जानिये शिव,शंकर और शंभु के बीच का भेद !! ~ Balaji Kripa

Tuesday, 10 February 2015

जानिये शिव,शंकर और शंभु के बीच का भेद !!

शास्त्रानुसार काल पर शिव का नियंत्रण है, अतः शिव महाकाल भी कहलाए जाते हैं। ऐसे शिव स्वरूप में लीन रहकर ही काल पर विजय पाना भी संभव है।सांसारिक मनुष्य के दृष्टिकोण से शिव व काल के संबंधों में छिपा संकेत यही है कि काल अर्थात् समय की महत्वता समझते हुए उसके साथ बेहतर तालमेल व गठजोड़ ही जीवन व मृत्यु दोनों ही स्थिति में सुखद है।अतः जीवन में शिव भाव में रम जाना ही महत्वपूर्ण है।शिव भाव से जुडऩे हेतु वेदों में वर्णित शिव के अतिरिक्त अन्य दो नाम शंकर व शंभु के अर्थ को भी समझना आवश्यक है।इस लेख के माध्यम से जान लीजिए कि एक ही होने पर भी इन तीन नामों के बीच क्या भेद हैं।
वेद अनुसार:== 
शंभु मोक्ष देने वाले हैं।वहीं शंकर शमन करने वाले और शिव कल्याण करने वाले हैं।इस भांति शंभु नाम ऐसे भाव जागृत करता है कि शांति हेतु सद्‍भावना व सुकर्म का मार्ग ही अपनाएं।इनसे मन भय से व तन रोगों से दूर रहेगा तथा मनोवांछित लक्ष्य प्राप्ति संभव होगी।शंकर का अर्थ है शमन करने वाला।शंकर नाम स्मरण यही भाव जागृत करता है कि शंकर के योगी स्वरूप की भांति मन को सैदेव शांत, संयमित व संकल्पित रखें।संकल्पों से मन को जागृत रखने से ही अशांति का शमन होता है।शिव नाम का अर्थ है कल्याणकारी।शिव नाम से कर्म, भाव व व्यवहार में पावनता का संदेश मिलता है।इसके लिए जीवन में हर प्रकार से पवित्रता, आनन्द, ज्ञान, मंगल, कुशल व क्षमा को अपनाएं, ताकि अपने साथ दूसरों का भी शुभ हो।शिव नाम के साथ जब मंगल भावों से जुड़ते हैं, तो मन की कई बाधाएं, विकार, कामनाएं और विकल्प नष्ट हो जाते हैं।व्यक्ति मजबूत संकल्पों से जुड़ जाता है।इस प्रकार शिव, शंकर और शंभु तीनों ही नाम हमेशा जीवन में सोम्यस्य सुंदरता व सफलता प्रदान करते हैं। 
पुराण अनुसार:== शिव परम पिता और परमेश्वरी (शक्ति) जगजननी तथा जगदम्बा कहलाती हैं।अपनी संतान पर उनकी असीम करुणा और कृपा है।उनका नाम ही आशुतोष है।दानी और उदार ऐसे हैं कि नाम ही पड़ गया औढ़नदानी।उनका भोलापन भक्तों को बहुत ही भाता है।अकारण अनुग्रह करना, अपनी संतान से प्रेम करना भोलेबाबा का स्वभाव है।उनके समान कल्याणकारी व प्रजा रक्षक और कौन हो सकता है।शिव ही समस्त प्राणियों के अंतिम विश्रामस्थान भी है।उनकी संहारिका शक्ति प्राणियों के कल्याण के लिए प्रस्फुटित होती है।शंकर ही सबसे बड़े ज्ञानी है क्योंकि वे ही समस्त विद्याओं, वेदादि शास्त्रों, आगमों तथा कलाओं के मूल स्रोत है। इसलिए उन्हें विशुद्ध विज्ञानमय, विद्यापति तथा सस्त प्राणियों का ईश्वर कहा गया है।शंभु स्वयं नीतिस्वरूप हैं।अपने प्राणों की बलि देकर भी जीवों की रक्षा करना,सदा उनके हित चिंतन में संलग्न रहना- इससे बड़ी नीति और क्या हो सकती है।कृपालु शंभु ने यह सब कर दिखाया।ऐसा कह वे हलाहल पी गए और नीलकंठ कहलाए।तीनों लोकों की रक्षा हो गई।साधुजन, नीतिमान जन अपने क्षणभंगुर जीवन की बलि देकर भी प्राणियों की रक्षा करते हैं।कल्याणी ! जो पुरुष प्राणियों पर कृपा करता है, उससे सर्वात्मा कहते हैं। 
रामचरितमानस अनुसार:== "जासु नाम बल संकर कासी। देत सबहि सम गति अबिनासी"।। अर्थात् भगवन्नाम के बल से शंकर जी काशी में मरनेवालों को मुक्ति देते हैं। "कासी मरत जन्तु अवलोकी। जासु नाम बल करउँ बिसोकी"।। अर्थात् शंभु स्वरुप में वह कहते है की काशी में मरते हुए जीव को यदि मैं देख लेता हूँ तो हे पार्वती ! उन परमप्रभु के नाम अर्थात् ओम् के बल से मैं उसे अविनाशी पद प्रदान कर देता हू।अतः शिव शरण जो कोई आया, जैसे– कागभुशुण्डि, उन सबको भगवान की भक्ति प्रदान कर उद्धार किया गया।आदि शंकराचार्य मत: शिव आदि योगेश्वर हैं।शिव से ही योग-साधना प्रारम्भ होती है अतः उन्हें माता-पिताविहीन, स्वयंभू, स्वरूपस्थ, परमात्मस्वरूप इत्यादि विशेषणों से अलंकृत किया जाता है।उन्हें भूतनाथ भी कहा जाता है क्योंकि वे प्राणिमात्र की शरणस्थली हैं।उनके शरण बिना कोई मोक्ष को प्राप्त नहीं कर सकता।आदि शंकराचार्य प्रश्नोत्तरी अनुसार वह पूछते हैं कि सृष्टि में पूजनीय कौन है ? उत्तर है - जो शिवतत्त्व में स्थित है वह महापुरुष! जो प्रकृति की सीमाओं से उपराम है उसे शिव कहते हैं।ऐसा महापुरुष पूजनीय है।उनके गणों अर्थात् सेवकों की एक लम्बी परम्परा है उनमें गणेश भी हैं, कार्तिकेय हैं, समस्त प्राणी एवं देवता भी है।

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