श्री हनुमान बालाजी के रोम -रोम मे श्री राम !! ~ Balaji Kripa

Sunday, 19 October 2014

श्री हनुमान बालाजी के रोम -रोम मे श्री राम !!

जब रावण को मार कर श्री राम चन्द्र जी अयोध्या वापस आये और उनका राज्याभिषेक हुआ ! अपने राज्याभिषेक पर श्रीरामचंद्र जी ने सभी मुनियो एव ब्राह्मणो को दान दिए ! सुग्रीव, अंगद, विभीषण, जाम्बवंत आदि वानरो को भी अनेक बहुमूल्य रतनाभूषणादि भेट किए ! तभी माता जानकी जी ने हनुमान जी को अपने कण्ठ का मुक्ताहार प्रदान किया ! वह उन्होने पहन तो लिया किंतु उन्हे उसमें कुछ आनंद नही आ रहा था ! उन्होने उसे गले से उतार कर देखा परखा पर कही राम नाम नही मिला तो उन्होने उन मोतियो को तोड- तोड्कर देखना आरम्भ किया ! जब सभी लोगो ने हार और मोतियों को तोड़ते देखा तो लोगो मै आपस में  काना- फूँसी करने लगे ---"बंदर है न ! क्या जाने मोती की सार ? " विभीषण से न रहा गया ! वे बोले--" इस हार को इस प्रकार नष्ट - भ्रष्ट क्यो कर रहे हो कपीश्वर !
उन्हो ने कहा-" लंकेश्वर! देख रहा था कि इन दानो के भीतर ही मेरे प्रभु का नाम अंकित हो, बाहर तो कही मेरे प्रभु का नाम है ही नही | "
विभीषण ने कहा--"इन जड मोतियो मे तो प्रभु का नाम या झाकी नही है, किंतु आपकी इस पर्वत जैसी काया में वह है क्या ?" हनुमान बोले-"अवश्य, देखो ! " और उन्होने अपने दोनों हाथ वक्षस्थल पर रखकर तीक्ष्ण नखो के द्वारा चीरकर दिखा दिया | उनके रोम - रोम में भगवान श्री राम की छवि और नाम का अंकन था विभीषण उनके चरणो पर गिर पडे और सभी कंठ पुकार उठे --"परम भक्त हनुमान जी की जय, अंजनी पुत्र की जय" प्रभु के कर स्पर्श से उनका ह्रदय पूर्ववत स्वस्थ हो गया |

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