प्रत्येक 41 साल बाद यहां आते हैं हनुमानजी... ~ Balaji Kripa

Sunday, 22 February 2015

प्रत्येक 41 साल बाद यहां आते हैं हनुमानजी...


सात महामानव पिछले कई हजार वर्षों से आज भी जीवित हैं उनमें से ही एक है श्री हनुमानजी। हनुमानजी इस कलयुग के अंत तक अपने शरीर में ही रहेंगे। वे आज भी धरती पर विचरण करते हैं। जब कल्कि रूप में भगवान विष्णु अवतार लेंगे तब हनुमान, परशुराम, अश्वत्थामा, कृपाचार्य, विश्वामित्र, विभीषण और राजा बलि सार्वजनिक रूप से प्रकट हो जाएंगे।उक्त सातों महामानवों ने समय-समय पर अपने धरती पर होने का सबूत दिया है। एक ओर जहां अश्वत्थामा के कुछ जगह पर आने और उन्हें देखे जाने की चर्चा है तो कुछ जगह पर हनुमानजी भी कुछ लोगों को नजर आए हैं। इसी तरह परशुराम और विभीषण को भी देखे जाना का लोग दावा करते हैं।ताजा मामले में एक वेबसाइट ने दावा किया है कि एक ऐसी जगह है जहां हनुमानजी प्रत्येक 41 वर्ष बाद आते हैं और कुछ दिनों तक वहां रहने के बाद वापस चले जाते हैं। सवाल यह उठता है कि कहां चले जाते हैं? प्रत्येक 41 वर्ष बाद जहां आते हैं उसको बताने से पहले जानिए आखिर कहां चले जाते हैं हनुमानजी... 
प्रकट होकर यहां चले जाते हैं हनुमान?:
 हनुमानजी कलियुग में गंधमादन पर्वत पर निवास करते हैं, ऐसा श्रीमद् भागवत में वर्णन आता है...उल्लेखनीय है कि अपने अज्ञातवास के समय हिमवंत पार करके पांडव गंधमादन के पास पहुंचे थे। एक बार भीम सहस्रदल कमल लेने के लिए गंधमादन पर्वत के वन में पहुंच गए थे, जहां उन्होंने हनुमान को लेटे देखा और फिर हनुमान ने भीम का घमंड चूर कर दिया था।

''यत्र-यत्र रघुनाथ कीर्तन तत्र कृत मस्तकान्जलि।
वाष्प वारि परिपूर्ण लोचनं मारुतिं नमत राक्षसान्तक॥''


अर्थात: कलियुग में जहां-जहां भगवान श्रीराम की कथा-कीर्तन इत्यादि होते हैं, वहां हनुमानजी गुप्त रूप से विराजमान रहते हैं। सीताजी के वचनों के अनुसार- अजर-अमर गुन निधि सुत होऊ।। करहु बहुत रघुनायक छोऊ॥ 
गंधमादन पर्वत क्षेत्र और वन :
गंधमादन पर्वत का उल्लेख कई पौराणिक हिन्दू धर्मग्रंथों में हुआ है। महाभारत की पुरा-कथाओं में भी गंधमादन पर्वत का वर्णन प्रमुखता से आता है। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार माना जाता है कि यहां के विशालकाय पर्वतमाला और वन क्षेत्र में देवता रमण करते हैं। पर्वतों में श्रेष्ठ इस पर्वत पर कश्यप ऋषि ने भी तपस्या की थी। गंधमादन पर्वत के शिखर पर किसी भी वाहन से नहीं पहुंचा जा सकता। गंधमादन में ऋषि, सिद्ध, चारण, विद्याधर, देवता, गंधर्व, अप्सराएं और किन्नर निवास करते हैं। वे सब यहां निर्भीक विचरण करते हैं। 
वर्तमान में कहां है गंधमादन पर्वत? : 
इसी नाम से एक और पर्वत रामेश्वरम के पास भी स्थित है, जहां से हनुमानजी ने समुद्र पार करने के लिए छलांग लगाई थी, लेकिन हम उस पर्वत की नहीं बात कर रहे हैं। हम बात कर रहे हैं हिमालय के कैलाश पर्वत के उत्तर में (दक्षिण में केदार पर्वत है) स्थित गंधमादन पर्वत की। यह पर्वत कुबेर के राज्यक्षेत्र में था। सुमेरू पर्वत की चारों दिशाओं में स्थित गजदंत पर्वतों में से एक को उस काल में गंधमादन पर्वत कहा जाता था। आज यह क्षेत्र तिब्बत के इलाके में है।पुराणों के अनुसार जम्बूद्वीप के इलावृत्त खंड और भद्राश्व खंड के बीच में गंधमादन पर्वत कहा गया है, जो अपने सुगंधित वनों के लिए प्रसिद्ध था। 
कैसे पहुंचे गंधमादन : 
पुराणों के अनुसार जम्बूद्वीप के इलावृत्त खंड और भद्राश्व खंड के बीच में गंधमादन पर्वत कहा गया है, जो अपने सुगंधित वनों के लिए प्रसिद्ध था। इस क्षेत्र में दो रास्तों से जाया जा सकता है। पहला नेपाल के रास्ते मानसरोवर से आगे और दूसरा भूटान की पहाड़ियों से आगे और तीसरा अरुणाचल के रास्ते चीन होते हुए। संभवत महाभारत काल में अर्जुन ने असम के एक तीर्थ में जब हनुमानजी से भेंट की थी, तो हनुमानजी भूटान या अरुणाचल के रास्ते ही असम तीर्थ में आए होंगे। गौरतलब है कि एक गंधमादन पर्वत उड़िसा में भी बताया जाता है लेकिन हम उस पर्वत की बात नहीं कर रहे हैं। 
मातंग आदिवासी : 
सेतु एशिया नामक एक वेबसाइट ने दावा किया है कि श्रीलंका के जंगलों में एक आदिवासी समूह से हनुमानजी प्रत्येक 41 साल बाद मिलने आते हैं।सेतु के शोधानुसार श्रीलंका के जंगलों में एक ऐसा कबीलाई समूह रहता है जोकि पूर्णत: बाहरी समाज से कटा हुआ है। उनका रहन-सहन और पहनावा भी अलग है। उनकी भाषा भी प्रचलित भाषा से अलग है।सेतु एशिया नाम इस आध्यात्मिक संगठन का केंद्र कोलंबों में है जबकि इसका साधना केंद्र पिदुरुथालागाला पर्वत की तलहटी में स्थित एक छोटे से गांव नुवारा में है। इस संगठन का उद्देश्य मानव जाति को फिर से हनुमानजी से जोड़ना है।सेतु नामक इस आध्यात्मिक संगठन का दावा है कि इस बार 27 मई 2014 हनुमानजी ने इन आदिवासी समूह के साथ अंतिम दिन‍ बिताया था। इसके बाद अब 2055 में फिर से मिलने आएंगे हनुमानजी।सेतु संगठन अनुसार इस कबीलाई या आदिवासी समूह को मातंग लोगों का समाज कहा जाता है। उल्लेखनीय है कि कर्नाटक में पंपा सरोवर के पास मातंग ऋषि का आश्रम है जहां हनुमानजी का जन्म हुआ था। इस समूह का कहीं न कहीं यहां से संबंध हो सकता है।श्रीलंका के पिदुरु पर्वत के जंगलों में रहने वाले मातंग कबीले के लोग संख्या में बहुत कम हैं और श्रीलंका के अन्य कबीलों से काफी अलग हैं। सेतु संगठन ने उनको और अच्छी तरह से जानने के लिए जंगली जीवन शैली अपनाई और इनसे संपर्क साधना शुरू किया। संपर्क साधने के बाद उन समूह से उन्हें जो जानकारी मिली उसे जानकर वे हैरान रह गए। 
'हनु पुस्तिका' में सब कुछ लिखा है : 
अध्ययनकर्ताओं अनुसार मातंगों के हनुमानजी के साथ विचित्र संबंध हैं जिसके बारे में पिछले साल ही पता चला। फिर इनकी विचित्र गतिविधियों पर गौर किया गया, तो पता चला कि यह सिलसिला रामायण काल से ही चल रहा है।इन मातंगों की यह गतिविधियां प्रत्येक 41 साल बाद ही सक्रिय होती है। मातंगों अनुसार हनुमानजी ने उनको वचन दिया था कि मैं प्रत्येक 41 वर्ष में तुमसे मिलने आऊंगा और आत्मज्ञान दूंगा। अपने वचन के अनुसार उन्हें हर 41 साल बाद आत्मज्ञान देकर आत्म शुद्धि करने हनुमानजी आते हैं।सेतु अनुसार जब हनुमानजी उनके पास 41 साल बाद रहने आते हैं, तो उनके द्वारा उस प्रवास के दौरान किए गए हर कार्य और उनके द्वारा बोले गए प्रत्येक शब्द का एक-एक मिनट का विवरण इन आदिवासियों के मुखिया बाबा मातंग अपनी 'हनु पुस्तिका' में नोट करते हैं। 2014 के प्रवास के दौरान हनुमानजी द्वारा जंगल वासियों के साथ की गई सभी लीलाओं का विवरण भी इसी पुस्तिका में नोट किया गया है। इस नोट को जानने के लिए इस वेबसाइट पर जा सकते हैं...www.setu.asia/सेतु ने दावा किया है कि हमारे संत पिदुरु पर्वत की तलहटी में स्थित अपने आश्रम में इस पुस्तिका तो समझकर इसका आधुनिक भाषाओँ  में अनुवाद करने में जुटे हुए हैं ताकि हनुमानजी के चिरंजीवी होने के रहस्य जाना जा सके, लेकिन इन आदिवासियों की भाषा पेचीदा और हनुमानजी की लीलाएं उससे भी पेचीदा होने के कारण इस पुस्तिका को समझने में काफी समय लग रहा है।

3 comments:


  1. कृष्ण निराश होकर लौट चुके हैं, संधि प्रस्ताव असफल हो चुका है . महाभारत का युद्ध टालने की सारी कोशिशें जब बेकार साबित हो गई तो अब सिवाय इसके कोई चारा नही बचा कि युद्ध की तैयारियां की जाये . प्रत्येक व्यक्ति अपने अपने स्तर पर मशगूल हो गया. अब कोई भी उपाय नही बचा कि इस विभीषिका से बचा जा सके . गांधारी और कुंती भी अपने अपने स्तर पर तैयारियों में सलंग्न हो गई .
    दोनों ही , गांधारी और कुंती, राजमहल के पीछे दूर जंगल में बने शिव मन्दिर में राजोपचार विधि से, अपने अपने पुत्रो को राज्य दिलवाने की कामना से शिव पूजन करने लगी . कुछ दिन पश्चात भगवान् भोलेनाथ दोनों पर ही प्रशन्न हो गए और वर मांगने के लिए कहा . दोनों ही माताओं ने अपने अपने पुत्रो के लिए राज्य माँगा .
    भगवान् शिव बोले – यह असंभव है . राज्य एक है तो दोनों को नही मिल सकता . एक काम करो एक पक्ष राज्य ले लो और दूसरा मोक्ष ले ले . आप लोग आपस में निर्णय कर लीजिये

    जब कुंती और गंधारी के समक्ष महादेव शिव ने रखी एक अनोखी शर्त, महाभारत की अनकही कथा !

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  2. जय बजरंग बली.....मैं यहाँ "सेतु हनुमान बोधि" का खुलासा कर रहा हूँ, ताकि आप भी उनकी बातों में न आएं |
    "सेतु हनुमान बोधि " नाम की एक संस्था श्री लंका में है और उन्होंने इस बात का दावा किया है और प्रचार किया है कि २०१४ में हनुमान जी लोगों से मिलने आए थे | हनुमान जी मतंग लोगों के बीच थे और उनका लीडर उस मुलाक़ात को एक रजिस्टर में दर्ज किए हुए है, जो उनकी सिंघली भाषा में है जिसका अनुवाद करने में समय लग रहा है | जैसे जैसे वे इसका अनुवाद करते जाएंगे वे उसे भेजते जाएंगे | वे इस मुलाक़ात के २१ चैप्टर भी छाप चुके हैं, तथा हर बार वो अर्पणम मांगते है जो 250/- रूपये से लेकर 5000/- तक का है |
    मैं अभी हाल ही में श्रीलंका जा कर आया हूँ और मुझे वंहा ऐसी कोई संस्था नहीं दिखी | उन्होंने अपना इंटरनेट पर पता मन्दारम नुवारा का दिया हुआ है | जब हम वहाँ गए तो वो एक छोटा सा सुंदर सा गाँव है लेकिन वहाँ मतंग नाम के कोई आदिवासी नहीं है | हमें वहाँ बहुत ढूँढने पर एक पहाड़ जो करीब ३ किलोमीटर ऊपर था, वहाँ तमिल लोग मिले जो आम लोगों से कटे हुए है |
    ये लोग हनुमान जी के अनन्य भक्त हैं | मगर इन्होंने भी हनुमान जी को २०१४ में नहीं देखा | उन्होंने हनुमान जी को कभी देखा ही नहीं है | हालांकि उनका ये मानना है कि हनुमान जी आज भी जीवित है क्यों कि उनके पाँव के निशान कभी कभी जंगल में देखने को मिल जाते हैं | मगर “सेतु हनुमान बोधि” नाम की कोई संस्था के बारे में वे नहीं जानते और ना ही उनके बारे में सुना है |
    “सेतु हनुमान बोधि” वालों से इंटरनेट पर ई –मेल करके मैंने उनका फोन नम्बर लेने का प्रयास किया मगर उन्होंने अपना कोई फोन नम्बर नहीं दिया और कहा कि उनका आफिस कोलम्बो में है लेकिन कोलम्बो का कोई पता उन्होंने नहीं दिया है और ना मेरी ई-मेल में दिया है | उन्होंने जब कोई फोन नम्बर नहीं दिया और कोलम्बो का कोई पता नहीं दिया तब मुझे उनके होने पर शक हुआ, और ये शक स्पष्ट हो गया कि “सेतु हनुमान बोधि” नाम की कोई संस्था है |
    मैं लगातार उन्हें प्रत्येक चेप्टर के 251/- रूपये भेज रहा हूँ लेकिन अब रोक दिया है |
    मेरा आप सभी लोगों से यह अनुरोध है कि उनके इस बहकावे में ना आएं कि २०१४ में हनुमान जी लोगों से आकर मिले थे और ४१ वर्षों के बाद वे फिर से आएँगे |
    के.बी.व्यास

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  3. Aek bhai 1Varsh setu ke sath rahe the.vo kun.kaun Hanumandas.usne 2 Photo bhi prakshit kiye.he. aur Rochak varan bhi likha he.ye sach he.meri puri madad kare.jay hanuman

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