भगवान शंकर ने केसे लिया हनुमान बालाजी अवतार !! ~ Balaji Kripa

Sunday, 19 October 2014

भगवान शंकर ने केसे लिया हनुमान बालाजी अवतार !!


भगवान शंकर भगवती सती के साथ कैलाश के एक उत्तम शिखर पर विराजमान थे ! व्रक्ष की घनी छाया मे उनके शरीर पर भूरे रंग की जटाँए बिखरी हुई थी ! हाथ मे रुद्राक्ष की माला, गले में साप और सामने ही नदी पर बैठा हुआ था ! उनके अनुचर वहाँ से कुछ दूर, परस्पर अनेको प्रकार की क्रीडाएँ कर रहे थे ! उनके सिर पर चन्द्रमा और गंगा की धारा रहने के कारण तीसरे नेत्र की विषम ज्वाला शान्त थी ! ललाट का भस्म बडा ही सुहावना मालूम पड रहा था ! एकाएक राम-राम कहते हुए उन्होने समाधि भग की ! सती ने देखा कि भगवान शंकर एक विचित्र भाव से उनकी और देख रहे है ! वे उनके सामने खडी हो गयी और हाथ जोडकर कहने लगी स्वामी इस समय मै आपकी क्या सेवा करुँ, क्या आप कुछ कहना चाहते है ! भगवान शंकर ने कहा-प्रिये आज मेरे मन मे एक शुभ संकल्प उठ रहा है ! मै सोच रहा हूँ कि जिनका मै निरन्तर ध्यान किया करता हूँ, जिनके नामो को रट-रटकर गद-गद होता रहता हूँ, जिनके वास्तविक स्वरुप का स्मरण करके मै समाधिस्थ हो जाता हूँ, वे ही मेरे भगवान वे ही मेरे प्रभु अवतार ग्रहण करके संसार मे आ रहे है ! सभी देवता उनके साथ अवतार लेकर उनकी सेवा का सुयोग प्राप्त करना चाहते है, तब मै ही क्यो वंचित रहूँ ? मै भी वही चलू और उन्की सेवा करके अपनी युग - युग की लालसा पूर्ण करुँ, अपने जीवन को सफल बनाऊँ ! भगवान संकर की यह बात सुनकर सती सहसा यह न सोच सकी कि इस समय क्या उचित है और क्या अनुचित ! उनके मन मे दो तरह के भाव उठ रहे थे ! एक तो यह कि मेरे पतिदेव की अभिलाषा पूर्ण होनी चाहिए और दूसरा यह कि मुझसे उनका वियोग न होगा ! उन्होने कुछ सोचकर कहा-प्रभो ! आपका संकल्प बडा ही सुन्दर है - जैसे ही मै अपने इष्टदेव की सेवा करना चाहती हूँ वैसे ही आप भी अपने इष्टदेव की सेवा करना चाहते है ! परन्तु वियोग के भय से मेरा ह्रदय न जाने कैसा हुआ जा रहा है ! आप क्रपा करके मुझे ऐसी शक्ति दे कि मेरा ह्रदय आपके सुख मे ही सुख मानने लगे ! एक बात और है, भगवान का अवतार इस बार रावण को मारने के लिए हो रहा है , वह आपका बडा भक्त है ! उसने अपने सिर तक काटकर आपको चढाएँ है ! ऐसी स्थिति मे आप उसको मारने के काम मे कैसे सहायता कर सकते है ! भगवान शंकर हँसने लगे ! उन्होने कहा - देवी ! तुम बडी भोली हो ! इसमें वियोग की तो कोई बात ही नही है ! मै एक रुप से अवतीर्ण होकर उनकी सेवाएँ करुँगा और एक रुप से तुम्हारे साथ रहकर तुम्हे उनकी लीलाएँ दिखाउँगा और समय पर उनके पास जाकर उनकी स्तुति-प्रार्थना करुँगा ! रह गई तुम्हारी दुसरी बात, सो तो रावण ने मेरी भक्ति की है, वैसी ही उसने मेरे अंश की अवहेलना की है ! तुम तो जानती ही हो, मै ग्यारह स्वरुपो मे रहता हूँ ! जब उसने अपने दस सिर चढाकर मेरी पूजा की थी, तब उसने मेरे एक अंश को बिना पूजा किए ही छोड दिया था ! अब मै उसी अंश के रुप मे उसके विरुध्द युध्द कर सकता हूँ और अपने प्रभु की सेवा भी कर सकता हूँ ! मैने वायु देवता के द्वारा अंजना के गर्भ से अवतार लेने का निश्चय किया है ! अब तो तुम्हारे मन मे कोई दुख नही है ना ये सुनकर भगवती सती प्रसन्न हो गई !!

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