सूर्य क्या है तथा उनकी प्रार्थना केसे करनी चाहिए और प्रार्थना से क्या फल प्राप्त होता है !! ~ Balaji Kripa

Friday, 17 October 2014

सूर्य क्या है तथा उनकी प्रार्थना केसे करनी चाहिए और प्रार्थना से क्या फल प्राप्त होता है !!

 
कुछ भक्त रोजाना सूर्य देव को जल प्रदान करते है और उनकी पूजा करते है ! परन्तु उनको सूर्य देव के विषय में पूर्ण ज्ञान नहीं होता हैं !अब हम सूर्यदेव से सम्बंधित अथर्वाडिंगरस मंत्रो की व्याख्या करेंगे ! इस मंत्र के ऋषि ब्रह्मा ,छन्द गायत्री और आदित्य देवता है,'हंस '' सो अहम अग्रिनारायण 'से युक्त बीज तथा ह्ल्लेखा (उत्सुकता )शक्ति है .वियत (आकाश )आदि स्रष्टि से संबध कीलक है .इस मंत्र का विनियोग चारों पुरुषार्थ की सिद्धि हेतु किया जाता है षट स्वरों पर बीज के साथ प्रतिष्ठित ,षडंगयुक्त ,लालकमल ,पर अवस्थित ,सात अश्र्व वाले रथ पर आरुढ़ ,हिरण्यवर्ण ,चतुर्भुजधारी ,चारों हांथो में से दो कमल तथा दो में वरमुद्रा और अभयमुद्रा धारण करने वाले ,कालचक्र के प्रेरक भगवान् सूर्यदेव को जो इस रूप में जानता है,वही ब्राह्मण (ब्रह्मवेत्ता) है !
सूर्य देव की प्रार्थना :=
जो प्रणवरूप में सच्चिदानंद परमात्मा भूः ,भुवः , स्वः रूप त्रिलोक में संव्याप्त हैं .समस्त स्रष्टि के उत्पादनकर्ता उन सवितादेव के सर्वोत्तम तेज का हम ध्यान करते हैं, जो हमारी बुद्धियों को प्रेरणा प्रदान करें ! सूर्य देव समस्त जड़ और चेतन जगत् कि आत्मा हैं !सूर्य से भी प्राणियों की उत्पत्ति होती है .सूर्य से ही यज्ञ,पर्जन्य ,अन्न और आत्मा (चेतना) का प्रादुर्भाव होता है ! हे आदित्य देव ! हम आपके प्रति नमस्कार करते हैं !आप ही प्रत्यक्ष कर्मों के कर्त्ता हैं, आप ही प्रत्यक्ष ब्रह्मा ,विष्णु एवम् रुद्ररूप हैं, आप ही ऋक , यजुष् ,साम और अथर्व (चतुर्वेद) स्वरुप हैं, आप ही समस्त छन्दों के प्रत्यक्ष रूप हैं !सूर्य देव और मित्र देवता को नमस्कार है,हे देव ! म्रत्यु से हमें सुरक्षित रखें .संसार के कारणस्वरुप तथा दीप्तिमान सूर्यदेव को नमस्कार है, सूर्य से सब जड़-चेतन प्राणियों को प्राकट्य, पालन-पोषण होता है तथा अंत में उन्हीं में लय हो जाता है सविता देव हमारे नेत्र हैं सबके धारणकर्ता आदित्यदेव हमरी आँखों को देखने की सामर्थ्य प्रदान करें आगे-पीछे ,उत्तर-बायें और दक्षिण-दायें भाग में सवितादेव हैं, सविता देव हमारे लिए सभी अभीष्ट पदार्थों को उत्पन्न करें ! वे हमें दीर्घायुष्य प्रदान करें !
सूर्य देव मानव शरीर और संसार में किस प्रकार उपस्थित है :=
आदित्य से ही वायु ,भूमि ,जल और ज्योति पैदा होती है,उन्ही से आकाश और  दिशाओं की उत्पत्ति होती है .उन्ही से देवताओ और वेदों का प्राकट्य होता है ! आदित्यदेव ही इस ब्रह्मांड को तपाते है,यह आदित्य ही ब्रह्म है, यही अन्तःकरण ( चतुष्टया ),मन ,बुधि ,चित्त ,और अहंकाररूप है,यह आदित्यदेव ही प्राण,अपान ,समान ,उदान और व्यान-इन पंच प्राणों के रूप में प्रतिष्ठित है ,यही श्रवणेन्द्रीय ,त्वचा ,नेत्र ,जिह्वा और घ्राण -इन पंच इन्द्रियरुप में क्रियाशील है,वाक ,हांथ ,पैर , गुदा ,और उपस्थ -इन पांच कर्मेन्द्रिया के रूप में भी यही है ! आदित्य ही शब्द ,स्पर्श ,रूप ,रस ,गंध-पांच ज्ञानेन्द्रियो कि तन्मात्रा तथा वचन ,आदान ,गमन ,मलविसर्जन और आनंद -पांच कर्मेन्द्रियो की तन्मात्रारूप है,यही आनंदमय ,ज्ञानमय ,तथा विज्ञानमय है !
सूर्य देव का मंत्र :=
'ॐ' यह प्रणव एकाक्षर ब्रह्म है 'घ्रणि:' और 'सूर्य:' यह दो-दो अक्षरों के मंत्र हैं तथा 'आदित्य:' इसमें तीन अक्षर हैं. इन सबके सहयोग से सूर्य देव का आठ अक्षरों वाला महामंत्र बनता है ! ॐ घ्रणि सूर्याय नम:
प्रार्थना से प्राप्त फल :=
इस मंत्र का प्रतिदिन जप करने वाला ही ब्राह्मण कहलाता है !सूर्य भगवान् कि तरफ मुख करके इस मंत्र के जाप से बड़ी व्याधियों के के भय से मुक्ति मिलती है.उसका दारिद्र्य दूर हो जाता है.जो महाभाग प्रातःकाल इसका पाठ करता है ,वह भग्यवान् हो जाता है, उसे गाये आदि पशुधन की प्राप्ति तथा वेदार्थ-विद्या की प्राप्ति होती है .त्रिकाल संध्या करने से सैकड़ों यज्ञों का पुण्य फल मिलता है.सूर्यदेव का हस्तनक्षत्रकाल अर्थात आश्विन मास में जप करने वाला महाम्रतयु पर विजय प्राप्त कर लेता है, जो इसका ज्ञाता है वह भी अकालमृत्यु से पार हो जाता है !        

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