शिव दारिद्रयदहन स्तोत्र से धन-संपन्नता और भौतिक सुखों को बटोरे !! ~ Balaji Kripa

Tuesday, 27 January 2015

शिव दारिद्रयदहन स्तोत्र से धन-संपन्नता और भौतिक सुखों को बटोरे !!

शास्त्रों के अनुसार शिव ही सांसारिक सुखों का आधार हैं। शिव उपासना तन, मन व धन से जुडी कामनाओं में आने वाली बाधाओं को भी दूर करती है। सांसारिक इच्छाओं का मूल है धन-धान्य और ऐश्वर्य भरा जीवन। हर व्यक्ति के मन में धन संपन्नता और भौतिक सुखों को बंटोरने का भाव आता है, जिसे पूरा करने के लिए वह धार्मिक उपाय चुनता है। ऐसे ही उपायों में फाल्गुन महीने के कृष्ण पक्ष कि चतुर्दशी तिथि पर महाशिवरात्रि पर विशिष्ट शिव पूजा में शिव की विशेष मंत्र स्तुति दु:ख, दरिद्रता और धन के अभाव को दूर कर धन, संतान, निरोगी शरीर द्वारा वैभवशाली और संपन्न बना देती है। जानिए यह शिव मंत्र स्तुति, जो दारिद्रयदहन शिवस्तोत्रम्‌ के नाम से प्रसिद्ध है।द्रारिदय दहन स्त्रोत का अर्थ है-द्रारिद्रता का दहन करने वाला स्त्रोत। द्ररिद्रता अर्थात् गरीबी। जिस स्तुति को सुनकर शिव आनंदित हो उठंते है । ऐसे प्रभाव वाला द्रारिद्रय दहन शिव स्त्रोत है। शिव पूजन के बाद इस स्त्रोत का पाठ किया जाना शिव को प्रसन्न करता है। इस स्त्रोत के पाठ से द्ररिद्रता से छुटकारा मिलने लगता है। जैसे कि अग्नि में जलकर कोई चीज जलकर राख हो जाती है। शिव की प्रसन्नता जीवन में सौभाग्य लाती है।
कैसे करें महाशिवरात्रि पर दारिद्रयदहन शिव पूजन: -
सर्वप्रथम शिवरात्रि को प्रदोष काल में शिवलिंग को जल, दूध, बिल्वपत्र और सफेद आंकड़ा समर्पित कर इस मंत्र का 16 बार उच्चारण करते हुए जलाभिषेक करेंl

मंत्र: ह्रीं ॐ नमः शिवाय ह्रीं॥ 
तत्पश्चात शिवलिंग पर धूप, दीप गंध, पुष्प  दूध, अक्षत, धतूरा, बिल्वपत्र व नैवेद्य अर्पित कर पंचोउपचार पूजन करें। पुष्प और अक्षत हाथ में लेकर दारिद्रयदहन शिव स्तोत्र का पाठ कर कर्पूर चंदन जलाकर शिवलिंग की आरती करेंl तत्पश्चात हाथ में लिए हुए फूल और पुष्प शिवलिंग पर अर्पित कर दें।
 स्त्रोत :=
विश्वेश्वराय नरकार्णवतारणाय
कर्णामृताय शशिशेखरधारणाय।
कर्पूरकांतिधवलाय जटाधराय
दारिद्रयदुःखदहनाय नमः शिवाय।।1।।

गौरीप्रियाय रजनीशकलाधराय
कालान्तकाय भुजगाधिपकङ्कणाय।
गङ्गाधराय गजराजविमर्दनाय ।।2।।

भक्तिप्रियाय भवरोगभयापहाय
उग्राय दुर्गभवसागरतारणाय।
ज्योतिर्मयाय गुणनामसुनृत्यकाय ।।3।।
चर्माम्बराय शवभस्मविलेपनाय
भालेक्षणाय मणिकुण्डलमण्डिताय।
मञ्जीरपादयुगलाय जटाधराय ।।4।।

फणिराजविभूषणाय
हेमांशुकाय भुवनत्रयमण्डिताय।
आनंतभूमिवरदाय तमोमयाय ।।5।।

भानुप्रियाय भवसागरतारणाय
कालान्तकाय कमलासनपूजिताय।
नेत्रत्रयाय शुभलक्षणलक्षिताय ।।6।।

रामप्रियाय रघुनाथवरप्रदाय
नागप्रियाय नरकार्णवतारणाय।
पुण्येषु पुण्यभरिताय सुरार्चिताय ।।7।।

मुक्तेश्वराय फलदाय गणेश्वराय
गीतप्रियाय वृषभेश्वरवाहनाय।
मातङग्चर्मवसनाय महेश्वराय ।।8।।

वसिष्ठेन कृतं स्तोत्रं सर्वरोगनिवारणम्।
सर्वसम्पत्करं शीघ्रं पुत्रपौत्रादिवर्धनम्।
त्रिसंध्यं यः पठेन्नित्यं स हि स्वर्गमवाप्नुयात् ।।9।।

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