ज्योतिष मै प्रेतादिक संकट का योग कैसे बनता है और उसको दूर करने के उपाय !! ~ Balaji Kripa

Thursday, 23 October 2014

ज्योतिष मै प्रेतादिक संकट का योग कैसे बनता है और उसको दूर करने के उपाय !!


हम जहां रहते हैं वहां कई ऐसी शक्तियां होती हैं, जो हमें दिखाई नहीं देतीं किंतु बहुधा हम पर प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं जिससे हमारा जीवन अस्त-व्यस्त हो उठता है और हम दिशाहीन हो जाते हैं। इन अदृश्य शक्तियों को ही आम जन प्रेत बाधाओं की संज्ञा देते हैं। भारतीय ज्योतिष में ऐसे कतिपय योगों का उल्लेख है जिनके घटित होने की स्थिति में ये शक्तियां शक्रिय हो उठती हैं और उन योगों के जातकों के जीवन पर अपना प्रतिकूल प्रभाव डाल देती हैं। यहां प्रेत बाधाओं के कुछ ऐसे ही प्रमुख योगों तथा उनसे बचाव के उपायों का उल्लेख प्रस्तुत है।
ग्रहों के प्रभाव से योग :=
लग्न में राहु तथा चंद्र और त्रिकोण में मंगल व शनि हों, तो जातक को प्रेत प्रदत्त पीड़ा होती है।
चंद्र पाप ग्रह से दृष्ट हो, शनि सप्तम में हो तथा कोई शुभ ग्रह चर राशि में हो, तो प्रेत  से पीड़ा होती है।
शनि तथा राहु लग्न में हो, तो जातक को प्रेत  सताता है।
लग्नेश या चंद्र से युक्त राहु लग्न में हो, तो प्रेत योग होता है।
यदि दशम भाव का स्वामी आठवें या एकादश भाव में हो और संबंधित भाव के स्वामी से दृष्ट हो, तो उस स्थिति में भी प्रेत योग होता है।
प्रेतादिक संकट योग  का प्रभाव :=
उक्त योगों के प्रभाव से जातकों के आचरण और व्यवहार में बदलाव आने लगता है। वो किसी की बात ना तो सुनना पसन्द करते है ना मानना और अपने मन की करते है तथा कुछ लोग चारित्रिक रूप से भ्रष्ट होजाते है, कुछ मानसिक और शारीरिक बीमारियों के शिकार हो जाते है और मृत्यु तक पहुच जाते है 
योगों के दुष्प्रभावों से मुक्ति हेतु ये उपाय करने चाहिए।
                                        
                                                        दुर्गा सप्तशती से

संकट निवारण हेतु पान, पुष्प, फल, हल्दी, पायस एवं इलाइची के हवन से दुर्गासप्तशती के बारहवें अध्याय के तेरहवें श्लोक सर्वाबाधा..न संशयः मंत्र से संपुटित नवचंडी यज्ञ कराएं।
दुर्गा सप्तशती के चौथे अध्याय के चौबीसवें श्लोक का पाठ करते हुए पलाश की समिधा से घृत और सीलाभिष की आहुति दें, कष्टों से रक्षा होगी।
शक्ति तथा सफलता की प्राप्ति हेतुग्यारहवें अध्याय के ग्यारहवें श्लोक सृष्टि स्थिति विनाशानां..का उच्चारण करते हुए घी की आहुतियां दें।
 शत्रु शमन हेतु सरसों, काली मिर्च, दालचीनी तथा जायफल की हवि देकर अध्याय के उनचालीसवें श्लोक का संपुटित प्रयोग तथा हवन कराएं।
 महाकाली या भद्रकाली माता के मंत्रानुष्ठान कराएं और कार्यस्थल या घर पर हवन कराएं।
                   
                                                     अन्य पूजनदेवो के पूजन से उपाय

महामृत्युंजय मंत्र का विधिवत्‌ अनुष्ठान कराएं। जप के पश्चात्‌ हवन अवश्य कराएं।
गुग्गुल का धूप देते हुए हनुमान चालीस तथा बजरंग बाण का पाठ करें।
उग्र देवी या देवता के मंदिर में नियमित श्रमदान करें, सेवाएं दें तथा साफ सफाई करें।
यदि घर के छोटे बच्चे पीड़ित हों, तो मोर पंख को पूरा जलाकर उसकी राख बना लें और उस राख से बच्चे को नियमित रूप से तिलक लगाएं तथा थोड़ी-सी राख चटा दें।

नोट := यदि फिर भी इन उपायों से संतुष्टी नहीं मिलती है तो  बालाजी कृपा से सम्पर्क करे !!

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