November 2014 ~ Balaji Kripa

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May Baba fullfill all the wishes of the Devotees.

जय श्रीराम

भगवान रामभक्त हनुमान की उपासना से जीवन के सारे कष्ट, संकट मिट जाते है। माना जाता है कि हनुमान एक ऐसे देवता है जो थोड़ी-सी प्रार्थना और पूजा से ही शीघ्र प्रसन्न हो जाते है। जहां मंगलवार और शनिवार का दिन इनके पूजन के लिए सर्वश्रेष्ठ हैं।

ॐ हं हनुमंतये नम:

मंगलवार और शनिवार के दिन हनुमान म‍ंदिर में जाकर रामभक्त हनुमान का गुणगान करें और उनसे अपने पापों के लिए क्षमायाचना करें।

Sunday, 30 November 2014

भगबान शिव ने अर्द्धनारीश्वर रूप क्यों रक्खा और उसका क्या प्रयोजन था !!

सृष्टि के प्रारंभ में जब ब्रह्माजी द्वारा रची गई मानसिक सृष्टि विस्तार न पा सकी, तब ब्रह्माजी को बहुत दुःख हुआ। उसी समय आकाशवाणी हुई ब्रह्मन्! अब मैथुनी सृष्टि करो। आकाशवाणी सुनकर ब्रह्माजी ने मैथुनी सृष्टि रचने का निश्चय तो कर लिया, किंतु उस समय तक नारियों की उत्पत्ति न होने के कारण वे अपने निश्चय में सफल नहीं हो सके। तब ब्रह्माजी ने सोचा कि परमेश्वर शिव की कृपा के बिना मैथुनी सृष्टि नहीं हो सकती। अतः वे उन्हें प्रसन्न करने के लिए कठोर तप करने लगे। बहुत दिनों तक ब्रह्माजी अपने हृदय में प्रेमपूर्वक महेश्वर शिव का ध्यान करते रहे। उनके तीव्र तप से प्रसन्न होकर भगवान उमा-महेश्वर ने उन्हें अर्द्धनारीश्वर रूप में दर्शन दिया। महेश्वर शिव ने कहा- पुत्र ब्रह्मा! तुमने प्रजाओं की वृद्धि के लिए जो कठिन तप किया है, उससे मैं परम प्रसन्न हूं। मैं तुम्हारी इच्छा अवश्य पूरी करूंगा। ऐसा कहकर शिवजी ने अपने शरीर के आधे भाग से उमा देवी को अलग कर दिया। ब्रह्मा ने कहा.-एक उचित सृष्टि निर्मित करने में अब तक मैं असफल रहा हूं। मैं अब स्त्री-पुरुष के समागम से मैं प्रजाओं को उत्पन्न कर सृष्टि का विस्तार करना चाहता हूं। परमेश्वरी शिवा ने अपनी भौंहों के मध्य भाग से अपने ही समान कांतिमती एक शक्ति प्रकट की। सृष्टि निर्माण के लिए शिव की वह शक्ति ब्रह्माजी की प्रार्थना के अनुसार दक्षकी पुत्री हो गई। इस प्रकार ब्रह्माजी को उपकृत कर तथा अनुपम शक्ति देकर देवी शिवा महादेव जी के शरीर में प्रविष्ट हो गईं, यही अर्द्धनारीश्वर शिव का रहस्य है और इसी से आगे सृष्टि का संचालन हो पाया, जिसके नियामक शिवशक्ति ही हैं।

ईश्वरकी कृपा से प्राप्त प्रसाद जिसे हम जानते भी नहीं है !!


मेरे अतिशय प्रिय पाठकगण ! मैं  अपनी धुन में  आपको अपने निजी अनुभव के आधार पर कलिकाल से ग्रस्त मानव  को "श्री हनुमान बालाजी " की विशेष कृपा से प्राप्त भक्ति करने के सरलतम साधन "भजन कीर्तन" की महत्ता समझाने में व्यस्त हूँ ! प्रियजन ! इस संसार में जन्म लेने के बाद अपने मानव तन से "जीव" जो कुछ भी करता है ,जो कुछ भी देखता है ,जो कुछ भी सीखता है और उसे जो कुछ भी "अनुभव" होते हैं ,वे सब ,सच पूछो तो, उस परम पिता परमात्मा की करुणा और अनुकम्पा जनित "कृपा" के कारण ही होते हैं !  दुर्भाग्य यह है क़ि अक्सर सफल मानव अपनी सफलताओं का श्रेय या तो अपनी निजी कार्यकुशलता को या किसी अन्य सांसारिक व्यक्ति या परिस्थिति के सह्योग को देता है ! अपने सम्पूर्ण जीवन में मैंने जो कुछ भी कर्म किये और उन कर्मों के फलस्वरूप मुझे जो भी यश-अपयश ,सुख-दुःख या अनुकूल-प्रतिकूल फल प्राप्त हुए ,वे सब ही मेरे प्यारे प्रभु की मुझ पर कीं हुईं असंख्य "कृपा अनुभवोँ" के उदहारण स्वरूप हैं ! मैं तो अपनी प्रत्येक सांस को, अपने हृदय की प्रत्येक धड़कन को उनकी "कृपा का  प्रसाद" ही समझता हूँ ! मेरे लिए ,संसार में मेरा जो है वह सब मुझे "हनुमत कृपा प्रसाद" स्वरुप ही प्राप्त हुआ है ! यदि आप भी हनुमत कृपा प्रसाद समझेगे तो तो परमपिता परमेश्वर की कृपा प्राप्त होगी और आप की हर साँस से प्रभु का नाम निकलेगा !!

श्री राम चरित मानस में हनुमान जी के गुणों का वर्णन !!

युगों युगों से असंख्य विश्वासी आस्तिकों को अपनी कृपा दृष्टि से अनुग्रहित कर उन्हें सभी दैहिक, दैविक भौतिक तापों से मुक्ति प्रदान करवाने वाले संकट मोचन, दुःख भंजन , "श्री हनुमान जी" को गोस्वामी तुलसीदास ने "राम चरित मानस " के बालकाण्ड के वन्दना प्रकरण में "महावीर" नाम से संबोधित किया है !उन्होंने श्री हनुमान जी की वन्दना में कहा है की मैं उस महावीर हनुमान की वंदना करता हूँ जिस की यशगाथा का गायन स्वयं मर्यादा- पुरुषोत्तम श्री राम चन्द्र जी ने अनेकों बार किया है - "राम जासु जस आप बखाना "
सुंदर काण्ड के आरंभिक श्लोकों में तुलसी ने स्पष्ट शब्दों में हनुमान जी के , उन गुणों का उल्लेख किया है जिन के कारण वह एक साधारण कपि से इतने पूजनीय हो गये.
अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं
दनुजबनकृशानुम ग्यानिनामअग्रगण्यम
सकल गुण निधानं वानारानामधीशं
रघुपति प्रिय भक्तं वातजातं नमामि
तुलसी ने कहा "अतुलित बल के धाम, स्वर्ण के समान कान्तियुक्त कायावाले , दैत्यों के संहारक (दैत्य वन के लिए दावानल के समान विध्वंसक ), ज्ञानियों में सर्वोपरि , सभी श्रेठ गुणों से युक्त समस्त वानर समुदाय के अधीक्षक और श्री रघुनाथ जी के अतिशय प्रिय भक्त महावीर हनुमान को मैं प्रणाम करता हूँ".अन्यत्र भी उनके स्थूल रूप की व्याख्या करते हुए तुलसी ने कहा कि हनुमान जी देखने में कपि - एक अति चंचल पशु हैं, उछलते कूदते वृक्षों की एक शाखा से दूसरी शाखा पर सुगमता से जा सकते है . मानस के उत्तर -काण्ड में हनुमानजी ने स्वयं ही अपना परिचय देते हुए भरत जी से कहा है:
"मारुत सुत मै कपि हनुमाना
नाम मोर सुनु कृपा निधाना "
सराहनीय है “महावीर विक्रमबजरंगी, कुमति निवार सुमति के संगी”, कपि-तन-धारी हनुमान जी का यह विनय और उनकी यह नम्रता . उनके अनेक सद्गुणों में यह एक विशेष गुण है जिसने उन्हें देवतुल्य बना दिया. हनुमान जी के सभी गुण अनुकरणीय हैं . आज का मानव जिसका जीवन मूल्य कहीं कहीं पशुता के स्तर से भी बहुत नीचे गिर चुका है, अपना स्वरुप सुधारने के लिए हनुमान जी के इन सद्गुणों को यदि अपनी जीवन शैली में उतार सके तो मानवता का कल्याण हो जाएगा !

Saturday, 29 November 2014

धर्म और अध्यात्म को हम क्या मानते है और है क्या !!


प्रियजन मैं भारत के उन साधारण नागरिकों में से एक हूँ जो यथार्थ आध्यात्म के ज्ञान से पूर्णतःअनभिज्ञ हैं ! लगभग ३० वर्ष की आयु तक ,पारिवारिक परंपरागत सनातनी कर्मकांड को करना ही हमारी "धार्मिकता" का प्रतीक है ! त्योहारों -पर्वों पर व्रत-उपवास रखना,तथा गंगास्नान करना, मंदिरों में देवताओं की मूर्ति पर दूर से फूलों की बौछार करना , हनुमान जी की मूर्ति के मुख में ठूस ठूस कर मिठाइयां भरना , मंदिर में घंटा बजा कर प्रवेश करना और घंटा बजा कर ही वहाँ से निकलना, आरती की थाल में कुछ धन राशि डालना ,हाथ में माला घुमाते रहना ही हम अपना धर्म समझते है ! ऐसी धार्मिकता का प्रदर्शन कर के हम अपने को अति धर्म परायण या धार्मिक सिद्ध करके समाज में प्रसिद्धि पाने का प्रयास भी करते थे;जिसमे हम थोड़ा बहुत सफल भी हो जाते है ! अच्छा लगता है जब हम किसी को यह कहते सुनते है कि, "कि देखो बलासरण दास इस उम्र में ही कितने धार्मिक हो गए हैं !" पर वास्तव में क्या हम धार्मिक है ?ऐसा लगता है कि ह्म मंदिरों -देवालयों में केवल स्वार्थ सिद्धि के लिए ही जाते हैं ! हम अपने "इष्ट देवों" से कुछ मांगने तथा उनसे कुछ प्राप्त करने की आशा ही हमे वहाँ ले जाती है ! मन में कामना पूर्ति की आशा होती है और इष्टदेव से लाभान्वित होने की अभिलाषा रहती हैं ! आरती की थाली में धन डालते समय आँख मूंद कर सम्भवतः इष्ट से सीधे ही कुछ मांगते हैं या मंदिर के गोलक में गुप्त दान करते समय हमारे मन में यह लालसा बनी रहती हैं कि काश मेरी यह दान दी हुई रकम दसगुनी होकर मेरे पास लौट आये ! सच पूछो तो उस समय हमारा शरीर तो मंदिर में होता है पर हमारा ध्यान श्रीमन नारायण के श्रीचरणों पर न होकर श्री नगद नारायण के चिंतन में लगा होता है ! इन सभी कर्मकांडों में हमारा मन / ध्यान भगवान की ओर न होकर केवल अपनी स्वार्थ सिद्धि की ओर होता हैं !मंदिरों में और घर में आयोजित पूजा पाठ में हमारे पुरोहित ही निर्धारित कर्म कांड का पालन करते है और हम बंदरों की तरह , उन मदारी पंडित जी के आदेशानुसार यंत्रवत वह सब क्रियाएँ करते रहते है जो वह प्रत्येक मंत्रोचारण के बाद हमे बोल चाल की भाषा में समझाकर उसे करने का आदेश देते है ! हमारा ध्यान भगवान की मूर्ति से कहीं अधिक उनके श्री चरणों के निकट चांदी के कटोरे में रक्खे ,नये लाल कपड़े से ढंकें गर्म गर्म देशी घी के हलुए तथा निकट ही एक बड़े लोटे में रखे पंचामृत पर रहता है !जैसे जैसे समय बीतता गया ,लगभग ३० वर्ष की आयु में गुरुजन के संसर्ग में आने पर आँखे खुलीं ,कुछ बोध हुआ तो समझ में आया कि इन सब कर्मकांड और बाह्यआडम्बर और पारम्परिक मान्यताओं में "प्रेम भाव" का पूर्णतः अभाव है! इनका फल केवल स्वार्थ सिद्धि है 'सांसारिक सुख -सम्पदा प्राप्त करने की महत्वकांक्षा है ! प्रेम भाव के अभाव में इन विधि विधानों को अपनाने से अपने इष्ट की उपस्थिति का अहसास नहीं होता !जो भी धर्म -कर्म करो उसे प्रेम भाव से करो !प्रेम भाव में ही प्रभु का निवास है ! सद्गुरु के सान्निध्य में रहने पर ही मुझे धर्म और अध्यात्म के भाव का बोध हुआ ,मैंने उनसे जाना कि धर्म में आचार और विचार दोनों ही समाये हैं! आत्मा सम्बन्धी ज्ञान को अध्यात्मवाद कहते हैं !आत्मा को लक्ष्य रख कर जो बात की जाय , वह अध्यात्म वाद है !धर्म की उत्पत्ति अध्यात्मवाद से होती है ! मैं आत्मा हूँ ;इसलिए मेरा धर्म मेरा अपना प्रेम मय स्वरूप ही है !प्रेम ही परम धर्म है !प्रत्येक मनुष्य के मन में प्रेम का पथ अपनाने की चाह स्वाभाविक है क्योंकि प्रेम सभी प्राणियों के स्वभाव में निहित है !प्रेम के पथ में पवित्रता है! प्रेम ही जगत का आधार है ! प्रेम ही धर्म का सार है! मेरा धर्म प्रभु का प्रेम है! प्रभु प्रत्येक प्राणी में विराज मान है ;उससे प्रेम करना ही प्रभु से प्रेम करना है !राम के प्रेम में राम की भक्ति में मन को रमाने से जो शान्ति जो सुख और जो संतोष मनुष्य को प्राप्त होता है वह किसी भी कर्मकांड से प्राप्त हो ही नहीं सकता ! आत्मा की तृप्ति ,"प्रेमामृत" पान करने से होती है !प्यार ढूढने आपको दूर नहीं जाना पडेगा ,प्रभु ने अपनी श्रृष्टि के कण कण में प्यार भर रखा है -


Friday, 28 November 2014

नाम जाप, भजन, कीर्तन का महत्व !!

हमारा सौभाग्य है कि हम इस कलिकाल में धरती पर आये हैं. बात यह है की भारत भूमि पर हजारों वर्ष पूर्व प्रगटे युग-दृष्टा मनीषियों - ऋषि मुनियों ने उस काल में ही यह उद्घोषित कर दिया था कि सतयुग, त्रेता एवं द्वापर युग के जीवों के द्वारा मुक्ति प्राप्ति हेतु की जाने वाली कठिन चेष्टाओं - (तपश्चर्या -यज्ञ आदि) से, कलि युग के जीव मुक्त हैं. उन्हें मोक्ष प्राप्ति हेतु उतनी कठिन साधना नही करनी है. भारतीय पौराणिक धर्म ग्रन्थ "श्री मद् भागवत " में इसका उल्लेख है आधुनिक काल के गोस्वामी तुलसीदास कृत "रामचरितमानस" मे "छहों शास्त्र सब ग्रंथन को रस" समाहित है. युगदृष्टा तुलसी ने इसमें अपने निजी अनुभवों के आधार पर हमे यह विश्वास दिलाया है कि कलि काल के जीवों को गाते बजाते केवल नाम जाप, सुमिरन और भजन , कीर्तन से मुक्ति मिल जायेगी.  उन्होंने कहा है:

"कलिजुग केवल नाम अधारा ,सिमिर सिमिर नर उतरहिं पारा .
चहु जुग चहु श्रुति नाम प्रभाउ ,कलि बिशेस नहीं आन उपाऊ .."

मानस में ही तुलसी ने अन्यत्र कहा है:

"एही कलि काल न साधन दूजा, जोग जग्य जप तप व्रत पूजा.
रामहि सुमिरिअ गाइअ रामहि संतत सुनीअ राम गुन ग्रामहि.."
विशेष :+++++++++
इस प्रकार हम सौभाग्यशाली जीव, गाते बजाते , ब्लॉग लिखते लिखाते और इसी बहाने अपने इष्ट का स्मरण करते तथा ब्लॉग पढने वालों को उनके इष्ट का स्मरण कराते, स्वयं भी मुक्त हो जायेंगे और सहपाठियों को भी साथ ले जायेंगे..देखिये कितनी बड़ी कृपा की है हमारे प्यारे प्रभु ने हम- कलियुगी जीवों पर !एक बात और है. प्रियजनों. मैं यह नही चाहता कि आप मेरे कहने पर अपने इष्ट के स्थान पर "मेरे राम'" को भजें. आप अपने इष्ट, जिन पर आपको श्रद्धा है कृपया उन्ही को याद करें, उन्ही का भजन कीर्तन करे, पर कृपया जो भी करिये, पूरी श्रद्धा और पूरे विश्वास के साथ करिये .

रोजाना हनुमान जी से सुबह उठ कर ये प्रार्थना करनी चाहिए !!


चरण शरण में आय के, धरूं तुम्हरा  ध्यान .
संकट से रक्षा करो, पवनपुत्र हनुमान ..

दुर्गम काज बनाय के, कीन्हें भक्त निहाल .
अब मोरी विनती सुनो, हे अंजनि के लाल ..

हाथ जोड़ विनती करूं, सुनो वीर हनुमान .
कष्टों से रक्षा करो, पवनपुत्र हनुमान ..

राम भक्ति देहुँ मोहि दान,राम भक्ति देहुँ मोहि दान

आप जीवन में प्रगति नहीं कर पा रहे है तो ग्रह दोष से पीड़ित है करे इस प्रकार सभी ग्रह दोष का निवारण !!

यदि कुंडली में कोई ग्रह दोष हो तो व्यक्ति को कार्यों में सफलता प्राप्त नहीं हो पाती है। यदि सफलता मिलती भी है तो कई परेशानियों का सामना करने के बाद मिलती है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार नौ ग्रह बताए गए हैं। ये ही नौ ग्रह कुंडली के बारह भावों में विचरण करते रहते हैं। किसी व्यक्ति के जन्म के समय इन ग्रहों की जैसी स्थिति होती है, वैसा ही असर जीवनभर बना रहता है। यदि कोई ग्रह अशुभ स्थिति में है तो व्यक्ति को परेशानियों का सामना करना पड़ता है। ग्रहों के अशुभ दोष को दूर करने के लिए ज्योतिष में उपाय भी बताए गए हैं। इन उपायों को नियमित रूप से करते रहने पर अशुभ ग्रहों के दोष दूर हो सकते हैं।
सूर्य:= सूर्य ग्रह के दोष दूर करने और इसे शुभ बनाने के लिए जपाकुसुम के फूलों की माला बनाकर हर रविवार को शिवजी को पहनाएं। इस उपाय से वर्चस्व एवं आत्मविश्वास की वृद्धि होती है। किसी वृद्ध व्यक्ति को लाल फल भेंट करना चाहिए। प्रत्येक रविवार सुबह घोड़े को भीगे चने की दाल खिलानी चाहिए।
चंद्रमा:= प्रत्येक सोमवार गाय के दूध से शिवजी का अभिषेक करें। इस दौरान 'ऊँ सोमाय नम:’ मंत्र का जप करें। किसी गरीब महिला को दूध और सफेद वस्तु का दान करें। खरगोश को मूली खिलाएं।
मंगल:= प्रत्येक मंगलवार गाय को गुड़ और आटे से बनी रोटी खिलाएं। लाल फूलों की माला बनाकर देवी प्रतिमा को पहनाएं। लाल कनेर के 108 फूलों से मां दुर्गा की पूजा करें। मंगलवार को गुड़हल का पेड़ घर में लगाएं और नियमित रूप से इसकी देखभाल करें। मूंगा रत्न का दान किसी ब्राह्मण को मंगलवार के दिन करना लाभकारी होता है। कुंडली में यदि मांगलिक दोष है तो प्रतिदिन तुलसी के पौधे की पूजा करें, जल चढ़ाएं, मगर बुधवार और रविवार को तुलसी को नहीं छुएं।
बुध:= बुध ग्रह से पीड़ित व्यक्ति को अधिक से अधिक संख्या में पौधे लगाने चाहिए। साथ ही, घर में भी छोटा बगीचा बनाएं। प्रत्येक बुधवार गणेशजी को 21, 41 या 108 दूर्वा चढ़ाएं। प्रतिदिन कम से कम तीन इलायची का सेवन करें। मेहंदी और इलायची का पौधा घर में लगाएं। प्रत्येक बुधवार यदि संभव हो सके तो हाथी के दर्शन करें और उसे केला खिलाएं।
गुरु: =गुरु ग्रह को शुभ बनाने के लिए सबसे प्रभावी उपाय है गुरुवार को केले के पेड़ की पूजा करना। केले के पौधे को हल्दी युक्त जल अर्पित करें। बरगद के पेड़ में हर गुरुवार हल्दी युक्त कच्चा दूध चढ़ाएं। यदि संभव हो तो गुरु-पुष्य योग में केले की जड़ अपनी दाहिनी बांह पर बांधें। ये व्यापार की वृद्धि में सहायक होगा। पीली कदली के पुष्पों को घर में लगाएं और गरीबों को पीली वस्तु और पुस्तकें दान करें।
शुक्र:= जीवन में प्रसन्नता और वैभव की वृद्धि के लिए शुक्र ग्रह को बलवान बनाना आवश्यक है। इसके लिए प्रत्येक शुक्रवार सुगंधित फूलों से महालक्ष्मी की पूजा-अर्चना करें। इत्र का दान करें एवं सफेद गाय को चावल खिलाएं। सफेद कनेर के पुष्पों की माला तथा कमल के पुष्पों को लक्ष्मीनारायण भगवान को अर्पित करें। सफेद और हल्के रंग वाले फूलों के पौधे घर में लगाएं। आंवले के पेड़ की पूजा करें और प्रत्येक शुक्रवार आंवले की पत्तियां लक्ष्मीजी को चढ़ाएं।
शनि: =यदि सरकारी नौकरी पाने की इच्छा है तो शनि ग्रह को पक्ष में करना जरूरी है। प्रत्येक शनिवार पीपल के पेड़ के सामने सरसो के तेल का दीपक जलाएं। शकर और जल का मिश्रण पीपल की जड़ में चढ़ाएं। पीपल के पेड़ की पूजा से शनि दोष शांत होता है। प्रतिदिन पीपल की पूजा करें, लेकिन बुधवार और रविवार को पीपल को नहीं छुएं। कौवे और काले कुत्ते को गुड़ वाली तेल की रोटी खिलाएं। काली गाय को हर शनिवार उड़द की दाल भिगोकर खिलाएं।
राहु-केतु:= राहु और केतु ग्रह से पीड़ित व्यक्ति को रोजाना कबूतरों को बाजरा और काले तिल मिलाकर खिलाना चाहिए। कुष्ठ रोगियों को दो रंग वाली वस्तुओं का दान करें। मोर पंख की पूजा करें या हो सके तो उसे हमेशा अपने पास रखें। गिलहरी को दाना डालें। दो रंग के फूलों को घर में लगाएं और गणेशजी को अर्पित भी करें। हर मंगलवार या शनिवार को चीटियों को मीठा खिलाएं।

Thursday, 27 November 2014

तनावपूर्ण (डिप्रेशनमें ) जीवन नहीं जीना है तो इस प्रकार जीवन जिए !!

आज के समय जितनी शिक्षा का स्तर बढा है, उतनी ही उलझने भी बढ़ रही है। पढ़े-लिखे लोग अपने लक्ष्य प्राप्ति के लिए इस कदर उलझनों में होते जा रहे हैं कि जरा-सी रुकावट या देरी उन्हें तनाव की ओर ले जाती है। जो थोड़े हिम्मत वाले हैं, वे अपने आप को तनाव से तो बचा लेते हैं, लेकिन चिड़चिड़े हो जाते हैं।कुल मिलाकर शिक्षा ने आदमी को बुद्धिमान बनाया, पर बेताब भी बना दिया। हर पढ़े-लिखे आदमी को यह बात जरूर समझनी चाहिए कि कुछ घटनाये ऐसी होती  ही रहती है जो घट जाती है आप चाहें या न चाहें। उस समय शिक्षा को समझ का काम करना चाहिए। प्रिय लोगों की मृत्यु, बिछड़ना, अचानक नुकसान हो जाना, दुर्घटनाएं इत्यादि पर आपका सीधा वश नहीं चलता। ऐसे वक्त में पढ़े-लिखे होने का अर्थ है कि हिम्मत न हारें। जैसे निरोगी काया एक सुख है, वैसे ही समझ देने वाली शिक्षा भी अपने आप में बहुत बड़ा सुख है।अत: यह उपलब्धि हमारे लिए काम की होनी चाहिए। दो वक्त की रोटी को पढ़ाई-लिखाई तो जुटा ही देगी, लेकिन शरीर और मन के स्वास्थ्य के अलावा एक और स्वास्थ्य होता है, जिसे नैतिक स्वास्थ्य कहते हैं। इसकी अनुभूति शिक्षा कराती है। नैतिक रूप से निरोगी व्यक्ति दूसरों के प्रति प्रेम, सेवा, परोपकार, उदारता और मधुरता का व्यवहार करता है। दरअसल शिक्षा एक समझ की तरह बननी चाहिए, जो मनुष्य के शरीर और आत्मा के संयोग को समझा सके, क्योंकि मनुष्य पूरी दुनिया में आत्मा और शरीर का अद्भुत संयोग है और इस अनुभूति को शिक्षा परिपक्व कर देती है।
जीवन की कुछ आदते ही मनुष्य की दुश्मन जिनको छोड़ना जरूरी !! 
जीवन में हम कुछ ऐसी आदतों को अपने जीवन पर लागू कर लेते हैं जिनका ना तो कोई मतलब होता है ना कोई अर्थ और उन को जीने लगते हैं। आदतों का स्वभाव होता है कि उसे बार-बार करने की इच्छा होती है। पुनरावृत्ति आदत का मूल स्वभाव है। देर से उठने की आदत है तो अगले दिन फिर देर से उठने की इच्छा होगी। लोग बोलते व्यापार में घाटा होगया इसलिए तनाव में हूँ तो शराब पीने लगते है क्या शराब पीने से घाटा कम होता है या तनाब ! ये नहीं पता की आदत अतीत से जुड़कर अतीत को ही भविष्य में पटकने पर उतारू होती है। इसीलिए आदत से बचने के लिए अपने भीतर के स्वभाव को समझना होगा। अभी तो हमने भक्ति को भी आदत बना लिया है, जबकि भक्ति स्वभाव का विषय है। सामान्य रूप से ऐसा समझा जाता है कि जो लोग भक्ति कर रहे हैं वे या तो कमजोर लोग हैं या छोटे ओहदे के व्यक्ति हैं। यह एक भ्रम है। जिनके पास मिटने की क्षमता है वे ही भक्ति कर सकेंगे, क्योंकि जितना हम मिटेंगे उतने ही हमारे भीतर के परमात्मा को रूप लेने कर अवसर मिलेगा।जितना हमने अपने को बचाया, समझ लें उतना ही उसको खोया। भक्ति एक आत्मघाती कला है। इसलिए जैसे-जैसे भक्ति जीवन में उतरेगी हमें भीतर उतरने में सुविधा होगी। मन को निष्क्रिय करने में सहारा मिलेगा। अभी मन मालिक है और शरीर गुलाम। लेकिन भक्ति के उतरते ही परमात्मा प्रकट होने लगता है और ईश्वर की अनुभूति के सामने मन मौन हो जाता है।मन मौन हुआ और हमारी सारी मस्ती, तमाम शौर-शराबे, धूमधाम भौतिक सफलताओं के बाद भी हमें खूब शांत रखेंगी, प्रकाश ही प्रकाश होगा और इसी प्रकाश को आंतरिक उत्सव कहा गया है। जब हर काम आनंद हो जाए तो फिर जिन्दगी के अर्थ ही बदल जाते हैं।
भगबान का ध्यान हमारे जीवन में क्या परिवर्तन ला सकता है !!
चौबीस घंटे में एक बार भगबान का ध्यान आवश्य करें। आप जितना श्रद्धालु होंगे आपके भीतर सकारात्मकता उतनी अधिक बढ़ जाएगी। श्रद्धा नकारात्मकता को समाप्त करती है !ध्यान करते ही हम ईश्वर रूपी दिव्य शक्ति से जुडऩे लगते हैं जो अपने आपमें एक उपलब्धि है। दूसरी महत्वपूर्ण बात होती है हमारे भीतर एक रासायनिक परिवर्तन आरंभ हो जाता है यह रासायनिक परिवर्तन हमें विपरित परिस्थितियों से जूझने में हमारी शक्ति को बढ़ाता है। सहनशक्ति और सरलता हमारे जीवन के सारथी बन जाते हैं।ध्यान (प्रार्थना )एक और बोध कराती है। ध्यान करने वाले लोग समझ जाते हैं कि संसार नहीं छोडऩा है, जो व्यर्थ है उसे त्यागना है। ध्यान हमें उस परम शक्ति से जोड़ती है जिसने यह दुनिया बनाई, जब हम ईश्वर से जुड़ रहे हैं तो उसकी बनाई दुनिया से कैसे नफरत कर सकते हैं। दुनिया में जो व्यर्थ है उसका विस्मरण करें तो ध्यान  में जो स्मरण होगा वह अपने आपमें दिव्यानुभूति होगी।जब भी ध्यान किया जाए इसे केवल कर्मकांड न मानें, इसे अनुभव समझें, आत्मविश्वास का अनुभव। आज के दौर में हमें दूसरों के मामले में दुनियाभर का अनुभव होता है बस एक खुद की अनुभूति को छोड़कर। ध्यान आपको आपके होने का एहसास न कराए तो समझें ध्यान नहीं मात्र कर्मकांड किया है। कभी कभी आप पाएंगे ध्यान में आपकी चेतना शिखर पर होगी और यहीं से आप मन से खुश तथा तन से स्वस्थ होना महसूस करेंगे।

शिवपुराण मेंभगबान शिव जीने बताए है मृत्यु के ये 12 संकेत !!

भगवान शिव महाकाल भी है। महाकाल का अर्थ है काल यानी मृत्यु भी जिसके अधीन हो। भगवान शिव जन्म-मृत्यु से परे हैं। अनेक धर्म ग्रंथों में भगवान शंकर को अनादि व अजन्मा बताया गया है। भगवान शंकर से संबंधित अनेक धर्मग्रंथ प्रचलित हैं, लेकिन शिवपुराण उन सभी में सबसे अधिक प्रामाणिक माना गया है। इस ग्रंथ में भगवान शिव से संबंधित अनेक रहस्यमयी बातें बताई गई हैं। इसके अलावा इस ग्रंथ में ऐसी अनेक बातें लिखी हैं, जो आमजन नहीं जानते। शिवपुराण में भगवान शिव ने मृत्यु के संबंध में कुछ विशेष संकेत बताए हैं। इन संकेतों को समझकर यह जाना जा सकता है कि किस व्यक्ति की मौत कितने समय में हो सकती है। ये संकेत इस प्रकार हैं-
 शिवपुराण के अनुसार ===
1- जिस मनुष्य को ग्रहों के दर्शन होने पर भी दिशाओं का ज्ञान न हो, मन में बैचेनी छाई रहे, तो उस मनुष्य की मृत्यु 6 महीने में हो जाती है।
2- जिस व्यक्ति को अचानक नीली मक्खियां आकर घेर लें। उसकी आयु एक महीना ही शेष जाननी चाहिए।
3- जिस मनुष्य के सिर पर गिद्ध, कौवा अथवा कबूतर आकर बैठ जाए, वह एक महीने के भीतर ही मर जाता है। ऐसा शिवपुराण में बताया गया है।
4- यदि अचानक किसी व्यक्ति का शरीर सफेद या पीला पड़ जाए और लाल निशान दिखाई दें तो समझना चाहिए कि उस मनुष्य की मृत्यु 6 महीने के भीतर हो जाएगी। जिस मनुष्य का मुंह, कान, आंख और जीभ ठीक से काम न करें,उसकी मृत्यु 6 महीने के भीतर हो जाती है।
5- जिस मनुष्य को चंद्रमा व सूर्य के आस-पास काचमकीला घेरा काला या लाल दिखाई दे, तो उस मनुष्य की मृत्यु 15 दिन के अंदर हो जाती है। अरूंधती तारा व चंद्रमा जिसे न दिखाई दे अथवा जिसे अन्य तारे भी ठीक से न दिखाई दें, ऐसे मनुष्य की मृत्यु एक महीने के भीतर हो जाती है।
6- त्रिदोष (वात, पित्त, कफ) में जिसकी नाक बहने लगे, उसका जीवन पंद्रह दिन से अधिक नहीं चलता। यदि किसी व्यक्ति के मुंह और कंठ बार-बार सूखने लगे तो यह जानना चाहिए कि 6 महीने बीत-बीतते उसकी आयु समाप्त हो जाएगी।
7- जब किसी व्यक्ति को जल, तेल, घी तथा दर्पण में अपनी परछाई न दिखाई दे, तो समझना चाहिए कि उसकी आयु 6 माह से अधिक नहीं है। जब कोई अपनी छाया को सिर से रहित देखे अथवा अपने को छाया से रहित पाए तो ऐसा मनुष्य एक महीने भी जीवित नहीं रहता।
8- जब किसी मनुष्य का बायां हाथ लगातार एक सप्ताह तक फड़कता ही रहे, तब उसका जीवन एक मास ही शेष है, ऐसा जानना चाहिए। जब सारे अंगों में अंगड़ाई आने लगे और तालू सूख जाए, तब वह मनुष्य एक मास तक ही जीवित रहता है।
9- जिस मनुष्य को ध्रुव तारा अथवा सूर्यमंडल का भी ठीक से दर्शन न हो। रात में इंद्रधनुष और दोपहर में उल्कापात होता दिखाई दे तथा गिद्ध और कौवे घेरे रहें तो उसकी आयु 6 महीने से अधिक नहीं होती। ऐसा शिवपुराण में बताया गया है।
10- जो मनुष्य अचानक सूर्य और चंद्रमा को राहू से ग्रस्त देखता है (चंद्रमा और सूर्य काले दिखाई देने लगते हैं) और संपूर्ण दिशाएं जिसे घुमती दिखाई देती हैं, उसकी मृत्यु 6 महीने के अंदर हो जाती है।
11- जो व्यक्ति हिरण के पीछे होने वाली शिकारियों की भयानक आवाज को भी जल्दी नहीं सुनता, उसकी मृत्यु 6 महीने के भीतर हो जाती है। जिसे आकाश में सप्तर्षि तारे न दिखाई दें, उस मनुष्य की आयु भी 6 महीने ही शेष समझनी चाहिए।
12- जिस व्यक्ति को अग्नि का प्रकाश ठीक से दिखाई न दे और चारों ओर काला अंधकार दिखाई दे तो उसका जीवन भी 6 महीने के भीतर समाप्त हो जाता है।

Wednesday, 26 November 2014

स्वास्थ्य, उम्र और धन संबंधी परेशानियों से मुक्ति पाना चाहते हैं तो शिवपुराण में बताए गए उपाय करना चाहिए !!

इस सृष्टि की रचना शिवजी की इच्छा मात्र से ही हुई है। शिवपुराण में बताया गया है कि ब्रह्माजी ने शिवजी की इच्छा के अनुसार संपूर्ण सृष्टि रची है। महादेव ने इसके संचालन का कार्य भगवान श्रीहरि को सौंपा है। इसी कारण शिवजी का पूजन सभी इच्छाओं को पूर्ण करने वाले माना गया है। जो भी व्यक्ति भोलेनाथ की आराधना करता है, उसे सभी देवी-देवताओं की कृपा प्राप्त होती है। उसके पाप नष्ट हो जाते हैं, अक्षय पुण्य प्राप्त होता है। यदि आप भी शिवजी की कृपा से स्वास्थ्य, उम्र और धन संबंधी परेशानियों से मुक्ति पाना चाहते हैं तो शिवपुराण में बताए गए उपाय करना चाहिए।शिवपुराण में सप्ताह के सातों दिनों के लिए अलग-अलग देवताओं के पूजन का महत्व बताया गया है। रविवार को सूर्य, सोमवार को चंद्र, मंगलवार को मंगल, बुधवार को बुध, गुरुवार को बृहस्पति, शुक्रवार को शुक्र और शनिवार को शनि का पूजन करना श्रेष्ठ है।
सूर्य आरोग्य देता है। चंद्र धन-संपत्ति देता है। मंगल व्याधियों यानी रोगों का निवारण करता है। बुध देव बल देता है। बृहस्पति आयु बढ़ाता है। शुक्र भौतिक सुख प्रदान करता है। शनि मृत्यु का भय दूर करता है।
रविवार को ऐसे प्राप्त करें सूर्य की कृपा !!
 सूर्य की कृपा पाने के लिए हर रोज सूर्य को जल अर्पित करना चाहिए। रविवार को तांबे के लोटे में जल भरें, पुष्प डालें और सूर्य को अर्पित करें। इसके बाद किसी जरुरतमंद व्यक्ति को या किसी ब्राह्मण को भोजन कराएं। यदि भोजन नहीं करा सकते हैं तो किसी मंदिर में अन्न का दान करें। यह उपाय नियमित रूप से करते रहेंगे तो सूर्य की कृपा से आरोग्य की प्राप्ति होती है। रोगों से मुक्ति मिलती है और यौवन बना रहता है !
 सोमवार को ऐसे प्राप्त करें चंद्र की पूजा !!
चंद्र देव की कृपा से व्यक्ति को धन-संपत्ति के साथ ही मानसिक शांति की प्राप्ति भी होती है। चंद्र कृपा पाने के लिए हर सोमवार देवी लक्ष्मी का पूजन करें। पूजन के बाद किसी जरुरतमंद व्यक्ति को या किसी ब्राह्मण को घी से निर्मित भोजन कराएं या किसी मंदिर में घी का दान करें।इस उपाय से धन संबंधी कार्यों में आ रही बाधाएं दूर होती हैं और देवी लक्ष्मी की कृपा से घर में बरकत बनी रहती है। 
मंगलवार को ऐसे प्राप्त करें मंगल की कृपा !!
मंगल की कृपा पाने के लिए हर मंगलवार मां काली का पूजन करना चाहिए। इसके साथ ही उड़द, मूंग एवं अरहर की दाल से निर्मित भोजन किसी ब्राह्मण को या किसी जरुरतमंद व्यक्ति को कराएं। इस उपाय को नियमित रूप से करने पर मंगल की कृपा प्राप्त होती है और रोगों की शांति होती है। स्वास्थ्य उत्तम रहता है। भूमि संबंधी कार्यों में भी शुभ फल प्राप्त होते हैं।
बुधवार को ऐसे प्राप्त करें बुध की कृपा !!यदि आप बुध की कृपा प्राप्त करना चाहते हैं तो हर बुधवार यह उपाय करें। उपाय के अनुसार हर बुधवार भगवान विष्णु का पूजन करें। पूजन में दधियुक्त यानी दूध-दही से निर्मित प्रसाद अर्पित करें। मिठाई अर्पित की जा सकती है। यह उपाय नियमित रूप से करते रहना चाहिए। इसके शुभ प्रभाव से पुत्र, मित्र और घर-परिवार से सहयोग प्राप्त होता है। दुख दूर होते हैं। सुखद वातावरण बना रहता है।
गुरुवार को ऐसे प्राप्त करें बृहस्पति की कृपा !!
 जो लोग गुरुवार को यहां बताया जा रहा उपाय नियमित रूप से करते हैं, उन्हें लंबी आयु प्राप्त हो सकती है। देव गुरु बृहस्पति से कृपा पाने के लिए हर गुरुवार वस्त्र, यज्ञोपवित और घी मिश्रित खीर से शिवजी का पूजन करना चाहिए। शिवपुराण के अनुसार इस उपाय से व्यक्ति दीर्घायु होता है। 
शुक्रवार को ऐसे प्राप्त करें शुक्र की कृपा !!
 समस्त भोग यानी सभी भौतिक सुख-सुविधाएं प्राप्त करने के लिए शुक्रवार को यह उपाय करें। उपाय के अनुसार हर शुक्रवार शिवजी को तांबे के लोटे में जल भरकर अर्पित करें। बिल्व पत्र चढ़ाएं। किसी ब्राह्मण या जरुरतमंद व्यक्ति को अन्न का दान करें। यह उपाय नियमित रूप से करते रहने पर व्यक्ति को समस्त भोगों की प्राप्ति होती है। पत्नी से सुख पाने के लिए शुक्रवार को पत्नी को सुंदर वस्त्र का उपहार दें।
शनिवार को ऐसे प्राप्त करें शनि की कृपा !!
 
शनि की कृपा से मृत्यु भय से मुक्ति पाने के लिए हर शनिवार भगवान शिव का विशेष पूजन करना चाहिए। पूजन में जल, बिल्व पत्र, काले तिल आदि अर्पित करें। किसी जरुरतमंद व्यक्ति को या किसी ब्राह्मण को तिल मिश्रित भोजन कराएं। शनि के निमित्त तेल का दान करें। हनुमान चालीसा का पाठ करें। जो लोग यहां बताए गए उपाय नियमित रूप से करते रहते हैं, उन्हें आयोग्य प्राप्त होता है।

कुंडली के योग से जानिए पूर्वजन्म में आप कौन थे और मृत्यु के बाद आप क्या बनेगे !!



हिंदू धर्म में पुनर्जन्म की मान्यता है। हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार प्राणी का केवल शरीर नष्ट होता है, आत्मा अमर है। आत्मा एक शरीर के नष्ट हो जाने पर दूसरे शरीर में प्रवेश करती है, इसे ही पुनर्जन्म कहते हैं। पुनर्जन्म के सिद्धांत को लेकर सभी के मन ये जानने की जिज्ञासा अवश्य रहती है कि पूर्वजन्म में वे क्या थे साथ ही वे ये भी जानना चाहते हैं, वर्तमान शरीर की मृत्यु हो जाने पर इस आत्मा का क्या होगा? भारतीय ज्योतिष में इस विषय पर भी काफी शोध किया गया है। उसके अनुसार किसी भी व्यक्ति की कुंडली देखकर उसके पूर्व जन्म और मृत्यु के बाद आत्मा की गति के बारे में जाना जा सकता है। गीताप्रेस गोरखपुर दवारा प्रकाशित परलोक और पुनर्जन्मांक पुस्तक में इस विषय पर विस्तृत रूप से प्रकाश डाला गया है। उसके अनुसार शिशु जिस समय जन्म लेता है। उस समय, स्थान व तिथि को देखकर उसकी जन्म कुंडली बनाई जाती है। उस समय के ग्रहों की स्थिति के अध्ययन के फलस्वरूप यह जाना जा सकता है कि बालक किस योनि से आया है और मृत्यु के बाद उसकी क्या गति होगी। आगे इस संबंध में कुछ विशेष योग बताए जा रहे हैं-
 
जन्मपूर्व योनि विचार !!

1- जिस व्यक्ति की कुंडली में चार या इससे अधिक ग्रह उच्च राशि के अथवा स्वराशि के हों तो उस व्यक्ति ने उत्तम योनि भोगकर यहां जन्म लिया है, ऐसा ज्योतिषियों का मानना है।
2- लग्न में उच्च राशि का चंद्रमा हो तो ऐसा व्यक्ति पूर्वजन्म में योग्य वणिक था, ऐसा मानना चाहिए।
3- लग्नस्थ गुरु इस बात का सूचक है कि जन्म लेने वाला पूर्वजन्म में वेदपाठी ब्राह्मण था। यदि जन्मकुंडली में कहीं भी उच्च का गुरु होकर लग्न को देख रहा हो तो बालक पूर्वजन्म में धर्मात्मा, सद्गुणी एवं विवेकशील साधु अथवा तपस्वी था, ऐसा मानना चाहिए।
4- यदि जन्म कुंडली में सूर्य छठे, आठवें या बारहवें भाव में हो अथवा तुला राशि का हो तो व्यक्ति पूर्वजन्म में भ्रष्ट जीवन व्यतीत करना वाला था, ऐसा मानना चाहिए।
5- लग्न या सप्तम भाव में यदि शुक्र हो तो जातक पूर्वजन्म में राजा अथवा सेठ था व जीवन के सभी सुख भोगने वाला था, ऐसा समझना चाहिए।
6- लग्न, एकादश, सप्तम या चौथे भाव में शनि इस बात का सूचक है कि व्यक्ति पूर्वजन्म में शुद्र परिवार से संबंधित था एवं पापपूर्ण कार्यों में लिप्त था।
7- यदि लग्न या सप्तम भाव में राहु हो तो व्यक्ति की पूर्व मृत्यु स्वभाविक रूप से नहीं हुई, ऐसा ज्योतिषियों का मत है।
8- चार या इससे अधिक ग्रह जन्म कुंडली में नीच राशि के हों तो ऐसे व्यक्ति ने पूर्वजन्म में निश्चय ही आत्महत्या की होगी, ऐसा मानना चाहिए।
9- कुंडली में स्थित लग्नस्थ बुध स्पष्ट करता है कि व्यक्ति पूर्वजन्म में वणिक पुत्र था एवं विविध क्लेशों से ग्रस्त रहता था।
10- सप्तम भाव, छठे भाव या दशम भाव में मंगल की उपस्थिति यह स्पष्ट करती है कि यह व्यक्ति पूर्वजन्म में क्रोधी स्वभाव का था तथा कई लोग इससे पीडि़त रहते थे।
11- गुरु शुभ ग्रहों से दृष्ट हो या पंचम या नवम भाव में हो तो जातक पूर्वजन्म में संन्यासी था, ऐसा मानना चाहिए।
12- कुंडली के ग्यारहवे भाव में सूर्य, पांचवे में गुरु तथा बारहवें में शुक्र इस बात का सूचक है कि यह व्यक्ति पूर्वजन्म में धर्मात्मा प्रवृत्ति का तथा लोगों की मदद करने वाला था, ऐसा ज्योतिषियों का मानना है।

मृत्यु उपरांत गति विचार !!

मृत्यु के बाद आत्मा की क्या गति होगी या वह पुन: किस रूप में जन्म लेगी, इसके बारे में भी जन्म कुंडली देखकर जाना जा सकता है। आगे इसी से संबंधित कुछ प्रमाणिक योग बताए जा रहे हैं-
1- कुंडली में कहीं पर भी यदि कर्क राशि में गुरु स्थित हो तो जातक मृत्यु के बाद उत्तम कुल में जन्म लेता है।
2- लग्न में उच्च राशि का चंद्रमा हो तथा कोई पापग्रह उसे न देखते हों तो ऐसे व्यक्ति को मृत्यु के बाद सद्गति प्राप्त होती है।
3- अष्टमस्थ राहु जातक को पुण्यात्मा बना देता है तथा मरने के बाद वह राजकुल में जन्म लेता है, ऐसा विद्वानों का कथन है।
4- अष्टम भाव पर मंगल की दृष्टि हो तथा लग्नस्थ मंगल पर नीच शनि की दृष्टि हो तो जातक रौरव नरक भोगता है।
5- अष्टमस्थ शुक्र पर गुरु की दृष्टि हो तो जातक मृत्यु के बाद वैश्य कुल में जन्म लेता है।
6- अष्टम भाव पर मंगल और शनि, इन दोनों ग्रहों की पूर्ण दृष्टि हो तो जातक की अकाल मृत्यु होती है।
7- अष्टम भाव पर शुभ अथवा अशुभ किसी भी प्रकार के ग्रह की दृष्टि न हो और न अष्टम भाव में कोई ग्रह स्थित हो तो जातक ब्रह्मलोक प्राप्त करता है।
8- लग्न में गुरु-चंद्र, चतुर्थ भाव में तुला का शनि एवं सप्तम भाव में मकर राशि का मंगल हो तो जातक जीवन में कीर्ति अर्जित करता हुआ मृत्यु उपरांत ब्रह्मलीन होता है अर्थात उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।
9- लग्न में उच्च का गुरु चंद्र को पूर्ण दृष्टि से देख रहा हो एवं अष्टम स्थान ग्रहों से रिक्त हो तो जातक जीवन में सैकड़ों धार्मिक कार्य करता है तथा प्रबल पुण्यात्मा एवं मृत्यु के बाद सद्गति प्राप्त करता है।
10- अष्टम भाव को शनि देख रहा हो तथा अष्टम भाव में मकर या कुंभ राशि हो तो जातक योगिराज पद प्राप्त करता है तथा मृत्यु के बाद विष्णु लोक प्राप्त करता है।
11- यदि जन्म कुंडली में चार ग्रह उच्च के हों तो जातक निश्चय ही श्रेष्ठ मृत्यु का वरण करता है।
12- ग्यारहवे भाव में सूर्य-बुध हों, नवम भाव में शनि तथा अष्टम भाव में राहु हो तो जातक मृत्यु के पश्चात मोक्ष प्राप्त करता है।

विशेष योग !!

1- बारहवां भाव शनि, राहु या केतु से युक्त हो फिर अष्टमेश (कुंडली के आठवें भाव का स्वामी) से युक्त हो अथवा षष्ठेश (छठे भाव का स्वामी) से दृष्ट हो तो मरने के बाद अनेक नरक भोगने पड़ेंगे, ऐसा समझना चाहिए।
2- गुरु लग्न में हो, शुक्र सप्तम भाव में हो, कन्या राशि का चंद्रमा हो एवं धनु लग्न में मेष का नवांश हो तो जातक मृत्यु के बाद परमपद प्राप्त करता है।
3- अष्टम भाव को गुरु, शुक्र और चंद्र, ये तीनों ग्रह देखते हों तो जातक मृत्यु के बाद श्रीकृष्ण के चरणों में स्थान प्राप्त करता है, ऐसा ज्योतिषियों का मत है।

Tuesday, 25 November 2014

मंत्र जप व मंत्र सिद्ध करते समय जप के नियम !!

मंत्र जप का मूल भाव होता है- मनन। जिस देव का मंत्र है उस देव के मनन के लिए सही तरीके धर्मग्रंथों में बताए है। शास्त्रों के मुताबिक मंत्रों का जप पूरी श्रद्धा और आस्था से करना चाहिए। साथ ही, एकाग्रता और मन का संयम मंत्रों के जप के लिए बहुत जरुरी है। माना जाता है कि इनके बिना मंत्रों की शक्ति कम हो जाती है और कामना पूर्ति या लक्ष्य प्राप्ति में उनका प्रभाव नहीं होता है।
यहां मंत्र जप से संबंधित 12 जरूरी नियम और तरीके बताए जा रहे हैं, जो गुरु मंत्र हो या किसी भी देव मंत्र और उससे मनचाहे कार्य सिद्ध करने के लिए बहुत जरूरी माने गए हैं-
१-मंत्रों का पूरा लाभ पाने के लिए जप के दौरान सही मुद्रा या आसन में बैठना भी बहुत जरूरी है। इसके लिए पद्मासन मंत्र जप के लिए श्रेष्ठ होता है। इसके बाद वीरासन और सिद्धासन या वज्रासन को प्रभावी माना जाता है।
२-मंत्र जप के लिए सही वक्त भी बहुत जरूरी है। इसके लिए ब्रह्ममूर्हुत यानी तकरीबन 4 से 5 बजे या सूर्योदय से पहले का समय श्रेष्ठ माना जाता है। प्रदोष काल यानी दिन का ढलना और रात्रि के आगमन का समय भी मंत्र जप के लिए उचित माना गया है।
३-अगर यह वक्त भी साध न पाएं तो सोने से पहले का समय भी चुना जा सकता है।
४-मंत्र जप प्रतिदिन नियत समय पर ही करें।
५-एक बार मंत्र जप शुरु करने के बाद बार-बार स्थान न बदलें। एक स्थान नियत कर लें।
६ -मंत्र जप में तुलसी, रुद्राक्ष, चंदन या स्फटिक की 108 दानों की माला का उपयोग करें। यह प्रभावकारी मानी गई है।
७ -किसी विशेष जप के संकल्प लेने के बाद निरंतर उसी मंत्र का जप करना चाहिए।
८-मंत्र जप के लिए कच्ची जमीन, लकड़ी की चौकी, सूती या चटाई अथवा चटाई के आसन पर बैठना श्रेष्ठ है। सिंथेटिक आसन पर बैठकर मंत्र जप से बचें।
९-मंत्र जप दिन में करें तो अपना मुंह पूर्व या उत्तर दिशा में रखें और अगर रात्रि में कर रहे हैं तो मुंह उत्तर दिशा में रखें।
१०-मंत्र जप के लिए एकांत और शांत स्थान चुनें। जैसे- कोई मंदिर या घर का देवालय।
११-मंत्रों का उच्चारण करते समय यथासंभव माला दूसरों को न दिखाएं। अपने सिर को भी कपड़े से ढंकना चाहिए।
१२ -माला का घुमाने के लिए अंगूठे और बीच की उंगली का उपयोग करें।माला घुमाते समय माला के सुमेरू यानी सिर को पार नहीं करना चाहिए, जबकि माला पूरी होने पर फिर से सिर से आरंभ करना चाहिए।
विशेष:=======
कुछ विशेष कामनों की पूर्ति के लिए विशेष मालाओं से जप करने का भी विधान है। जैसे धन प्राप्ति की इच्छा से मंत्र जप करने के लिए मूंगे की माला, पुत्र पाने की कामना से जप करने पर पुत्रजीव के मनकों की माला और किसी भी तरह की कामना पूर्ति के लिए जप करने पर स्फटिक की माला का उपयोग करें।

Monday, 24 November 2014

क्या आप सनातन हिन्दू धर्म की आचरण संहिता जानते है !!

हिन्दू धर्म में आचरण के सख्त नियम हैं जिनका उसके अनुयायी को प्रतिदिन जीवन में पालन करना चाहिए। इस आचरण संहिता में मुख्यत: दस  प्रतिबंध हैं और दस नियम हैं। यह सनातन हिन्दू धर्म का नैतिक अनुशासन है। इसका पालन करने वाला जीवन में हमेशा सुखी और शक्तिशाली बना रहता है।
सनातन  हिन्दू धर्म के प्रतिबंध -
1=अहिंसा- स्वयं सहित किसी भी जीवित प्राणी को मन, वचन या कर्म से दुख या हानि नहीं पहुंचाना। जैसे हम स्वयं से प्रेम करते हैं, वैसे ही हमें दूसरों को भी प्रेम और आदर देना चाहिए।
 अहिंसा का लाभ- किसी के भी प्रति अहिंसा का भाव रखने से जहां सकारात्मक भाव के लिए आधार तैयार होता है वहीं प्रत्येक व्यक्ति ऐसे अहिंसकर व्यक्ति के प्रति भी अच्छा भाव रखने लगता है। सभी लोग आपके प्रति अच्छा भाव रखेंगे तो आपके जीवन में  कअच्छा ही होगा।
2=सत्य- मन, वचन और कर्म से सत्यनिष्ठ रहना, दिए हुए वचनों को निभाना, प्रियजनों से कोई गुप्त बात नहीं रखना।
 सत्य का लाभ- सदा सत्य बोलने से व्यक्ति की प्रतिष्ठा और विश्वसनीयता कायम रहती है। सत्य बोलने से व्यक्ति को आत्मिक बल प्राप्त होता है जिससे आत्मविष्वास भी बढ़ता है।
3-अस्तेय- चोरी नहीं करना। किसी भी विचार और वस्तु की चोरी नहीं करना ही अस्तेय है। चोरी उस अज्ञान का परिणाम है जिसके कारण हम यह मानने लगते हैं कि हमारे पास किसी वस्तु की कमी है या हम उसके योग्य नहीं हैं। किसी भी किमत पर दांव-पेच एवं अवैध तरीकों से स्वयं का लाभ न करें।
अस्तेय का लाभ- आपका स्वभाव सिर्फ आपका स्वभाव है। व्यक्ति जितना मेहनती और मौलीक बनेगा उतना ही उसके व्यक्तित्व में निखार आता है। इसी ईमानदारी से सभी को दिलों को ‍जीतकर आत्म संतुष्ट रहा जा सकता है। जरूरी है कि हम अपने अंदर के सौंदर्य और वैभव को जानें।
4-ब्रह्मचर्य- ब्रह्मचर्य के दो अर्थ है- ईश्वर का ध्यान और यौन ऊर्जा का संरक्षण। ब्रह्मचर्य में रहकर व्यक्ति को विवाह से पहले अपनी पूरी शक्ति अध्ययन एवं प्रशिक्षण में लगाना चाहिए। पश्चात इसके दांपत्य के ढांचे के अंदर ही यौन क्रिया करना चाहिए। वह भी विशेष रातों में इससे दूर रहना चाहिए। ब्रह्मचर्य का पालन करने में काफी बातों का ध्यान रखा जाता है- जैसे योनिक वार्ता एवं मजाक, अश्लील चित्र एवं चलचित्र के देखने पर प्रतिबंध। स्त्री और पुरुष को आपस में बातचीत करते समय मर्यादित ढंग से पेश आना चाहिए। इसी से ब्रह्मचर्य कायम रहता है।
ब्रह्मचर्य का लाभ- यौन ऊर्जा ही शरीर की शक्ति होती है। इस शक्ति का जितना संचय होता है व्यक्ति उतना शारीरिक और मानसिक रूप से शक्तिशाली और ऊर्जावान बना रहता है। जो व्यक्ति इस शक्ति को खो देता है वह मुरझाए हुए फूल के समान हो जाता है।
5=क्षमा- यह जरूरी है कि हम दूसरों के प्रति धैर्य एवं करुणा से पेश आएं एवं उन्हें समझने की कोशिश करें। परिवार एवं बच्चों, पड़ोसी एवं सहकर्मियों के प्रति सहनशील रहें क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति परिस्‍थितिवश व्यवहार करता है।
क्षमा का लाभ- परिवार, समाज और सहकर्मियों में आपके प्रति सम्मान बढ़ेगा। लोगों को आप समझने का समय देंगे तो लोग भी आपको समझने लगेंगे।
6=धृति - स्थिरता, चरित्र की दृढ़ता एवं ताकत। जीवन में जो भी क्षेत्र हम चुनते हैं, उसमें उन्नति एवं विकास के लिए यह जरूरी है कि निरंतर कोशिश करते रहें एवं स्थिर रहें। जीवन में लक्ष्य होना जरूरी है तभी स्थिरता आती है। लक्ष्यहिन व्यक्ति जीवन खो देता है।
धृति का लाभ- चरित्र की दृढ़ता से शरीर और मन में स्थि‍रता आती है। सभी तरह से दृढ़ व्यक्ति लक्ष्य को भेदने में सक्षम रहता है। इस स्थिरता से जीवन के सभी संकटों को दूर किया जा सकता है। यही सफलता का रहस्य है।
7=दया- यह क्षमा का विस्त्रत रूप है। इसे करुणा भी कहा जाता है। जो लोग यह कहते हैं कि दया ही दुख का कारण है वे दया के अर्थ और महत्व को नहीं समझते। यह हमारे आध्यात्मिक विकास के लिए एक बहुत आवश्यक गुण है।
दया का लाभ- जिस व्यक्ति में सभी प्राणियों के प्रति दया भाव है वह स्वयं के प्रति भी दया से भरा हुआ है। इसी गुण से भगवान प्रसन्न होते हैं। यही गुण चरित्र से हमारे आस पास का माहौल अच्छा बनता है।
8=आर्जव- दूसरों को नहीं छलना ही सरलता है। अपने प्रति एवं दूसरों के प्रति ईमानदारी से पेश आना।
आजर्व का लाभ- छल और धोके से प्राप्त धन, पद या प्रतिष्ठा कुछ समय तक ही रहती है, लेकिन जब उस व्यक्ति का पतन होता है तब उसे बचाने वाला भी कोई नहीं रहता। स्वयं द्वारा अर्जित संपत्ति आदि से जीवन में संतोष और सुख की प्राप्ति होती है।
9=मिताहार- भोजन का संयम ही मिताहार है। यह जरूरी है कि हम जीने के लिए खाएं न कि खाने के लिए जिएं। सभी तरह का व्यसन त्यागकर एक स्वच्छ भोजन का चयन कर नियत समय पर खाएं। स्वस्थ रहकर लंबी उम्र जीना चाहते हैं तो मिताहार को अपनाएं। होटलों एवं ऐसे स्थानों में जहां हम नहीं जानते कि खाना किसके द्वारा या कैसे बनाया गया है, वहां न खाएं।
मिताहार  का लाभ- आज के दौर में मिताहार की बहुत जरूरत है। अच्छा आहार हमारे शरीर को स्वस्थ बनाएं रखकर ऊर्जा और स्फूति भी बरकरार रखता है। अन्न ही अमृत है और यही जहर बन सकता है।
10=शौच- आंतरिक एवं बाहरी पवित्रता और स्वच्छता। इसका अर्थ है कि हम अपने शरीर एवं उसके वातावरण को पूर्ण रूप से स्वच्छ रखें। हम मौखिक और मानसिक रूप से भी स्वच्छ रहें।
शौच का लाभ- वातावरण, शरीर और मन की स्वच्छता एवं व्यवस्था का हमारे अंतर्मन पर सात्विक प्रभाव पड़ता है। स्वच्छता सकारात्मक और दिव्यता बढ़ती है। यह जीवन को सुंदर बनाने के लिए बहुत जरूरी है। सनातन  हिन्दू धर्म  के दस नियम।
1=ह्री- पश्चात्ताप को ही ह्री कहते हैं। अपने बुरे कर्मों के प्रति पश्चाताप होना जरूरी है। यदि आपमें पश्चाताप की भावना नहीं है तो आप अपनी बुराइयों को बढ़ा रहे हैं। विनम्र रहना एवं अपने द्वारा की गई भूल एवं अनुपयुक्त व्यवहार के प्रति असहमति एवं शर्म जाहिर करना जरूरी है, इसका यह मतलब कतई नहीं की हम पश्चाताप के बोझ तले दबकर फ्रेस्ट्रेशन में चले जाएं।
ह्री का लाभ- पश्चाताप हमें अवसाद और तनाव से बचाता है तथा हममें फिर से नैतिक होने का बल पैदा करता है। मंदिर, माता-पिता या स्वयं के समक्ष खड़े होकर भूल को स्वीकारने से मन और शरीर हल्का हो जाता है।
2=संतोष- प्रभु ने हमारे निमित्त जितना भी दिया है, उसमें संतोष रखना और कृतज्ञता से जीवन जीना ही संतोष है। जो आपके पास है उसका सदुपयोग करना और जो अपके पास नहीं है, उसका शोक नहीं करना ही संतोष है। अर्थात जो है उसी से संतुष्ट और सुखी रहकर उसका आनंद लेना।
संतोष का लाभ- यदि आप दूसरों के पास जो है उसे देखर और उसके पाने की लालसा में रहेंगे तो सदा दुखी ही रहेगें बल्कि होना यह चाहिए कि हमारे पास जो है उसके होने का सुख कैसे मनाएं या उसका सदुपयोग कैसे करें यह सोचे इससे जीवन में सुख बढ़ेगा।
3=दान- आपके पास जो भी है वह ईश्वर और इस कुदरत की देन है। यदि आप यह समझते हैं कि यह तो मेरे प्रयासों से हुआ है तो आपमें घमंड का संचार होगा। आपके पास जो भी है उसमें से कुछ हिस्सा सोच समझकर दान करें। ईश्वर की देन और परिश्रम के फल के हिस्से को व्यर्थ न जाने दें। इसे आप मंदिर, धार्मिक एवं आध्यात्मिक संस्थाओं में दान कर सकते हैं या किसी गरीब के लिए दान करें।
दान का लाभ- दान किसे करें और दान का महत्व क्या है यह जरूर जानें। दान पुण्य करने से मन की ग्रंथियां खुलती है और मन में संतोष, सुख और संतुलन का संचार होता है। मृत्युकाल में शरीर आसानी से छुट जाता है।
4=आस्तिकता- वेदों में आस्था रखने वाले को आस्तिक कहते हैं। माता-पिता, गुरु और ईश्वर में निष्ठा एवं विश्वास रखना भी आस्तिकता है।
आस्तिकता का लाभ- आस्तिकता से मन और मस्तिष्क में जहां समारात्मकता बढ़ती हैं वहीं हमारी हर तरह की मांग की पूर्ति भी होती है। अस्तित्व या ईश्वर से जो भी मांगा जाता है वह तुरंत ही मिलता है। अस्तित्व के प्रति आस्था रखना जरूरी है।
5=ईश्वर प्रार्थना- बहुत से लोग पूजा-पाठ करते हैं, लेकिन सनातन हिन्दू धर्म में ईश्वर या देवी-देवता के लिए संध्यावंदन करने का निर्देश है। संध्यावंदन में प्रार्थना, स्तुति या ध्यान किया जाता है वह भी प्रात: या शाम को सूर्यास्त के तुरंत बाद।
ईश्वर की  प्रार्थना का लाभ- पांच या सात मिनट आंख बंद कर ईश्वर या देवी देवता का ध्यान करने से व्यक्ति ईथर माध्यम से जुड़कर उक्त शक्ति से जुड़ जाता है। पांच या सात मिनट के बाद ही प्रार्थना का वक्त शुरू होता है। फिर यह आप पर निर्भर है कि कब तक आप उक्त शक्ति का ध्यान करते हैं। इस ध्यान या प्रार्थना से सांसार की सभी समस्याओं का हल मिल जाता है।
6=सिद्धांत श्रवण- निरंतर वेद, उपनिषद या गीता का श्रवण करना। वेद का सार उपनिषद और उपनिषद का सार गीता है। मन एवं बुद्धि को पवित्र तथा समारात्मक बनाने के लिए साधु-संतों एवं ज्ञानीजनों की संगत में वेदों का अध्ययन एक शक्तिशाली माध्यम है।
सिद्धांत श्रवणका लाभ- जीस तरह शरीर के लिए पौ‍ष्टिक आहार की जरूरत होती है उसी तरह दिमाग के लिए समारात्मक बात, किताब और दृष्य की आवश्यकता होती है। आध्यात्मिक वातावरण से हमें यह सब हासिल होता है। यदि आप इसका महत्व नहीं जानते हैं तो आपके जीवन में हमेशा नकारात्मक ही होता रहता है।
7=मति- हमारे धर्मग्रंथ और धर्म गुरुओं द्वारा सिखाई गई नित्य साधना का पालन करना। एक प्रामाणिक गुरु के मार्गदर्शन से पुरुषार्थ करके अपनी इच्छा शक्ति एवं बुद्धि को आध्यात्मिक बनाना।
मति का लाभ- संसार में रहें या संन्यास में निरंतर अच्छी बातों का अनुसरण करना जरूरी है तभी जीवन को सुंदर बनाकर शांति, सुख और समृद्धि से रहा जा सकता है। इसके सबसे पहले अपनी बुद्धि को पुरुषार्थ द्वारा आध्यात्मिक बनाना जरूरी है।
8=व्रत- अतिभोजन, मांस एवं नशीली पदार्थों का सेवन नहीं करना, अवैध यौन संबंध, जुए आदि से बचकर रहना- ये सामान्यत: व्रत के लिए जरूरी है।
इसका गंभीरता से पालन चाहिए अन्यथा एक दिन सारी आध्यात्मिक या सांसारिक कमाई पानी में बह जाती है। यह बहुत जरूरी है कि हम विवाह, एक धार्मिक परंपरा के प्रति निष्ठा, शाकाहार एवं ब्रह्मचर्य जैसे व्रतों का सख्त पालन करें।
बृत का लाभ- व्रत से नैतिक बल मिलता है तो आत्मविश्वास तथा दृढ़ता बढ़ती है। जीवन में सफलता अर्जित करने के लिए व्रतवान बनना जरूरी है। व्रत से जहां शरीर स्वस्थ बना रहता है वही मन और बुद्धि भी शक्तिशाली बनते हैं।
9=जप- जब दिमाग या मन में असंख्य विचारों की भरमार होने लगती है तब जप से इस भरमार को भगाया जा सकता है। अपने किसी इष्ट का नाम या प्रभु स्मरण करना ही जप है। यही प्रार्थना भी है और यही ध्यान भी है।
जप का लाभ- हजारों विचार को भगाने के लिए मात्र एक मंत्र ही निरंतर जपने से सभी हजारों विचार धीरे-धीरे लुप्त हो जाते हैं। हम रोज स्नान करके अपने आपको स्वच्छ रखते हैं, उसी जप से मन की सफाई हो जाती है। इसे मन में झाडू लगना भी कहा जाता।
१0=तप- मन का संतुलन बनाए रखना ही तप है। व्रत जब कठीन बन जाता है तो तप का रूप धारण कर लेता है। निरंतर किसी कार्य के पीछे पड़े रहना भी तप है। निरंतर अभ्यास करना भी तप है। त्याग करना भी तप है। सभी इंद्रियों को कंट्रोल में रखकर अपने अनुसार चलापा भी तप है। उत्साह एवं प्रसन्नता से व्रत रखना, पूजा करना, पवित्र स्थलों की यात्रा करना। विलासप्रियता एवं फिजूलखर्ची न चाहकर सादगी से जीवन जीना। इंद्रियों के संतोष के लिए अपने आप को अंधाधुंध समर्पित न करना भी तप है।
तप का लाभ- जीवन में कैसी भी दुष्कर परिस्थिति आपके सामने प्रस्तुत हो, तब भी आप दिमागी संतुलन नहीं खो सकते, यदि आप तप के महत्व को समझते हैं तो। अनुशासन एवं परिपक्वता से सभी तरह की परिस्थिति पर विजय प्रा‍प्त की जा सकती है।
अंत: जो व्यक्ति यम और नियम का पालन करता है वह जीवन के किसी भी क्षेत्र में सफल होने की ताकत रखता है। यह प्रतिबंध और नियम सभी धर्मों का सार है।

श्री हनुमान बालाजी सरकार का सूर्य अस्त के बाद करे इस प्रकार पूजन दूर होगा आर्थिक संकट !!

कलियुग में हनुमानजी की पूजा सबसे जल्दी मनोकामनाएं पूर्ण करने वाली मानी गई है। जो भी व्यक्ति सही विधि से बजरंगबली को मनाने के लिए पूजन करता है, उसे जल्दी ही शुभ फल प्राप्त हो सकते हैं। यदि आप भी हनुमानजी के भक्त हैं और धन संबंधी समस्याओं से मुक्ति पाना चाहते हैं तो यहां दीपक का एक पूजन बताया जा रहा है। यह पूजन सूर्यास्त के बाद करना है।
पूजन करने से पहले ध्यान रखें ये सामान्य सावधानियां :=
हनुमानजी के पूजन में साफ-सफाई और पवित्रता का विशेष ध्यान रखना अनिवार्य है। किसी भी प्रकार की अपवित्रता नहीं होनी चाहिए। जब भी पूजा करें, तब हमें मन से और तन से पवित्र हो जाना चाहिए। पूजन के दौरान गलत विचारों की ओर मन को भटकने न दें। यह कुछ सामान्य सावधानियां हैं, जो कि हनुमानजी का पूजन करते समय ध्यान रखनी चाहिए।
पूजन के लिए जरूरी हैं ये सामान :=
मिट्टी का दीपक, सरसो का तेल, रूई की बत्ती, सिंदूर, चमेली का तेल, अगरबत्ती, पुष्प-हार और बैठने के लिए साफ आसन।
पूजन की विधि:=
शाम को सूर्यास्त के बाद किसी भी हनुमानजी के मंदिर जाएं। इसके पूर्व पवित्र हो जाना चाहिए। मंदिर पहुंचकर हनुमानजी के सामने साफ आसन पर बैठें और सरसो के तेल का दीपक लगाएं। दीपक चौमुखा होना चाहिए यानी बत्ती इस प्रकार लगाएं कि दीपक को चारों ओर से जलाया जा सके। इस प्रकार दीपक लगाने के साथ ही अगरबत्ती, पुष्प आदि अर्पित करें। सिंदूर, चमेली का तेल चढ़ाएं। दीपक लगाते समय हनुमानजी के मंत्रों का जप करना चाहिए। 
मंत्र- ऊँ रामदूताय नम:, ऊँ पवन पुत्राय नम: आदि। इसके बाद हनुमान चालीसा का जप करें।
विशेष:==
यदि आप पूरी हनुमान चालीसा पढऩे में समर्थ न हों तो कुछ पंक्तियों का जप भी कर सकते हैं। इस उपाय से बहुत जल्द व्यक्ति का बुरा समय दूर हो सकता है। धन संबंधी परेशानियां दूर हो सकती हैं।हर मंगलवार या शनिवार के दिन बजरंगबली को बना हुआ बनारसी पान चढ़ाना चाहिए। बनारसी पत्ते का बना हुआ पान चढ़ाने से भी हनुमानजी की कृपा प्राप्त होती है।जो भक्त रामायण या श्रीरामचरित मानस का पाठ करते हैं या इनके दोहे प्रतिदिन पढ़ते हैं, उन्हें हनुमानजी का विशेष स्नेह प्राप्त होता है।किसी भी खास मुहूर्त में या त्यौहार या विशेष तिथि पर हनुमानजी का पूरा श्रृंगार अपनी श्रद्धा अनुसार करवाना चाहिए। इसे चोला चढ़ाना कहा जाता है। हनुमानजी का चोला चढ़वाने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है और पाप का प्रभाव कम होता है।

Sunday, 23 November 2014

क्या आप जानते है माता भगबती की 51 शक्तिपीठों की स्थापना कैसे हुई !!


ब्रह्मा के पुत्र प्रजापति दक्ष की पुत्री सती से भगवान शिव का विवाह हुआ। कुछ समय बाद दक्ष को पूरे ब्रह्माण्ड का अधिपति बना दिया गया। इससे दक्ष में अभिमान आ गया। वह अपने आपको सर्वश्रेष्ठ समझने लगा। एक यज्ञ में भगवान शिव द्वारा खुद को प्रणाम न करने पर दक्ष ने उन्हें अनेक अपशब्द कहे। दक्ष ने शिव को शाप दिया कि उन्हें देव यज्ञ में उनका हिस्सा नहीं मिलेगा। यह सुनकर नंदी ने भी दक्ष को शाप दिया कि जिस मुंह से वह शिव निंदा कर रहा है वह बकरे का हो जाएगा।कुछ समय बाद दक्ष ने एक भव्य यज्ञ का आयोजन किया। उसमें सभी देवी-देवताओं को बुलाया गया पर अभिमानी दक्ष ने शिव को उस यज्ञ से बहिष्कृत कर दिया। किसी तरह सती को यह पता चला तो उन्होंने शिव से उस यज्ञ में जाने की अनुमति मांगी। पहले तो शिव ने उन्हें समझाया पर जब वे नहीं मानीं तो उन्होंने सती को वहां जाने की अनुमति दे दी। सती अपने पिता के घर पहुंची तो दक्ष ने उनसे आंखें फेर लीं। सती यज्ञ में शिव का भाग न देखकर रूष्ट हो गईं और सभी को बुरा-भला कहने लगीं।यह सुनकर दक्ष ने भी शिव निंदा प्रारम्भ कर दी।यह सुनकर सती को बड़ा दुख हुआ और उन्होंने योगाग्रि से अपने शरीर को भस्म कर दिया। यह देखकर शिव के गणों ने दक्ष यज्ञ पर हमला कर दिया पर देवताओं ने उन्हें वहां से भगा दिया। वे शिव के पास गए और सारी घटना सुना दी। यह सुनकर शिव को बड़ा क्रोध आया। उन्होंने अपनी एक जटा को उखाड़कर जमीन पर मारा जिससे वीरभद्र और महाकाली प्रकट हुए। शिव ने उन दोनों को दक्ष का यज्ञ विध्वंस करने की आज्ञा दी। उन्होंने पल भर में ही दक्ष का यज्ञ विध्वंश कर डाला और वीरभद्र ने दक्ष का सिर काट कर उसे यज्ञ कु ण्ड में फेंक दिया।यह देखकर देवताओं में हडकंप मच गया और उन्होंने शिव स्तुति प्रारम्भ कर दी। उनकी स्तुति उन्होंने सभी को जीवनदान दे दिया और दक्ष के शरीर पर बकरे का सिर लगाकर उसे भी जीवित कर दिया। बाद में शिव की अनुमति से दक्ष ने अपना यज्ञ पूरा किया।अपनी प्रिय पत्नी के शव को लेकर शिव पूरे ब्रह्माण्ड में घूमने लगे।उनके प्रताप से सारी सृष्टि जलने लगी। तब विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के ५1 टुकड़े कर दिए। ये टुकड़े जहां-जहां गिरे वहां शक्तिपीठों की स्थापना हुई। तब सती का पूरा शरीर कट कर गिर गया तो भगवान बहुत दुखी हुए और कैलास पर जाकर एकांत में समाधि ले ली।

Saturday, 22 November 2014

भगबान को कैसे भक्त पसंद है !!


एक बार अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से प्रश्न किया, ‘आपको किन-किन सद्गुणों वाला भक्त प्रिय है?’
श्रीकृष्ण ने बताया, ‘जो किसी प्राणी से द्वेष नहीं करता, सबसे सद्भाव व मैत्री भाव रखता है, सब पर करुणा करता है, क्षमाशील है, ममता और अहंकार से रहित है, सुख-दुख में एक समान रहता है, वह भक्त मुझे प्रिय है।’
‘स्वर्ग के अधिकारी कौन होते हैं?’
इसका उत्तर देते हुए उन्होंने कहा, ‘जो दान, तपस्या, सत्य भाषण और इंद्रिय संयम द्वारा निरंतर धर्माचरण में लगे रहते हैं, ऐसे मनुष्य स्वर्गगामी होते हैं। जो माता-पिता की सेवा करते हैं तथा भाइयों के प्रति स्नेह रखते हैं, वे स्वर्ग को जाते हैं।’
हिंसा व अन्य दुष्प्रवृत्तियों को पतन का क्या कारण है !
श्रीकृष्ण ने कहा, ‘हे महाबाहु अर्जुन, प्राणियों की हिंसा करनेवाले, लोभ-मोह में फंसकर जीवन निरर्थक करनेवाले व्यक्ति का पतन हो जाता है। लेकिन जो व्यक्ति न किसी से द्वेष करता है और न आकांक्षा करता है, उसे सदा संन्यासी, महात्मा ही समझना चाहिए, क्योंकि राग-द्वेष आदि द्वंद्वों से रहित पुरुष सुखपूर्वक संसार-बंधन से मुक्त हो जाता है।’भगवान श्रीकृष्ण आगे कहते हैं, ‘जिसके चित्त में असंतोष व अभाव का बोध है, वही दरिद्र है। जिसकी चित्तवृत्ति विषयों में आसक्त नहीं है, वह समर्थ-स्वतंत्र है और सदा शांति की अनुभूति करता है।’ भक्तों को महत्व देते हुए श्रीकृष्ण ने बताया, ‘भक्त के पीछे-पीछे मैं निरंतर यह सोचकर घूमा करता हूं कि उसके चरणों की धूल उड़कर मुझ पर पड़ेगी और मैं पवित्र हो जाऊंगा।’

हनुमान चलिशा का पाठ करने से मिलती है तेज बुद्धि, दूर होते हैं क्लेश और विकार !!

आज का युग कल युग है यानि मशीनी युग जिसका अर्थ है कल -मशीन और युग -समय !आज के दौर में जिन लोगों की बुद्धि तेज है, वे ही तेजी से सफलता प्राप्त कर पाते हैं। हर क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा काफी अधिक हो गई है। ऐसे में जो लोग हालात को समझने में अधिक समय लगाते हैं, वे सफलता प्राप्त नहीं कर पाते हैं, घर-परिवार में सामंजस्य नहीं बना पाते हैं। आज काफी लोग क्लेश-विकार के भी शिकार हैं। क्लेश यानी कष्ट, मानसिक तनाव, चिंता और विकार यानी दोष, बुराई। तेज बुद्धि के साथ ही क्लेश और विकार दूर करने के लिए सबसे सरल उपाय है नियमित रूप से हनुमान चालीसा का पाठ किया जाए।

मानव जीवन के क्लेश- अविद्या यानी अज्ञान, अस्मिता यानी अपमान, राग यानी लगाव, द्वेष यानी मन-मुटाव, अभिनिवेश यानी मृत्यु का भय।

मानव जीवन के विकार यानी बुरी आदतें- काम यानी वासना, क्रोध यानी गुस्सा, लोभ यानी लालच, मद यानी नशा, मोह यानी आसक्ति या अत्यधिक लगाव, मत्सर यानी बुरी लत।

ये सभी क्लेश और विकार, हमें लक्ष्य से दूर करते हैं और सही दिशा से भटकाते हैं। इनसे बचने के लिए नियमित रूप से हनुमान चालीसा का पाठ करना चाहिए।यदि हम हर रोज हनुमान चालीसा का जप नहीं कर सकते हैं तो सप्ताह में दो दिन मंगलवार और शनिवार को जप कर सकते हैं। यदि सप्ताह में दो दिन भी संभव ना हो सके तो सप्ताह में किसी भी एक दिन जप कर सकते हैं। यदि एक दिन में भी पूरी हनुमान चालीसा का पाठ नहीं सकते हैं तो सच्चे मन से हनुमानजी का ध्यान करते हुए किसी एक चौपाई का जप भी कर लेंगे तो हनुमानजी की कृपा प्राप्त की जा सकती है।

हनुमान चालीसा के पाठ और किस चौपाई से क्या-क्या लाभ प्राप्त हो सकते हैं !

बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन कुमार।बल-बुद्धि बिद्या देह मोहिं, हरहु कलेस बिकार।।
यदि कोई व्यक्ति नियमित रूप से सिर्फ इन दो पंक्तियों का जप 108 बार जप करता है तो उसे तेज बुद्धि प्राप्त हो सकती है। इन पंक्तियों के प्रभाव से हनुमानजी व्यक्ति के सभी क्लेश और विकार भी दूर करते हैं। इन पंक्तियों का अर्थ यह है कि हे पवन कुमार। मैं खुद को बुद्धि हीन मानता हूं और आपका ध्यान, स्मरण करता हूं। आप मुझे बल-बुद्धि और विद्या प्रदान करें। मेरे सभी कष्टों और दोषों को दूर करने की कृपा कीजिए।पंक्तियों में छिपे हुए भाव के साथ हर रोज पूरी हनुमान चालीसा या सिर्फ इन पंक्तियों का जप करना चाहिए। यदि सिर्फ इन पंक्तियों का जप करना चाहते हैं तो जप की संख्या कम से कम 108 रखेंगे तो बेहतर रहेगा। जप के लिए रुद्राक्ष की माला का उपयोग किया जा सकता है। हनुमान चालीसा का जप करने के लिए किसी भी हनुमान मंदिर जा सकते हैं या घर पर ही किसी पवित्र और शांत स्थान पर पाठ किया जा सकता है। पाठ करने से पूर्व स्नान आदि से स्वयं को पूरी तरह पवित्र कर लेना चाहिए। साफ-स्वच्छ वस्त्र धारण करें और आसन पर बैठकर हनुमानजी का ध्यान करते हुए जप करें।
रामदूत अतुलित बलधामा।अंजनिपुत्र पवनसुत नामा।
यदि कोई व्यक्ति इस चौपाई का जप करता है तो उसे शारीरिक कमजोरियों से मुक्ति मिलती है। इस पंक्ति का अर्थ यह है कि हनुमानजी श्रीराम के दूत हैं और अतुलित बल के धाम हैं। हनुमानजी परम शक्तिशाली हैं। इनकी माता का नाम अंजनी है, इसी वजह से इन्हें अंजनी पुत्र कहा जाता है। शास्त्रों के अनुसार हनुमानजी को पवन देव का पुत्र माना जाता है, इसी वजह से इन्हें पवनसुत भी कहते हैं।
महाबीर बिक्रम बजरंगी।कुमति निवार सुमति के संगी।।
यदि कोई व्यक्ति हनुमान चालीसा की केवल इस पंक्ति का जप करता है तो उसे सुबुद्धि की प्राप्ति होती है। इस पंक्ति का जप करने वाले व्यक्ति के कुविचार नष्ट होते हैं और सुविचार बनने लगते हैं। बुराई से ध्यान हटता है और अच्छाई की ओर मन लगता है।इस चौपाई का अर्थ यही है कि बजरंगबली महावीर हैं और हनुमानजी कुमति को निवारते हैं। कुमति को दूर करते हैं और सुमति यानी अच्छे विचारों को बढ़ाते हैं।
बिद्यबान गुनी अति चातुर।रामकाज करीबे को आतुर।।
यदि किसी व्यक्ति को विद्या धन चाहिए तो उसे इस पंक्ति का जप करना चाहिए। इस पंक्ति के जप से हमें विद्या और चतुराई प्राप्त होती है। इसके साथ ही हमारे हृदय में श्रीराम की भक्ति भी बढ़ती है।इस चौपाई का अर्थ है कि हनुमानजी विद्यावान हैं और गुणवान हैं। हनुमानजी चतुर भी हैं। वे सदैव श्रीराम के काम करने के लिए तत्पर रहते हैं। जो भी व्यक्ति इस चौपाई का जप करता है, उसे हनुमानजी की ही तरह विद्या, गुण, चतुराई के साथ ही श्रीराम की भक्ति प्राप्त होती है।
भीम रूप धरि असुर संहारे।रामचंद्रजी के काज संवारे।।
जब आप शत्रुओं से परेशान हो जाएं और कोई रास्ता दिखाई न दे तो हनुमान चालीसा का जप करें। यदि एकाग्रता और भक्ति के साथ हनुमान चालीसा की सिर्फ इस पंक्ति का भी जप 108 बार हर रोज किया जाए तो शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है। श्रीराम की कृपा प्राप्त होती है।इस पंक्ति का अर्थ यह है कि श्रीराम और रावण के बीच हुए युद्ध में हनुमानजी ने भीम रूप यानी विशाल रूप धारण करके असुरों-राक्षसों का संहार किया था। श्रीराम के काम पूर्ण करने में हनुमानजी ने अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। जिससे श्रीराम के सभी काम संवर गए।
लाय संजीवन लखन जियाये।श्रीरघुबीर हरषि उर लाये।।
इस पंक्ति का जप करने से भयंकर बीमारियों से भी मुक्ति मिल सकती है। यदि कोई व्यक्ति किसी गंभीर बीमारी से पीडि़त है और दवाओं का भी असर नहीं हो रहा है तो उस रोगी को भक्ति के साथ पूरी हनुमान चालीसा का या इस पंक्ति का जप हर रोज 108 बार करना चाहिए। दवाओं का असर होना शुरू हो जाएगा, बीमारी धीरे-धीरे ठीक होने लगेगी। इस उपाय के साथ ही चिकित्सक द्वारा बताए गए नियमों का भी पालन करते रहना चाहिए।इस चौपाई का अर्थ यह है कि जब रावण के पुत्र मेघनाद ने लक्ष्मण को मुर्छित कर दिया था। तब कई औषधियों के प्रभाव से भी लक्ष्मण की चेतना लौट नहीं रही थी। उस समय हनुमानजी संजीवनी औषधि लेकर आए और लक्ष्मणजी के प्राण बचाए। हनुमानजी के इस चमत्कार से श्रीराम अतिप्रसन्न हुए।

Friday, 21 November 2014

बालाजी कृपा का भक्तो के लिए संदेश !!

प्रिय भक्तो आप लोगो को यदि आर्थिक संकट, मानसिक संकट, प्रेतादिक संकट, शारीरिक संकट, कालसर्प दोष, पितृ दोष, मंगली दोष, कुण्डली दोष, नव ग्रह की दशा-महादशा, और प्रेतादिक की परेशानी है !तो बालाजी कृपा द्वारा बताये गये‌ उपाय ‌से दूर कर सकते हैं और अपने कष्टों के बारे में बालाजी कृपा से विस्तार से जानकारी भी प्राप्त कर सकते है  ! और यदि आप स्वंय उपाय नही कर सकते तो आप बालाजी कृपा के माध्यम से दूर करवा सकते है ! बालाजी कृपा इन सभी कष्टों का निवारण योग्य आचार्यो द्वारा श्री हनुमान बालाजी सरकार व अन्य देवो के पूजा-पाठ, जाप, हबन-यज्ञ एवंम् धार्मिक अनुष्ठानों के माध्यम से सत्-प्रतिसत करती है !

मनुष्य की सोच और कर्म ही भाग्य का निर्माण करते है...

कर्मवादी लोग कहते हैं भाग्य कुछ नहीं होता, भाग्यवादी लोग कहते हैं किस्मत में जो लिखा होता है बही होता है , कर्म कुछ भी करते रहो। भाग्यवादी और कर्मवादी लोगों की यह बहस कभी खत्म नहीं हो सकती। लेकिन यह भी सत्य है कि भाग्य और कर्म दोनों के बीच एक रिश्ता सोच का जरूर होता है। कर्म से भाग्य बनता है या भाग्य से कर्म करते हैं इन दोनों के बीच सोच का  खास रिश्ता जरूर होता है।सोच, कर्म और भाग्य के बीच के इस रिश्ते को समझने के लिए यह कथा बहुत ही अच्छा उदाहरण हो सकती है। कहते हैं एक बार ऋषि नारद भगवान विष्णु के पास गए। उन्होंने शिकायती लहजे में भगवान से कहा पृथ्वी पर अब आपका प्रभाव कम हो रहा है। धर्म पर चलने वालों को कोई अच्छा फल नहीं मिल रहा, जो पाप कर रहे हैं उनका भला हो रहा है। भगवान ने कहा नहीं, ऐसा नहीं है, जो भी हो रहा है, सब नियती के मुताबिक ही हो रहा है। नारद नहीं माने। उन्होंने कहा मैं तो देखकर आ रहा हूं, पापियों को अच्छा फल मिल रहा है और भला करने वाले, धर्म के रास्ते पर चलने वाले लोगों को बुरा फल मिल रहा है। भगवान ने कहा कोई ऐसी घटना बताओ। नारद ने कहा अभी मैं एक जंगल से आ रहा हूं, वहां एक गाय दलदल में फंसी हुई थी। कोई उसे बचाने वाला नहीं था।तभी एक चोर उधर से गुजरा, गाय को फंसा हुआ देखकर भी नहीं रुका, उलटे उस पर पैर रखकर दलदल लांघकर निकल गया। आगे जाकर उसे सोने की मोहरों से भरी एक थैली मिल गई। थोड़ी देर बाद वहां से एक वृद्ध साधु गुजरा। उसने उस गाय को बचाने की पूरी कोशिश की। पूरे शरीर का जोर लगाकर उस गाय को बचा लिया लेकिन मैंने देखा कि गाय को दलदल से निकालने के बाद वह साधु आगे गया तो एक गड्ढे में गिर गया। भगवान बताइए यह कौन सा न्याय है।भगवान मुस्कुराए, फिर बोले नारद यह सही ही हुआ। जो चोर गाय पर पैर रखकर भाग गया था, उसकी किस्मत में तो एक खजाना था लेकिन उसके इस पाप के कारण उसे केवल कुछ मोहरे ही मिलीं।वहीं उस साधु को गड्ढे में इसलिए गिरना पड़ा क्योंकि उसके भाग्य में मृत्यु लिखी थी लेकिन गाय के बचाने के कारण उसके पुण्य बढ़ गए और उसे मृत्यु एक छोटी सी चोट में बदल गई। इंसान के कर्म से उसका भाग्य तय होता है। अब नारद संतुष्ट थे|इस लिए अच्छी सोच सोच रखो तो अच्छे कर्म करोगे और अच्छा कर्म करोगे तो अच्छा भाग्य बनेगा !!

क्या आप को पता है श्री राधा-कृष्ण जी का विवाह हुआ था !!

संसार में से बहुत से लोग यही जानते हैं कि राधाजी श्रीकृष्ण की प्रेमिका थीं परन्तु इनका विवाह नहीं हुआ था। श्रीकृष्ण के गुरू गर्गाचार्य जी द्वारा रचित "गर्ग संहिता" में यह वर्णन है कि राधा-कृष्ण का विवाह हुआ था। एक बार नन्द बाबा कृष्ण जी को गोद में लिए हुए गाएं चरा रहे थे। गाएं चराते-चराते वे वन में काफी आगे निकल आए। अचानक बादल गरजने लगे और आंधी चलने लगी। नन्द बाबा ने देखा कि सुन्दर वस्त्र आभूषणों से सजी राधा जी प्रकट हुई। नन्द बाबा ने राधा जी को प्रणाम किया और कहा कि वे जानते हैं कि उनकी गोद मे साक्षात श्रीहरि हैं और उन्हें गर्ग जी ने यह रहस्य बता दिया था। भगवान कृष्ण को राधाजी को सौंप कर नन्द बाबा चले गए। तब भगवान कृष्ण युवा रूप में आ गए। वहां एक विवाह मण्डप बना और विवाह की सारी सामग्री सुसज्जित रूप में वहां थी। भगवान कृष्ण राधाजी के साथ उस मण्डप में सुंदर सिंहासन पर विराजमान हुए। तभी वहां ब्रम्हा जी प्रकट हुए और भगवान कृष्ण का गुणगान करने के बाद कहा कि वे ही उन दोनों का पाणिग्रहण संस्कार संपन्न कराएंगे। ब्रम्हा जी ने वेद मंत्रों के उच्चारण के साथ विवाह कराया और दक्षिणा में भगवान से उनके चरणों की भंक्ति मांगी। विवाह संपन्न कराने के बाद ब्रम्हा जी लौट गए। नवविवाहित युगल ने हंसते खेलते कुछ समय यमुना के तट पर बिताया। अचानक भगवान कृष्ण फिर से शिशु रूप में आ गए। राधाजी का मन तो नहीं भरा था पर वे जानती थीं कि श्री हरि भगवान की लीलाएं अद्भुत हैं। वे शिशु रूपधारी श्री कृष्ण को लेकर माता यशोदा के पास गई और कहा कि रास्ते में नन्द बाबा ने उन्हें बालक कृष्ण को उन्हें देने को कहा था। राधा जी उम्र में श्रीकृष्ण से बडी थीं। यदि राधा-कृष्ण की मिलन स्थली की भौगोलिक पृष्ठभूमि देखें तो नन्द गांव से बरसाना 7 किमी है तथा वह वन जहाँ ये गायें चराने जाते थे नंद गांव और बरसाना के ठीक मघ्य में है। भारतीय वाङग्मय के अघ्ययन से प्रकट होता है कि राधा प्रेम का प्रतीक थीं और कृष्ण और राधा के बीच दैहिक संबंधों की कोई भी अवधारणा शास्त्रों में नहीं है। इसलिए इस प्रेम को अध्यात्मिक प्रेम  की श्रेणी में रखते हैं। इसलिए कृष्ण के साथ सदा राधाजी को ही प्रतिष्ठा मिली।

कैसे हुआ भगबान श्री कृष्ण का पृथ्वी अवतार !!

द्वापर युग की बात है, एक बार पृथ्वी पर पाप कर्म बहुत बढ़ गए। सभी देवता चिंतित थे। अपनी समस्या लेकर वे भगवान विष्णु के पास गए।भगवान विष्णु ने उनकी बात सुनकर उन्हें आश्वस्त करते हुए कहा, “चिंता न करें, मैं नर-अवतार लेकर पृथ्वी पर आऊंगा और इसे पापों से मुक्ति प्रदान करूंगा। मेरे अवतार लेने से पहले कश्यप मुनि मथुरा के यदुकुल में जन्म लेकर वसुदेव नाम से प्रसिद्ध होंगे। उनकी दूसरी पत्नी के गर्भ से मेरी सवारी शेषनाग बलराम के रूप में उत्पन्न होंगे और उनकी पहली पत्नी देवकी के गर्भ से मैं ‘कृष्ण’ के रूप में जन्म लूंगा। कुरुक्षेत्र के मैदान में मैं पापी क्षत्रियों का संहार कर पृथ्वी को पापों से भारमुक्त करूंगा।”वह समय भी जल्द ही आ गया। मथुरा में ययाति वंश के राजा उग्रसेन का राज था। राजा उग्रसेन के पुत्रों में सबसे बड़ा पुत्र कंस था। देवकी का जन्म उन्हीं के यहां हुआ। इस तरह देवकी का जन्म कंस की चचेरी बहन के रूप में हुआ। इधर कश्यप ऋषि का जन्म राजा शूरसेन के पुत्र वसुदेव के रूप में हुआ। बाद में देवकी का विवाह वसुदेव के साथ संपन्न हुआ।कंस देवकी से बहुत स्नेह करता था। पर एक बार आकाश से भविष्यवाणी सुनाई दी, “देवकी का आठवां पुत्र तुम्हारा काल होगा। तुम्हारी मृत्यु उसी के हाथों निश्चित है।” बस उसी दिन से कंस देवकी को मारने के लिए उद्धत हो गया।इस घटना से चारों तरफ हाहाकार मच गया। अनेक योद्धा वसुदेव का साथ देने के लिए तैयार हो गए। पर वसुदेव युद्ध नहीं चाहते थे। उन्होंने कंस को भरोसा दिलाया कि “देवकी के किसी बच्चे के जन्म लेते ही मैं उसे तुम्हें सौंप दूंगा।”वसुदेव झूठ नहीं बोलते थे। कंस ने उनकी बातों पर भरोसा कर लिया। उनके समझाने पर कंस का गुस्सा तो शांत हो गया पर उसने वसुदेव और देवकी को कारागार में डाल दिया और सख्त पहरा लगवा दिया।जैसे ही देवकी ने प्रथम पुत्र को जन्म दिया वसुदेव ने उसे कंस के हवाले कर दिया। कंस ने उसे चट्टान पर पटक कर मार डाला। इस तरह उसने देवकी के छह पुत्रों को मार दिया। देवकी के सातवीं बार गर्भवती होने पर शेषनाग अपने अंश से उसके गर्भ में पधारे।और आठवी संतान के रूप स्वयं भगबान विष्णु अंश अवतार में प्रकट हो गए !

Thursday, 20 November 2014

शनि दोष को तेल और नारियल से दूर करे !!

 शनि दोषों को दूर करने के लिए तेल से संबंधित उपाय सबसे अधिक प्रभावी होते हैं। यदि आप भी शनि से शुभ फल प्राप्त करना चाहते हैं तो प्रतिदिन नारियल के तेल में कर्पूर मिलाकर अपने बालों में लगाएं। ऐसा करने पर आपके बाल चमकदार और स्वस्थ बनेंगे और साथ ही शनि के दोषों से भी मुक्ति मिलेगी।
बहती नदी में बहाएं नारियल !
 शुभ फल पाने के लिए किसी पवित्र बहती हुई नदी में समय-समय पर एक-एक नारियल प्रवाहित करें। नारियल प्रवाहित करने से पहले अपने नाम और गौत्र का उच्चारण करना चाहिए। इसके बाद अपने इष्टदेव से प्रार्थना करें कि आपकी परेशानियां दूर करें और नारियल नदी में बहा दें। इसके बाद पीछे पलटकर ना देखें और अपने घर लौट आएं।

प्रतियेक शुक्रवार को महालक्ष्मी के सामने करें नारियल का ये एक उपाय !!

यदि आप को कड़ी मेहनत के बाद व्यापार या नोकरी में उचित प्रतिफल प्राप्त नहीं हो रहा है और पैसों की तंगी का सामना करना पड़ रहा है तो यहां एक उपाय बताया जा रहा है। यह उपाय नारियल से संबंधित है। यह उपाय बहुत सरल है। माना जाता है कि इस उपाय से महालक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है। उपाय की पूरी विधि है और सही विधि से ही यह उपाय शुक्रवार को किया जाना चाहिए। इसके प्रभाव से कई समस्याओं का निवारण हो सकता है।
जीवन में क्यों आती हैं परेशानियां !!
ज्योतिष के अनुसार यदि कुंडली में ग्रहों की स्थिति यदि विपरीत हो तो धन संबंधी मामलों में काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। यदि उचित ज्योतिषीय उपचार द्वारा ग्रह बाधा को दूर किया जाए तो संभवत: इस प्रकार की परेशानियों में कमी आ जाती है। यहां धन संबंधी समस्याओं को दूर करने के लिए एक प्राचीन उपाय बताया जा रहा है। यह उपाय प्रतियेक शुक्रवार महालक्ष्मी की प्रतिमा के सामने किया जाना चाहिए।
इस विधि से करें उपाय !!
प्रतियेक शुक्रवार ब्रह्म मुहूर्त में उठें और नित्य कर्मों से निवृत्त होकर पूर्णत: पवित्र हो जाएं। इसके बाद श्रीगणेश और धन की देवी महालक्ष्मी का पूजन करें। पूर्ण पूजन सामग्री के साथ ही एक नारियल भी पूजन में रखें। मिठाई और पुष्प हार भी रखें। नारियल पर लाल धागा लपेट लें। जब महालक्ष्मी का पूजन पूर्ण हो जाए तब नारियल को तिजोरी में या किसी ऐसे स्थान पर रख दें, जहां आप पैसा रखते हैं। दिन-भर तिजोरी में ही नारियल को रखे रहने दें। रात के समय तिजोरी से नारियल निकाल लें और किसी गणेश मंदिर में अर्पित कर दें। साथ ही, श्रीगणेश और महालक्ष्मी से निर्धनता दूर करने की प्रार्थना करें। ऐसा माना जाता है कि इस उपाय से कुछ ही समय में सकारात्मक फल प्राप्त होने लगते हैं। इसके साथ ही ध्यान रखें कि किसी भी प्रकार के अधार्मिक कार्यों से खुद को दूर रखें। अन्यथा उपाय निष्फल हो जाएगा।

Wednesday, 19 November 2014

क्या आप हनुमान जी दुआरा लिखी रामायण के बारे मै जानते है !!

प्रभु श्रीराम की रावण के ऊपर विजय प्राप्त करने के पश्चात ईश्वर की आराधना के लिये हनुमान हिमालय पर चले गये थे। वहाँ जाकर उन्होंने पर्वत शिलाओं पर अपने नाखून से रामायण की रचना की जिसमे उन्होनें प्रभु श्रीराम के कर्मों का उल्लेख किया था। कुछ समयोपरांत जब महर्षि वाल्मिकी हनुमानजी को अपने द्वारा रची गई रामायण दिखाने पहुँचे तो उन्होंने हनुमानजी द्वारा रचित रामायण भी देखी। उसे देखकर वाल्मिकी तोड़े निराश हो गये तो हनुमान ने उनसे उनकी निराशा का कारण पूछा तो महर्षि बोले कि उन्होने कठोर परिश्रम के पश्चात जो रामायण रची है वो हनुमान की रचना के समक्ष कुछ भी नहीं है अतः आने वाले समय में उनकी रचना उपेक्षित रह जायेगी। ये सुनकर हनुमान ने रामायण रचित पर्वत शिला को एक कन्धे पर उठाया और दूसरे कन्धे पर महर्षि वाल्मिकी को बिठा कर समुद्र के पास गये और स्वयं द्वारा की गई रचना को राम को समर्पित करते हुए समुद्र में समा दिया। तभी से हनुमान द्वारा रची गई हनुमद रामायण उपलब्ध नहीं है।तदुपरांत महर्षि वाल्मिकी ने कहा कि तुम धन्य हो हनुमान, तुम्हारे जैसा कोइ दूसरा नहीं है और साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि वो हनुमान की महिमा का गुणगान करने के लिये एक जन्म और लेंगे। इस बात को उन्होने अपनी रचना के अंत मे कहा भी है।माना जाता है कि रामचरितमानस के रचयिता कवि तुलसी दास कोई और नहीं बल्कि महर्षि वाल्मिकी का ही दूसरा अवतार थे।महाकवि तुलसीदास के समय में ही एक पटलिका को समुद्र के किनारे पाया गया जिसे कि एक सार्वजनिक स्थल पर टाँग दिया गया था ताकी विद्यार्थी उस गूढ़लिपि को पढ़कर उसका अर्थ निकाल सकें। माना जाता है कि कालीदास ने उसका अर्थ निकाल लिया था और वो ये भी जान गये थे कि ये पटलिका कोई और नहिं बल्कि हनुमान द्वारा उनके पूर्व जन्म में रची गई हनुमद् रामायण का ही एक अंश है जो कि पर्वत शिला से निकल कर ज़ल के साथ प्रवाहित होके यहाँ तक आ गई है। उस पटलिका को पाकर तुलसीदास ने अपने आपको बहुत भग्यशाली माना कि उन्हें हनुमद रामायण के श्लोक का एक पद्य प्राप्त हुआ।

हनुमान जी से सीखे विनयशीलता उपकार करके ना करे घमंड !!


भगवान श्रीराम वनवास काल के दौरान संकट में हनुमान जी द्वारा की गई अनूठी सहायता से अभिभूत थे। एक दिन उन्होंने कहा, 'हे हनुमान, संकट के समय तुमने मेरी जो सहायता की, मैं उसे याद कर गदगद हो उठा हूं। सीता जी का पता लगाने का दुष्कर कार्य तुम्हारे बिना असंभव था। लंका जलाकर तुमने रावण का अहंकार चूर-चूर किया, वह कार्य अनूठा था। घायल लक्ष्मण के प्राण बचाने के लिए यदि तुम संजीवनी बूटी न लाते, तो न जाने क्या होता?' तमाम बातों का वर्णन करके श्रीराम ने कहा, 'तेरे समान उपकारी सुर, नर, मुनि कोई भी शरीरधारी नहीं है। मैंने मन में खूब विचार कर देख लिया, मैं तुमसे उॠण नहीं हो सकता।'सीता जी ने कहा, 'तीनों लोकों में कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जो हनुमान जी को उनके उपकारों के बदले में दी जा सके।'
श्रीराम ने पुन: जैसे ही कहा, 'हनुमान, तुम स्वयं बताओ कि मैं तुम्हारे अनंत उपकारों के बदले क्या दूं, जिससे मैं ॠण मुक्त हो सकूं।'श्री हनुमान जी ने हर्षित होकर, प्रेम में व्याकुल होकर कहा, 'भगवन, मेरी रक्षा कीजिए- मेरी रक्षा कीजिए, अभिमान रूपी शत्रु कहीं मेरे तमाम सत्कर्मों को नष्ट नहीं कर डाले। प्रशंसा ऐसा दुर्गुण है, जो अभिमान पैदा कर तमाम संचित पुण्यों को नष्ट कर डालता है।' कहते-कहते वह श्रीराम जी के चरणों में लोट गए। हनुमान जी की विनयशीलता देखकर सभी हतप्रभ हो उठे।

हनुमान जी की श्री राम जी के प्रति भक्ति !!


राम के वनबास से आने की खुशी में जगह-जगह समारोह हो रहे थे। राम के भक्तों में काम बांटे जा रहे थे। किसी को सजावट और किसी को रोशनी के काम दिए गए। कुछ लोगों को भोजन और तरह-तरह के पकवान बनाने की ज़िम्मेदारी दी गईं तो कुछ लोगों को स्वागत और आवभगत की ज़िम्मेदारी दी गई। इस तरह से सारे काम भक्तों में बांट दिए गए।उसी समय हनुमान वहां पहुंचे। वे राम के सामने हाथ जोड़ कर खड़े हो गए और कहने लगे, भगवन, मुझे भी कुछ काम सौंप दीजिए। मैं तो आपका परम भक्त हूं।राम परेशान हो गए क्योंकि सारे कामों का विभाजन पहले ही हो चुका था। अब अगर किसी भक्त से काम वापिस लेकर हनुमान के हाथों में सौंपा जाता, तो वह भी उचित नहीं लगता। श्रीराम सोच में डूब गए। एकाएक श्रीराम को जम्हाई आई, तो उन्होंने चुटकी बजाकर सुस्ती भगाई और चुटकी के साथ ही श्रीराम को एक विचार आया। उन्होंने हनुमान जी से कहा, हनुमान तुम्हरा कार्य यह है कि जब भी मैं जम्हाई लूं, तुम चुटकी बजाना।हनुमान जी ने हाथ जोड़कर कार्य स्वीकार कर लिया। भगवान ने एक बार फिर जम्हाई ली और हनुमान जी ने तुरंत चुटकी बजाई।कुछ समय बाद श्रीराम आराम करने के लिए अपने शयन कक्ष में चले गए और हनुमान जी सजग होकर द्वार के बाहर बैठ गए। उसी समय हनुमान जी को ख्याल आया कि अगर उनके स्वामी श्रीराम को जम्हाई आ गई तो वह चुटकी बजाने से वंचित रह जाएंगे और वह अपने कर्तव्य से चूक जाएंगे। इसलिए उन्होंने लगातार चुटकियां बजाना शुरू कर दी। उसी समय राम को भी हनुमान की स्वामीभक्ति का विचार आया और वे समझ गए कि हनुमान जी लगातार चुटकियां बजा रहे होंगे। राम जम्हाई पर जम्हाई लेने लगे ताकि उनके भक्त की चुटकी व्यर्थ न चली जाए। उधर हनुमान जी चुटकी पर चुटकी बजाते रहे कि कहीं भगवान की एक भी जम्हाई चुटकी से वंचित न रह जाए। यह सिलसिला रात भर चलता रहा। इस पर सीता जी परेशान हो गइ कि यह राम को कैसा रोग लग गया है। न कुछ बोलते हैं और न कुछ बताते, बस जम्हाई पर जम्हाई लेते जा रहे हैं। सुबह होते ही सीता ने लक्ष्मण को राजवैद्य को बुलवाने के लिए भेजा। लक्ष्मण जी के लिए जैसे ही द्वार खुला वैसे ही श्रीराम ने जम्हाई लेना बंद कर दिया और हनुमान जी ने चुटकी बजाना बंद कर दिया।अब सीता और लक्ष्मण आश्चर्य चकित हो गए। राम ने दोनों को पूरी बात बताई और हनुमान जी की ईश्वर भक्ति की खूब प्रशंसा की। बाद में राम ने हनुमान जी से चुटकी बजाने का कठिन काम वापिस ले लिया और उन्हें स्वागत करने वालों में शामिल कर दिया। लोग आज भी हनुमान जी की रामभक्ति को याद करते हैं। और जम्हाई लेते समय चुटकी बजाने की परम्परा तो आज भी जारी है। हो सकता है इस परम्परा की शुरुआत उसी समय से हुई हो।

Tuesday, 18 November 2014

गणपति के श्री अवतार और जन्म की कथा !!


श्रीगणेश के जन्म की कथा भी निराली है। वराहपुराण के अनुसार भगवान शिव पंचतत्वों से बड़ी तल्लीनता से गणेश का निर्माण कर रहे थे। इस कारण गणेश अत्यंत रूपवान व विशिष्ट बन रहे थे। आकर्षण का केंद्र बन जाने के भय से सारे देवताओं में खलबली मच गई। इस भय को भांप शिवजी ने बालक गणेश का पेट बड़ा कर दिया और सिर को गज का रूप दे दिया।
दूसरी कथा शिवपुराण से है। इसके मुताबिक देवी पार्वती ने अपने उबटन से एक पुतला बनाया और उसमें प्राण डाल दिए। उन्होंने इस प्राणी को द्वारपाल बना कर बैठा दिया और किसी को भी अंदर न आने देने का आदेश देते हुए स्नान करने चली गईं। संयोग से इसी दौरान भगवान शिव वहां आए। उन्होंने अंदर जाना चाहा, लेकिन बालक गणेश ने रोक दिया। नाराज शिवजी ने बालक गणेश को समझाया, लेकिन उन्होंने एक न सुनी। क्रोधित शिवजी ने त्रिशूल से गणेश का सिर काट दिया। पार्वती को जब पता चला कि शिव ने गणेश का सिर काट दिया है, तो वे कुपित हुईं। पार्वती की नाराजगी दूर करने के लिए शिवजी ने गणेश के धड़ पर हाथी का मस्तक लगा कर जीवनदान दे दिया। तभी से शिवजी ने उन्हें तमाम सामर्थ्य और शक्तियाँ प्रदान करते हुए प्रथम पूज्य और गणों का देव बनाया।
 
गणपति के श्री अवतार
 
महोत्कट विनायक : इन्हें कृत युग में कश्यप व अदिति ने जन्म दिया। इस अवतार में गणपति ने देवतान्तक व नरान्तक नामक राक्षसों का संहार कर धर्म की स्थापना की व अपने अवतार की समाप्ति की।
गुणेश : त्रेता युग में गणपति ने उमा के गर्भ से भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन जन्म लिया व उन्हें 'गुणेश' नाम दिया गया। इस अवतार में गणपति ने सिंधु नामक दैत्य का विनाश किया व ब्रह्मदेव की कन्याएं, सिद्धि व रिद्धि से विवाह किया।
गणेश : द्वापर युग में गणपति ने पुनः पार्वती के गर्भ से जन्म लिया व गणेश कहलाए, परंतु गणेश जन्म से ही कुरूप थे, इसलिए पार्वती ने उन्हें जंगल में छोड़ दिया, जहाँ पर पराशर मुनि ने उनका पालन-पोषण किया। गणेश ने सिंदुरासुर का वध कर उसके द्वारा कैद किए अनेक राजाओं व वीरों को मुक्त किया। इसी अवतार में गणेश ने वरेण्य नामक अपने भक्त को गणेश गीता के रूप में शाश्वत तत्व ज्ञान का उपदेश दिया।
दाईं सूंड : जिस मूर्ति में सूंड के अग्रभाव का मोड़ दाईं ओर हो, उसे दक्षिण मूर्ति या दक्षिणाभिमुखी मूर्ति कहते हैं। यहां दक्षिण का अर्थ है दक्षिण दिशा या दाईं बाजू। दक्षिण दिशा यमलोक की ओर ले जाने वाली व दाईं बाजू सूर्य नाड़ी की है। जो यमलोक की दिशा का सामना कर सकता है, वह शक्तिशाली होता है व जिसकी सूर्य नाड़ी कार्यरत है, वह तेजस्वी भी होता है। इन दोनों अर्थों से दाईं सूंड वाले गणपति को 'जागृत' माना जाता है। ऐसी मूर्ति की पूजा में कर्मकांड के अंतर्गत पूजा विधि के सर्व नियमों का यथार्थ पालन करना आवश्यक है। उससे सात्विकता बढ़ती है व दक्षिण दिशा से प्रसारित होने वाली रज लहरियों से कष्ट नहीं होता।दक्षिणाभिमुखी मूर्ति की पूजा सामान्य पद्धति से नहीं की जाती, क्योंकि तिर्य्*क (रज) लहरियां दक्षिण दिशा से आती हैं। दक्षिण दिशा में यमलोक है, जहां पाप-पुण्य का हिसाब रखा जाता है। इसलिए यह बाजू अप्रिय है। यदि दक्षिण की ओर मुंह करके बैठें या सोते समय दक्षिण की ओर पैर रखें तो जैसी अनुभूति मृत्यु के पश्चात अथवा मृत्यु पूर्व जीवित अवस्था में होती है, वैसी ही स्थिति दक्षिणाभिमुखी मूर्ति की पूजा करने से होने लगती है। इसलिए ऐसी मूर्ति की पूजा करने का मन नहीं करता।
बाईं सूंड : जिस मूर्ति में सूंड के अग्रभाव का मोड़ बाईं ओर हो, उसे वाममुखी कहते हैं। वाम यानी बाईं ओर या उत्तर दिशा। बाई ओर चंद्र नाड़ी होती है। यह शीतलता प्रदान करती है एवं उत्तर दिशा अध्यात्म के लिए पूरक है, आनंददायक है। इसलिए पूजा में अधिकतर वाममुखी गणपति की मूर्ति रखी जाती है। इसकी पूजा प्रायिक पद्धति से की जाती है।गणेश के पास हाथी का सिर, मोटा पेट और चूहा जैसा छोटा वाहन है, लेकिन इन समस्याओं के बाद भी वे विघ्नविनाशक, संकटमोचक की उपाधियों से नवाजे गए हैं। कारण यह है कि उन्होंने अपनी कमियों को कभी अपना नकारात्मक पक्ष नहीं बनने दिया, बल्कि अपनी ताकत बनाया। उनकी टेढ़ी-मेढ़ी सूंड बताती है कि सफलता का पथ सीधा नहीं है।यहां दाएं-बाएं खोज करने पर ही सफलता और सच प्राप्त होगा। हाथी की भांति चाल भले ही धीमी हो, लेकिन अपना पथ अपना लक्ष्य न भूलें। उनकी आंखें छोटी लेकिन पैनी है, यानी चीजों का सूक्ष्मता से विश्लेषण करना चाहिए। कान बड़े है यानी एक अच्छे श्रोता का गुण हम सबमें हमेशा होना चाहिए।

शनी देव के प्रकोप का असर और महत्ता और कैसे है सभी देवो में श्रेष्ठ !!


एक समय स्वर्गलोक में सबसे बड़ा कौन के प्रश्न को लेकर सभी देवताओं में वाद-विवाद प्रारम्भ हुआ और फिर परस्पर भयंकर युद्ध की स्थिति बन गई। सभी देवता देवराज इंद्र के पास पहुंचे और बोले, हे देवराज! आपको निर्णय करना होगा कि नौ ग्रहों में सबसे बड़ा कौन है? देवताओं का प्रश्न सुनकर देवराज इंद्र उलझन में पड़ गए। और कुछ देर सोच कर बोले, हे देवगणों! मैं इस प्रश्न का उत्तर देने में असमर्थ हूं। पृथ्वीलोक में उज्ज्यिनी नगरी में राजा विक्रमादित्य का राज्य है। हम राजा विक्रमादित्य के पास चलते हैं क्योंकि वह न्याय करने में अत्यंत लोकप्रिय हैं। उनके सिंहासन में अवश्य ही कोई जादू है कि उस पर बैठकर राजा विक्रमादित्य दूध का दूध और पानी का पानी अलग करने का न्याय करते हैं। देवराज इंद्र के आदेश पर सभी देवता पृथ्वी लोक में उज्ज्यिनी नगरी में पहुंचे। देवताओं के आगमन का समाचार सुनकर स्वयं राजा विक्रमादित्य ने उनका स्वागत किया। महल में पहुंचकर जब देवताओं ने उनसे अपना प्रश्न पूछा तो राजा विक्रमादित्य भी कुछ देर के लिए परेशान हो उठे। क्योकि सभी देवता अपनी-अपनी शक्तियों के कारण महान शक्तिशाली थे। किसी को भी छोटा या बड़ा कह देने से उनके क्रोध के प्रकोप से भयंकर हानि पहुंच सकती थी। तभी राजा विक्रमादित्य को एक उपाय सूझा और उन्होंने विभिन्न धातुओं- स्वर्ण, रजत, कांसा, तांबा, सीसा, रांगा, जस्ता, अभ्रक, व लोहे के नौ आसन बनवाए। धातुओं के गुणों के अनुसार सभी आसनों को एक-दूसरे के पीछे रखवा कर उन्होंने देवताओं को अपने-अपने सिंहासन पर बैठने को कहा। सब देवताओं के बैठने के बाद राजा विक्रमादित्य ने कहा, आपका निर्णय तो स्वयं हो गया। जो सबसे पहले सिंहासन पर विराजमान है, वही सबसे बड़ा है। राजा विक्रमादित्य के निर्णय को सुनकर शनि देवता ने सबसे पीछे आसन पर बैठने के कारण अपने को छोटा जानकर क्रोधित होकर कहा, राजन! तुमने मुझे सबसे पीछे बैठाकर मेरा अपमान किया है। तुम मेरी शक्तियों से परिचित नहीं हो। मैं तुम्हारा सर्वनाश कर दूंगा। सूर्य एक राशि पर एक महीने, चंद्रमा सवा दो दिन, मंगल डेढ़ महीने, बुध और शुक्र एक महीने, वृहस्पति तेरह महीने रहते हैं लेकिन मैं किसी राशि पर साढ़े सात वर्ष रहता हूं। बड़े-बड़े देवताओं को मैंने अपने प्रकोप से पीड़ित किया है। राम को साढ़े साती के कारण ही वन में जाकर रहना पड़ा और रावण को साढ़े साती के कारण ही युद्ध में मृत्यु का शिकार बनना पड़ा। उसके वंश का सर्वनाश हो गया। राजा! अब तू भी मेरे प्रकोप से नहीं बच सकेगा। राजा विक्रमादित्य शनि देवता के प्रकोप से थोड़ा भयभीत तो हुए, लेकिन उन्होंने मन में विचार किया, मेरे भाग्य में जो लिखा होगा, ज्यादा से ज्यादा वही तो होगा। फिर शनि के प्रकोप से भयभीत होने की आवश्यकता क्या है?उसके बाद अन्य ग्रहों के देवता तो प्रसन्नता के साथ वहां से चले गए, लेकिन शनिदेव बड़े क्रोध के साथ वहां से विदा हुए। राजा विक्रमादित्य पहले की तरह ही न्याय करते रहे। उनके राज्य में सभी स्त्री पुरुष बहुत आनंद से जीवन-यापन कर रहे थे। कुछ दिन ऐसे ही बीत गए। उधर शनिदेवता अपने अपमान को भूले नहीं थे। विक्रमादित्य से बदला लेने के लिए एक दिन शनिदेव ने घोड़े के व्यापारी का रूप धारण किया और बहुत से घोड़ों के साथ उज्ज्यिनी नगरी में पहुंचे।राजा विक्रमादित्य ने राज्य में किसी घोड़े के व्यापारी के आने का समाचार सुना तो अपने अश्वपाल को कुछ घोड़े खरीदने के लिए भेजा। अश्वपाल ने वहां जाकर घोड़ों को देखा तो बहुत खुश हुआ। लेकिन घोड़ों का मूल्य सुन कर उसे बहुत हैरानी हुई। घोड़े बहुत कीमती थे। अश्वपाल ने जब वापस लौटकर इस संबंध में बताया तो राजा ने स्वयं आकर एक सुंदर व शक्तिशाली घोड़े को पसंद किया। घोड़े की चाल देखने के लिए राजा उस घोड़े पर सवार हुआ तो वह घोड़ा बिजली की गति से दौड़ पड़ा। तेजी से दौड़ता हुआ घोड़ा राजा को दूर एक जंगल में ले गया और फिर राजा को वहां गिराकर जंगल में कहीं गायब हो गया। राजा अपने नगर को लौटने के लिए जंगल में भटकने लगा। लेकिन उसे लौटने का कोई रास्ता नहीं मिला। राजा को भूख-प्यास लग आई। बहुत घूमने पर उसे एक चरवाहा मिला। राजा ने उससे पानी मांगा। पानी पीकर राजा ने उस चरवाहे को अपनी अंगूठी दे दी। फिर उससे रास्ता पूछकर वह जंगल से बाहर निकलकर पास के नगर में पहुंचा।राजा ने एक सेठ की दुकान पर बैठकर कुछ देर आराम किया। उस सेठ ने राजा से बातचीत की तो राजा ने उसे बताया कि मैं उज्ज्यिनी से आया हूं। राजा के कुछ देर दुकान पर बैठने से सेठजी की बहुत बिक्री हुई। सेठ ने राजा को बहुत भाग्यवान समझा और उसे अपने घर भोजन के लिए ले गया। सेठ के घर में सोने का एक हार खूंटी पर लटका हुआ था। राजा को उस कमरे में अकेला छोड़कर सेठ कुछ देर के लिए बाहर गया। तभी एक आश्चर्यजनक घटना घटी। राजा के देखते-देखते सोने के उस हार को खूंटी निगल गई। सेठ ने कमरे में लौटकर हार को गायब देखा तो चोरी का सन्देह राजा पर ही किया, क्योंकि उस कमरे में राजा ही अकेला बैठा था। सेठ ने अपने नौकरों से कहा कि इस परदेसी को रस्सियों से बांधकर नगर के राजा के पास ले चलो। राजा ने विक्रमादित्य से हार के बारे में पूछा तो उसने बताया कि उसके देखते ही देखते खूंटी ने हार को निगल लिया था। इस पर राजा ने क्रोधित होकर चोरी करने के अपराध में विक्रमादित्य के हाथ-पांव काटने का आदेश दे दिया। राजा विक्रमादित्य के हाथ-पांव काटकर उसे नगर की सड़क पर छोड़ दिया गया। कुछ दिन बाद एक तेली उसे उठाकर अपने घर ले गया और उसे अपने कोल्हू पर बैठा दिया। राजा आवाज देकर बैलों को हांकता रहता। इस तरह तेली का बैल चलता रहा और राजा को भोजन मिलता रहा। शनि के प्रकोप की साढ़े साती पूरी होने पर वर्षा ॠतु प्रारम्भ हुई। राजा विक्रमादित्य एक रात मेघ मल्हार गा रहा था कि तभी नगर के राजा की लड़की राजकुमारी मोहिनी रथ पर सवार उस तेली के घर के पास से गुजरी। उसने मेघ मल्हार सुना तो उसे बहुत अच्छा लगा और दासी को भेजकर गानेवाले को बुला लाने को कहा। दासी ने लौटकर राजकुमारी को अपंग राजा के बारे में सब कुछ बता दिया। राजकुमारी उसके मेघ मल्हार पर बहुत मोहित हुई थी। अत:उसने सब कुछ जानकर भी अपंग राजा से विवाह करने का निश्चय कर लिया। राज कुमारी ने अपने माता-पिता से जब यह बात कही तो वे हैरान रह गये। राजा को लगा कि उसकी बेटी पागल हो गई है। रानी ने मोहिनी को समझाया, च्बेटी! तेरे भाग्य में तो किसी राजा की रानी होना लिखा है। फिर तू उस अपंग से विवाह करके अपने पांव पर कुल्हाड़ी क्यों मार रही है?ज् राजा ने किसी सुंदर राजकुमार से उसका विवाह करने की बात कही। लेकिन राजकुमारी ने अपनी जिद नहीं छोड़ी। अपनी जिद पूरी कराने के लिए उसने भोजन करना छोड़ दिया और प्राण त्याग देने का निश्चय कर लिया। आखिर राजा, रानी को विवश होकर अपंग विक्रमादित्य से राजकुमारी का विवाह करना पड़ा। विवाह के बाद राजा विक्रमादित्य और राजकुमारी तेली के घर में रहने लगे। उसी रात स्वप्न में शनिदेव ने राजा से कहा,राजा ! तुमने मेरा प्रकोप देख लिया। मैंने तुम्हें अपने अपमान का दण्ड दिया है। राजा ने शनिदेव से क्षमा करने को कहा और प्रार्थना की, शनिदेव! आपने जितना दु:ख मुझे दिया है, अन्य किसी को न देना शनिदेव ने कुछ सोचते हुए कहा,राजा ! मैं तेरी प्रार्थना स्वीकार करता हूं। जो कोई स्त्री-पुरुष मेरी पूजा करेगा, शनिवार को व्रत कर के मेरी कथा सुनेगा, उस पर मेरी अनुकम्पा बनी रहेगी। उसे कोई दुख नहीं होगा। शनिवार को व्रत करने और चींटियों को आटा डालने से मनुष्य की सभी मनोकामनाएं पूरी होंगी।प्रात:काल राजा विक्रमादित्य की नींद खुली तो अपने हाथ-पांव देखकर राजा को बहुत खुशी हुई। उसने मन-ही-मन शनिदेव को प्रणाम किया। राजकुमारी भी राजा के हाथ-पांव सही सलामत देखकर आश्चर्य में डूब गई। तब राजा विक्रमादित्य ने अपना परिचय देते हुए शनिदेव के प्रकोप की सारी कहानी कह सुनाई। सेठ को जब इस बात का पता चला तो दौड़ता हुआ तेली के घर पहुंचा और राजा के चरणों में गिरकर क्षमा मांगने लगा। राजा ने उसे क्षमा कर दिया, क्यों कि यह सब तो शनिदेव के प्रकोप के कारण हुआ था। सेठ राजा को अपने घर ले गया और उसे भोजन कराया। भोजन करते समय वहां एक आश्चर्यजनक घटना घटी। सबके देखते-देखते उस खूंटी ने वह हार उगल दिया। सेठजी ने अपनी बेटी का विवाह भी राजा के साथ कर दिया और बहुत से स्वर्ण-आभूषण, धन आदि देकर राजा को विदा किया।राजा विक्रमादित्य राजकुमारी मोहिनी और सेठ की बेटी के साथ उज्ज्यिनी पहुंचे तो नगरवासियों ने हर्ष से उनका स्वागत किया। उस रात उज्ज्यिनी नगरी में दीप जलाकर लोगों ने दीवाली मनाई। अगले दिन राजा विक्रमादित्य ने पूरे राज्य में घोषणा करवाई, शनी देव सब देवों में सर्वश्रेष्ठ हैं। प्रत्येक स्त्री पुरुष शनिवार को उनका व्रत करें और व्रत कथा अवश्य सुनें। राजा विक्रमादित्य की घोषणा से शनिदेव बहुत प्रसन्न हुए। शनिवार का व्रत करने और कथा सुनने के कारण सभी लोगों की मनोकामनाएं शनिदेव की अनुकम्पा से पूरी होने लगीं। सभी लोग आनन्दपूर्वक रहने लगे।

कैसे हुई भगबान शंकर की श्री मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिग स्थापना !!


पुराण कथा के अनुसार भगवान शंकर के दोनों पुत्रों में आपस में इस बात पर विवाद उत्पन्न हो गया कि पहले किसका विवाह होगा ! जब श्री गणेश और श्री कार्तिकेय जब विवाद में किसी हल पर नहीं पहुंच पायें तो दोनों अपना- अपना मत लेकर भगवान शंकर और माता पार्वती के पास गए ! अपने दोनों पुत्रों को इस प्रकार लडता देख, पहले माता-पिता ने दोनों को समझाने की कोशिश की परन्तु जब वे किसी भी प्रकार से गणेश और कार्तिकेयन को समझाने में सफल नहीं हुए, तो उन्होने दोनों के समान एक शर्त रखी ! दोनों से कहा कि आप दोनों में से जो भी पृ्थ्वी का पूरा चक्कर सबसे पहले लगाने में सफल रहेगा उसी का सबसे पहले विवाह कर दिया जायेगा ! विवाह की यह शर्त सुनकर दोनों को बहुत प्रसन्नता हुई ! कार्तिकेयन का वाहन क्योकि मयूर है, इसलिए वे तो शीघ्र ही अपने वाहन पर सवार होकर इस कार्य को पूरा करने के लिए चल दिए परन्तु समस्या श्री गणेश के सामने आईं, उनका वाहन मूषक है ! और मूषक मन्द गति जीव है ! अपने वाहन की गति का विचार आते ही श्री गणेश समझ गये कि वे इस प्रतियोगिता में इस वाहन से नहीं जीत सकते ! श्री गणेश है ! चतुर बुद्धि, तभी तो उन्हें बुद्धि का देव स्थान प्राप्त है, बस उन्होने क्या किया, उन्होनें प्रतियोगिता जीतने का एक मध्य मार्ग निकाला और, शास्त्रों का अनुशरण करते हुए, अपने माता-पिता की प्रदक्षिणा करनी प्रारम्भ कर दी ! शास्त्रों के अनुसार माता-पिता भी पृ्थ्वी के समान होते है ! माता-पिता उनकी बुद्धि की चतुरता को समझ गये़ ! और उन्होने भी श्री गणेश को कामना पूरी होने का आशिर्वाद दे दिया ! शर्त के अनुसार श्री गणेश का विवाह सिद्धि और रिद्धि दोनों कन्याओं से कर दिया गया ! पृ्थ्वी की प्रदक्षिणा कर जब कार्तिकेयन वापस लौटे तो उन्होने देखा कि श्री गणेश का विवाह तो हो चुका है और वे शर्त हार गये है ! श्री गणेश की बुद्धिमानी से कार्तिकेयन नाराज होकर श्री शैल पर्वत पर चले गये़ श्री शैल पर माता पार्वती पुत्र कार्तिकेयन को समझाने के लिए गई ! और भगवान शंकर भी यहां ज्योतिर्लिंग के रुप में अपनी पुत्र से आग्रह करने के लिए पहुंच गयें ! उसी समय से श्री शैल पर्वत पर मल्लिकार्जुन ज्योर्तिलिंग की स्थापना हुई, और इस पर्वत पर शिव का पूजन करना पुन्यकारी हो गया !

Thursday, 13 November 2014

आदिशक्ति को क्यों कहते हैं दुर्गा जी !!


पुरातन काल में दुर्गम नामक दैत्य हुआ। उसने भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न कर सभी वेदों को अपने वश में कर लिया जिससे देवताओं का बल क्षीण हो गया। तब दुर्गम ने देवताओं को हराकर स्वर्ग पर कब्जा कर लिया। तब देवताओं को देवी भगवती का स्मरण हुआ। देवताओं ने शुंभ-निशुंभ, मधु-कैटभ तथा चण्ड-मुण्ड का वध करने वाली शक्ति का आह्वान किया। देवताओं के आह्वान पर देवी प्रकट हुईं। उन्होंने देवताओं से उन्हें बुलाने का कारण पूछा। सभी देवताओं ने एक स्वर में बताया कि दुर्गम नामक दैत्य ने सभी वेद तथा स्वर्ग पर अपना अधिकार कर लिया है तथा हमें अनेक यातनाएं दी हैं। आप उसका वध कर दीजिए। देवताओं की बात सुनकर देवी ने उन्हें दुर्गम का वध करने का आश्वासन दिया। यह बात जब दैत्यों का राज दुर्गम को पता चली तो उसने देवताओं पर पुन: आक्रमण कर दिया। तब माता भगवती ने देवताओं की रक्षा की तथा दुर्गम की सेना का संहार कर दिया। सेना का संहार होते देख दुर्गम स्वयं युद्ध करने आया।तब माता भगवती ने काली, तारा, छिन्नमस्ता, श्रीविद्या, भुवनेश्वरी, भैरवी, बगला आदि कई सहायक शक्तियों का आह्वान कर उन्हें भी युद्ध करने के लिए प्रेरित किया। भयंकर युद्ध में भगवती ने दुर्गम का वध कर दिया। दुर्गम नामक दैत्य का वध करने के कारण भी भगवती का नाम दुर्गा के नाम से भी विख्यात हुआ। (पुराण कथा से )

भगबान शंकर जी बताये ग्रहस्थ जीवन के नियम !!

एक बार पार्वती जी भगवान शंकर जी के साथ सत्संग कर रही थीं। उन्होंने भगवान भोलेनाथ से पूछा, गृहस्थ लोगों का कल्याण किस तरह हो सकता है? शंकर जी ने बताया, सच बोलना, सभी प्राणियों पर दया करना, मन एवं इंद्रियों पर संयम रखना तथा सामर्थ्य के अनुसार सेवा-परोपकार करना कल्याण के साधन हैं। जो व्यक्ति अपने माता-पिता एवं बुजुर्गों की सेवा करता है, जो शील एवं सदाचार से संपन्न है, जो अतिथियों की सेवा को तत्पर रहता है, जो क्षमाशील है और जिसने धर्मपूर्वक धन का उपार्जन किया है, ऐसे गृहस्थ पर सभी देवता, ऋषि एवं महर्षि प्रसन्न रहते हैं।भगवान शिव ने आगे उन्हें बताया, जो दूसरों के धन पर लालच नहीं रखता, जो पराई स्त्री को वासना की नजर से नहीं देखता, जो झूठ नहीं बोलता, जो किसी की निंदा-चुगली नहीं करता और सबके प्रति मैत्री और दया भाव रखता है, जो सौम्य वाणी बोलता है और स्वेच्छाचार से दूर रहता है, ऐसा आदर्श व्यक्ति स्वर्गगामी होता है।भगवान शिव ने माता पार्वती को आगे बताया कि मनुष्य को जीवन में सदा शुभ कर्म ही करते रहना चाहिए। शुभ कर्मों का शुभ फल प्राप्त होता है और शुभ प्रारब्ध बनता है। मनुष्य जैसा कर्म करता है, वैसा ही प्रारब्ध बनता है। प्रारब्ध अत्यंत बलवान होता है, उसी के अनुसार जीव भोग करता है। प्राणी भले ही प्रमाद में पड़कर सो जाए, परंतु उसका प्रारब्ध सदैव जागता रहता है। इसलिए हमेशा सत्कर्म करते रहना चाहिए।