February 2015 ~ Balaji Kripa

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May Baba fullfill all the wishes of the Devotees.

जय श्रीराम

भगवान रामभक्त हनुमान की उपासना से जीवन के सारे कष्ट, संकट मिट जाते है। माना जाता है कि हनुमान एक ऐसे देवता है जो थोड़ी-सी प्रार्थना और पूजा से ही शीघ्र प्रसन्न हो जाते है। जहां मंगलवार और शनिवार का दिन इनके पूजन के लिए सर्वश्रेष्ठ हैं।

ॐ हं हनुमंतये नम:

मंगलवार और शनिवार के दिन हनुमान म‍ंदिर में जाकर रामभक्त हनुमान का गुणगान करें और उनसे अपने पापों के लिए क्षमायाचना करें।

Sunday, 22 February 2015

प्रत्येक 41 साल बाद यहां आते हैं हनुमानजी...


सात महामानव पिछले कई हजार वर्षों से आज भी जीवित हैं उनमें से ही एक है श्री हनुमानजी। हनुमानजी इस कलयुग के अंत तक अपने शरीर में ही रहेंगे। वे आज भी धरती पर विचरण करते हैं। जब कल्कि रूप में भगवान विष्णु अवतार लेंगे तब हनुमान, परशुराम, अश्वत्थामा, कृपाचार्य, विश्वामित्र, विभीषण और राजा बलि सार्वजनिक रूप से प्रकट हो जाएंगे।उक्त सातों महामानवों ने समय-समय पर अपने धरती पर होने का सबूत दिया है। एक ओर जहां अश्वत्थामा के कुछ जगह पर आने और उन्हें देखे जाने की चर्चा है तो कुछ जगह पर हनुमानजी भी कुछ लोगों को नजर आए हैं। इसी तरह परशुराम और विभीषण को भी देखे जाना का लोग दावा करते हैं।ताजा मामले में एक वेबसाइट ने दावा किया है कि एक ऐसी जगह है जहां हनुमानजी प्रत्येक 41 वर्ष बाद आते हैं और कुछ दिनों तक वहां रहने के बाद वापस चले जाते हैं। सवाल यह उठता है कि कहां चले जाते हैं? प्रत्येक 41 वर्ष बाद जहां आते हैं उसको बताने से पहले जानिए आखिर कहां चले जाते हैं हनुमानजी... 
प्रकट होकर यहां चले जाते हैं हनुमान?:
 हनुमानजी कलियुग में गंधमादन पर्वत पर निवास करते हैं, ऐसा श्रीमद् भागवत में वर्णन आता है...उल्लेखनीय है कि अपने अज्ञातवास के समय हिमवंत पार करके पांडव गंधमादन के पास पहुंचे थे। एक बार भीम सहस्रदल कमल लेने के लिए गंधमादन पर्वत के वन में पहुंच गए थे, जहां उन्होंने हनुमान को लेटे देखा और फिर हनुमान ने भीम का घमंड चूर कर दिया था।

''यत्र-यत्र रघुनाथ कीर्तन तत्र कृत मस्तकान्जलि।
वाष्प वारि परिपूर्ण लोचनं मारुतिं नमत राक्षसान्तक॥''


अर्थात: कलियुग में जहां-जहां भगवान श्रीराम की कथा-कीर्तन इत्यादि होते हैं, वहां हनुमानजी गुप्त रूप से विराजमान रहते हैं। सीताजी के वचनों के अनुसार- अजर-अमर गुन निधि सुत होऊ।। करहु बहुत रघुनायक छोऊ॥ 
गंधमादन पर्वत क्षेत्र और वन :
गंधमादन पर्वत का उल्लेख कई पौराणिक हिन्दू धर्मग्रंथों में हुआ है। महाभारत की पुरा-कथाओं में भी गंधमादन पर्वत का वर्णन प्रमुखता से आता है। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार माना जाता है कि यहां के विशालकाय पर्वतमाला और वन क्षेत्र में देवता रमण करते हैं। पर्वतों में श्रेष्ठ इस पर्वत पर कश्यप ऋषि ने भी तपस्या की थी। गंधमादन पर्वत के शिखर पर किसी भी वाहन से नहीं पहुंचा जा सकता। गंधमादन में ऋषि, सिद्ध, चारण, विद्याधर, देवता, गंधर्व, अप्सराएं और किन्नर निवास करते हैं। वे सब यहां निर्भीक विचरण करते हैं। 
वर्तमान में कहां है गंधमादन पर्वत? : 
इसी नाम से एक और पर्वत रामेश्वरम के पास भी स्थित है, जहां से हनुमानजी ने समुद्र पार करने के लिए छलांग लगाई थी, लेकिन हम उस पर्वत की नहीं बात कर रहे हैं। हम बात कर रहे हैं हिमालय के कैलाश पर्वत के उत्तर में (दक्षिण में केदार पर्वत है) स्थित गंधमादन पर्वत की। यह पर्वत कुबेर के राज्यक्षेत्र में था। सुमेरू पर्वत की चारों दिशाओं में स्थित गजदंत पर्वतों में से एक को उस काल में गंधमादन पर्वत कहा जाता था। आज यह क्षेत्र तिब्बत के इलाके में है।पुराणों के अनुसार जम्बूद्वीप के इलावृत्त खंड और भद्राश्व खंड के बीच में गंधमादन पर्वत कहा गया है, जो अपने सुगंधित वनों के लिए प्रसिद्ध था। 
कैसे पहुंचे गंधमादन : 
पुराणों के अनुसार जम्बूद्वीप के इलावृत्त खंड और भद्राश्व खंड के बीच में गंधमादन पर्वत कहा गया है, जो अपने सुगंधित वनों के लिए प्रसिद्ध था। इस क्षेत्र में दो रास्तों से जाया जा सकता है। पहला नेपाल के रास्ते मानसरोवर से आगे और दूसरा भूटान की पहाड़ियों से आगे और तीसरा अरुणाचल के रास्ते चीन होते हुए। संभवत महाभारत काल में अर्जुन ने असम के एक तीर्थ में जब हनुमानजी से भेंट की थी, तो हनुमानजी भूटान या अरुणाचल के रास्ते ही असम तीर्थ में आए होंगे। गौरतलब है कि एक गंधमादन पर्वत उड़िसा में भी बताया जाता है लेकिन हम उस पर्वत की बात नहीं कर रहे हैं। 
मातंग आदिवासी : 
सेतु एशिया नामक एक वेबसाइट ने दावा किया है कि श्रीलंका के जंगलों में एक आदिवासी समूह से हनुमानजी प्रत्येक 41 साल बाद मिलने आते हैं।सेतु के शोधानुसार श्रीलंका के जंगलों में एक ऐसा कबीलाई समूह रहता है जोकि पूर्णत: बाहरी समाज से कटा हुआ है। उनका रहन-सहन और पहनावा भी अलग है। उनकी भाषा भी प्रचलित भाषा से अलग है।सेतु एशिया नाम इस आध्यात्मिक संगठन का केंद्र कोलंबों में है जबकि इसका साधना केंद्र पिदुरुथालागाला पर्वत की तलहटी में स्थित एक छोटे से गांव नुवारा में है। इस संगठन का उद्देश्य मानव जाति को फिर से हनुमानजी से जोड़ना है।सेतु नामक इस आध्यात्मिक संगठन का दावा है कि इस बार 27 मई 2014 हनुमानजी ने इन आदिवासी समूह के साथ अंतिम दिन‍ बिताया था। इसके बाद अब 2055 में फिर से मिलने आएंगे हनुमानजी।सेतु संगठन अनुसार इस कबीलाई या आदिवासी समूह को मातंग लोगों का समाज कहा जाता है। उल्लेखनीय है कि कर्नाटक में पंपा सरोवर के पास मातंग ऋषि का आश्रम है जहां हनुमानजी का जन्म हुआ था। इस समूह का कहीं न कहीं यहां से संबंध हो सकता है।श्रीलंका के पिदुरु पर्वत के जंगलों में रहने वाले मातंग कबीले के लोग संख्या में बहुत कम हैं और श्रीलंका के अन्य कबीलों से काफी अलग हैं। सेतु संगठन ने उनको और अच्छी तरह से जानने के लिए जंगली जीवन शैली अपनाई और इनसे संपर्क साधना शुरू किया। संपर्क साधने के बाद उन समूह से उन्हें जो जानकारी मिली उसे जानकर वे हैरान रह गए। 
'हनु पुस्तिका' में सब कुछ लिखा है : 
अध्ययनकर्ताओं अनुसार मातंगों के हनुमानजी के साथ विचित्र संबंध हैं जिसके बारे में पिछले साल ही पता चला। फिर इनकी विचित्र गतिविधियों पर गौर किया गया, तो पता चला कि यह सिलसिला रामायण काल से ही चल रहा है।इन मातंगों की यह गतिविधियां प्रत्येक 41 साल बाद ही सक्रिय होती है। मातंगों अनुसार हनुमानजी ने उनको वचन दिया था कि मैं प्रत्येक 41 वर्ष में तुमसे मिलने आऊंगा और आत्मज्ञान दूंगा। अपने वचन के अनुसार उन्हें हर 41 साल बाद आत्मज्ञान देकर आत्म शुद्धि करने हनुमानजी आते हैं।सेतु अनुसार जब हनुमानजी उनके पास 41 साल बाद रहने आते हैं, तो उनके द्वारा उस प्रवास के दौरान किए गए हर कार्य और उनके द्वारा बोले गए प्रत्येक शब्द का एक-एक मिनट का विवरण इन आदिवासियों के मुखिया बाबा मातंग अपनी 'हनु पुस्तिका' में नोट करते हैं। 2014 के प्रवास के दौरान हनुमानजी द्वारा जंगल वासियों के साथ की गई सभी लीलाओं का विवरण भी इसी पुस्तिका में नोट किया गया है। इस नोट को जानने के लिए इस वेबसाइट पर जा सकते हैं...www.setu.asia/सेतु ने दावा किया है कि हमारे संत पिदुरु पर्वत की तलहटी में स्थित अपने आश्रम में इस पुस्तिका तो समझकर इसका आधुनिक भाषाओँ  में अनुवाद करने में जुटे हुए हैं ताकि हनुमानजी के चिरंजीवी होने के रहस्य जाना जा सके, लेकिन इन आदिवासियों की भाषा पेचीदा और हनुमानजी की लीलाएं उससे भी पेचीदा होने के कारण इस पुस्तिका को समझने में काफी समय लग रहा है।

Saturday, 21 February 2015

51 शक्तिपीठों में है तारापीठ यानी नयन तारा माता मंदिर !!


तारापीठ में देवी सती के नेत्र गिरे थे, इसलिए इस स्थान को नयन तारा भी कहा जाता है ! कहते हैं, देवी तारा की आराधना से हर रोग से मुक्ति मिलती है !हिंदू धर्म में 51शक्तिपीठों में सिद्ध तारापीठ का सबसे अधिक महत्व है ! पश्चिम बंगाल के प्रमुख पर्यटन स्थलों में एक है यह तारापीठ. असम स्थित कामाख्या मंदिर की तरह यह स्थान भी तंत्र साधना में विश्वास रखने वालों के लिए परम पूज्य स्थल है ! यहां भी साधु-संत अति विश्वास और श्रद्धा के साथ साधना करते हैं !
लोककथा-
दक्ष प्रजापति के यज्ञ की अग्निकुंड में कूद कर सती द्वारा आत्म बलिदान करने के बाद शिव विचलित हो उठे और सती के शव को अपने कंधे पर लेकर आकाश मार्ग से चल दिए ! उनके क्रोध से सारे देवी-देवता डर गए ! उन्होंने भगवान विष्णु से प्रार्थना किया ! तब भगवान विष्णु ने अपने चक्र से सती के शव को खंडित कर दिया ! माना जाता है कि इस स्थान पर देवी सती के तीसरे नेत्र का तारा गिरा था ! इसलिए यह स्थान तारापीठ के नाम से विख्यात है ! प्राचीन काल में महर्षि वशिष्ठ ने इस स्थान पर देवी तारा की उपासना करके सिद्धियां प्राप्त की थीं !
तारा शक्तिपीठ की महिमा-
उन्होंने इस स्थान पर एक मंदिर भी बनवाया था, जो अब धरती में समा गया है. वर्तमान में तारापीठ का निर्माण जयव्रत नामक व्यापारी ने करवाया था ! एक बार इस व्यापारी ने व्यापार के सिलसिले में तारापीठ के पास स्थित गांव पहुंचा और वहीं रात गुजारी रात में देवी तारा माता उनके सपने में आई और उससे कहा कि पास ही एक शमशान घाट है. उस श्मशान घाट के बीच में एक शिला है !उसे उखाड़कर विधिवत स्थापना करो व्यापारी ने भी माता के आदेशानुसार उस स्थान की खुदाई करवाकर शिला को स्थापित किया ! इसके बाद उस व्यापारी ने देवी तारा का मंदिर बनवाया, जिसमें देवी तारा की एक भव्य मूर्ति की स्थापना की गई ! इस मूर्ति में देवी तारा की गोद में बाल रूप में भगवान शिव हैं, जिसे मां स्तनपान करा रही हैं !

चिता की आग नहीं बुझती -
वैसे तारापीठ मंदिर का प्रांगण श्मशान घाट के पास है, इसे महा श्मशान घाट कहते हैं. इस महाश्मशान घाट की चिता की आग बुझती नहीं है ! यहां आने पर लोगों को किसी प्रकार का डर नहीं लगता है ! इस मंदिर के चारों ओर द्वारका नदी बहती है ! इस मंदिर में वामाखेपा नामक एक साधक ने देवी तारा की साधना करके उनसे सिद्धियां हासिल की थी ! यह भी रामकृष्ण परमहंस के समान देवी माता के परम भक्तों में से एक थे !

सती के नेत्र गिरे थे तारापीठ में -
तारापीठ में देवी सती के नेत्र गिरे थे, इसलिए इस स्थान को नयन तारा भी कहा जाता है ! कहते हैं, यहां तंत्र साधकों के अलावा जो भी लोग यहां मुराद मांगने आते हैं, वह पूर्ण होता है ! देवी तारा के सेवा आराधना से हर रोग से मुक्ति मिलती है !इस स्थान पर सकाम और निष्काम दोनों प्रकार की सिद्धियां प्राप्त होती हैं ! त्रिताप को जो नाश करती है, उसे तारा कहते हैं ! ताप चाहे कोई सा भी हो, विष का ताप हो, दरिद्रता का ताप हो या भय का ताप, देवी तारा माता सभी तापों को दूर कर जीव को स्वतंत्र बनाती है ! यदि किसी का शरीर रोग से ग्रस्त हो गया है या कोई प्राणी पाप से कष्ट भोग रहा है, वह जैसे ही दिल से तारा-तारा पुकारता है, तो ममतामयी तारा माता अपने भक्तों को इस त्रिताप से मुक्त कर देती है ! तारा अपने शिव को अपने मस्तक पर विराजमान रखती हैं ! वे जीव से कहती है चिंता मत करो, चिता भूमि में जब मृत्यु वरण करोगे तो मैं तुम्हारे साथ रहूंगी, तुम्हारे सारे पाप, दोष सभी बंधन से मैं मुक्त कर दूंगी !
तारा माता का मंत्र :- नीले कांच की माला से बारह माला प्रतिदिन 'ऊँ ह्नीं स्त्रीं हुम फट' मंत्र का जाप कर सकते हैं।मंत्र जाप करने से सभी प्रकार के कास्ट दूर होते है !

Thursday, 19 February 2015

नक्षत्र क्या हैं? नक्षत्र कितने प्रकार के होते है नक्षत्र का आपके जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता हैं?



नक्षत्र क्या हैं?
नक्षत्र का सिद्धांत भारतीय वैदिक ज्योतिष में पाया जाता है। यह पद्धति संसार की अन्य प्रचलित ज्योतिष पद्धतियों से अधिक सटीक व अचूक मानी जाती है। आकाश में चन्द्रमा पृथ्वी के चारों ओर अपनी कक्षा पर चलता हुआ 27.3 दिन में पृथ्वी की एक परिक्रमा पूरी करता है। इस प्रकार एक मासिक चक्र में आकाश में जिन मुख्य सितारों के समूहों के बीच से चन्द्रमा गुजरता है, चन्द्रमा व सितारों के समूह के उसी संयोग को नक्षत्र कहा जाता है। चन्द्रमा की 360˚ की एक परिक्रमा के पथ पर लगभग 27 विभिन्न तारा-समूह बनते हैं, आकाश में तारों के यही विभाजित समूह नक्षत्र या तारामंडल के नाम से जाने जाते हैं। इन 27 नक्षत्रों में चन्द्रमा प्रत्येक नक्षत्र की 13˚20’ की परिक्रमा अपनी कक्षा में चलता हुआ लगभग एक दिन में पूरी करता है। प्रत्येक नक्षत्र एक विशेष तारामंडल या तारों के एक समूह का प्रतिनिधी होता है।

नक्षत्र का आपके जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता हैं?
चन्द्रमा का एक राशिचक्र 27 नक्षत्रों में विभाजित है, इसलिए अपनी कक्षा में चलते हुए चन्द्रमा को प्रत्येक नक्षत्र में से गुजरना होता है। आपके जन्म के समय चन्द्रमा जिस नक्षत्र में स्थित होगा, वही आपका जन्म नक्षत्र होगा। आपके वास्तविक जन्म नक्षत्र का निर्धारण होने के बाद आपके बारे में बिल्कुल सही भविष्यवाणी की जा सकती है। अपने नक्षत्रों की सही गणना व विवेचना से आप अवसरों का लाभ उठा सकते हैं। इसी प्रकार आप अपने अनेक प्रकार के दोषों व नकारात्मक प्रभावों का विभिन्न उपायों से निवारण भी कर सकते हैं। नक्षत्रों का मिलान रंगों, चिन्हों, देवताओं व राशि-रत्नों के साथ भी किया जा सकता है।
गंडमूल नक्षत्र - अश्विनी, आश्लेषा, मघा, मूला एवं रेवती !ये छ: नक्षत्र गंडमूल नक्षत्र कहे गए हैं !इनमें किसी बालक का जन्म होने पर 27 दिन के पश्चात् जब यह नक्षत्र दोबारा आता है तब इसकी शांति करवाई जाती है ताकि पैदा हुआ बालक माता- पिता आदि के लिए अशुभ न हो ! संस्था में गंडमूल दोष निवारण की विशेष सुविधा उपलब्ध है !

शुभ नक्षत्र - रोहिणी, अश्विनी, मृगशिरा, पुष्य, हस्त, चित्रा, उत्तराभाद्रपद, उत्तराषाढा, उत्तरा फाल्गुनी, रेवती, श्रवण, धनिष्ठा, पुनर्वसु, अनुराधा और स्वाति ये नक्षत्र शुभ हैं !इनमें सभी कार्य सिद्ध होते हैं !  
मध्यम नक्षत्र - पूर्वा फाल्गुनी, पूर्वाषाढा, पूर्वाभाद्रपद, विशाखा, ज्येष्ठा, आर्द्रा, मूला और शतभिषा ये नक्षत्र मध्यम होते हैं ! इनमें साधारण कार्य सम्पन्न कर सकते हैं, विशेष कार्य नहीं !  
अशुभ नक्षत्र - भरणी, कृत्तिका, मघा और आश्लेषा नक्षत्र अशुभ होते हैं !इनमें कोई भी शुभ कार्य करना वर्जित है !ये नक्षत्र क्रूर एवं उग्र प्रकृति के कार्यों के लिए जैसे बिल्डिंग गिराना, कहीं आग लगाना, विस्फोटों का परीक्षण करना आदि के लिए ही शुभ होते हैं !  
पंचक नक्षत्र - धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद और रेवती ! ये पाँच नक्षत्र पंचक नक्षत्र कहे गए हैं ! इनमें समस्त शुभ कार्य जैसे गृह प्रवेश, यात्रा, गृहारंभ, घर की छत डालना, लकड़ी का संचय करना आदि कार्य नहीं करने चाहियें !

Wednesday, 18 February 2015

वर्ष 2015 के विभिन्न प्रकार के संस्कार महूर्त !!


षोडश संस्कार मुहूर्त!
जिस कार्य में मन, रूचि और आचार- विचार को परिष्कृत एवं उन्नत किया जाता है उसे संस्कार कहते हैं अर्थात जिस क्रिया से पदार्थों में विकार हटकर स्वच्छता आ जाती है उसको संस्कार कहते हैं !हिन्दुओं में धार्मिक दृष्टि से शुद्ध और उन्नत करने के लिए होने वाले सोलह विशिष्ट कृत्य षोडश संस्कार के नाम से जाने जाते हैं
ये निम्न हैं -1. गर्भाधान 2. पुंसवन 3. सीमान्तोन्नयन 4. जातकर्म 5. नामकरण 6. निष्क्रमण 7. अन्नप्राशन 8. कर्णवेध 9. चूड़ाकर्म 10. यज्ञोपवीत 11. विद्यारम्भ 12. वेदारम्भ 13. समावर्तन 14. उपनयन (व्रतबन्ध) 15. विवाह 16. अन्त्येष्टि

भूमि के क्रय- विक्रय का मुहूर्त !
तिथि - 2, 5, 6, 10, 11, 15 (दोनों पक्ष)
वार - गुरुवार, शुक्रवार
नक्षत्र - मृगशिरा, पुनर्वसु, आश्लेषा, मघा, विशाखा, अनुराधा, मूल, रेवती
लग्न - 2, 5, 8 (केन्द्र एवं त्रिकोण में शुभग्रह एवं 3, 6, 11वें पापग्रह होना शुभ होता है)

वास्तु- शांति मुहूर्त !
गृह- निर्माण से पूर्व या गृह- प्रवेश से पूर्व वास्तु- शांति अवश्य करनी चाहिए !इसके लिए शुभ नक्षत्र, वार एवं तिथि निम्न प्रकार समझें -
शुभ वार - चन्द्र, बुध, गुरु व शुक्र
शुभ तिथि - 2, 3, 5, 7, 10, 11, 12 व 13 (दोनों पक्ष)
शुभ नक्षत्र - अश्विनी, पुनर्वसु, पुष्य, हस्त, तीनों उत्तरा, रोहिणी, रेवती, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, स्वाति, अनुराधा एवं मघा
टिप्पणी - चन्द्र बल, लग्न शुद्धि एवं भद्र का विचार कर लेना चाहिए

रजस्वला स्नान मुहूर्त !
शुभ तिथि - 1 2, 3, 5, 6, 7, 8, 10, 12, 15 (दोनों पक्ष)
शुभ वार - सोम, बुध, गुरु, शुक्र
नक्षत्र - अश्विनी, रोहिणी, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य, तीनों उत्तरा, हस्त, चित्रा, अनुराधा, धनिष्ठा, रेवती I
टिप्पणी - रजस्वला स्नान तीन दिन के बाद ही होना चाहिए क्योंकि इससे पूर्व कन्या शुद्ध नहीं होती है I

पुंसवन संस्कार मुहूर्त !
यह संस्कार गर्भधारण के दूसरे या तीसरे महीने में मनचाही सन्तान की प्राप्ति के लिए किया जाता है !ज्योतिष के अनुसार गर्भ के दूसरे महीने में मंगल ग्रह का तथा तीसरे महीने में गुरु ग्रह का प्रभाव रहता है ! शुभ नक्षत्रों का चयन करके मन्त्र पाठ व औषधियों का सेवन इस प्रकार से किया जाता है कि सन्तान उत्तम भाग्य वाली एवं मनचाही हो !आयुर्वेद शास्त्र में कुछ ऐसी आश्चर्यजनक औषधियां हैं जिनके प्रयोग से पुत्र या पुत्री की प्राप्ति भी कि जा सकती है !इन्हीं औषधियों एवं उत्तम मंत्रों के उचित समय में प्रयोग को पुंसवन संस्कार कहा जाता है !प्रस्तुत हैं इनके लिए उत्तम नक्षत्र एवं तिथियां !
यह संस्कार गर्भाधान के दूसरे या तीसरे महीने में पुनर्वसु, पुष्य, हस्त, मृगशिरा, श्रवण नक्षत्रों में जब रविवार, मंगलवार एवं गुरुवार का योग हो, शुक्लपक्ष हो, नंदा एवं भद्रा नाम की तिथियां होँ और किये जाने वाले समय में मिथुन, सिंह, कुंभ, धनु और मीन लग्न हो तब इस संस्कार को सम्पन्न किया जाता है

विष्णु पूजा मुहूर्त !
गर्भ के आठवें महीने में गर्भ की रक्षा हेतु सृष्टि के पालक शंख- चक्र- गदा- पदमधारी विष्णु की पूजा करके स्वर्ण प्रतिमा का दान किया जाता है !
शुभ तिथि - 1(कृष्णपक्ष), 2, 3, 5, 7, 10, 15 (शुक्लपक्ष)
शुभ वार - सोम, गुरु व शुक्र
शुभ नक्षत्र - अश्विनी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य, हस्त, चित्रा, स्वाति, विशाखा, अनुराधा, श्रवण, धनिष्ठा व रेवती !
लग्न - 2, 3, 4, 6, 7 व 9 I
टिप्पणी - भद्रा, व्यतिपात, रिक्ता- तिथि को त्याज्य दें एवं पत्नी के चन्द्र बल को महत्ता देने के साथ- साथ लग्न शुद्धि भी देखनी चाहिए !

सूतिका स्नान मुहूर्त !
प्रथम सूतिका स्नान पुत्र जन्म के सातवें या नौवें दिन होता है !निम्नलिखित वार, तिथि, एवं नक्षत्र में प्रसूता स्त्री को स्नान कराना शुभ रहता है
शुभ तिथि - 2, 3, 5, 7, 10, 13 व 15 (शुक्लपक्ष)
शुभ वार - रवि, मंगल, गुरु
शुभ नक्षत्र - रेवती, तीनों उत्तरा, रोहिणी, मृगशिरा, हस्त, स्वाति, अश्विनी एवं अनुराधा
लग्न - 2, 3, 4, 6, 7 व 9
टिप्पणी - आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, श्रवण, मघा, भरणी, विशाखा, कृत्तिका, मूला, चित्रा आदि नक्षत्र बुधवार व शनिवार एवं 8, 6, 12, 4, 9, 14 तिथि में प्रसूता को स्नान न कराएं क्योंकि इनमें स्नान कराने से सन्तान नहीं होती है

पुराने गृह प्रवेश का मुहूर्त !
यदि आपने पुराना घर ख़रीदा हो या किसी कारण से घर के टूट जाने पर उसी स्थान पर उसकी मरम्मत करवाई हो या दूसरा घर बनाया हो तो उस घर में प्रवेश के लिए शुभ नक्षत्र, वार, तिथि एवं मास निम्नवत समझें-
शुभ मास - वैशाख, ज्येष्ठ, माघ और फाल्गुन !इसमें कार्तिक, श्रावण और मार्गशीर्ष मास भी ग्राह्य हैं
शुभ वार - चन्द्र, बुध, गुरु, शुक्र और शनि
शुभ तिथि - 2, 3, 5, 6, 7, 10, 11 व 13 (शुक्ल पक्ष)
शुभ नक्षत्र - रोहिणी, मृगशिरा, उफा., चित्रा, अनुराधा, उषा., उभा. और रेवती !ये नक्षत्र न मिलें तो विशेष परिस्थिति में पुष्य, स्वाति, धनिष्ठा और शतभिषा नक्षत्र भी प्रवेश के लिए शुभ माने गए हैं ! यहाँ कलशचक्र शुद्धि की उपेक्षा कर सकते हैं परन्तु पंचांग, चन्द्र एवं लग्न शुद्धि अवश्य करें !

यात्रा मुहूर्त विचार !
यात्रा से ही मानव का सामाजिक व्यवहार चलता है !वस्तुत: शुभ ग्रह की दशा में तथा शुभ मुहूर्त या शकुन में यात्रा करने से, बिना अधिक परिश्रम किये कार्य की सिद्धि होती है जबकि अशुभ मुहूर्त या शकुन में यात्रा करने से हानि होती है !गुरु या शुक्र का अस्त होना यात्रारम्भ के लिए शुभ नहीं माना जाता है !यदि यात्रा आवश्यक हो तो गुरु व शुक्र की उपासना के बाद यात्रा करनी चाहिए !
तिथि - रिक्ता, अमावस, पूर्णिमा, षष्ठी, अष्टमी, द्वादशी और शुक्ल प्रतिपदा को छोड़कर शेष सभी तिथियां यात्रा हेतु शुभ मानी गयी हैं I अपनी राशि के अनुसार घात तिथियों को भी त्याज्य देना चाहिए !
वार - दिशाशूल त्याज्य कर समस्त वार प्रशस्त हैं
शुभनक्षत्र - अश्विनी, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य, हस्त, अनुराधा, श्रवण, धनिष्ठा और रेवती !
मध्य नक्षत्र - रोहिणी, तीनों उत्तरा, तीनों पूर्वा, ज्येष्ठा, मूला और शतभिषा !
वर्जित नक्षत्र - भरणी, कृत्तिका, आर्द्रा, आश्लेषा, मघा, चित्रा, स्वाति और विशाखा नक्षत्र निन्द्य हैं !
टिप्पणी - पंचक एवं पड़वा में यात्रा कदापि नहीं करनी चाहिए ! दिशाशूल विचार सोमवार व शनिवार को पूर्व, गुरुवार को दक्षिण, रविवार व शुक्रवार को पश्चिम, मंगलवार व बुधवार को उत्तर दिशा में दिशाशूल समझकर यात्रा का त्याज्य करना चाहिए !अन्यथा हानि उठानी पड़ सकती है !समय शूल विचार प्रात:काल में पूर्व, मध्याह्न में दक्षिण, गोधूलि में पश्चिम एवं रात्रि में उत्तर दिशा में यात्रा नहीं करनी चाहिए !चन्द्र वास विचार मेष, सिंह और धनु राशि का चन्द्रमा पूर्व दिशा में वृष, कन्या और मकर राशि का चन्द्रमा दक्षिण दिशा में तुला, मिथुन और कुंभ राशि का चन्द्रमा पश्चिम दिशा में कर्क, वृश्चिक और मीन का चन्द्रमा उत्तर दिशा में वास करता है !चन्द्र वास फल इस प्रकार है : सम्मुख चन्द्रमा धनलाभ कारक दक्षिण चन्द्रमा सुख- सम्पत्ति देने वाला पृष्ठ चन्द्रमा शोक- संताप कारक वाम चन्द्रमा धन हानि कारक जन्म राशि से 1, 3, 6, 7, 10 व 11वें चन्द्र हो तो शुभ होता है !इसके अतिरिक्त शुक्लपक्ष में 2, 5 व 9वें चन्द्रमा हो तो भी शुभ होता है !

नवीन वस्त्र धारण मुहूर्त !
शुभ तिथि - 2, 3, 5, 6, 7, 8, 10, 12, 15 (दोनों पक्ष)
शुभ वार - बुध, गुरु, शुक्र
शुभ नक्षत्र - अश्विनी, रोहिणी, पुनर्वसु, पुष्य, पूफा., उफा., हस्त, चित्रा, स्वाति, विशाखा, अनुराधा, रेवती
टिप्पणी - विवाह, यज्ञ, अनुष्ठान, संवत्सराम्भ, राजतिलक, वस्त्रालंकार, विशेषोत्सव एवं श्राद्ध आदि में बिना मुहूर्त के भी वस्त्र पहने जा सकते हैं

गर्भाधान मुहूर्त !
स्त्रियों के मासिक धर्म के प्रारम्भ से सोलह रात ऋतुकाल कही गयी हैं !इनमें से पहली चार रात स्त्री सहवास के योग्य नहीं हैं !शेष बारह रात में 6, 8, 10, 12, 14, 16 वीं रात में सहवास प्रशस्त और पुत्र प्रदायक है
शुभ तिथि - 4, 6, 8, 9, 14, पूर्णिमा व अमावस्या इनको छोड़ करके शेष तिथियां अनुकूल हैं
शुभ वार - रवि, सोम, बुध, गुरु, शुक्र
नक्षत्र - तीनों उत्तरा, मृगशिरा, हस्त, अनुराधा, रोहिणी, स्वाति, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा आदि नक्षत्रों में गर्भाधान शुभ है !चित्रा, पुनर्वसु, पुष्य, अश्विनी, नक्षत्र गर्भाधान के लिए मध्यम है अर्थात शुभ नहीं है !इनके अतिरिक्त शेष नक्षत्र अधम हैं जिनमें गर्भाधान नहीं करना चाहिए
लग्न शुद्धि- केन्द्र- त्रिकोण में शुभग्रह होँ 3, 6, 11वें पापग्रह होँ एवं लग्न में सूर्य, मंगल, गुरु की दृष्टि हो !विषम राशि या नवांश में चन्द्रमा हो ऐसे लग्न में रजोदर्शन के बाद 6, 8, 10, 12, 14, 16वीं रात में गर्भधारण करना शुभ एवं फलदायी होता है
टिप्पणी - ऋतुकाल के पहले चार दिन एवं ग्यारहवां व तेरहवां दिन गर्भाधान के लिए वर्जित है I शेष दस दिन ही गर्भाधान के लिए उपयुक्त हैं I पुत्र की कामना हो तो ऋतुकाल के सम दिन और पुत्री की कामना हो तो विषम दिनों में गर्भाधान करना चाहिए I
 


सिमन्तोन्नयन संस्कार मुहूर्त !
गर्भ के चौथे, छठे या आठवें मास में बालक एवं उसकी माता की रक्षा के लिए बालक के जन्म समय किसी भी दुविधा से बचने के लिए यह संस्कार सम्पन्न किया जाता है
मृगशिरा, पुनर्वसु, मूला, पुष्य, हस्त, श्रवण नक्षत्रों में गुरु, मंगल या रविवार में भद्रा (6, 8, 12), रिक्ता (4, 9, 14, 30) तिथियों को छोड़कर अन्य तिथियों में जब किये जाने वाले समय में केन्द्र और त्रिकोण में शुभ ग्रह होँ, 3, 6, 11 भावों में पाप ग्रह होँ, पुरुष ग्रह का लग्न हो तब यह संस्कार करना लाभप्रद रहता है
 

पितृ गृह जाने का मुहूर्त !
प्रसव के पूर्व जब स्त्री पति गृह से पितृ गृह जाती है या असमय मायके जाए तो इस मुहूर्त को उपयोग में लाना चाहिए
शुभ तिथि - 1,(कृष्णपक्ष), 2, 3, 5, 7, 10 (शुक्लपक्ष)
शुभ वार - सोम, गुरु, शुक्र
शुभ नक्षत्र - अश्विनी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य, हस्त, चित्रा, स्वाति, विशाखा, अनुराधा, श्रवण, धनिष्ठा व रेवती
लग्न - 2, 3, 4, 6, 7 व 9
टिप्पणी - भद्रा, व्यतिपात, रिक्ता तिथि को त्याज्य दें एवं पत्नी के चन्द्र बल को महत्ता देने के साथ- साथ लग्न शुद्धि भी देखनी चाहिए

जातकर्म संस्कार !
यह संस्कार जातक के जन्म के तुरंत बाद किया जाता है !इसमें बच्चे का मुख देखकर उत्तराभिमुख होकर पिता शीतल जल से स्नान करता है !दुर्बलता की स्थिति में स्वर्णयुक्त गुनगुने जल से स्नान करना चाहिए !इसके करने से बालक की आयु में वृद्धि होती है !जन्म समय पिता उपस्थित न हो तो 11वें या 12वें दिन करना चाहिए !बच्चा गण्डमूल में उत्पन्न हो तो बिना मुख देखे यह संस्कार करना चाहिए !रिक्ता, 14, 30 व 15 तिथि एवं रवि संक्रान्ति को त्याजना चाहिए !शुभ वारों (चन्द्र, बुध व शुक्र) व मृदु, क्षिप्र और चर नक्षत्र को ग्रहण करना चाहिए !बालक का नाल कट जाए तो सूतक होता है !जबकि जातकर्म सूतक न होने पर ही होता है !आधुनिक युग में नाल काटने से पूर्व यह कर्म असुविधाजनक है !इसलिए जन्म के बाद लग्नशुद्धि देखकर कर लेना चाहिए !

दोलारोहण मुहूर्त !
जन्मदिन से दसवें, बारहवें, सोलहवें, अठारहवें, बाईसवें दिन प्रथम बार झूले में झुलाने या सुलाने को दोलारोहण कहते हैं !
शुभ वार - सोम, बुध, गुरु एवं शुक्र
शुभ नक्षत्र - मृगशिरा, रेवती, चित्रा, अनुराधा, हस्त, अश्विनी, पुष्य, अभिजित, तीनों उत्तरा, रोहिणी
टिप्पणी - शुभवारों और नक्षत्रों में पहले- पहल बालक को झुला झुलाना शुभ है I सूर्य नक्षत्र से उस दिन तक का नक्षत्र गिन कर फल को विचारें एवं शुभ अवधि में बालक को पहली बार झुलाएं

नामकरण मुहूर्त !
शास्त्रानुसार बालक का नामकरण संस्कार 11वें दिन होना चाहिए !लेकिन मानव अपनी सुविधानुसार 7वें, 8वें, 10वें, 11वें या 12वें दिन भी कर लेता है !यदि बारहवें दिन तक नामकरण मुहूर्त न हो सके तो 18वें, 19वें व 100वें दिन बीतने पर या छह माह या एक वर्ष में करना चाहिए !शुभ मुहूर्त में ज्योतिष शास्त्रानुसार नवजात शिशु का नाम उसके कान में कहा जाता है !कुछ लोग जन्म नाम नहीं रखते हैं !लेकिन ऐसा नहीं करना चाहिए क्योंकि दो नाम होने से दो राशियों का प्रभाव उस मनुष्य पर पड़ता है जिससे ग्रहों के शुभाशुब प्रभाव से सुख- दुःख का अनुभव अधिक होता है !बच्चे को शुभ मुहूर्त में स्नान कराकर, साफ वस्त्र पहनाकर प्रसन्नता सहित नामकरण संस्कार करना चाहिए !
शुभ वार - सोम, बुध, गुरु एवं शुक्र
शुभ तिथि - 1(कृष्णपक्ष), 2, 3, 7, 10, 11, 13(शुक्लपक्ष)
शुभ नक्षत्र - मृगशिरा, चित्रा, रोहिणी, उषा., उफा., उभा., अश्विनी, पुष्य, हस्त, अभिजित
लग्न शुद्धि - लग्न स्थिर 2, 5, 8 होना चाहिए !लग्न में केन्द्र व त्रिकोण में शुभग्रह होँ, 3, 6, 11वें भाव में क्रूरग्रह होँ एवं 8 व 12वें भाव में कोई ग्रह नहीं होना चाहिए
टिप्पणी - बालक की पहचान उसके नाम से ही होती है !नाम के आधार पर ही ख्याति, सम्मानादी भी मिलता है !अतः बालक का नाम जन्माक्षर के आधार पर रखना चाहिए !यदि दो नाम होंगे तो दो राशियों के प्रभाव से प्रभावित होने पर एक ही मनुष्य को दो बार शुभाशुभ ग्रहों के प्रभाव से प्रभावित होना पड़ता है

शिशु निष्क्रमण मुहूर्त !
बालक को प्रथम बार घर से बाहर ले जाने को निष्क्रमण कहते हैं !यह कर्म बारहवें दिन या चौथे मास में करना शुभ है !बालक को सर्वप्रथम मंदिर ले जाकर पुजार्चन करना चाहिए एवं ब्राह्मणों से शुभाशीष लेने चाहिए !इसके अतिरिक्त बच्चे को पितृकुल के किसी स्वजन के पास ले जाकर आशीर्वाद लेना चाहिए !
शुभ वार - सोम, बुध एवं गुरु
शुभ तिथि - 1(कृष्णपक्ष), 2, 3, 5 , 7, 10, 11, 13 व 15 (शुक्लपक्ष)
शुभ नक्षत्र - अश्विनी, रोहिणी, श्रवण, पुष्य, पुनर्वसु, मृगशिरा, हस्त, धनिष्ठा, अनुराधा और रेवती
लग्न - 2, 3, 4, 5, 6, 7 व 11वां
टिप्पणी - जन्म से बारहवें दिन या जन्म से चौथे मास में शुभ तिथ्यादि में निष्क्रमण अर्थात प्रसूतिका गृह से दूसरे गृह या आंगन में लाना प्रशस्त है I
अन्नप्राशन मुहूर्त

अन्नप्राशन मुहूर्त !
शुभ दिन का चयन करके माता- पिता बच्चे को अन्न का स्वाद चखते हैं !जन्म से 5, 6, 7, 8, 10वें महीने में बालक को पहली बार अन्न खिलाया जाता है !यह दिन पुत्र जन्म से 6, 8, 10 और सम मास में और कन्या जन्म 5, 7 आदि विषम मास में शुभ तिथि, नक्षत्रादि में यह संस्कार करना चाहिए
शुभ वार - सोम, बुध, गुरु एवं शुक्र
शुभ तिथि - 1(कृष्णपक्ष), 2, 3, 5 , 7, 10, 13 व 15 (शुक्लपक्ष)
शुभ नक्षत्र - अश्विनी, रोहिणी, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य, तीनों उत्तरा, हस्त, चित्रा, स्वाति, अनुराधा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा
शुभ लग्न - 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9, 10, 11
टिप्पणी - शुभग्रह 1, 4, 5, 7, 9 में होँ तथा पापग्रह 3, 6, 11वें भाव में हो या बालक की जन्म राशि से 8 या 12वां भाव ग्रह रहित हो तो यह संस्कार अवश्य कर लेना चाहिए !लग्न शुद्धि एवं चन्द्र बल देखकर ही यह संस्कार करना चाहिए

चूड़ाकर्म (मुंडन) मुहूर्त !
यह संस्कार विषम वर्ष में लड़के का और सम वर्षों में कन्या का करना चाहिए !चौलकर्म, मुंडन या चूडाकर्म उत्तरायण सूर्य में शुभ समय में करना चाहिए !
शुभ वार - सोम, बुध, गुरु एवं शुक्र
शुभ तिथि - 2, 3, 5, 6, 7, 10, 13 (शुक्लपक्ष)
शुभ नक्षत्र - पुनर्वसु, मृगशिरा, धनिष्ठा, श्रवण, रेवती, पुष्य, चित्रा, अश्विनी एवं हस्त
शुभ लग्न - 2, 3, 4, 5, 6, 7, 10, 12
टिप्पणी - लग्न शुद्धि देखकर दोपहर से पूर्व चूडाकर्म संस्कार करना प्रशस्त है !ब्राह्मण के लिए रविवार, क्षत्रिय के लिए मंगलवार, वैश्य व शूद्र के लिए शनिवार उपयुक्त है, ऐसा कहा गया है  दक्षिणायन, देवशयन, निर्बल चंद्रमास, संध्या, रात्रि या युद्धकाल में यह कार्य नहीं करना चाहिए !माता प्रसूता या रजस्वला हो तब भी यह संस्कार वर्जित है !ऐसा ध्यान रखें की क्षीण चन्द्र होने पर मृत्यु, क्षीण मंगल होने पर दुर्घटना, क्षीण शनि होने पर पंगुता एवं क्षीण सूर्य होने पर ज्वर की सम्भावना बनती है, इसलिए लग्न शुद्धि भली- भाँति अवश्य देख लें !
उपनयन संस्कार मुहूर्त

उपनयन संस्कार मुहूर्त !
उपनयन संस्कार को कहीं यज्ञोपवीत संस्कार व कहीं व्रतबन्ध के नाम से जाना जाता है !यज्ञोपवीत संस्कार हो जाने पर मनुष्य द्विज कहलाता है !शास्त्रानुसार ब्राह्मण का पाँच या आठवें वर्ष में, क्षत्रिय का छठे या ग्यारहवें वर्ष में तथा वैश्य का आठवें या बारहवें वर्ष में उपनयन संस्कार होना चाहिए !
शुभ मास - चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, माघ और फाल्गुन
सूर्य - उत्तरायण में शुभ वार - रवि, सोम, बुध, गुरु एवं शुक्र
शुभ तिथि - 2, 3, 5, 7, 10, 11 (शुक्लपक्ष) एवं 2, 3, 5 (कृष्णपक्ष)
शुभ समय - पूर्वाह्न शुभ लग्न - 2, 3, 5, 6, 7, 12
टिप्पणी - तारा व ग्रह शुद्धि देखनी चाहिए !शुभ ग्रह केन्द्र या त्रिकोण में होने चाहिए !इस दिन संस्कार के बाद सामर्थ्य व श्रद्धानुसार दान करना चाहिए !ब्राह्मण को दिया दान शुभ फलदायी है  ज्येष्ठ शुक्ल द्वितीया, आषाढ़ शुक्ल दशमी, पौष शुक्ल एकादशी और माघ शुक्ल द्वादशी में उपनयन संस्कार वर्जित है !

विवाह एवं इससे संबंधित मुहूर्त
वाग्दान (सगाई) मुहूर्त :

इस मुहूर्त में पिता या कन्या का कोई संबंधी वर के घर जाकर जब रिश्ते को सुनिश्चित कर आते है अर्थात रिश्ता जुबानी तौर पर पक्का कर आते हैं तो इसे वाग्दान कहते हैं !निम्नलिखित शुभ तिथि, वार और नक्षत्रों में यह शुभ कर्म कर सकते हैं
शुभ वार - सोम, बुध, गुरु एवं शुक्र
शुभ तिथि - 2, 3, 5, 7, 10, 12, 13 (शुक्लपक्ष)
शुभ नक्षत्र - रोहिणी, मृगशिरा, मघा, उत्तरा फाल्गुनी, हस्त, स्वाति, अनुराधा, मूला, उत्तराषाढा, उत्तरा भाद्रपदा और रेवती

वर को तिलक करने का मुहूर्त !
सगाई निश्चित हो जाने के बाद कन्या पक्ष वाले वर का तिलक करने जाते हैं और भेंट आदि देते हैं ये कार्य भी कुछ शुभ घड़ियों में होना चाहिए
शुभ वार - सोम, बुध, गुरु एवं शुक्र
शुभ तिथि - 2, 3, 5, 7, 10, 12, 13 (शुक्लपक्ष)
शुभ नक्षत्र - अश्विनी, कृत्तिका, रोहिणी, उत्तरा फाल्गुनी, उत्तराषाढा, उत्तराभाद्रपद, पूर्वाभाद्रप, पूर्वाषाढा, पूर्वाफाल्गुनी
टिप्पणी - भद्रा, गण्डान्त, गुरु- शुक्रास्त एवं निर्बल चन्द्र त्याज्य है

विवाह मुहूर्त !
विवाह मुहूर्त का निर्णय करने से पहले वार के लिए सूर्य बल, कन्या के लिए गुरु बल एवं दोनों के लिए चन्द्र बल विचार कर निम्नलिखित शुभ मास, तिथि, वार, व नक्षत्र आदि में विवाह संस्कार करना चाहिए
शुभ मास - वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, पौष, माघ, फाल्गुन व मार्गशीर्ष
शुभ वार - सभी वार ग्राह्य हैं
शुभ तिथि - 1(कृष्णपक्ष), 2, 3, 5, 6, 7, 8, 10, 12 (शुक्लपक्ष)
शुभ नक्षत्र - रोहिणी, मृगशिरा, मघा, उफा., हस्त, स्वाति, अनुराधा, मूला, उषा., उभा., रेवती
शुभ लग्न - सप्तम में सभी ग्रह अनिष्टकारक कहे गए हैं I लग्न में 3, 6, 7, 9 व 12वीं राशि का नवांश श्रेष्ठ कहा गया है !जब जन्म राशि जन्म लग्न से आठवीं या बारहवीं न हो
विवाह लग्न से सूर्यादि ग्रहों के शुभ भाव अधोलिखित हैं :
सूर्य - 3, 6, 10, 11, 12वें भाव में
चन्द्र - 2, 3, 11वें भाव में
मंगल - 3, 6, 11वें भाव में
बुध व गुरु - 1, 2, 3, 4, 6, 9, 10, 11वें भाव में
शुक्र - 1, 2, 4, 5, 9, 10, 11वें भाव में
शनि, राहु- केतु - 3, 6, 8, 11वें भाव में
टिप्पणी - गुरु व शुक्र अस्त नहीं होने चाहियें !सिंहस्थ गुरु, भद्रा व क्षीण चन्द्र वर्जित हैं
नोट : वास्तव में वैवाहिक मुहूर्त का निर्णय करना अत्यन्त विद्वत्ता एवं परिश्रम साध्य काम है !इस मुहूर्त को शुद्धि पूर्वक निकालने के लिए लता, पात, युति, वेध, यामित्र, बाण, एकार्गल, उपग्रह, क्रांतिसाम्य एवं दग्धा तिथि आदि दस महादोषों का अनेक प्रकार के ग्रहबलों का राशि दोषों का तथा अनेक शास्त्रीय नियमों का, लोकाचार का, क्षेत्र, जाति, कुल परम्परा एवं आयु आदि का विचार किया जाता है और एक साधारण मनुष्य के लिए इन सब बातों का एक साथ विचार करके शुद्ध मुहूर्त निकालना अत्यन्त कठिन कार्य है !अतः जनसुविधा के लिए प्रत्येक राशि वाले वर एवं कन्याओं के लिए पूरे वर्ष की शुभ तिथियां निकालकर दी गयी हैं !लड़के की जन्मराशी या बोलते नाम की राशि एवं कन्या की राशि मालूम करके नीचे दी गयी तारीखों से एक संयुक्त तिथि निकाल लें और उसे शुभ विवाह मुहूर्त के रूप में पर्युक्त करें !

पुनर्विवाह मुहूर्त !
यदि किसी दम्पत्ति का विवाह अशुद्ध काल में हो गया है तो वह पुन: शुद्ध काल में विवाह कर सकते हैं यह शास्त्र सम्मत है !जब पति की मृत्यु के पश्चात् कोई स्त्री दूसरा पति चयन करके विवाह कर लेती है तो उसे पुनर्विवाह कहते हैं !जब वर में दोष हो, वर कन्या को त्याज्य कर सन्यास ग्रहण कर ले या मर जाए, कन्या की इच्छा के विरुद्ध विवाह कर लिया जाए, इस स्थिति में कन्या का किसी अन्य योग्य वर के साथ पुनर्विवाह कर दिया जाए तो यह सर्वत्र धर्म के अनुकूल माना गया है इसलिए पुनर्विवाह निम्नलिखित शुभ वार, मास, तिथि एवं नक्षत्र में करें-
शुभ मास - वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, पौष, माघ, फाल्गुन व मार्गशीर्ष
शुभ वार - सभी वार ग्राह्य हैं
शुभ तिथि - 2, 3, 5, 6, 7, 8, 10, 12 (शुक्लपक्ष)
शुभ नक्षत्र - रोहिणी, मृगशिरा, मघा, उफा., हस्त, स्वाति, अनुराधा, मूला, उषा., उभा., रेवती
शुभ लग्न - सप्तम में सभी ग्रह अनिष्टकारक कहे गए हैं !लग्न में 3, 6, 7, 9 व 12वीं राशि का नवांश श्रेष्ठ कहा गया है !जब जन्म राशि जन्म लग्न से आठवीं या बारहवीं न हो
विवाह लग्न से सूर्यादि ग्रहों के शुभ भाव अधोलिखित हैं :
सूर्य - 3, 6, 10, 11, 12वें भाव में
चन्द्र - 2, 3, 11वें भाव में
मंगल - 3, 6, 11वें भाव में
बुध व गुरु - 1, 2, 3, 4, 6, 9, 10, 11वें भाव में
शुक्र - 1, 2, 4, 5, 9, 10, 11वें भाव में
शनि, राहु- केतु - 3, 6, 8, 11वें भाव में
टिप्पणी - गुरु व शुक्र अस्त एवं क्षीण चन्द्रमा वर्जित है पुनः विवाह करने वाली स्त्री को पुनर्भु कहा जाता है !सूर्य नक्षत्र से साभिजित गणना के अनुसार 4, 11, 18, 25वां नक्षत्र मृत्युदायक माना गया है !शेष नक्षत्र पुनर्विवाह के लिए शुभ हैं

वेदिका मुहूर्त !
विवाह में यज्ञादि हेतु वेदी का निर्माण किया जाता है, यह एक आवश्यक कृत्य है
शुभ वार - रवि, सोम, बुध, गुरु व शुक्र
शुभ तिथि - 2, 3, 5, 6, 7, 8, 10, 12 (शुक्लपक्ष)
शुभ नक्षत्र - रोहिणी, मृगशिरा, मघा, उत्तरात्रय, हस्त, स्वाति, अनुराधा, मूला और रेवती

वधू प्रवेश मुहूर्त !
विवाह के बाद प्रथम बार पति के घर आने को वधू प्रवेश या वधू आगमन कहा जाता है !मुहूर्त निर्णय करते समय निम्नलिखित स्थितियों का चयन करें-
शुभ मास - वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, पौष, माघ, फाल्गुन व मार्गशीर्ष
शुभ वार - सोम, बुध, गुरु व शुक्र
शुभ तिथि - 2, 3, 5, 6, 7, 8, 10, 12 (शुक्लपक्ष)
शुभ नक्षत्र - रोहिणी, मृगशिरा, मघा, उफा., हस्त, स्वाति, अनुराधा, मूला, उषा., उभा., रेवती
शुभ लग्न - सप्तम में सभी ग्रह अनिष्टकारक कहे गए हैं !लग्न में 3, 6, 7, 9 व 12वीं राशि का नवांश श्रेष्ठ कहा गया है !जब जन्म राशि जन्म लग्न से आठवीं या बारहवीं न हो
विवाह लग्न से सूर्यादि ग्रहों के शुभ भाव अधोलिखित हैं :
सूर्य - 3, 6, 10, 11, 12वें भाव में !चन्द्र - 2, 3, 11वें भाव में
मंगल - 3, 6, 11वें भाव में
बुध व गुरु - 1, 2, 3, 4, 6, 9, 10, 11वें भाव में
शुक्र - 1, 2, 4, 5, 9, 10, 11वें भाव में
शनि, राहु- केतु - 3, 6, 8, 11वें भाव में
टिप्पणी - वधू प्रवेश नवीन गृह में सर्वथा त्याज्य है !विषम दिनों, विषम मासों या विषम वर्षों में वर्जित है !इसी तरह भद्रा, व्यतिपात, गुरु- शुक्रास्त, क्षीण चन्द्र भी वर्जित है

नव वधू द्वारा पाकारम्भ मुहूर्त !
ससुराल में आने के बाद वधू द्वारा प्रथम बार रसोई बनवाई जाती है !इस कार्य के लिए ही इस मुहूर्त का विचार किया गया है !निम्नलिखित वार, तिथि, नक्षत्र एवं लग्न आदि में नव वधू का पाकारम्भ (पहली बार रसोई बनाना) करना शुभ होता है 

शुभ वार - सोम, बुध, गुरु व शनि
शुभ तिथि - 1(कृष्णपक्ष), 2, 3, 5, 6, 7, 8, 10, 12 (शुक्लपक्ष)
शुभ नक्षत्र - कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिरा, पुष्य, उत्तरात्रय, विशाखा, ज्येष्ठा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा एवं रेवती

द्विरागमन मुहूर्त !
ससुराल से पिता के घर में जाकर फिर से पति- परमेश्वर के घर में आने का नाम द्विरागमन है !यह भी शुभ समय में करने श्रेष्ठ होता है !निम्नलिखित वार, तिथि, नक्षत्र एवं लग्न आदि में द्विरागमन शुभ होता है
शुभ वर्ष - 1, 3, 5, 7, 9, 11, 13 15 व 17
शुभ मास - वैशाख, मार्गशीर्ष एवं फाल्गुन
शुभ वार - रवि, सोम, बुध, गुरु एवं शुक्र
शुभ तिथि - 1, 2, 3, 5, 7, 8, 10, 11, 13 (शुक्लपक्ष)
शुभ नक्षत्र - रोहिणी, पुनर्वसु, मृगशिरा, अनुराधा, धनिष्ठा, श्रवण, चित्रा, स्वाति, रेवती, पुष्य, चित्रा, पूर्वाषाढा, अश्विनी, मूला,हस्त व उत्तरात्रय
शुभ लग्न - 3, 4, 7, 9 , 10 व 12वीं राशि
टिप्पणी - शनि और मंगलवार, 4, 6, 9, 12, 14, 30 तिथियां त्याज्य हैं

प्रथम समागम मुहूर्त !
अधोलिखित वार, तिथि, नक्षत्र एवं लग्न आदि में वर- वधू का परस्पर प्रथम समागम करना शुभ होता है !
शुभ वार - रवि, सोम, बुध, गुरु एवं शुक्र
शुभ तिथि - 1(कृष्णपक्ष), 2, 3, 5, 7, 9, 13, 15 (शुक्लपक्ष)
शुभ नक्षत्र - इन नक्षत्रों को तीन वर्गों में विभाजित किया गया है
पूर्वाद्ध भोगी नक्षत्र - रेवती, अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिरा
मध्य भोगी नक्षत्र - आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा, मघा, पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाति, विशाखा, अनुराधा
उत्तरार्ध भोगी नक्षत्र - ज्येष्ठा, मूला, पूर्वाषाढा, उत्तराषाढा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद एवं उत्तराभाद्रपद
शुभ लग्न - 1, 3, 5, 7, 9, 11वीं राशि
टिप्पणी - पूर्वाद्ध भोगी नक्षत्र में स्त्री- पुरुष का प्रथम समागम होने पर स्त्री पति को प्रिय होती है, मध्य भोगी नक्षत्र में हो तो परस्पर प्रीति होती है और उत्तरार्ध भोगी नक्षत्र में हो तो पति पत्नी को प्रिय होता है

षष्ठी पूजन !
बच्चे के जन्म से छठे दिन रात्रि के आरंभ में षष्ठी देवी (कात्यायनी देवी) का चित्र बनाकर पूजा की जाती है !इसको बोलचाल की भाषा में छठी कहते हैं !षष्ठी पूजन के बाद स्थिर लग्न व शुभवार को बिरादरी का, मित्रों एवं सगे- सम्बन्धियों का सम्मिलित सहभोज किया जाता है एवं दानादि करके ब्राह्मणों को सन्तुष्ट किया जाता है !कहीं- कहीं यह पूजन 14, 21 या 31वें दिन में भी होता है !

कुआं पूजन मुहूर्त !
सन्तान के जन्म के एक मास के उपरान्त जल- पूजन किया जाता है !इसमें माता व सन्तान कुंए पर जाकर जल- पूजन करती है !
शुभ वार - सोम, बुध एवं गुरु
शुभ तिथि - 1(कृष्णपक्ष), 2, 3, 5 , 7, 10, 11, 13 व 15 (शुक्लपक्ष) !रिक्ता तिथियां त्याज्य कर अन्य तिथियों में पूजा करनी चाहिए !
शुभ नक्षत्र - श्रवण, पुष्य, पुनर्वसु, मृगशिरा, हस्त, मूल एवं अनुराधा !
टिप्पणी - जल- पूजन में श्राद्धपक्ष व दिन, क्षयमास, गुरु व शुक्र अस्त, चैत्र- पौष मास व कुयोगों को त्याज्य देना चाहिए

शिशु को पहली बार वस्त्र पहनाने का मुहूर्त !
इस मुहूर्त में बालक को काले डोरे की करघनी या कोई नया वस्त्र पहनना शुभ फलदायी होता है
शुभ वार - बुध, गुरु एवं शुक्र
शुभ तिथि - 2, 3, 5, 7, 11, 13 व 15 (शुक्लपक्ष)
शुभ नक्षत्र - अश्विनी, रोहिणी, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य, मघा, तीनों उत्तरा, चित्रा, स्वाति, विशाखा, अनुराधा एवं रेवती
 

कर्णवेध मुहूर्त !
यह संस्कार जन्म से 12वें या 16वें दिन या जन्म से छठे, सातवें, या आठवें मास में शुभ समय चयन करके कर्णछेदन करना चाहिए !बालक का पूर्व की ओर मुख करके पहले दाहिना और फिर बायां जबकि कन्या का पहले बायां और फिर दाहिना कान छेड़ना चाहिए ! कर्ण छेदन स्वर्णकार या सौभाग्यवती स्त्री द्वारा शुद्ध धातु की सूई से करना चाहिए !तीसरे दिन गर्म जल से कान को धोया जाता है !
शुभ वार - सोम, बुध, गुरु एवं शुक्र
शुभ तिथि - 2, 3, 5 , 7, 10, 11, 12, 13 व 15 (शुक्लपक्ष)
शुभ नक्षत्र - रोहिणी, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य, तीनों उत्तरा, हस्त, पूर्वा फाल्गुनी, रेवती, अनुराधा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा
शुभ लग्न - 2, 3, 5, 6, 7, 9, 12
टिप्पणी - यदि लग्न में गुरु हो तो विशेष शुभ होता है !अष्टम में कोई ग्रह न हो, पापग्रह 3, 6, 11वें होँ तथा शुभ ग्रह 1, 3, 4, 5, 7, 9, 10, 11वें होना उत्तम होता है !कर्णवेध के लिए सम वर्ष 2, 4, 6, 8, 10 त्याज्य होते हैं !विषम वर्ष 3, 5, 7, 9, 11 आदि में यह संस्कार करना उचित है !यह संस्कार दोपहर से पहले करना या बाद में कर लेना चाहिए, किन्तु रात्रि में कभी नहीं करना चाहिए !इसी प्रकार कन्या नासिक छेदन का मुहूर्त भी उक्त प्रकार से ज्ञात कर सकते हैं !इसके लिए भी उपरोक्त तिथि, वार, नक्षत्र आदि प्रयुक्त होते हैं !
अक्षरारंभ मुहूर्त

अक्षरारंभ मुहूर्त !
बालक या बालिका को जन्म से पांचवें वर्ष में अक्षरारम्भ या विद्यारम्भ कराना शुभ होता है !
शुभ वार - सोम, बुध एवं शुक्र
शुभ तिथि - 2, 3, 5, 6, 10, 11, 12 (शुक्लपक्ष)
शुभ नक्षत्र - अश्विनी,आर्द्रा, पुनर्वसु, हस्त, चित्रा, स्वाति, अनुराधा, श्रवण, धनिष्ठा, रेवती
शुभ लग्न - 2, 3, 6, 9, 12
टिप्पणी - सर्वप्रथम गणेश पूजन व सरस्वती पूजन करके गुरु पूजन करें !तदोपरांत 108 बार घृताहुति देकर, गुरु के सामने पूर्वाभिमुख बैठकर अक्षरारम्भ या पाठशाला के लिए भेजना चाहिए

समावर्तन मुहूर्त !
जब ब्रह्मचारी गुरु के पास से विद्या प्राप्त कर गृहस्थाश्रम के लिए पुन: घर लौटता है तो समावर्तन का संस्कार करने के बाद स्नातक कहा जाता है !समावर्तन संस्कार का मुहूर्त भी उपनयन संस्कार के अनुसार ही मान्य है !

सर्वोपयोगी मुहूर्त !
यह मुहूर्त प्रत्येक शुभ कार्यों में उपयोगी होता है !सका उपयोग सर्वत्र किया जा सकता है !
शुभ वार - सोम, बुध, गुरु एवं शुक्र
शुभ तिथि - 1(कृष्णपक्ष), 2, 3, 5, 8, 9, 10, 12, 13, 14, 15 (शुक्लपक्ष)
शुभ नक्षत्र - अश्विनी, रोहिणी, मृगशिरा, आश्लेषा, पुनर्वसु, उत्तरात्रय, अनुराधा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा एवं रेवती
शुभ लग्न - लग्न शुद्धि अवश्य करें
टिप्पणी - चन्द्र बल का एवं गोचर विचार के अतिरिक्त जातक की दशा- अन्तर्दशा भी देख लेनी चाहिए

मंदिर की स्थापना का मुहूर्त !
इस मुहूर्त में मंदिर का निर्माण एवं स्थापना करना शुभ होता है
शुभ मास - माघ, फाल्गुन, वैशाख, ज्येष्ठ, मार्गशीर्ष, पौष
शुभ वार - रवि, सोम, बुध, गुरु एवं शुक्र
शुभ तिथि - 2, 3, 5, 7, 11 व 13 (शुक्लपक्ष)
शुभ नक्षत्र - पुष्य, उत्तरात्रय, मृगशिरा, श्रवण, अश्विनी, चित्रा, पुनर्वसु, विशाखा, आर्द्रा, हस्त, धनिष्ठा एवं रोहिणी
शुभ लग्न - लग्न शुद्धि अवश्य करें

धार्मिक कार्य मुहूर्त !
इस मुहूर्त में कोई भी धार्मिक कार्य करना शुभ होता है !
शुभ वार - रवि, सोम, बुध, गुरु एवं शुक्र
शुभ तिथि - 1(कृष्णपक्ष), 2, 3, 5, 6, 7, 8, 10, 11, 12, 13 व 15 (शुक्लपक्ष)
शुभ नक्षत्र - अश्विनी, रोहिणी, मृगशिरा, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, उत्तरा फाल्गुनी, हस्त, चित्रा, अनुराधा, धनिष्ठा व रेवती
शुभ लग्न - 2, 3, 5, 6, 8, 9, 11, 12वीं राशि का होना चाहिए !केन्द्र व त्रिकोण में शुभ ग्रह एवं 3, 6, 11वें पाप ग्रह होने चाहियें !आठवें स्थान में कोई भी शुभ ग्रह नहीं होना चाहिए !

दुकान करने का मुहूर्त !
इसमें लग्न शुद्धि देखकर दुकान का मुहूर्त करना शुभ होता है !प्रकाशन, बुक- स्टाल, छापाखाना, नाई, सुनार, लुहार, काष्ठ, मिठाई, जुते या चमड़े की वास्तु की, ड्राईक्लीनिंग, कपडे आदि की दुकान के लिए भी यह मुहूर्त प्रशस्त होता है ! शुभ होरा या चौघड़िया भी देख लेनी चाहिए !
शुभ वार - सोम, बुध, गुरु एवं शुक्र
शुभ तिथि - 2, 3, 5, 7, 10, 12 व 13 (शुक्लपक्ष)
शुभ नक्षत्र - रोहिणी, उत्तरात्रय, हस्त, पुष्य, चित्रा, रेवती, अनुराधा, मृगशिरा व अश्विनी

कृषि कार्य संबंधी मुहूर्त !
इस मुहूर्त में बाघ लगाना, बीज बोना, हल चलाना, सिंचाई करना, अनाज काटना, खलियान में दाना, भूसा अलग करना एवं अनाज भरण आदि कार्यों के लिए नीचे लिखे शुभ वार, तिथि व नक्षत्र आदि का उपयोग करना चाहिए !
शुभ वार - सूर्य, चन्द्र, गुरु व शुक्र
शुभ तिथि - 3, 5, 7, 10, 11, 13, 15 (दोनों पक्ष)
शुभ नक्षत्र - अश्विनी, रोहिणी, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य, उत्तरात्रय, चित्रा, स्वाति, विशाखा, अनुराधा एवं रेवती
लग्न शुद्धि - चन्द्र व शुक्र बली होने चाहिए !लग्न बली होना चाहिए !सूर्य जिस नक्षत्र में हो उसके पहले नक्षत्र से तीन नक्षत्र अशुभ, अगले आठ शुभ, उससे अगले नौ अशुभ तथा अगले आठ शुभ होते हैं ! इस विचार में अभिजित नक्षत्र भी गिना जाता है ! बीज बोने के लिए सूर्य नक्षत्र से पहले तीन नक्षत्र शुभ, अगले सोलह नक्षत्र अशुभ एवं बाद के आठ नक्षत्र शुभ होते हैं ! इस गणना में भी अभिजित नक्षत्र को गिना जाता है !

यन्त्र- तन्त्र- मन्त्र सिद्धि मुहूर्त !
यन्त्र- तन्त्र- मन्त्र की सिद्धि या प्रगोय के लिए अधोलिखित वार, तिथि एवं नक्षत्रादी शुभ समझने चाहियें !
शुभ वार - रवि, सोम, बुध, गुरु एवं शुक्र
शुभ तिथि - 2, 3, 5, 10, 11, 13 (दोनों पक्ष)
शुभ नक्षत्र - उत्तरा फाल्गुनी, हस्त, अश्विनी, श्रवण, विशाखा, मृगशिरा
टिप्पणी - संक्रान्ति, दीपावली, होली, दुर्गाष्टमी, ग्रहण का काल एवं नवरात्री इन कार्यों के लिए शुभ होती है !लग्न शुद्धि देख लेनी चाहिए व चन्द्र प्रबल होना चाहिए
 

बृहद (बड़े) व्यापार का मुहूर्त !
इस मुहूर्त में कोई भी बड़ा व्यापार किया जा सकता है !इसके लिए निम्नलिखित शुभ वार, तिथि व नक्षत्र आदि का प्रयोग करना चाहिए
शुभ वार - बुध, गुरु व शुक्र
शुभ तिथि - 2, 3, 5, 7, 11 व 13 (शुक्लपक्ष)
शुभ नक्षत्र - हस्त, पुष्य, उत्तरात्रय एवं चित्रा
टिप्पणी - लग्न शुद्धि देखकर या शुभ होरा या शुभ चौघड़िया मुहूर्त में बृहद व्यापार करना चाहिए

वस्त्र निर्माण मुहूर्त !
हथकरघा, सूत मिल, कपड़ा छापी, रेडीमेड गारमेन्ट, दर्जी की दुकान एवं किसी भी प्रकार के वस्त्र बनाने या बुनने के लिए निम्नलिखित शुभ तिथि, वार, नक्षत्र व लग्न आदि को उपयोग में लाना चाहिए !
शुभ वार - शनिवार को छोड़कर शेष सभी वार
शुभ तिथि - 2, 3, 5, 6, 7, 8, 10, 11, 12, 13, 15 (शुक्लपक्ष)
शुभ नक्षत्र - मृगशिरा, रोहिणी, उत्तरात्रय, चित्रा

स्वर्ण आभूषण/ रत्न व्यवसाय का मुहूर्त !.
रत्न, सोने- चांदी के आभूषण की दुकान, जवाहारात, बने- बनाए आभूषण बेचने या बनाने संबंधी व्यवसाय के लिए निम्नलिखित तिथि, वार एवं नक्षत्रादि शुभ समझें
शुभ वार - बुध, गुरु व शुक्र
शुभ तिथि - 2, 3, 5, 7, 8, 10, 11, 12, 13, 14 (दोनों पक्ष)
शुभ नक्षत्र - अश्विनी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य, उत्तरात्रय, हस्त, चित्रा, स्वाति, अनुराधा, श्रवण, धनिष्ठा एवं रेवती
लग्न शुद्धि - इसे अवश्य देखना चाहिए !चन्द्र बल भी अनुकूल होने चाहिए !

वाहन क्रय करने का मुहूर्त !
वाहन क्रय करने के लिए निम्नलिखित तिथि, वार एवं नक्षत्रादि शुभ समझें !
शुभ वार - चन्द्र, बुध, गुरु एवं शुक्र
शुभ तिथि - 1(कृष्णपक्ष), 4, 9, 12, 14 (शुक्लपक्ष)
शुभ नक्षत्र - अश्विनी, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य, हस्त, चित्रा, स्वाति, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा व रेवती
लग्न शुद्धि - वृष, मिथुन, कर्क, तुला, धनु एवं मीन राशि का लग्न प्रशस्त है
टिप्पणी - सूर्य नक्षत्र से चन्द्र नक्षत्र तक गणना करके देख लेना चाहिए कि नक्षत्र नेष्ट कारक तो नहीं है 1 से 9 नक्षत्र तक नेष्टकारक, 10 से 12 नक्षत्र तक श्रेष्ठकारक, 16 से 24 नक्षत्र तक में नेष्टकारक एवं 25 से 27 नक्षत्र तक में श्रेष्ठकारक होता है !शुभ लग्न में शुभ होरा हो तो सर्वश्रेष्ठ है

पशु- पक्षी क्रय- विक्रय व पालनादि का मुहूर्त !
पशु- पक्षी क्रय- विक्रय व पालनादि के लिए निम्नलिखित शुभ तिथि, वार एवं नक्षत्रादि का प्रयोग करना चाहिए
शुभ वार - सूर्य, चन्द्र, बुध, गुरु व शुक्र
शुभ तिथि - 2, 3, 5, 6, 7, 8, 10, 12 (दोनों पक्ष)
शुभ नक्षत्र - अश्विनी, रोहिणी, मृगशिरा, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, उत्तरात्रय, हस्त, चित्रा, स्वाति, अनुराधा, श्रवण एवं रेवती

वाद्य यन्त्र व्यवसाय का मुहूर्त !
वाद्य यन्त्र (तबला, सितार, सारंगी, ग्रामोफोन, एवं रेडियो आदि व्यवसाय के लिए निम्नलिखित शुभ तिथि, वार एवं नक्षत्रादि का प्रयोग करना चाहिए !
शुभ वार - सूर्य, चन्द्र, बुध, गुरु व शुक्र
शुभ तिथि - 2, 3, 5, 8, 10, 13 (शुक्लपक्ष)
शुभ नक्षत्र - अश्विनी, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य, हस्त, चित्रा, स्वाति, अनुराधा, श्रवण एवं रेवती
लग्न शुद्धि - लग्न शुद्धि देखनी चाहिए !ताराबल भी देख लेना चाहिए

नशीले पदार्थों कि दुकान का मुहूर्त !
शराब, गांजा, भांग, तम्बाकू आदि मादक पदार्थों कि दुकान करने के लिए निम्नलिखित शुभ तिथि, वार एवं नक्षत्रादि का प्रयोग करना चाहिए !
शुभ वार - चन्द्र, बुध, गुरु, शुक्र व शनि
शुभ तिथि - 2, 5, 7, 8, 10, 11, 12, 15 (शुक्लपक्ष)
शुभ नक्षत्र - भरणी, आर्द्रा, आश्लेषा, ज्येष्ठा, मूला एवं रेवती

होटल/रेस्टोरेन्ट खोलने का मुहूर्त !
होटल व रेस्टोरेन्ट खोलने के लिए निम्नलिखित शुभ तिथि, वार एवं नक्षत्रादि का प्रयोग करना चाहिए !
शुभ वार - चन्द्र, बुध, गुरु, शुक्र व शनि
शुभ तिथि - 1(कृष्णपक्ष), 2, 3, 5, 7, 10, 11, 13 (शुक्लपक्ष) !
शुभ नक्षत्र - अश्विनी, रोहिणी, उत्तरात्रय, स्वाति, विशाखा व रेवती !

गोद लेने का मुहूर्त !
बालक को गोद लेने के लिए निम्नलिखित शुभ तिथि, वार एवं नक्षत्रादि का प्रयोग करना चाहिए !
शुभ वार - चन्द्र, बुध, गुरु एवं शुक्र
शुभ तिथि - 2, 3, 5, 8, 10, 12 (दोनों पक्ष)
शुभ नक्षत्र - अश्विनी, हस्त, चित्रा, पुनर्वसु, स्वाति, विशाखा, अनुराधा एवं धनिष्ठा
टिप्पणी - बालक व गोद लेने वाले व्यक्ति दोनों के चन्द्र शुभ एवं बली होने चाहियें

चुनाव में खड़े होने का मुहूर्त !
चुनाव में खड़े होने के लिए निम्नलिखित शुभ तिथि, वार एवं नक्षत्रादि का प्रयोग करना चाहिए
शुभ वार - चन्द्र, बुध, गुरु एवं शुक्र
शुभ तिथि - 2, 3, 5, 9, 10, 12, 15 (शुक्लपक्ष)
शुभ नक्षत्र - अश्विनी, रोहिणी, उत्तरात्रय, एवं रेवती
टिप्पणी - केन्द्र- त्रिकोण में शुभग्रह व 3 , 6 , 11वें पापग्रह होँ !लग्नेश एवं चन्द्र बली होँ और चतुर्थेश का लग्नेश से संबंध होना शुभ है !संसद में जाने के लिए भी उपरोक्त मुहूर्त उपयोगी है  अंतर मात्र इतना है कि लग्न शुद्धि देखते समय लग्न राशि स्थिर होनी चाहिए !

मंत्री पद पर शपथ मुहूर्त !
किसी भी पद कि शपथ ग्रहण करने के लिए निम्नलिखित शुभ तिथि, वार एवं नक्षत्रादि का प्रयोग करना चाहिए !
शुभ वार - मंगल, गुरु, शुक्र व शनि
शुभ तिथि - 2, 3, 4, 5, 7, 8, 10, 12, 13, 15 (शुक्लपक्ष)
शुभ नक्षत्र - मृगशिरा, आर्द्रा, मघा, मूला, उत्तरात्रय, चित्रा, अनुराधा, धनिष्ठा व शतभिषा
लग्न - लग्न स्थिर राशि का होना चाहिए
टिप्पणी - लग्नेश, चन्द्र तथा सूर्य शुभभाव में हो एवं चतुर्थेश बली हो !वैधृति, व्यतिपात व भाद्रादि को त्याजना चाहिए !

फिल्म संबंधी मुहूर्त !
फिल्म आरम्भ करते समय या उसका प्रदर्शन करते समय मुहूर्त निकलना चाहिए और इसके लिए यह ध्यान रखना चाहिए कि फिल्म आरम्भ करते समय लग्न राशि चर और फिल्म प्रदर्शन करते समय लग्न राशि स्थिर हो !लग्नेश, चन्द्र एवं शुक्र ग्रह विशेष प्रबल होँ !शुक्र ग्रह लग्न या चतुर्थ में हो तो विशेष शुभ है !केन्द्र- त्रिकोण में शुभग्रह होँ और लग्न पर पाप ग्रहों कि दृष्टि नहीं होनी चाहिए
शुभ वार - बुध, गुरु एवं शुक्र विशेष शुभ है
शुभ तिथि - 2, 3, 5, 9, 12, 15 (शुक्लपक्ष)
शुभ नक्षत्र - भरणी, पूफा. एवं पूषा
लग्न - लग्न स्थिर राशि का होना चाहिए
टिप्पणी - शुभ होरा व चौघड़िया होना चाहिए

चूल्हा स्थापन मुहूर्त !
चूल्हा स्थापन हेतु निम्नलिखित शुभ तिथि, वार एवं नक्षत्रादि का प्रयोग करना चाहिए
शुभ वार - सोम, बुध, गुरु एवं शुक्र
शुभ तिथि - 2, 3, 5, 6, 7, 8, 9, 10, 12, 13, 15 (शुक्लपक्ष)
शुभ नक्षत्र - आर्द्रा, रोहिणी, उत्तरात्रय, एवं पुनर्वसु

मशीनरी चालू करने का मुहूर्त !
मशीनरी चालू करने के लिए निम्नलिखित शुभ तिथि, वार एवं नक्षत्रादि का प्रयोग करना चाहिए !
शुभ वार - गुरु, शुक्र, शनि व रवि
शुभ तिथि - 1, 7, 8 के अतिरिक्त सभी तिथियां
शुभ नक्षत्र - अश्विनी, पुष्य, धनिष्ठा, हस्त, चित्रा, अनुराधा, ज्येष्ठा, पुनर्वसु एवं रेवती
लग्न - लग्न स्थिर राशि का होना चाहिए  


नौकरी संबंधी मुहूर्त !
नौकरी के लिए आवेदन शुभ होरा या लग्न में करें !जबकि जन्म राशि से भी चन्द्र बली होना चाहिए !नौकरी प्रारंभ करने के लिए निम्नलिखित शुभ तिथि, वार एवं नक्षत्रादि का प्रयोग करना चाहिए !
शुभ वार - सोम, गुरु, शुक्र व शनि !
शुभ तिथि - 2, 3, 5, 10, 15 (शुक्लपक्ष) !
शुभ नक्षत्र - अश्विनी, रोहिणी, मृगशिरा, पुष्य, उत्तरात्रय, हस्त, चित्रा, अनुराधा, श्रवण व रेवती !
टिप्पणी - लग्नेश बली हो, लग्न में चन्द्र या शुक्र हो, शनि 6 , 8 , 11वें हो तथा गुरु केन्द्र- त्रिकोण में हो तो श्रेष्ठ है !

मुहूर्त क्या होता है तथा इस का क्या प्रभाव होता है जीवन पर !!

मुहूर्त का अर्थ है किसी कार्य विशेष को करने के लिए सही समय का चुनाव !सही समय में प्रारंभ किया गया कार्य शीघ्र ही पूर्ण होता है और सफल रहता है इसके विपरीत अनुचित समय में प्रारम्भ किया गया कार्य समय पर पूर्ण नहीं हो पाता और उसमें असफलता की सम्भावना भी अधिक बनी रहती है !उचित मुहूर्त बिना किये गये कार्य में विभिन्न विघ्न आते हैं, अनेक समस्याएं खड़ी हो जाती हैं और कार्य पूर्ण नहीं हो पाता है !इसीलिए हमारे पूर्वजों नें मुहूर्त की व्यवस्था की, ताकि उचित समय में किसी कार्य विशेष को प्रारम्भ किया जा सके !समय और ग्रहों का प्रभाव जड़, चेतन, मानव, पशु, पक्षी, प्रकृति आदि सब पर पड़ता है !संसार का कोई ऐसा पदार्थ नहीं, जिस पर समय अपना प्रभाव न दिखाता हो, समय के वशीभूत हुए बड़े- बड़े पहाड़ टूटकर मिट्टी में तब्दील हो जाते हैं, बड़े- बड़े गड्ढे भरकर समतल हो जाते हैं !आपमें से कौन ऐसा है जिसने समय के साथ अच्छी- अच्छी चीजों को बदलते न देखा हो, समय ने हर फैशन, संस्कृति, आदतों, डिजाइनों, तकनीकों, तौर- तरीकों सबको बदला है और ये सब आपने, हमने सबने देखा है ! इसीलिए कहते हैं कि "वक्त बड़ा बलवान है" और ये अत्यन्त परिवर्तन शील है !करोड़ों, अरबों रूपये देकर भी आप एक सैकिंड को भी नहीं खरीद सकते ! हां इस वक्त का सदुपयोग अवश्य किया जा सकता है ! संसार के सभी सफल लोगों को यदि हम पढ़ें तो उनके जीवन में एक ही समानता है कि उन्होनें "सही वक्त पर सही निर्णय लिया" और दुर्भाग्यशाली जिन्हें हम कहते हैं, उनके मुंह से एक ही बात निकलेगी की ओह ! वक्त पर चूक गए !शास्त्रों में इसी समय के सदुपयोग का नाम मुहूर्त है !वास्तव में सही समय पर सही कार्य को करने कि कला का नाम मुहूर्त है !एक बीज भी सही समय पर न बोने से खराब हो जाता है और उचित समय, मौसम, प्रकृति का विचार करके खेती किये जाने पर श्रेष्ठतम समृद्धि कि प्राप्ति होती है !कौन सा ऐसा क्षेत्र है जहां आप समय, मुहूर्त का विचार नहीं करते ? किसी भी पर्यटन स्थल पर जाते हुए, पहाड़ पर चढ़ाई करते हुए, यात्रा के लिए निकलते हुए, बच्चे का एडमिशन करने के लिए, इन्वैस्टमेंट करते हुए, बच्चे का करियर चूज़ करते हुए, कहां आप बिना समय को देखे निर्णय लेते हैं !बस इन्हीं सब जीवन के आवश्यक कार्यों को करने के लिए हमारे प्राचीन ऋषिमुनियों नें कुछ ऐसे नक्षत्र, घडियां, तिथियां, वार आदि का विचार अपने गहन अनुसंधान, अपने तप, अपनी आंतरिक एवं अलौकिक शक्तियों के द्वारा किया है, जिसका उपयोग करने पर आप अदभुत आश्चर्यजनक परिणामों कि प्राप्ति उतने ही परिश्रम, इन्वैस्टमेंट, साधनों के उपयोग के द्वारा कर सकते हैं !और बस इसी समय का, स्थान का विचार करने को ही मुहूर्त कहा गया है ! रोग होने पर उचित समय में दवाई खाना शुरू करने पर रोग शीघ्र ठीक हो जाता है, मुहूर्त निकालकर आपरेशन करने पर सफलता से कष्ट दूर हो जाता है ! उचित मुहूर्त में केस दायर करने पर जीत की प्राप्ति होती है, शुभ मुहूर्त में वाहन खरीदने पर दुर्घटना से बचाव कर सकते हैं, शुभ मुहूर्त में व्यवसाय प्रारम्भ करने पर अच्छे लाभ की प्राप्ति होती है, जीवन के हर क्षेत्र को एक शुभ मुहूर्त की आवश्यकता है और आपकी इसी जरुरत को समझते हुये आपके गर्भ में शिशु आने से लेकर उसके सफलता के शिखर पर चढ़ने तक के मुहूर्त, आपके जीवन की हर ख़ुशी लम्बी रहे इसके लिए मुहूर्त, आपके कष्ट, दुःख, विपदाएं जल्दी से आपको छोड़ दें इसके लिए मुहूर्त, आपके हितकारी मित्र की तरह आपका साथ दें !


पारद शिवलिंग का महत्व !!

पारद शिवलिंग से धन-धान्य, आरोग्य, पद-प्रतिष्ठा, सुख आदि भी प्राप्त होते हैं। नवग्रहों से जो अनिष्ट प्रभाव का भय होता है, उससे मुक्ति भी पारद शिवलिंग से प्राप्त होती है।पारद शिवलिंग की भक्तिभाव से पूजा-अर्चना करने से संतानहीन दंपति को भी संतानरत्न की प्राप्ति हो जाती है। 12 ज्योतिर्लिंग के पूजन से जितना पुण्यकाल प्राप्त होता है उतना पुण्य पारद शिवलिंग के दर्शन मात्र से मिल जाता है।पारे के बारे में तो प्राय: आप सभी जानते होंगे कि पारा ही एकमात्र ऐसी धातु है, जो सामान्य स्थित‍ में भी द्रव रूप में रहता है। मानव शरीर के ताप को नापने के यं‍त्र तापमापी अर्थात थर्मामीटर में जो चमकता हुआ पदार्थ दिखाई देता है, वही पारा धातु होता है।पारद शिवलिंग इसी पारे से निर्मित होते हैं। पारे को विशेष प्रक्रियाओं द्वारा शोधित किया जाता है जिससे वह ठोस बन जाता है फिर तत्काल उसके शिवलिंग बना लिए जाते हैं।पारद शिवलिंग बहुत ही पुण्य फलदायी और सौभाग्यदायक होते हैं। पारद शिवलिंग के महत्व का वर्णन ब्रह्मपुराण, ब्रह्मवेवर्त पुराण, शिव पुराण, उपनिषद आदि अनेक ग्रंथों में किया गया है। पारद शिवलिंग से अकाल मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है। रुद्र संहिता में यह विवरण प्राप्त होता है कि रावण रसायन शास्त्र का ज्ञाता और तंत्र-मंत्र का विद्वान था। उसने भी रसराज पारे के शिवलिंग का निर्माण एवं पूजा-उपासना कर शिवजी को प्रसन्न किया था।झाबुआ व बस्तर में रहने वाले आदिवासी, जो शहरों में जड़ी-बूटी बेचते आसानी से देखे जा सकते हैं, उनमें से कई पारद को ठोस बनाने की कला जानते हैं, परंतु पारद से शिवलिंग एक विशेष समय में बनाए जाते हैं जिसे 'विजयकाल' कहा जाता है। तत्पश्चात अच्छा शुभ मुहूर्त देखकर शिवलिंग की प्राण-प्रतिष्ठा करवाई जाती है।पारद शिवलिंग की पूजा-अर्चना का तरीका सामान्य शिवलिंग के समान ही होता है। जिस घर में पारद शिवलिंग होता है, वह धन-धान्य से परिपूर्ण और दुर्गुणों से मुक्त होता है।

Monday, 16 February 2015

घर पर कैसे करें शिवरात्रि का पूजन, जानें सरलतम विधि !!

महाशिवरात्रि पर्व पर भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए भक्त-गण विविध उपाय करते हैं। लेकिन हर उपाय साधारण जनमानस के लिए सरल नहीं होते।
पेश हैं घर पर ही महाशिवरात्रि पूजन की अत्यंत आसान विधि:-
यह पूजन विधि जितनी आसान है उतनी ही फलदायी भी। भगवान शिव अत्यंत सरल स्वभाव के देवता माने गए हैं अत: उन्हें सरलतम तरीकों से ही प्रसन्न किया जा सकता है !
।वैदिक शिव पूजन :-
भगवान शंकर की पूजा के समय शुद्ध आसन पर बैठकर पहले आचमन करें। यज्ञोपवित धारण कर शरीर शुद्ध करें। तत्पश्चात आसन की शुद्धि करें। पूजन-सामग्री को यथास्थान रखकर रक्षादीप प्रज्ज्वलित कर लें।
अब स्वस्ति-पाठ करें।

स्वस्ति-पाठ  :-
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवा:, स्वस्ति ना पूषा विश्ववेदा:, स्वस्ति न स्तारक्ष्यो अरिष्टनेमि स्वस्ति नो बृहस्पति र्दधातु।
इसके बाद पूजन का संकल्प कर भगवान गणेश एवं गौरी-माता पार्वती का स्मरण कर पूजन करना चाहिए।
यदि आप रूद्राभिषेक, लघुरूद्र, महारूद्र आदि विशेष अनुष्ठान कर रहे हैं, तब नवग्रह, कलश, षोडश-मात्रका का भी पूजन करना चाहिए।संकल्प करते हुए भगवान गणेश व माता पार्वती का पूजन करें फिर नन्दीश्वर, वीरभद्र, कार्तिकेय (स्त्रियां कार्तिकेय का पूजन नहीं करें) एवं सर्प का संक्षिप्त पूजन करना चाहिए। इसके पश्चात हाथ में बिल्वपत्र एवं अक्षत लेकर भगवान शिव का ध्यान करें।भगवान शिव का ध्यान करने के बाद आसन, आचमन, स्नान, दही-स्नान, घी-स्नान, शहद-स्नान व शक्कर-स्नान कराएं।इसके बाद भगवान का एक साथ पंचामृत स्नान कराएं। फिर सुगंध-स्नान कराएं फिर शुद्ध स्नान कराएं।अब भगवान शिव को वस्त्र चढ़ाएं। वस्त्र के बाद जनेऊ चढाएं। फिर सुगंध, इत्र, अक्षत, पुष्पमाला, बिल्वपत्र चढाएं।अब भगवान शिव को विविध प्रकार के फल चढ़ाएं। इसके पश्चात धूप-दीप !!
रुद्राभिषेक के विभिन्न पूजन के लाभ इस प्रकार हैं :-
• जल से अभिषेक करने पर वर्षा होती है।
• असाध्य रोगों को शांत करने के लिए कुशोदक से रुद्राभिषेक करें।
• भवन-वाहन के लिए दही से रुद्राभिषेक करें।
• लक्ष्मी प्राप्ति के लिये गन्ने के रस से रुद्राभिषेक करें।
• धन-वृद्धि के लिए शहद एवं घी से अभिषेक करें।
• तीर्थ के जल से अभिषेक करने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है।
• इत्र मिले जल से अभिषेक करने से बीमारी नष्ट होती है ।
• पुत्र प्राप्ति के लिए दुग्ध से और यदि संतान उत्पन्न होकर मृत पैदा हो तो गोदुग्ध से रुद्राभिषेक करें।
• रुद्राभिषेक से योग्य तथा विद्वान संतान की प्राप्ति होती है।
• ज्वर की शांति हेतु शीतल जल/गंगाजल से रुद्राभिषेक करें।
• सहस्रनाम-मंत्रों का उच्चारण करते हुए घृत की धारा से रुद्राभिषेक करने पर वंश का विस्तार होता है।
• प्रमेह रोग की शांति भी दुग्धाभिषेक से हो जाती है।
• शक्कर मिले दूध से अभिषेक करने पर जडबुद्धि वाला भी विद्वान हो जाता है।
• सरसों के तेल से अभिषेक करने पर शत्रु पराजित होता है।
• शहद के द्वारा अभिषेक करने पर यक्ष्मा (तपेदिक) दूर हो जाती है।
• पातकों को नष्ट करने की कामना होने पर भी शहद से रुद्राभिषेक करें।
• गो दुग्ध से तथा शुद्ध घी द्वारा अभिषेक करने से आरोग्यता प्राप्त होती है।
• पुत्र की कामनावाले व्यक्ति शक्कर मिश्रित जल से अभिषेक करें।

ऐसे तो अभिषेक साधारण रूप से जल से ही होता है। परन्तु विशेष अवसर पर या सोमवार, प्रदोष और शिवरात्रि आदि पर्व के दिनों मंत्र गोदुग्ध या अन्य दूध मिला कर अथवा केवल दूध से भी अभिषेक किया जाता है। विशेष पूजा में दूध, दही, घृत, शहद और चीनी से अलग।-अलग अथवा सब को मिला कर पंचामृत से भी अभिषेक किया जाता है। तंत्रों में रोग निवारण हेतु अन्य विभिन्न वस्तुओं से भी अभिषेक करने का विधान है।

Tuesday, 10 February 2015

जानिये शिव,शंकर और शंभु के बीच का भेद !!

शास्त्रानुसार काल पर शिव का नियंत्रण है, अतः शिव महाकाल भी कहलाए जाते हैं। ऐसे शिव स्वरूप में लीन रहकर ही काल पर विजय पाना भी संभव है।सांसारिक मनुष्य के दृष्टिकोण से शिव व काल के संबंधों में छिपा संकेत यही है कि काल अर्थात् समय की महत्वता समझते हुए उसके साथ बेहतर तालमेल व गठजोड़ ही जीवन व मृत्यु दोनों ही स्थिति में सुखद है।अतः जीवन में शिव भाव में रम जाना ही महत्वपूर्ण है।शिव भाव से जुडऩे हेतु वेदों में वर्णित शिव के अतिरिक्त अन्य दो नाम शंकर व शंभु के अर्थ को भी समझना आवश्यक है।इस लेख के माध्यम से जान लीजिए कि एक ही होने पर भी इन तीन नामों के बीच क्या भेद हैं।
वेद अनुसार:== 
शंभु मोक्ष देने वाले हैं।वहीं शंकर शमन करने वाले और शिव कल्याण करने वाले हैं।इस भांति शंभु नाम ऐसे भाव जागृत करता है कि शांति हेतु सद्‍भावना व सुकर्म का मार्ग ही अपनाएं।इनसे मन भय से व तन रोगों से दूर रहेगा तथा मनोवांछित लक्ष्य प्राप्ति संभव होगी।शंकर का अर्थ है शमन करने वाला।शंकर नाम स्मरण यही भाव जागृत करता है कि शंकर के योगी स्वरूप की भांति मन को सैदेव शांत, संयमित व संकल्पित रखें।संकल्पों से मन को जागृत रखने से ही अशांति का शमन होता है।शिव नाम का अर्थ है कल्याणकारी।शिव नाम से कर्म, भाव व व्यवहार में पावनता का संदेश मिलता है।इसके लिए जीवन में हर प्रकार से पवित्रता, आनन्द, ज्ञान, मंगल, कुशल व क्षमा को अपनाएं, ताकि अपने साथ दूसरों का भी शुभ हो।शिव नाम के साथ जब मंगल भावों से जुड़ते हैं, तो मन की कई बाधाएं, विकार, कामनाएं और विकल्प नष्ट हो जाते हैं।व्यक्ति मजबूत संकल्पों से जुड़ जाता है।इस प्रकार शिव, शंकर और शंभु तीनों ही नाम हमेशा जीवन में सोम्यस्य सुंदरता व सफलता प्रदान करते हैं। 
पुराण अनुसार:== शिव परम पिता और परमेश्वरी (शक्ति) जगजननी तथा जगदम्बा कहलाती हैं।अपनी संतान पर उनकी असीम करुणा और कृपा है।उनका नाम ही आशुतोष है।दानी और उदार ऐसे हैं कि नाम ही पड़ गया औढ़नदानी।उनका भोलापन भक्तों को बहुत ही भाता है।अकारण अनुग्रह करना, अपनी संतान से प्रेम करना भोलेबाबा का स्वभाव है।उनके समान कल्याणकारी व प्रजा रक्षक और कौन हो सकता है।शिव ही समस्त प्राणियों के अंतिम विश्रामस्थान भी है।उनकी संहारिका शक्ति प्राणियों के कल्याण के लिए प्रस्फुटित होती है।शंकर ही सबसे बड़े ज्ञानी है क्योंकि वे ही समस्त विद्याओं, वेदादि शास्त्रों, आगमों तथा कलाओं के मूल स्रोत है। इसलिए उन्हें विशुद्ध विज्ञानमय, विद्यापति तथा सस्त प्राणियों का ईश्वर कहा गया है।शंभु स्वयं नीतिस्वरूप हैं।अपने प्राणों की बलि देकर भी जीवों की रक्षा करना,सदा उनके हित चिंतन में संलग्न रहना- इससे बड़ी नीति और क्या हो सकती है।कृपालु शंभु ने यह सब कर दिखाया।ऐसा कह वे हलाहल पी गए और नीलकंठ कहलाए।तीनों लोकों की रक्षा हो गई।साधुजन, नीतिमान जन अपने क्षणभंगुर जीवन की बलि देकर भी प्राणियों की रक्षा करते हैं।कल्याणी ! जो पुरुष प्राणियों पर कृपा करता है, उससे सर्वात्मा कहते हैं। 
रामचरितमानस अनुसार:== "जासु नाम बल संकर कासी। देत सबहि सम गति अबिनासी"।। अर्थात् भगवन्नाम के बल से शंकर जी काशी में मरनेवालों को मुक्ति देते हैं। "कासी मरत जन्तु अवलोकी। जासु नाम बल करउँ बिसोकी"।। अर्थात् शंभु स्वरुप में वह कहते है की काशी में मरते हुए जीव को यदि मैं देख लेता हूँ तो हे पार्वती ! उन परमप्रभु के नाम अर्थात् ओम् के बल से मैं उसे अविनाशी पद प्रदान कर देता हू।अतः शिव शरण जो कोई आया, जैसे– कागभुशुण्डि, उन सबको भगवान की भक्ति प्रदान कर उद्धार किया गया।आदि शंकराचार्य मत: शिव आदि योगेश्वर हैं।शिव से ही योग-साधना प्रारम्भ होती है अतः उन्हें माता-पिताविहीन, स्वयंभू, स्वरूपस्थ, परमात्मस्वरूप इत्यादि विशेषणों से अलंकृत किया जाता है।उन्हें भूतनाथ भी कहा जाता है क्योंकि वे प्राणिमात्र की शरणस्थली हैं।उनके शरण बिना कोई मोक्ष को प्राप्त नहीं कर सकता।आदि शंकराचार्य प्रश्नोत्तरी अनुसार वह पूछते हैं कि सृष्टि में पूजनीय कौन है ? उत्तर है - जो शिवतत्त्व में स्थित है वह महापुरुष! जो प्रकृति की सीमाओं से उपराम है उसे शिव कहते हैं।ऐसा महापुरुष पूजनीय है।उनके गणों अर्थात् सेवकों की एक लम्बी परम्परा है उनमें गणेश भी हैं, कार्तिकेय हैं, समस्त प्राणी एवं देवता भी है।

हिंदू धर्म में शंख का महत्व !!

विष्णु पुराण के अनुसार शंख लक्ष्मी जी का सहोदर भ्राता है। यह समुद्र मंथन के समय प्राप्त चौदह रत्नों में से एक है। शंख को विजय, समृध्दि, यश और शुभता का प्रतीक माना गया है। शंख ध्वनि की परंपरा आज भी समाज में पूजा-पाठ, हवन, यज्ञ और आरती के अवसरों पर महत्वपूर्ण मानी जाती है। शंख की घर में स्थापना करने से लक्ष्मी वास होता है और यह भगवान विष्णु का प्रिय है। शंख निधि का प्रतीक है, ऐसा माना जाता है कि शंख को पूजा स्थल में रखने से अरिष्टों एवः अनिष्ठो का नाश होता है और सौभाग्य में विर्धि होती है।
 शंख की उत्पत्ति: =
शंख समुद्र मंथन के समय प्राप्त चौदह रत्नों में से एक है। शंख की उत्पत्ति जल से ही होती है। जल ही जीवन का आधार है। सृष्टि की उत्पत्ति भी जल से हुई, इसलिये शंख हर तरह से पवित्र है। शंख दो प्रकार के होते है, वामावर्त और दक्षिणावर्त। शंख का उदर दक्षिण दिशा की ओर हो तो दक्षिणावृत्त होता है और जिसका उदर बायीं ओर खुलता हो तो वह वामावृत्त शंख कहलता है।
शंख का किस देवता से संबंध है :=
 विष्णु जी को शंख सबसे प्रिय माना जाता है, शंख भगवन विष्णु का पांचवा शस्त्र है। इसे पांचजन्य शंख कहा जाता है , यह कृष्ण भगवान का आयुध है। इसे विजय व यश का प्रतीक माना जाता है। इसमें पांच उंगलियों की आकृति होती है। घर को वास्तु दोषों से मुक्त रखने के लिए स्थापित किया जाता है। यह राहु और केतु के दुष्प्रभावों को भी कम करता है।
शंख का महत्व :=
 शंख को पवित्रता का प्रतीक माना गया है, यह हर एक हिन्दु के घर में पूजा के स्थान पर रखा जाता है। इसे साफ लाल रंग के कपड़े में लपेट कर मिट्टी के बर्तन पे रखते हैं। आमतौर पर पूजा अनुष्ठान के वक़्त शंख में पानी रखतें हैं, जो पूजा के बाद पूरे घर में छिड़का जाता है।शंख को कभी आपने कान के पास लेके जाएं आपको समुद्र कि ध्वनि सुनाई पड़ेंगी। यह वास्तव में सुनाई देने वाली कंपन है जो शंख में हवा के दवारा उत्पन होती है।

Friday, 6 February 2015

बिभिन्न प्रकार की समस्याओ से मानसिक तनाव ( डिप्रेशन) हो या नींद न आए, कर सकते हैं ये आसान उपाय !!

हर व्यक्ति के जीवन में कुछ न कुछ परेशानी जरूर होती है। आज हम आपको जीवन की विभिन्नप्रकार की समस्याओं के लिए कुछ साधारण ज्योतिषीय उपाय बता रहे हैं, जो इस प्रकार हैं- 
मानसिक तनाव डिप्रेशन के लिए :----
रोज सुबह स्नान करने के बाद तुलसी के पौधे की 11 परिक्रमा करें और गाय के शुद्ध घी का दीपक जलाएं। साथ ही जल भी चढ़ाएं। यही प्रक्रिया शाम को भी करें। ऐसा करने से डिप्रेशन कम होगा। तुलसी की माला धारण करें तो और भी बेहतर लाभ मिलेगा। 
नींद न आए तो :------
जब आप सोने जाएं तो बिस्तर पर लेटने के बाद शरीर को थोड़ी देर के लिए ढीला छोड़ दें और धीरे-धीरे 100 तक गिनती बोलें। उसके बाद सांस रोककर ऊं कुंभकर्णाय नम: बोलें और सांस छोड़ दें। इस तरह 108 बार करें। कुछ दिनों तक थोड़ी परेशानी होगी, लेकिन बाद में आपकी समस्या का निदान हो जाएगा और आपको भरपूर नींद आने लगेगी।
व्यापार की सफलता के लिए :------
किसी रविवार को दोपहर के समय पांच कागजी नींबू काटकर व्यवसाय स्थल (ऑफिस या दुकान) पर रखकर उसके साथ एक मुट्ठी काली मिर्च, एक मुट्‌ठी पीली सरसों रख दें। अगले दिन जब दुकान या व्यवसाय स्थल खोलें तो सभी सामान कहीं दूर जाकर सुनसान स्थान पर दबा दें। इस प्रयोग से व्यवसाय चलने लगेगा या अगर किसी की बुरी नजर होगी तो उसका प्रभाव भी समाप्त हो जाएगा। 
धन लाभ के लिए :------
किसी शनिवार को सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करने के बाद किसी पीपल के पेड़ से एक पत्ता तोड़ लाएं। उस पर सफेद चंदन से गायत्री मंत्र लिखें और उसका पूजन करें। अब इस पत्ते को अपने कैश बॉक्स, गल्ला, तिजोरी या जहां आप पैसा रखते हैं, वहां इस प्रकार रखें कि यह किसी को दिखाई न दे। इस पीपल के पत्ते को हर शनिवार को बदलते रहें। इससे घर में सुख-शांति रहेगी और धन-संपत्ति बढऩे को योग बनेंगे। 
सुख-समृद्धि के लिए :-------- 
तुलसी नामाष्टक मंत्र का जाप करें-
वृंदा वृंदावनी विश्वपूजिता विश्वपावनी।
पुष्पसारा नंदनीय तुलसी कृष्ण जीवनी।।
एतभामांष्टक चैव स्त्रोतं नामर्थं संयुतम।
य: पठेत तां च सम्पूज्य सौश्रमेघ फलंलमेता।। 
सुखी पारिवारिक जीवन के लिए :------
अगर घर में सदैव अशांति रहती हो तो घर के मुख्य द्वार पर बाहर की ओर श्वेतार्क (सफेद आकड़े के गणेश) लगाने से घर में सुख-शांति बनी रहती है।
प्रतिदिन सुबह घर में गोमूत्र अथवा गाय के दूध में गंगा जल मिलाकर छिड़कने से घर की शुद्धि होती है तथा नकारात्मकता कम होती है। इससे भी परिवार में अच्छा माहौल बनता है।
गाय के गोबर का दीपक बनाकर उसमें गुड़ तथा तेल डालकर जलाएं। फिर इसे घर के मुख्य द्वार के मध्य में रखें। इस उपाय से भी घर में शांति बनी रहेगी तथा समृद्धि में वृद्धि होगी। 
शीघ्र विवाह के लिए :----
हर सोमवार को समीप स्थित किसी शिव मंदिर में जाएं। भगवान शिव को दूध में काले तिल मिलाकर चढ़ाएं तथा जल्दी विवाह के लिए प्रार्थना करें।
गुरुवार को उपवास रखें तथा पीली वस्तुओं का दान करें। इस उपाय से गुरु बृहस्पति प्रसन्न होंगे, जिससे विवाह के योग बनने लगेंगे।
जन्म कुंडली के अनुसार यदि सूर्य के कारण विवाह में विलंब हो रहा हो तो रोज सुबह सूर्यदेव को नियमित रूप से अर्घ्य दें। साथ ही ऊं सूर्याय नम: मंत्र का जाप करें।
किसी मित्र या सहेली के विवाह में उसके हाथों से अपने हाथों में मेहंदी लगवाने से भी शीघ्र ही विवाह हो जाता है।
रूका हुआ पैसा पाने के लिए :----
शुक्ल पक्ष के किसी सोमवार से यह उपाय शुरू कर लगातार 21 दिनों तक करें। सुबह जल्दी उठें। स्नान आदि कामों से निपटकर एक लौटे में साफ पानी लेकर उसमें 5 गुलाब के फूल डालकर सूर्य को अर्घ्य दें और भगवान सूर्य से समस्या निराकरण के लिए प्रार्थना करें। शीघ्र ही आपकी मनोकामना पूरी हो सकती है।

Wednesday, 4 February 2015

तिलक क्या होता है तिलक के लाभ और मंत्र !!

ज्योतिष के अनुसार यदि तिलक धारण किया जाता है तो सभी पाप नष्ट हो जाते है सनातन धर्म में शैव, शाक्त, वैष्णव और अन्य मतों के अलग-अलग तिलक होते हैं। चंदन का तिलक लगाने से पापों का नाश होता है, व्यक्ति संकटों से बचता है, उस पर लक्ष्मी की कृपा हमेशा बनी रहती है, ज्ञानतंतु संयमित व सक्रिय रहते हैं।तिलक कई प्रकार के होते हैं - मृतिका, भस्म, चंदन, रोली, सिंदूर, गोपी आदि। यदि वार अनुसार तिलक धारण किया जाए तो उक्त वार से संबंधित ग्रहों को शुभ फल देने वाला बनाया जा सकता है।
तिलक किस दिन किसका लगाये !!
सोमवार := सोमवार का दिन भगवान शंकर का दिन होता है तथा इस वार का स्वामी ग्रह चंद्रमा हैं।चंद्रमा मन का कारक ग्रह माना गया है। मन को काबू में रखकर मस्तिष्क को शीतल और शांत बनाए रखने के लिए आप सफेद चंदन का तिलक लगाएं। इस दिन विभूति या भस्म भी लगा सकते हैं।
मंगलवार := मंगलवार को हनुमानजी का दिन माना गया है। इस दिन का स्वामी ग्रह मंगल है।मंगल लाल रंग का प्रतिनिधित्व करता है। इस दिन लाल चंदन या चमेली के तेल में घुला हुआ सिंदूर का तिलक लगाने से ऊर्जा और कार्यक्षमता में विकास होता है। इससे मन की उदासी और निराशा हट जाती है और दिन शुभ बनता है।
बुधवार := बुधवार को जहां मां दुर्गा का दिन माना गया है वहीं यह भगवान गणेश का दिन भी है।इस दिन का ग्रह स्वामी है बुध ग्रह। इस दिन सूखे सिंदूर (जिसमें कोई तेल न मिला हो) का तिलक लगाना चाहिए। इस तिलक से बौद्धिक क्षमता तेज होती है और दिन शुभ रहता है।
गुरुवार := गुरुवार को बृहस्पतिवार भी कहा जाता है। बृहस्पति ऋषि देवताओं के गुरु हैं। इस दिन के खास देवता हैं ब्रह्मा। इस दिन का स्वामी ग्रह है बृहस्पति ग्रह।गुरु को पीला या सफेद मिश्रित पीला रंग प्रिय है। इस दिन सफेद चन्दन की लकड़ी को पत्थर पर घिसकर उसमें केसर मिलाकर लेप को माथे पर लगाना चाहिए या टीका लगाना चाहिए। हल्दी या गोरोचन का तिलक भी लगा सकते हैं। इससे मन में पवित्र और सकारात्मक विचार तथा अच्छे भावों का उद्भव होगा जिससे दिन भी शुभ रहेगा और आर्थिक परेशानी का हल भी निकलेगा।
शुक्रवार : = शुक्रवार का दिन भगवान विष्णु की पत्नी लक्ष्मीजी का रहता है। इस दिन का ग्रह स्वामी शुक्र ग्रह है।हालांकि इस ग्रह को दैत्यराज भी कहा जाता है। दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य थे। इस दिन लाल चंदन लगाने से जहां तनाव दूर रहता है वहीं इससे भौतिक सुख-सुविधाओं में भी वृद्धि होती है। इस दिन सिंदूर भी लगा सकते हैं।
शनिवार := शनिवार को भैरव, शनि और यमराज का दिन माना जाता है। इस दिन के ग्रह स्वामी है शनि ग्रह।शनिवार के दिन विभूत, भस्म या लाल चंदन लगाना चाहिए जिससे भैरव महाराज प्रसन्न रहते हैं और किसी भी प्रकार का नुकसान नहीं होने देते। दिन शुभ रहता है।
रविवार := रविवार का दिन भगवान विष्णु और सूर्य का दिन रहता है। इस दिन के ग्रह स्वामी है सूर्य ग्रह जो ग्रहों के राजा हैं।इस दिन लाल चंदन या हरि चंदन लगाएं। भगवान विष्णु की कृपा रहने से जहां मान-सम्मान बढ़ता है वहीं निर्भयता आती है।

तिलक लगाने का मंत्र !!
केशवानन्न्त गोविन्द बाराह पुरुषोत्तम ।
पुण्यं यशस्यमायुष्यं तिलकं मे प्रसीदतु ।।
कान्ति लक्ष्मीं धृतिं सौख्यं सौभाग्यमतुलं बलम् ।
ददातु चन्दनं नित्यं सततं धारयाम्यहम् ।।

माता चौंसठ योगिनी मंत्र !!



१. ॐ काली नित्य सिद्धमाता स्वाहा
२. ॐ कपालिनी नागलक्ष्मी स्वाहा
३. ॐ कुल्ला देवी स्वर्णदेहा स्वाहा
४. ॐ कुरुकुल्ला रसनाथा स्वाहा
५. ॐ विरोधिनी विलासिनी स्वाहा
६. ॐ विप्रचित्ता रक्तप्रिया स्वाहा
७. ॐ उग्र रक्ता भोग रूपा स्वाहा
८. ॐ उग्रप्रभा शुक्रनाथा स्वाहा
९. ॐ दीपा मुक्तिः रक्ता देहा स्वाहा
१०. ॐ नीला भुक्ति रक्त स्पर्शा स्वाहा
११. ॐ घना महा जगदम्बा स्वाहा
१२. ॐ बलाका काम सेविता स्वाहा
१३. ॐ मातृ देवी आत्मविद्या स्वाहा
१४. ॐ मुद्रा पूर्णा रजतकृपा स्वाहा
१५. ॐ मिता तंत्र कौला दीक्षा स्वाहा
१६. ॐ महाकाली सिद्धेश्वरी स्वाहा
१७. ॐ कामेश्वरी सर्वशक्ति स्वाहा
१८. ॐ भगमालिनी तारिणी स्वाहा
१९. ॐ नित्यक्लिन्ना तंत्रार्पिता स्वाहा
२०. ॐ भेरुण्ड तत्त्व उत्तमा स्वाहा
२१. ॐ वह्निवासिनी शासिनि स्वाहा
२२. ॐ महावज्रेश्वरी रक्त देवी स्वाहा
२३. ॐ शिवदूती आदि शक्ति स्वाहा
२४. ॐ त्वरिता ऊर्ध्वरेतादा स्वाहा
२५. ॐ कुलसुंदरी कामिनी स्वाहा
२६. ॐ नीलपताका सिद्धिदा स्वाहा
२७. ॐ नित्य जनन स्वरूपिणी स्वाहा
२८. ॐ विजया देवी वसुदा स्वाहा
२९. ॐ सर्वमङ्गला तन्त्रदा स्वाहा
३०. ॐ ज्वालामालिनी नागिनी स्वाहा
३१. ॐ चित्रा देवी रक्तपुजा स्वाहा
३२. ॐ ललिता कन्या शुक्रदा स्वाहा
३३. ॐ डाकिनी मदसालिनी स्वाहा
३४. ॐ राकिनी पापराशिनी स्वाहा
३५. ॐ लाकिनी सर्वतन्त्रेसी स्वाहा
३६. ॐ काकिनी नागनार्तिकी स्वाहा
३७. ॐ शाकिनी मित्ररूपिणी स्वाहा
३८. ॐ हाकिनी मनोहारिणी स्वाहा
३९. ॐ तारा योग रक्ता पूर्णा स्वाहा
४०. ॐ षोडशी लतिका देवी स्वाहा
४१. ॐ भुवनेश्वरी मंत्रिणी स्वाहा
४२. ॐ छिन्नमस्ता योनिवेगा स्वाहा
४३. ॐ भैरवी सत्य सुकरिणी स्वाहा
४४. ॐ धूमावती कुण्डलिनी स्वाहा
४५. ॐ बगलामुखी गुरु मूर्ति स्वाहा
४६. ॐ मातंगी कांटा युवती स्वाहा
४७. ॐ कमला शुक्ल संस्थिता स्वाहा
४८. ॐ प्रकृति ब्रह्मेन्द्री देवी स्वाहा
४९. ॐ गायत्री नित्यचित्रिणी स्वाहा
५०. ॐ मोहिनी माता योगिनी स्वाहा
५१. ॐ सरस्वती स्वर्गदेवी स्वाहा
५२. ॐ अन्नपूर्णी शिवसंगी स्वाहा
५३. ॐ नारसिंही वामदेवी स्वाहा
५४. ॐ गंगा योनि स्वरूपिणी स्वाहा
५५. ॐ अपराजिता समाप्तिदा स्वाहा
५६. ॐ चामुंडा परि अंगनाथा स्वाहा
५७. ॐ वाराही सत्येकाकिनी स्वाहा
५८. ॐ कौमारी क्रिया शक्तिनि स्वाहा
५९. ॐ इन्द्राणी मुक्ति नियन्त्रिणी स्वाहा
६०. ॐ ब्रह्माणी आनन्दा मूर्ती स्वाहा
६१. ॐ वैष्णवी सत्य रूपिणी स्वाहा
६२. ॐ माहेश्वरी पराशक्ति स्वाहा
६३. ॐ लक्ष्मी मनोरमायोनि स्वाहा
६४. ॐ दुर्गा सच्चिदानंद स्वाहा

Sunday, 1 February 2015

॥वैभव प्रदाता श्री सूक्त हिन्दी अर्थ सहित ॥


 
श्री सूक्त- श्री लक्ष्मी की उपासना में ऋग्वेद में बताए श्रीसूक्त के मंगलकारी मंत्रों का पाठ शुभ माना गया है। शुक्रवार को श्री लक्ष्मी का पूजन कर अनार का भोग अर्पित करें। देवी लक्ष्मी की प्रतिमा के आगे श्री सुक्त के मंत्रों का जप करें। श्री सुक्त का पाठ देवी लक्ष्मी को प्रसन्न करता हैं। गरीबी को दूर कर सुख और समृद्धि प्रदान करता है।
ॐ हिरण्य-वर्णां हरिणीं, सुवर्ण-रजत-स्त्रजाम्।
चन्द्रां हिरण्यमयीं लक्ष्मीं, जातवेदो म आवह।।
तां म आवह जात-वेदो, लक्ष्मीमनप-गामिनीम्।
यस्यां हिरण्यं विन्देयं, गामश्वं पुरूषानहम्।।
अश्वपूर्वां रथ-मध्यां, हस्ति-नाद-प्रमोदिनीम्।
श्रियं देवीमुपह्वये, श्रीर्मा देवी जुषताम्।।
कांसोऽस्मि तां हिरण्य-प्राकारामार्द्रा ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीं।
पद्मे स्थितां पद्म-वर्णां तामिहोपह्वये श्रियम्।।
चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियं लोके देव-जुष्टामुदाराम्।
तां पद्म-नेमिं शरणमहं प्रपद्ये अलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणोमि।।
आदित्य-वर्णे तपसोऽधिजातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽक्ष बिल्वः।
तस्य फलानि तपसा नुदन्तु मायान्तरायाश्च बाह्या अलक्ष्मीः।।
उपैतु मां दैव-सखः, कीर्तिश्च मणिना सह।
प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन्, कीर्तिं वृद्धिं ददातु मे।।
क्षुत्-पिपासाऽमला ज्येष्ठा, अलक्ष्मीर्नाशयाम्यहम्।
अभूतिमसमृद्धिं च, सर्वान् निर्णुद मे गृहात्।।
गन्ध-द्वारां दुराधर्षां, नित्य-पुष्टां करीषिणीम्।
ईश्वरीं सर्व-भूतानां, तामिहोपह्वये श्रियम्।।
मनसः काममाकूतिं, वाचः सत्यमशीमहि।
पशूनां रूपमन्नस्य, मयि श्रीः श्रयतां यशः।।
कर्दमेन प्रजा-भूता, मयि सम्भ्रम-कर्दम।
श्रियं वासय मे कुले, मातरं पद्म-मालिनीम्।।
आपः सृजन्तु स्निग्धानि, चिक्लीत वस मे गृहे।
निच-देवी मातरं श्रियं वासय मे कुले।।
 
॥वैभव प्रदाता श्री सूक्त का हिन्दी अर्थ ॥
मूलतः यह ऋग्वेद के दूसरे अध्याय के छठे सूक्त में आनंदकर्दम ऋषि द्वारा श्री देवता को समर्पित काव्यांश है। लक्ष्मी साधना के सिद्ध मंत्र के रूप में प्रतिष्ठित इस रचना का यह हिन्दी अनुवाद है।

हरित और हिरण्य-वर्णा हार स्वर्ण, रजत सुशोभित
चन्द्र और हिरण्य आभा देवि लक्ष्मी का, अग्नि अब तुम करो आवाहन।
 
करो आवाहन, हमारे गृह अनल उस देवि श्री का अब,
वास हो जिसका सदा और जो दे धन प्रचुर, गो, अश्व, सेवक, सुत सभी।
 
अश्व जिनके पूर्वतर, मध्यस्थ रथ
हस्ति- रव से प्रबोधित पथ, देवि श्री का आगमन हो, प्रार्थना है।

परा रूपा, हसित-आभा, हेम-वदना, आर्द्र-करुणा तप्त, तृप्त, सुशीतकर, पद्म स्थित
पद्म-वर्णा, देवि श्री का आगमन हो।

चन्द्रकान्ता, कीर्ति से प्रज्वलित लोक-श्री, सुरलोक पूजित, उदारा
देवि पद्मा की शरण हूँ दूर हो दारिद्र्‌य, तेरी दया हो।

सूर्य-प्रभ, तप प्राप्य, तुझ से ही हुआ वनस्पति में विल्व तरु, फल तप रूप
आह्‌लादित उर करे, निर्गमित करदे सकल दारिद्रय मेरा।

सुर- सखा, करदो कृपा कीर्ति, मणियों सहित मुझ पर
मैं इस राष्टृ में पैदा हुआ अब धन,कीर्ति, वैभव मुझे दो।

क्षुत्‌, पिपासा, मलिनता, जो ज्येष्ठा-श्री आदि सब को नष्ट करता हूँ
अयश, निर्धनता सभी मेरे, पलायन करो गृह से।

गन्ध सेवित, दुर्जयी, सन्तुष्ट नित, गज स्वामिनी
ईश्वरी सब प्रणियों की, देवि श्री की अर्चना है यह।

कामनायें पूर्ण हों मन की, सत्य वाणी में बसे मेरी
अन्न, पशु, वैभव, सुयश सब देवि हमें श्री, श्रेयस्‌ मिले।

प्रजा कर्दम की सभी हम, सदा आगे ही रहें कर्दम
कुल हमारे सम्पदा श्री रहे, माँ हमारी पद्म-माला।

जल सुशीतल, स्नेह वर्षा करे गृह सदा कुल मेरे रहे श्रेयस्‌, जननि देवी।
आर्द्र-कमला, आप्त, पिंगल, पद्म-माला चन्द्र और हिरण्य आभा, देवि श्री का, अग्नि आवाहन करो।

आर्द्र, अनुशासक, सुवर्णा, दण्डधारी हेम- माला,
सूर्य-द्युति, स्वर्णिम, देवि श्री का, अग्नि आवाहन करो।

अग्नि लाओ देवि-श्री वह, जो कभी जाती नहीं आगमन से जिसके मुझे हो प्राप्त
प्रचुर धन, गो, अश्व, सेवक और संतति।

॥ श्री सूक्त संपूर्ण ॥
 

राशि अनुसार करे ये कार्य 2015 में हो सकता है धन लाभ !!


यदि आप धन संबंधी परेशानियों का सामना कर रहे हैं और आप ज्योतिष के उपाय करना चाहते हैं तो कुछ बातों का ध्यान रखना अनिवार्य है। सभी बारह राशियों और उनके ग्रह स्वामियों के अनुसार कुछ सामान्य बातें बताई गई हैं, इन बातों का ध्यान रखनें पर वर्ष 2015 के अंत तक धन लाभ प्राप्त होने के योग बन सकते हैं।ज्योतिष के उपायों में सबसे अधिक चमत्कारी और असरदार उपाय है दान करना। कुंडली में अलग-अलग दोषों को दूर करने के लिए भिन्न-भिन्न चीजों का दान किया जाता है। दान करते समय हमें राशि अनुसार यहां दी जा रही बातों का ध्यान रखना चाहिए। यदि इन बातों का ध्यान रखा जाएगा तो निश्चित ही आपको कार्यों में जल्दी सफलता प्राप्त होने लगेगी। 
मेष राशि ::=
इस राशि का स्वामी मंगल है और ज्योतिष के अनुसार मंगल को ग्रहों का सेनापति बताया गया है। अत: मेष राशि के लोगों को मंगल से संबंधित चीजें जैसे जमीन, लालवस्त्र, सोना, तांबा, केसर, कस्तूरी का दान करना चाहिए।
वृषभ राशि ::=
जिन लोगों की राशि वृषभ है, उन्हें चांदी, सफेद वस्त्र, घी, सोना तेल, काले वस्त्र, लोहा का दान करना चाहिए। वृष राशि का स्वामी शुक्र है।
मिथुन राशि ::=
बुध ग्रह मिथुन राशि का स्वामी है। जो लोग मिथुन राशि के अंतर्गत आते हैं, उन्हें कांसा, हरे वस्त्र, घी, पैसे, पन्ना, सोना, शंख, फल का दान करना चाहिए। इन चीजों के दान से आपके दुख-दर्द खत्म होने लगेंगे।
कर्क राशि::=
इस राशि का स्वामी चंद्र है। ज्योतिष के अनुसार चंद्र को मन का देवता बताया गया है। कर्क राशि के लोगों के लिए सफेद-लाल वस्त्र, चांदी, घी, शंख, सोना, तांबा, केसर, कस्तूरी का दान करना श्रेष्ठ रहता है।
सिंह राशि ::=
सूर्य के स्वामित्व वाली एकमात्र राशि सिंह है। सिंह राशि के लोगों को घर, दूध देने वाली गाय, लाल-सफेद वस्त्र, सोना, तांबा, केसर, मूंगा, चांदी, घी, शंख, मोती का दान करना चाहिए।
कन्या राशि ::=
कन्या राशि का स्वामी बुध है। जिन लोगों की राशि कन्या है, उन्हें बुध से संबंधित वस्तुएं कांसा, हरे वस्त्र, घी, पैसा, पन्ना, सोना, शंख, फल का दान करना श्रेष्ठ रहता है।
तुला राशि ::=
जिन लोगों की राशि तुला है, उन्हें हीरे, चांदी, मोती, सफेद-काले वस्त्र, घी, सोना, तेल, गाय, लोहा का दान करना चाहिए। यह वस्तुएं तुला राशि के स्वामी शुक्र से संबंधित हैं।
वृश्चिक राशि ::=
मंगल के स्वामित्व वाली यह दूसरी राशि है। जिन लोगों की राशि वृश्चिक है, उन्हें भूमि, लाल वस्त्र, सोना, तांबा, केसर, कस्तूरी का दान करना चाहिए। यह बहुत फायदेमंद रहता है।
धनु राशि ::=
धनु राशि के स्वामी देव गुरु बृहस्पति हैं। इस राशि के लोगों को गुरु ग्रह से संबंधित वस्तुएं जैसे पीली चीज, पुस्तक, भूमि, दूध देने वाली गाय, लाल वस्त्र, तांबा, केसर, मूंगा का दान करना चाहिए, विशेष फायदेमंद रहता है।
मकर राशि ::=
शनि ग्रह से संबंधित राशि है मकर। मकर राशि के लोगों को शनि की वस्तुएं जैसे तेल, तिल, नीले व काले वस्त्र, ऊनी वस्त्र, सोना, लोहा, कस्तूरी का दान करना खास फायदा देता है।
कुंभ राशि ::=
शनि के स्वामित्व वाली यह दूसरी राशि है। जिन लोगों की राशि कुंभ हैं, उन्हें शनि की चीजें जैसे तेल, तिल, नीले-काले वस्त्र, काली गाय, ऊनी वस्त्र, लोहा, कस्तूरी का दान करना चाहिए। इन चीजों के दान से शनि की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
मीन राशि ::=
इस राशि के स्वामी देवगुरु बृहस्पति हैं। अत: इन्हें गुरु ग्रह से संबंधित चीजें जैसे पीली चीज, पुस्तक, शहद, भूमि, दूध देने वाली गाय, लाल चंदन, लाल वस्त्र, तांबा, केसर, मूंगा का दान करना चाहिए।

कुंडली में सूर्य कमजोर या अशुभ हो तो कर सकते हैं ये उपाय !!


हर रोज सुबह-सुबह सूर्य की आराधना करनी चाहिए। ऐसी मान्यता है जो लोग रोज सूर्य की पूजा करते हैं, उन्हें समाज में मान-सम्मान प्राप्त होता और कार्यों में सफलता मिलती है। ज्योतिष के अनुसार, सूर्य मान-सम्मान का कारक ग्रह है। यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में सूर्य ग्रह अच्छी स्थिति में है, तो उसे समाज से मान-सम्मान मिलता है, जबकि सूर्य की अशुभ स्थिति व्यक्ति को समाज में अपमानित करवा सकती है। इस ग्रह से शुभ फल पाने के लिए यहां बताए जा रहा उपाय कर सकते हैं ! 
उपाय ::= 
 हर रोज सुबह जल्दी उठकर सूर्य को जल अर्पित करें। इसके लिए तांबे के लोटे का उपयोग करें। जल अर्पित करते समय सूर्य मंत्र का जप करें। यह बहुत ही सामान्य और सरल उपाय है।
मंत्र :::--
1. ऊँ सूर्याय नम:
2. ऊँ आदित्याय विदमहे दिवाकराय धीमहि तन्नौ: सूर्य: प्रचोदयात्।
3. ऊँ आदित्याय नम:

इन तीनों मंत्र में से किसी एक का या तीनों मंत्रों का जप किया जा सकता है। आप गायत्री मंत्र का जप भी कर सकते हैं। गायत्री मंत्र: ऊँ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गोदेवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।यदि किसी एक मंत्र का जप हर रोज 108 बार करेंगे तो बेहतर रहेगा। इसके लिए रुद्राक्ष की माला का उपयोग कर सकते हैं। सुबह-सुबह नित्यकर्मों से निवृत्त होकर किसी शांत एवं पवित्र स्थान पर साफ आसन बिछाएं और बैठ जाएं। इसके बाद श्रद्धापूर्वक माला का उपयोग करते हुए सूर्य मंत्र का जप 108 बार करें।