श्री हनुमान जी का बजरंग बाण ~ Balaji Kripa

Thursday, 2 October 2014

श्री हनुमान जी का बजरंग बाण


बजरंग बाण
दोहा
    निश्चय प्रेम प्रतीत ते, विनय करें सनमान ।
    तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्घ करैं हनुमान ।।
चौपाई
    जय हनुमन्त सन्त हितकारी । सुन लीजै प्रभु अरज हमारी ।।
    जन के काज विलम्ब न कीजै । आतुर दौरि महा सुख दीजै ।।
    जैसे कूदि सुन्धु वहि पारा । सुरसा बद पैठि विस्तारा ।।
    आगे जाई लंकिनी रोका । मारेहु लात गई सुर लोका ।।
    जाय विभीषण को सुख दीन्हा । सीता निरखि परम पद लीन्हा ।।
    बाग़ उजारी सिन्धु महं बोरा । अति आतुर जमकातर तोरा ।।
    अक्षय कुमार मारि संहारा । लूम लपेट लंक को जारा ।।
    लाह समान लंक जरि गई । जय जय धुनि सुरपुर में भई ।।
    अब विलम्ब केहि कारण स्वामी । कृपा करहु उन अन्तर्यामी ।।
    जय जय लक्ष्मण प्राण के दाता । आतुर होय दुख हरहु निपाता ।।
    जै गिरिधर जै जै सुखसागर । सुर समूह समरथ भटनागर ।।
    जय हनु हनु हनुमंत हठीले । बैरिहि मारु बज्र की कीले ।।
    गदा बज्र लै बैरिहिं मारो । महाराज प्रभु दास उबारो ।।
    ऊँ कार हुंकार महाप्रभु धावो । बज्र गदा हनु विलम्ब न लावो ।।
    ॐ ह्नीं ह्नीं ह्नीं हनुमंत कपीसा । ऊँ हुं हुं हनु अरि उर शीशा ।।
    सत्य होहु हरि शपथ पाय के । रामदूत धरु मारु जाय के ।।
    जय जय जय हनुमन्त अगाधा । दुःख पावत जन केहि अपराधा ।।
    पूजा जप तप नेम अचारा । नहिं जानत हौं दास तुम्हारा ।।
    वन उपवन, मग गिरि गृह माहीं । तुम्हरे बल हम डरपत नाहीं ।।
    पांय परों कर ज़ोरि मनावौं । यहि अवसर अब केहि गोहरावौं ।।
    जय अंजनि कुमार बलवन्ता । शंकर सुवन वीर हनुमन्ता ।।
    बदन कराल काल कुल घालक । राम सहाय सदा प्रति पालक ।।
    भूत प्रेत पिशाच निशाचर । अग्नि बेताल काल मारी मर ।।
    इन्हें मारु तोहिं शपथ राम की । राखु नाथ मरजाद नाम की ।।
    जनकसुता हरि दास कहावौ । ताकी शपथ विलम्ब न लावो ।।
    जय जय जय धुनि होत अकाशा । सुमिरत होत दुसह दुःख नाशा ।।
    चरण शरण कर ज़ोरि मनावौ । यहि अवसर अब केहि गौहरावौं ।।
    उठु उठु उठु चलु राम दुहाई । पांय परों कर ज़ोरि मनाई ।।
    ॐ चं चं चं चं चपल चलंता । ऊँ हनु हनु हनु हनु हनुमन्ता ।।
    ऊँ हं हं हांक देत कपि चंचल । ऊँ सं सं सहमि पराने खल दल ।।
    अपने जन को तुरत उबारो । सुमिरत होय आनन्द हमारो ।।
    यह बजरंग बाण जेहि मारै । ताहि कहो फिर कौन उबारै ।।
    पाठ करै बजरंग बाण की । हनुमत रक्षा करैं प्राम की ।।
    यह बजरंग बाण जो जापै । ताते भूत प्रेत सब कांपै ।।
    धूप देय अरु जपै हमेशा । ताके तन नहिं रहै कलेशा ।।
दोहा
    प्रेम प्रतीतहि कपि भजै, सदा धरैं उर ध्यान ।
    तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्घ करैं हनुमान ।।

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