सूर्य देव से नेत्र रोग दूर करने की प्रार्थना तथा इस पाठ की महत्वता !! ~ Balaji Kripa

Sunday, 12 October 2014

सूर्य देव से नेत्र रोग दूर करने की प्रार्थना तथा इस पाठ की महत्वता !!


अब पाठ मात्र से सिद्ध हो जाने वाली चाक्षुषी विद्या कि व्याख्या करते है .यह विधा नेत्र के रोगों को पूर्णतया विनष्ट करने में समर्थ है .इससे नेत्र तजोमय हो जाते है .इस चाक्षुषी विद्या के मंत्र -द्रष्टा ऋषि अहिर्बुन्ध्य है . छन्द -गायत्री है और देवता -सूर्य (सविता ) भगवान हैं .नेत्र रोग के निवारार्थ इसका विनियोग किया जाता है .हे चक्षु के अभिमानी सूर्य देवता ! आप चक्षु में चक्षु के तेजोमय स्वरुप में प्रतिष्ठित हो जाये .आप मेरी रक्षा करें,मेरे नेत्र रोगों का शीघ्र शमन करें,मुझे अपना स्वर्ण-सद्रश दिव्य तेज (प्रकाश ) द्रष्टिगोचर करा दें.जिससे कि में अँधा न हो होऊं.कृपा करके वैसा ही कोई उपाय करें .(हम सभी का ) कल्याण करें .मेरे  द्वारा पूर्वजन्म में अर्जित पापों का ,जो दर्शंशक्ति के अवरोधक हैं,उन सभी को समूल नष्ट कर दें.नेत्रों को दिव्य तेजोमय बनाने वाले दिव्य प्रकाश स्वरुप भगवान भास्कर के लिए नमन-वंदन है.ॐ कार रूप भगवान करुणामय अमृतस्वरुप को नमस्कार है.भगवान सूर्य (सविता )देवता को नमस्कार है.महान श्रेष्ठतम स्वरुप को नमस्कार है. रजोगुण एवं तमोगुण आश्रय  स्वरूप प्रदाता  भगवान सूर्य (सविता देव ) को प्रणाम है.हे भगवान ! आप हम सभी को असत से सत कि ओर ले चलें.अज्ञानरूपी अंधकार से ज्ञानरूपी प्रकाश कि ओर गमन करायें.म्रत्यु से अमरत्व कि ओर ले चलें.जो विद्वान् मनीषी ब्राह्मण इस चाक्षुषीविद्या का नित्य प्रति पाठ करता है ,उसे चक्षु से सम्बन्धित किसी भी तरह के रोग नहीं होते.उसके कुल में कोई अँधा नहीं होता है.इस विद्या को आठ ब्राह्मणों (ब्रह्मनिष्टों ) को ग्रहण (याद )करा देने पर यह विद्या सिद्ध हो जाती है .   ||१||
भगवन भास्कर सच्चिदानन्द स्वरुप हैं,सम्पूर्ण जगत जिनका स्वरुप है,जो तीनो कालों को जानने वाले तथा अपनी किरणों से शोभायमान हैं,जो प्रकाशस्वरूप,हिरण्यमय पुरुषरूप में तप्त हो रहे हैं,इस सम्पूर्ण विश्व को प्रकट करने वाले हैं,उन प्रचण्ड प्रकाश से युक्त भगवान सविता देवता को हम सभी नमस्कार करते हैं.यह भगवान सूर्य नारायण सम्पूर्ण प्रजाओं (प्राणियों ) के सामने प्रत्यक्ष रूप में उदित हो रहे हैं. ||२||
भगवान आदित्य को नमन-वंदन हैं.उनकी प्रभा दिन का वहन करने वाली है .हम उन सूर्य देव के लिए श्रेष्ठ आहुति प्रदान करते हैं.प्रियमेधा आदि समस्त ऋषिगण श्रेष्ठ पंखों से युक्त पक्षी-रूप में भगवान सूर्य देव के समक्ष उपस्थित होकर इस प्रकार निवेदन करने लगे-हाय भगवान ! इस अज्ञान रूपी अंधकार को हम सभी से दूर कर दें,हमारे नेत्रों को प्रकाश से परिपूर्ण बना दें और तमोमय बंधन में आबद्ध हुए हम सभी प्राणिजगत को अपना दिव्य तेज प्रदान कर मुक्त करने कि कृपा करें.पुण्डरीकाक्ष भगवान को नमस्कार है. पुष्करेक्षण,अमलेक्षण,कमलेक्षण तथा विश्वरूप को प्रणाम है.भगवान महाविष्णु को नमन-वंदन है.||३||

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