'हनुमानजी' सिखाते है जीवन प्रबंधन और लक्ष्य पाने की कला !! ~ Balaji Kripa

Sunday, 7 December 2014

'हनुमानजी' सिखाते है जीवन प्रबंधन और लक्ष्य पाने की कला !!

राम भक्त हनुमान एक कुशल प्रबंधक भी थे। वे मानव संसाधन का बेहतर उपयोग करना जानते थे।रामायणी गुरुओं के मुताबिक, संपूर्ण रामचरित मानस में ऐसे कई उदाहरण हैं जिससे साबित होता है कि महाबली हनुमान में प्रबंधन की जबर्दस्त क्षमता थी।
समुद्र को पार करना :=
श्रीराम के परम भक्त हनुमान के प्रबंधन से भगवान ने रावण पर विजय प्राप्त की। हनुमानजी ने सेना से लेकर समुद्र को पार करने तक जो कार्य कुशलता व बुद्धि के साथ किया वह उनके विशिष्ट प्रबंधनको दर्शाता है।
हर काम में निपुणता :=
भगवान राम से परिचय के बाद से हनुमानजी को जो भी कार्य सौंपा वह उन्होंने पूर्ण कुशलता के साथ संपन्न किए। इस प्रकार हनुमानजी को प्रबंधन के क्षेत्र में एक कुशल स्तंभ माना जा सकता है।
सही योजनाये :=
श्री हनुमानजी ऊर्जा प्रदान करने वाले शक्ति और समर्पण के पुंज हैं। आज के युवा प्रबंधको को अंजनी पुत्र हनुमानजी से कई प्रकार की प्रेरणा मिलती है। बुद्धि के साथ सही योजना बनाने  की उनमें गजब की क्षमता है।
दूरदर्शिता :=
हनुमान जी ने सहज और सरल वार्तालाप के अपने गुण से कपिराज सुग्रीव से श्रीराम की मैत्री कराई। उनकी दूरदर्शिता का ही परिणाम था कि सुग्रीव रामजी के सहयोगी बने। हनुमान जी की कुशलता एवं चतुरता आगे चल कर सही दिखाई पड़ती है जब सुग्रीव श्रीराम के काम आते हैं और रामजी की मदद से सुग्रीव को अपना राज्य मिलता है।
नीति कुशलता :=
राजकोष व पराई नारी प्राप्त कर सुग्रीव मैत्रीधर्म भुला देते हैं तो हनुमानजी उसे चारों विधियों साम, दाम, दण्ड, भेद नीति का प्रयोग कर श्रीराम के कार्यों की याद दिलाते हैं। यहाँ उनकी स्मरण शक्ति, सजगता, सतर्कता तथा लक्ष्य की दिशा में तत्परता श्रीराम को प्रभावित करती है। हनुमानजी का प्रबंधन यह सीख देता हैं कि अगर लक्ष्य महान हो और उसे पाना सभी के हित में हो तो हर प्रकार की नीति अपनाई जा सकती है, और यह भी कि कोई अपने कर्तव्यों और अहसानों को भूल रहा है तो उसे सही राह पर लाने के लिए भी हर तरह की नीति लागू की जा सकती है।
मार्ग दर्शक हो तो हनुमान जैसा :=
उनकी सहज विनम्रता, और सब को साथ लेकर चलने की क्षमता श्रीराम पहचान लेते हैं। कठिनाइयों में जो निर्भयता और साहसपूर्वक साथियों का सहायक और मार्गदर्शक बन सके लक्ष्य प्राप्ति हेतु जिसमें उत्साह और जोश, धैर्य और लगन हो, कठिनाइयों पर विजय पाने, परिस्थितियों को अपने अनुकूल कर लेने का संकल्प और क्षमता हो वही तो नेतृत्व कर सकता है।
सबकी सलाह सुनने का गुण :=
हनुमानजी का राम-काज हेतु उत्साह और वह जामवंत से मार्गदर्शन चाहना भी प्रबंधन का तत्व है। सबको सम्मानित करना, सक्रिय और ऊर्जा संपन्न होकर कार्य में निरंतरता बनाए रखने की क्षमता भी कार्यसिद्धि का गुरुमंत्र है।
दुश्मन पर पैनी नजर :=
विरोधी के असावधान रहते ही उसके रहस्य को जान लेना दुश्मनों के बीच दोस्त खोज लेने की दक्षता विभीषण प्रसंग में दिखाई देती है। हनुमानजी उससे भ्राता का संबंध जोड़कर अपना और उसका भी कार्य सिद्ध करने में सफल होते हैं। उनके हर कार्य में सोच और फुर्ती  का अद्भुत मिश्रण है।
नैतिक साहस :=
परिस्थितियों से विचलित हुए बिना दृढ़ इच्छाशक्ति को बनाए रखना प्रबंधन कला का महान गुण है। रावण को सीख देने में उनकी निर्भीकता, दृढ़ता, स्पष्टता और निश्चिंतता अप्रतिम है। उनमें न कहीं दिखावा है, न छल कपट। व्यवहार में पारदर्शिता है, कुटिलता नहीं। उनमें अपनी बात को कहने का नैतिक साहस हैं। हनुमानजी की शीलता और निर्भयता की प्रशंसा रावण भी करता है।हर हाल में मस्तरावण को हनुमानजी 'रामचरन पंकज उर धरहू लंका अचल राज तुम्ह करहू' का मंत्र देते हैं। लेकिन वह अभिमानवश उनकी सलाह की उपेक्षा करता है परंतु विनम्र विभीषण उसी को मानकर लंका के राजा बनते है। इन सबके साथ ही उनमें आज की सबसे अनिवार्य प्रबंधन छमता है कि वे अपना विनोदी स्वभाव हर हालत में बनाए रखते हैं। हर हाल में मस्त रहना आज की सबसे बड़ी जरूरत है।

0 comments:

Post a Comment