल रहा है ठीक उसी तरह हमारी सोच-विचार,कर्तव्य और काम के तरीके में भी परिवर्तन आ रहा है। अधिकतर लोग दुर्भावानाओं से घिरे रहते हैं। अगर इनसे छुटकारा पाना है तो हनुमानजी का पूजन और ध्यान करे ! हनुमानजी बुरे विचारों को समाप्त कर हमारे मन को शुद्धता और पवित्रता प्रदान करते हैं।   

 तुलसी दास जी हनुमान चलीसा मै कहा है :=              
  महाबीर विक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमति के संगी।
                 
चोपाई का अर्थ ::::===
        हनुमानजी वीरता की साक्षात् प्रतीमा एवं शक्ति तथा बल पराक्रम की जीवंत मूर्ति है हनुमानजीने मन के अंदर रहे काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर आदि शत्रुओंपर विजय प्राप्त की थी इसलिए उन्हे महावीर कहते हैं । हमे सुमति दे, अच्छी बुध्दि प्रदान करें जो प्रभु कार्य में सहायक हो। इस पंक्ति के जप से साधक के सभी बुरे विचार, कुमति नष्ट हो जाती है और विचारों में शुद्धता आती है। भगवान हनुमान महावीर हैं अपने भक्तों की कुमति को दूर करके उन्हें शुद्ध विचारों वाला बना देते हैं। हनुमानजी का ध्यान हमें पूरी तरह धार्मिक बनाता है साथ ही हमारे जीवन की सभी समस्याओं का प्रभाव कम कर देता है  !!