माला के भेद ,उसके लक्षण सूत्र तथा पिरोने के प्रकार कौन-२ से अक्षर ,प्रतिष्ठा ,अधिदेवता और इसका फल !! ~ Balaji Kripa

Thursday, 2 October 2014

माला के भेद ,उसके लक्षण सूत्र तथा पिरोने के प्रकार कौन-२ से अक्षर ,प्रतिष्ठा ,अधिदेवता और इसका फल !!

यह अक्ष माला प्रबाल ,मूर्ति ,स्फटिक ,संख ,चांदी ,स्वर्ण ,चन्दन,पुत्र जीविका ,कमल एवम रुद्राक्ष यह दस प्रकार की होती है .यह 'अ' से लेकर 'क्ष' तक के अक्षरों से युक्त विधि पूर्वक धारण की जाती हैं .स्वर्ण ,चांदी और तम्बा निर्मित तीन सूत्र होते हैं. इसमें स्वर्ण सामने (मनकों के )मुख विवर (छिद्र )में ,दाहिने भाग में चांदी तथा बाये हिस्से में तम्बा उसके मुख में मुख एवम पूँछ के साथ पूँछ क्रम नियोजित करना चाहिये.जो उसके अन्दर का सूत्र है वही ब्रह्म है ,जो दाहिने भाग में है वही सैव है जो बायें हिस्से में है वही वैष्णव है ,जो मुख है ,वही सरस्वती है.जो पूँछ है,वही गायत्री है .जो छिद्र है,वही विद्या है .जो गाँठ है वही प्राकृति है जो स्वर है वही सात्विक होने के कारण धवल अर्थात सुभ्र -स्वेत है और जो स्पर्श है वही पीत है तथा जो परा है वे रक्त वर्ण युक्त है इसके अनंतर उसे पांच गौओं के दूध से तथा पंच गव्य (गौमूत्र ,गौमय,गौदुग्ध,गौदध,गौघ्रत ) से शोधित करके पुनः पंच गव्य (नन्दादि पांच गौओं के दही-मात्र से )एवम गंध मिश्रित जल से भली प्रकार स्नान करवा कर ॐकार का उच्चारण करते हुए पत्तों की कूची द्वार जल छिड़क कर के (मंत्र शास्त्र में प्रख्यात तत्कोल,उसीर ,कपूर अदि )अष्ट गंधों से लेपन करके 'मणशिला' नामक धातु पर प्रतिष्ठित कर अक्षत -पुष्पों से पूजन करें .प्रतिएक अक्ष (मनके )को 'अ ' से लेकर 'क्ष' तक के अक्षरों द्वारा क्रमशः भावित करें.हे आकार तुम मृत्यु को जीतने वाले हो ,सर्ववियापी इस प्रथम मनके में स्थित हो जाओ .हे आकार! तुम आकर्षण शक्ति से ओत-प्रोत सर्वत्र संव्याप्त हो ,इस दुसरे अक्ष में प्रविष्ट हो जाओ . हे इकार! तुम पुष्टि प्रदाता हो तथा क्षोभ रहित हो तीसरे अक्ष में प्रतिष्ठित हो जाओ .हे ईकार! तुम वाणी को प्राज्जलता प्रदान करने वाले हो तथा निर्मल हो इस चौथे अक्ष में  प्रतिष्ठित हो जाओ .हे उकार ! तुम सभी को सभी तरह से बल-प्रतादा हो एवम सारयुक्तों में सर्वश्रेस्ठ हो पांचवे अक्ष में  प्रतिष्ठित हो जाओ .हे ऊकार !  तुम उच्चारण करने वाले तथा दुस्सह अर्थात न सहे जा सकने वाले हो ,इस छठे अक्ष में स्थित हो जाओ ,हे ऋकार! तुम संक्षोभ अर्थात चल-चित्तता को करने वाले एवम चंचल हो इस सातवें अक्ष में स्थित हो जाओ.हे ऋदकार ! तुम सम्मोहित करने वाले एवम उज्ज्वल हो इस आठवें अक्ष में स्थित हो जाओ.हे ल्रिकार !तुम विद्वेष को प्रकट कर देने वाले एवम सभी कुछ जानने वाले अत्यंत गोपनीय हो,इस नौवें अक्ष में स्थित हो जाओ.हे ल्रिदकार! तुम मोह करी हो इस दशवें अक्ष में स्थित हो जाओ.हे एकार !तुम सभी को वश में करने वाले तथा शुद्ध सत्य हो ,इस ग्यारवें अक्ष में  प्रतिष्ठित हो जाओ.हे ऐकार  !  तुम शुद्ध एवम सात्विक हो तथा पुरषों को अपने वश में करने वाले हो इस बारवें अक्ष में  प्रतिष्ठित हो जाओ.हे ओकार ! तुम अखिल शब्द समूह हो एवम नित्य पवित्र हो इस तेरवें अक्ष में  प्रतिष्ठित हो जाओ.हे औकार ! तुम भी अक्षर समूह रूप सभी को वश में करने वाले तथा शांत स्वरुप हो इस चौदहवें अक्ष में  प्रतिष्ठित हो जाओ.हे अंकार !हांथी अदि को अपने वश में करने वाले तथा एवम मोहित करने वाले हो ,पंद्रहवे अक्ष में  प्रतिष्ठित हो जाओ.हे अ:कार ! तुम म्रत्यु विनाशक एवम अति भयानक हो इस सोलहवे अक्ष में  प्रतिष्ठित हो जाओ.हे ककार ! तुम सम्पूर्ण विषो को बिनष्ट करने वाले एवम कल्याण प्रदाता हो इस सत्राहवे अक्ष में  प्रतिष्ठित हो जाओ.हे खकार ! तुम सभी को क्षुभित करने वाले एवम सर्वत्र व्याप्त रहते हो इस अट्ठारहवे अक्ष में  प्रतिष्ठित हो जाओ.हे गकार ! तुम सभी विघ्नों को शांत करने वाले एवम बड़ों में भी अति विशाल हो इस उन्नीसवे अक्ष में  प्रतिष्ठित हो जाओ.हे घकार ! तुम सौभाग्य प्रदाता और स्तम्भन गति को अवरुद्ध करने वाले करता हो इस बीसवे अक्ष में  प्रतिष्ठित हो जाओ.हे डंकार ! तुम सभी विषयों के विनाशक एवम उग्र भयानक हो ,इस इक्कीसवे अक्ष में  प्रतिष्ठित हो जाओ.हे चकार ! तुम अभिचार नाशक तथा अत्यंत क्रूर हो ,इस बईसवे अक्ष में  प्रतिष्ठित हो जाओ.हे छकार !तुम  भुत विनाशक एवम भयानक हो ,इस तेईसवे अक्ष में  प्रतिष्ठित हो जाओ.हे जकार ! तुम कर्त्या डाकिनी अदि के नाशक एवम दुरधर्ष हो  इस चौबीसवें अक्ष में  प्रतिष्ठित हो जाओ.हे झकार ! तुम भूत नाशक हो इस पच्चीसवें अक्ष में  प्रतिष्ठित हो जाओ.हे ञकार ! तुम म्रत्यु को मथित कर देने वाले हो इस छब्बीसवें अक्ष में  प्रतिष्ठित हो जाओ.हे टकार ! तुम समस्त रोगों के विनाशक एवम सुन्दर हो इस सत्ताईसवें अक्ष में  प्रतिष्ठित हो जाओ.हे  ठकार ! तुम चन्द्र स्वरुप इस अट्टाइशवें अक्ष में  प्रतिष्ठित हो जाओ.हे डकार ! तुम गरुण संद्रश विष नाशक तथा सुन्दर हो इस उनतीसवें अक्ष में  प्रतिष्ठित हो जाओ.हे ढकार ! तुम समस्त प्रकार के सम्पत्ति प्रदाता हो एवम सौम्य शालीन हो इस तीसवें अक्ष में  प्रतिष्ठित हो जाओ.हे णकार ! तुम सभी सिद्धयों के प्रदाता हो एवम मोहित करने वाले हो इस एकत्तीसवें अक्ष में  प्रतिष्ठित हो जाओ.हे तकार ! तुम धन एवम धन्य अदि सम्प्पतियों के देने वाले एवम सदैव प्रसन्न मय हो इस बत्तीसवें अक्ष में  प्रतिष्ठित हो जाओ.हे थकार ! तुम धर्म की प्राप्ति करने वाले एवम निर्मल हो इस तेंतीसवें अक्ष में  प्रतिष्ठित हो जाओ.हे दकार ! तुम पुष्टि करता एवम वृधि करता हो सुन्दर द्रष्टि गोचर होने वाले हो इस चौतीसवें अक्ष में  प्रतिष्ठित हो जाओ.हे धकार ! तुम विष एवम ज्वर विनाशक हो तथा बहुत विशाल भी हो इस पैतीसवें अक्ष में  प्रतिष्ठित हो जाओ.हे नकार ! तुम भोग मोक्ष -प्रदाता एवम शांत स्वरुप हो इस छब्बीसवें अक्ष में  प्रतिष्ठित हो जाओ.हे पकार ! तुम विष और विघ्नों के नाशक एवम कल्याणकारी हो इस सैतीशवें अक्ष में  प्रतिष्ठित हो जाओ.हे फकार ! तुम अणिमा ,महिमा एवम गरिमा अदि अष्ट सिद्धयों से सम्पन्न एवम प्रकाशमय हो इस अडतीसवें अक्ष में  प्रतिष्ठित हो जाओ.हे वकार ! तुम समस्त दोषों के हरण करता एवम सौंदर्य मय हो इस उनतालीसवें अक्ष में  प्रतिष्ठित हो जाओ.हे भकार ! तुम भुत बाधा का समनं करने वाले भयानक हो इस चालीशवें अक्ष में  प्रतिष्ठित हो जाओ.हे मकार !तुम द्वेष करने वाले को सम्मोहित कर लेने वाले हो इस इकतालीसवें अक्ष में  प्रतिष्ठित हो जाओ.हे यकार !तुम सर्वत्र स्म्व्यप्त एवम परम पवित्र हो इस बियालिसवें अक्ष में  प्रतिष्ठित हो जाओ,हे रकार ! तुम दाह उत्पन्न करने विकृत हो इस तेतालीसवें अक्ष में  प्रतिष्ठित हो जाओ.हे लकार ! तुम विश्व का पोषण करने वाले एवम  तेजस्वी हो इस चौवालिसवें अक्ष में  प्रतिष्ठित हो जाओ.हे वकार ! तुम सबको तृप्त करने वाले एवम निर्मल हो इस पैतालीसवें अक्ष में  प्रतिष्ठित हो जाओ.हे शकार ! तुम सभी तरह के फलों के देने वाले एवम पवित्र हो इस छियालिसवें अक्ष में  प्रतिष्ठित हो जाओ.हे षकार ! तुम धर्म,अर्थ एवम काम को देने वाले तथा स्वेत- सुभ्र हो इस सैतालीसवें अक्ष में  प्रतिष्ठित हो जाओ.हे सकार ! तुम समस्त वस्तुओं के कारण सभी वर्णों से सम्बन्धित हो इस अड़तालीस वें अक्ष में  प्रतिष्ठित हो जाओ.हे हकार ! तुम समस्त अक्षरों या साहित्य के स्वरुप वाले एवम निर्मल हो इस उञ्चासवें अक्ष में  प्रतिष्ठित हो जाओ.लकार ! तुम सम्पूर्ण शक्तिओं के प्रदाता एवम प्रधान हो इस पचासवें अक्ष में  प्रतिष्ठित हो जाओ.हे क्षकार ! तुम परष्पर तत्व को बतलाने एवम परम ज्योति स्वरुप हो इस शिखा मणि  में मेरु माला या प्रधान मनका के प्रति निधि के रूप में   अक्ष में  प्रतिष्ठित हो जाओ.इसके पश्चात् बोले जो देवता प्रथ्वी में विचरण करने वाले हैं उन्हें हम प्रणाम करते हैं .हाय भगवान् मेरे द्वारा इस माला को स्वीकार करने का समर्थन करें .इसकी प्रतिष्ठा हेतु पित्र गण अनुमोदन करें इस ज्ञान रूपा अक्ष मालिका को प्राप्त कर पितर अनुमोदन करें.
जो देवता अन्तरिक्ष में निवास करते हैं उन्हें नमन है वे भगवान् पितरों के साथ इस ज्ञानमय माला में प्रतिष्ठा  हों और इसकी शोभा के लिया अनुमोदन करें.
जो देवता स्वर्ग में निवास करते हैं वो ज्ञान स्वरुपणी अक्षमलिका में स्तिथ हों वर प्रदाता बनकर पितोरों के सहित इसकी शोभा हेतु अनुमोदन करें (शोभा का अर्थ प्राण-प्रतिष्ठा है )
इस लोक में (साथ करोड़ के लगभग )जो मन्त्र हैं और जो (चौसठ कला स्वरुप ) विद्याऐ हैं उन्हें नमस्कार कर है उनकी शक्तियां इसमें प्रतिष्टित हों .
जो ब्रह्मा ,विष्णु ,रूद्र हैं उन्हें बारम्बार नमन है .उनके प्रक्रम नमस्कार है.उनका वीर्य इसमें स्तिथ हो .
जो स्न्ख्यादिक तत्व हैं उन्हें नमस्कार आप लोग वृधि प्रदान करें विरोध दुर करें .
जो शैव् वैष्णव एवम शक्त सैकड़ों एवम सहस्त्रों की संख्यां में निवास करतें हैं उन्हें नमस्कार कर हैं वे सभी भगवान हम सभी पर कृपा करें.
म्रत्यु की जो आश्रित शक्तियां हैं इन्हें नमस्कार है आप सभी इस नमन-बंदन से स्तुति से प्रसन्न हों इस अक्ष मलिका द्वरा अपने उपासकों को सुख प्रदान करें.
अक्षमलिका की स्तुति करने के पश्चात् उसे उठाकर परिक्रमा करके हे भगवति मंत्र मात्र के हे अक्ष माले तुम सभी को अपने वश में करने वाली हो तुम को नमन वंदन .

1 comment:

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