वेदों का संक्षिप्त विवरण,सर्व प्रथम जगत का शुभारम्भ एवं इसके पाठ का फलश्रुति ~ Balaji Kripa

Saturday, 11 October 2014

वेदों का संक्षिप्त विवरण,सर्व प्रथम जगत का शुभारम्भ एवं इसके पाठ का फलश्रुति


सृष्टि से पूर्व सर्व प्रथम एक मात्र नारायण ही थे .न ब्रह्मा और न ही ईशान (शिव) थे .इनके अतिरिक्त प्रथ्वी,वायु,आकाश,नक्षत्र एवं सूर्य आदि में से कोई नहीं था .वह एकमात्र अकेला 'नर' (विराट पुरुष) ही था .ध्यान में स्थित तपस्यारत उस नर (विराट पुरुष ) के ललाट (मस्तक) से स्वेद (पसीना) गिरा.वही यह आपः (जल) हुआ.वही यह (आपः) हमारे लिए हिरण्यमय अत्र रूप है और उससे ही चार मुख वाले ब्रह्मा का प्राकट्य हुआ .उस (ब्रह्मा) ने ध्यानावस्था में पर्वाभिमुख होकर 'भूः' व्याहति,गायत्री छन्द,ऋग्वेद; पश्चिमाभिमुख होकर 'भू' व्याहति,त्रिष्टुप छन्द एवं यजुर्वेद ; उत्तराभिमुख होकर 'भुवः' व्याहिती,जगती छन्द एवं सामवेद तथा अंत में दक्षिणाभिमुख होकर 'जनत'(सम्भवतः जनः ) व्याहति ,अनुष्टुप छन्द एवं अथर्ववेद को प्रकट किया ! वे अविनाशी देव (विराट पुरुष ) जिनके कि सहस्त्रों सिर एवं सहस्त्रों नेत्र हैं.सम्पूर्ण विश्व को प्रादुर्भूत करने वाले वे परमदेव हमेशा सर्वत्र विद्यमान रहते हैं .(वे देव  ) नारायण एवं हरी आदि शब्द से भी प्रख्यात हैं .उन ऋषि स्वरूप सम्पूर्ण जगत के स्वामी समुद्रशायी विश्व-रूप परम विराट पुरुष का आश्रय प्राप्त करके ही यह संसार जीवित -जाग्रत है .( यह विराट पुरुष ) कमल कोश के समान ह्र्दय में अधोमुख होकर एक कोश के रूप मैं लटका है, जो अपनी शक्तियों से ही  सभी कुछ करता रहता है. उसके  मध्य में श्रेष्ठ अग्रि स्थित है,जिसकी  ज्वाला चारों ओर मुखवाली अर्थात लपकने वाली है.उसके मध्य में ही वहिशिखा है ,जो 'अणिय' के ऊपर प्रतिष्ठित है .उस श्रेस्ठ शिखा के मध्य में ही वह विराट पुरुष परब्रह्म स्तिथ है.वह ही ब्रह्मा,शिव,अक्षर (ब्रह्म ) तथा परम प्रभु स्वयं प्रकाश रूप है.
|जो ब्राह्मण (साधक ) इसका पाठ करता है,वह यदि अश्रोत्रिय है,तो श्रोत्रिय हो जाता है .अनुपनीत है,तो उपनीत अर्थात यज्ञोपवीत धारण करने वाला हो जाता है.वह अग्नि,वायु,सूर्य,सोम और सत्य  कि तरह पवित्र हो जाता है,उसे समस्त देवगण जानने लगते हैं तथा सातवीं पीढ़ी तक मनुष्यों को पवित्र कर देता है एवं वह एवं वह अमरत्व को निश्चयपूर्वक प्राप्त कर लेता है,ऐसा ही  भगवान हिरण्यगर्भ ने कहा है. ||७||

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