March 2015 ~ Balaji Kripa

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May Baba fullfill all the wishes of the Devotees.

जय श्रीराम

भगवान रामभक्त हनुमान की उपासना से जीवन के सारे कष्ट, संकट मिट जाते है। माना जाता है कि हनुमान एक ऐसे देवता है जो थोड़ी-सी प्रार्थना और पूजा से ही शीघ्र प्रसन्न हो जाते है। जहां मंगलवार और शनिवार का दिन इनके पूजन के लिए सर्वश्रेष्ठ हैं।

ॐ हं हनुमंतये नम:

मंगलवार और शनिवार के दिन हनुमान म‍ंदिर में जाकर रामभक्त हनुमान का गुणगान करें और उनसे अपने पापों के लिए क्षमायाचना करें।

Tuesday, 31 March 2015

4 को हनुमान जयंती के साथ चंद्रग्रहण का योग, जानिए किस राशि पर कैसा होगा असर !1

इस बार 4 अप्रैल, शनिवार को हनुमान जयंती पर खण्डग्रास चंद्रग्रहण का योग बन रहा है। यह साल 2015 का पहला चंद्रग्रहण होगा, जो भारत में लगभग साढ़े 3 घंटे दिखाई देगा। यह ग्रहण भारत के कुछ भागों में ग्रस्तोदित दिखाई देगा। जहां-जहां यह ग्रहण दिखाई देगा, वहीं इसका प्रभाव माना जाएगा। शनिवार को ग्रहण दोपहर 03.31 से आरंभ होकर शाम को 07.07 तक रहेगा। ग्रहण का सूतक सुबह से ही आरंभ हो जाएगा, जो ग्रहण के मोक्ष तक रहेगा। इसलिए पूरे दिन हनुमानजी या अन्य कोई देवता का पूजन आदि नही हो पाएगा। हनुमान जयंती के कार्यक्रम भी शाम को 07.15 के बाद ही करना श्रेष्ठ रहेंगे। 
इसलिए खास है ये चंद्रग्रहण:-
यह चंद्रग्रहण कन्या राशि में होगा। अत: कन्या राशि वालों को अति सावधानी बरतनी पड़ सकती है। कन्या राशि पर होने वाला खग्रास चंद्रग्रहण अब तक की सबसे लंबी अवधि वाला होगा। शनिवार व हनुमान जयंती के संयोग में चंद्रग्रहण पर सभी राशि वाले हनुमानजी की आराधना कर शुभ फल प्राप्त कर सकते हैं।
जानिए किस राशि पर कैसा होगा चंद्रग्रहण का असर :-
मेष- इस राशि के लिए यह चंद्रग्रहण शुभ फल देने वाला रहेगा। धन का लाभ एवं छठी राशि मे चंद्रग्रहण होने से रुके कार्यों में भी गति आएगी। विवादों में विजय प्राप्त होगी। शुभ समाचारों की वृद्धि होगी। बेरोजगारों को रोजगार मिलने के योग बनेंगे।
वृषभ- इस राशि से पांचवी राशि में ग्रहण लगेगा, जो सामान्य फल प्रदान करने वाला होगा। बुरा समय समाप्त होगा और अच्छे कामों में मन लगेगा। निराशा का अंत होगा। रिश्तेदारों से संबंधों में सुधार होगा एवं धन की आवक सामान्य रहेगी।
मिथुन- इस राशि से चौथी राशि मे चंद्रग्रहण होगा। यह समय मिथुन राशि वालों के लिए संभलने का है। कोई भी कार्य ऐसा नही करें, जिससे चिंताएं बढ़ जाए। धन की आवक कमजोर हो सकती है। निवेश में घाटे की संभावना है। विवादों से हानि हो सकती है। चोरी आदि से भी सावधान रहना होगा।
कर्क- इस राशि से तीसरी राशि में चंद्रग्रहण शुभ फल देने वाला होगा। शुभ समाचारों की प्राप्ति होगी। रुके कार्य संपन्न होंगे एवं रोगों में सुधार होगा। उधार दिए गए पैसों की वसूली होगी एवं संपत्ति से लाभ होगा एवं नए कार्यों का आरंभ भी हो सकता है।
सिंह- दूसरी राशि में चंद्रग्रहण सामान्य लाभ देने वाला होगा। शुभ सूचनाएं मिलेंगी, किंतु मन उदास रहेगा। मनचाही सफलताएं मिलने में संदेह रहेगा। आगे बढ़ने में सहायता करने वाले पीछे हटेंगे। रोगों में वृद्धि हो सकती है, लेकिन कोई गंभीर समस्या नही होगी।
कन्या- राहु एवं चंद्र का गोचर इसी राशि में ग्रहण योग निर्मित करेगा। अत्यंत सावधानी बरतने का समय है। हर कार्य को सावधानी पूर्वक करें एवं किसी से विवाद की स्थिति बनने लगे तो तुरंत वहां से चले जाएं, तो ही बेहतर होगा। वाहन आदि सावधानी से चलाएं एवं निवेश का जोखिम न लें।
तुला- बारहवीं राशि में चंद्रग्रहण संभलकर रहने का संकेत करता है। आय में कमी एवं चिंताओं में वृद्धि हो सकती है। कार्यक्षमता कमजोर हो सकती है। रिश्तेदारों से विवाद एवं विरोधी प्रभावी हो सकते हैं। कार्यस्थल पर असम्माननीय स्थिति बन सकती है।
वृश्चिक- एकादश राशि मे चंद्रग्रहण शुभ फल देने वाला होगा। शुभ समाचार एवं आय की वृद्धि के संकेत हैं। संपत्ति से लाभ एवं रुके कार्यों के पूरे होने के संकेत हैं। रोगों में लाभ होगा एवं विरोधी हताश होंगे। कार्य प्रणाली में सुधार होगा।
धनु- दशम राशि में चंद्रग्रहण होगा यह भी साधारण फल देने वाला होगा। आय सामान्य बनी रहेगी एवं चिंताओं से मुक्ति मिलेगी। कोई नई जिम्मेदारी मिल सकती है। अधिकारी प्रसन्न रहेंगे, किंतु कार्य अधिक करना पड़ सकता है। विरोधी को परास्त करने के लिए प्रयास करना होगा।
मकर- इस राशि को नवम राशि में होने वाले चंद्र ग्रहण का असर रहेगा। न्यायालयीन एवं विवादित मामलों में अपना पक्ष रखने का समय प्राप्त होगा। जिम्मेदारी बढ़ सकती है एवं परिवार का सहयोग प्राप्त होगा। नौकरी में बदलाव हो सकता है।
कुंभ- आठवी राशि में चंद्रग्रहण अशुभ फल का सूचक है। रोगों की वृद्धि हो सकती है। संतान से भी दुख प्राप्त होने के योग बन रहे हैं। नौकरी में भी चिंताजनक खबर मिल सकती है। यह समय शांत रहने का है। किसी से विवाद नही करें एवं परिवार वालों की सलाह पर ध्यान देना उचित होगा।
मीन- सप्तम राशि मे चंद्रग्रहण सामान्य फल देने वाला होगा। विचारों की अधिकता रहेगी। नए कार्यों को करने का मौका मिलेगा एवं कार्यशैली में सुधार होगा। क्रेडिट मिलने में संदेह रहेगा। परिवार का सहयोग बना रहेगा। धन की कमी महसूस होगी।
ग्रहण में रखें इन बातों का ध्यान:-
ग्रहण के दौरान अपने इष्टदेव का ध्यान, गुरु मंत्र का जाप, धार्मिक कथाएं सुननी व पढ़नी चाहिए। इनमें से कुछ न कर पाने की स्थिति में राम नाम का या अपने इष्टदेव के नाम का जाप भी कर सकते हैं। ग्रहण के समय भगवान की मूर्ति को छूना, भोजन पकाना या खाना एवं पीना, सोना, मनोरंजन आदि कार्य नहीं करना चाहिए। ग्रहण के बाद ही पूरे घर की शुद्धि एवं स्नान कर दान देने का महत्व है। गर्भवती महिलाओं के ग्रहण के दौरान बाहर निकलने से बचना चाहिए। ग्रहण के मोक्ष के पश्चात ही पूजनादि से निवृत्त होकर भोजनादि ग्रहण करने का नियम है।
चंद्रग्रहण का धार्मिक कारण:-
अमृत प्राप्ति के लिए जब देवताओं व दानवों ने समुद्र मंथन किया तो समुद्र में से धन्वन्तरि अमृत कलश लेकर निकले, इस अमृत कलश को इंद्र का पुत्र जयंत लेकर भाग गया। अमृत कलश के लिए देवताओं व दानवों में घोर युद्ध हुआ। तब भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप लिया और कहा कि मैं बारी-बारी से देवता व दानवों को अमृत पिला दूंगी। सभी सहमत हो गए। मोहिनी रूपधारी भगवान विष्णु चालाकी से देवताओं को अमृत पिलाने लगे और दानवों के साथ छल लिया।यह बात राहु नामक दैत्य ने जान ली और वह रूप बदलकर सूर्य व चंद्र के बीच जा बैठा। जैसे ही राहु ने अमृत पीया, सूर्य व चंद्रदेव ने उसे पहचान लिया और मोहिनी रूपधारी भगवान विष्णु को यह बात बता दी। तत्काल भगवान ने सुदर्शन चक्र निकाला और राहु का सिर धड़ से अलग कर दिया, लेकिन अमृत पीने के कारण वह मरा नहीं। राहु के दो टुकड़े हो गए। एक बना राहु दूसरा बना केतु। इस घटना के बाद से राहु ने सूर्य व चंद्रदेव से दुश्मनी पाल ली। धर्म ग्रंथों के अनुसार राहु व केतु उसी बात का बदला ग्रहण के रूप में लेते हैं।

Friday, 27 March 2015

श्रीराम नवमी के अवसर पर वाल्मीकि रामायण में लिखी कुछ ऐसी बातें जिन्हें बहुत कम लोग जानते हैं !!

चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को श्रीराम नवमी का पर्व मनाया जाता है। वाल्मीकि रामायण के अनुसार इसी दिन भगवान विष्णु ने श्रीराम के रूप में धरती पर अवतार लिया था। इस बार श्रीराम नवमी का पर्व 28 मार्च, शनिवार को है। श्रीराम नवमी के अवसर पर हम आज आपको वाल्मीकि रामायण में लिखी कुछ ऐसी बातें बता रहे हैं, जिन्हें बहुत कम लोग जानते हैं, ये बातें इस प्रकार हैं-

1. जिस समय भगवान श्रीराम वनवास गए, उस समय उनकी आयु लगभग 26 वर्ष तथा सीता की आयु 18 वर्ष की थी। वाल्मीकि रामायण के प्रसंग में सीता कहती हैं-
मम भर्ता महातेजा वयसा पंचविंशकः।
अष्टादश हि वर्षाणि मम जन्मानि गण्यते।।
अर्थात- वनवास पर जाते समय मेरे महातेजस्वी पति की अवस्था 25 साल से ऊपर (लगभग 26 साल) की थी और मेरे जन्म काल से लेकर वन जाने तक मेरी अवस्था 18 साल की हो गई थी।


2. राजा दशरथ श्रीराम को वनवास नहीं भेजना चाहते थे, लेकिन वे वचनबद्ध थे। जब श्रीराम को रोकने का कोई उपाय नहीं सूझा तो उन्होंने श्रीराम से यह भी कह दिया कि तुम मुझे बंदी बनाकर स्वयं राजा बन जाओ।

3. तुलसीदास द्वारा रचित श्रीरामचरित मानस में वर्णन है कि भगवान श्रीराम ने सीता स्वयंवर में शिव धनुष को उठाया और प्रत्यंचा चढ़ाते समय वह टूट गया, जबकि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण में सीता स्वयंवर का वर्णन नहीं है। रामायण के अनुसार भगवान राम व लक्ष्मण ऋषि विश्वामित्र के साथ मिथिला पहुंचे थे।
विश्वामित्र ने ही राजा जनक से श्रीराम को वह शिवधनुष दिखाने के लिए कहा। तब भगवान श्रीराम ने खेल ही खेल में उस धनुष को उठा लिया और प्रत्यंचा चढ़ाते समय वह टूट गया। राजा जनक ने यह प्रण किया था कि जो भी इस शिव धनुष को उठा लेगा, उसी से वे अपनी पुत्री सीता का विवाह कर देंगे।
 

4. वाल्मीकि रामायण के अनुसार राजा दशरथ ने पुत्र प्राप्ति के लिए पुत्रेष्ठि यज्ञ करवाया था। इस यज्ञ को मुख्य रूप से ऋषि ऋष्यशृंग ने संपन्न किया था। ऋष्यशृंग के पिता का नाम महर्षि विभाण्डक था। एक दिन जब वे नदी में स्नान कर रहे थे तब नदी में उनका वीर्यपात हो गया। उस जल को एक हिरणी ने पी लिया था, जिसके फलस्वरूप ऋषि ऋष्यशृंग का जन्म हुआ था।

5. श्रीरामचरित मानस के अनुसार सीता स्वयंवर के समय भगवान परशुराम वहां आए थे, जबकि रामायण के अनुसार सीता से विवाह के बाद जब श्रीराम पुन: अयोध्या लौट रहे थे, तब परशुराम वहां आए और उन्होंने श्रीराम से अपने धनुष पर बाण चढ़ाने के लिए कहा। श्रीराम के द्वारा बाण चढ़ा देने पर परशुराम वहां से चले गए थे।

6. वाल्मीकि रामायण के अनुसार एक बार रावण अपने पुष्पक विमान से कहीं जा रहा था, तभी उसे एक सुंदर स्त्री दिखाई दी, उसका नाम वेदवती था। वह भगवान विष्णु को पति रूप में पाने के लिए तपस्या कर रही थी। रावण ने उसके बाल पकड़े और अपने साथ चलने को कहा। उस तपस्विनी ने उसी क्षण अपनी देह त्याग दी और रावण को श्राप दिया कि एक स्त्री के कारण ही तेरी मृत्यु होगी। उसी स्त्री ने दूसरे जन्म में सीता के रूप में जन्म लिया।

7. अपने पिता राजा दशरथ की मृत्यु का आभास भरत को पहले ही एक स्वप्न के माध्यम से हो गया था। सपने में भरत ने राजा दशरथ को काले वस्त्र पहने हुए देखा था। उनके ऊपर पीले रंग की स्त्रियां प्रहार कर रही थीं। सपने में राजा दशरथ लाल रंग के फूलों की माला पहने और लाल चंदन लगाए गधे जूते हुए रथ पर बैठकर तेजी से दक्षिण (यम की दिशा) की ओर जा रहे थे।

8. हिंदू धर्म में तैंतीस करोड़ देवी-देवताओं की मान्यता है, जबकि रामायण के अरण्यकांड के चौदहवे सर्ग के चौदहवे श्लोक में सिर्फ तैंतीस देवता ही बताए गए हैं। उसके अनुसार बारह आदित्य, आठ वसु, ग्यारह रुद्र और दो अश्विनी कुमार, ये ही कुल तैंतीस देवता हैं।

9. रघुवंश में एक परम प्रतापी राजा हुए थे, जिनका नाम अनरण्य था। जब रावण विश्वविजय करने निकला तो राजा अनरण्य से उसका भयंकर युद्ध हुआ। उस युद्ध में राजा अनरण्य की मृत्यु हो गई, लेकिन मरने से पहले उन्होंने रावण को श्राप दिया कि मेरे ही वंश में उत्पन्न एक युवक तेरी मृत्यु का कारण बनेगा।

10. रावण जब विश्व विजय पर निकला तो वह यमलोक भी जा पहुंचा। वहां यमराज और रावण के बीच भयंकर युद्ध हुआ। जब यमराज ने रावण के प्राण लेने के लिए कालदण्ड का प्रयोग करना चाहा तो ब्रह्मा ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया क्योंकि वरदान के कारण किसी देवता द्वारा रावण का वध संभव नहीं था।

11. सीताहरण करते समय जटायु नामक गिद्ध ने रावण को रोकने का प्रयास किया था। रामायण के अनुसार जटायु के पिता अरुण बताए गए हैं। ये अरुण ही भगवान सूर्यदेव के रथ के सारथी हैं।

12. रावण के पुत्र मेघनाद ने जब युद्ध में इंद्र को बंदी बना लिया तो ब्रह्माजी ने देवराज इंद्र को छोडऩे को कहा। इंद्र पर विजय प्राप्त करने के कारण ही मेघनाद इंद्रजीत के नाम से विख्यात हुआ।
 

13. जिस दिन रावण सीता का हरण कर अपनी अशोक वाटिका में लाया। उसी रात को भगवान ब्रह्मा के कहने पर देवराज इंद्र माता सीता के लिए खीर लेकर आए, पहले देवराज ने अशोक वाटिका में उपस्थित सभी राक्षसों को मोहित कर सुला दिया। उसके बाद माता सीता को खीर अर्पित की, जिसके खाने से माता सीता की भूख-प्यास शांत हो गई।

14. जब भगवान राम और लक्ष्मण वन में सीता की खोज कर रहे थे। उस समय कबंध नामक राक्षस का राम-लक्ष्मण ने वध कर दिया। वास्तव में कबंध एक श्राप के कारण ऐसा हो गया था। जब श्रीराम ने उसके शरीर को अग्नि के हवाले किया तो वह श्राप से मुक्त हो गया। कबंध ने ही श्रीराम को सुग्रीव से मित्रता करने के लिए कहा था।

15. श्रीरामचरितमानस के अनुसार समुद्र ने लंका जाने के लिए रास्ता नहीं दिया तो लक्ष्मण बहुत क्रोधित हो गए थे, जबकि वाल्मीकि रामायण में वर्णन है कि लक्ष्मण नहीं बल्कि भगवान श्रीराम समुद्र पर क्रोधित हुए थे और उन्होंने समुद्र को सुखा देने वाले बाण भी छोड़ दिए थे। तब लक्ष्मण व अन्य लोगों ने भगवान श्रीराम को समझाया था।

16. सभी जानते हैं कि समुद्र पर पुल का निर्माण नल और नील नामक वानरों ने किया था। क्योंकि उसे श्राप मिला था कि उसके द्वारा पानी में फेंकी गई वस्तु पानी में डूबेगी नहीं, जबकि वाल्मीकि रामायण के अनुसार नल देवताओं के शिल्पी (इंजीनियर) विश्वकर्मा के पुत्र थे और वह स्वयं भी शिल्पकला में निपुण था। अपनी इसी कला से उसने समुद्र पर सेतु का निर्माण किया था।

17. रामायण के अनुसार समुद्र पर पुल बनाने में पांच दिन का समय लगा। पहले दिन वानरों ने 14 योजन, दूसरे दिन 20 योजन, तीसरे दिन 21 योजन, चौथे दिन 22 योजन और पांचवे दिन 23 योजन पुल बनाया था। इस प्रकार कुल 100 योजन लंबाई का पुल समुद्र पर बनाया गया। यह पुल 10 योजन चौड़ा था। (एक योजन लगभग 13-16 किमी होता है)

18. एक बार रावण जब भगवान शंकर से मिलने कैलाश गया। वहां उसने नंदीजी को देखकर उनके स्वरूप की हंसी उड़ाई और उन्हें बंदर के समान मुख वाला कहा। तब नंदीजी ने रावण को श्राप दिया कि बंदरों के कारण ही तेरा सर्वनाश होगा।

19. वाल्मीकि रामायण के अनुसार जब रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कैलाश पर्वत उठा लिया तब माता पार्वती भयभीत हो गई थी और उन्होंने रावण को श्राप दिया था कि तेरी मृत्यु किसी स्त्री के कारण ही होगी।

20. जिस समय राम-रावण का अंतिम युद्ध चल रहा था, उस समय देवराज इंद्र ने अपना दिव्य रथ श्रीराम के लिए भेजा था। उस रथ में बैठकर ही भगवान श्रीराम ने रावण का वध किया था।
 

21. जब काफी समय तक राम-रावण का युद्ध चलता रहा तब अगस्त्य मुनि ने श्रीराम से आदित्य ह्रदय स्त्रोत का पाठ करने को कहा, जिसके प्रभाव से भगवान श्रीराम ने रावण का वध किया।

22. रामायण के अनुसार रावण जिस सोने की लंका में रहता था वह लंका पहले रावण के भाई कुबेर की थी। जब रावण ने विश्व विजय पर निकला तो उसने अपने भाई कुबेर को हराकर सोने की लंका तथा पुष्पक विमान पर अपना कब्जा कर लिया।

23. रावण ने अपनी पत्नी की बड़ी बहन माया के साथ भी छल किया था। माया के पति वैजयंतपुर के शंभर राजा थे। एक दिन रावण शंभर के यहां गया। वहां रावण ने माया को अपनी बातों में फंसा लिया। इस बात का पता लगते ही शंभर ने रावण को बंदी बना लिया। उसी समय शंभर पर राजा दशरथ ने आक्रमण कर दिया। उस युद्ध में शंभर की मृत्यु हो गई। जब माया सती होने लगी तो रावण ने उसे अपने साथ चलने को कहा। तब माया ने कहा कि तुमने वासना युक्त मेरा सतित्व भंग करने का प्रयास किया इसलिए मेरे पति की मृत्यु हो गई, अत: तुम्हारी मृत्यु भी इसी कारण होगी।

Thursday, 26 March 2015

नव दुर्गा की पूजा क्यों की जाती है !!

दुर्गा पूजा शक्ति उपासना का पर्व है। नवरात्र में मनाने का कारण यह है कि इस अवधि में ब्रह्मांड के सारे ग्रह एकत्रित होकर सक्रिय हो जाते हैं, जिसका दुष्प्रभाव प्राणियों पर पड़ता है। ग्रहों के इसी दुष्प्रभाव से बचने के लिए नवरात्रि में दुर्गा की पूजा की जाती है।दुर्गा दुखों का नाश करने वाली देवी है। इसलिए नवरात्रि में जब उनकी पूजा आस्था, श्रद्धा से की जाती है तो उनकी नवों शक्तियाँ जागृत होकर नवों ग्रहों को नियंत्रित कर देती हैं। फलस्वरूप प्राणियों का कोई अनिष्ट नहीं हो पाता।दुर्गा की इन नवों शक्तियों को जागृत करने के लिए दुर्गा के 'नवार्ण मंत्र' का जाप किया जाता है। नव का अर्थ नौ तथा अर्ण का अर्थ अक्षर होता है। अतः नवार्ण नवों अक्षरों वाला वह मंत्र है, नवार्ण मंत्र 'ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै विच्चे' है। नौ अक्षरों वाले इस नवार्ण मंत्र के एक-एक अक्षर का संबंध दुर्गा की एक-एक शक्ति से है और उस एक-एक शक्ति का संबंध एक-एक ग्रह से है।नवार्ण मंत्र के नौ अक्षरों में पहला अक्षर ऐं है, जो सूर्य ग्रह को नियंत्रित करता है। ऐं का संबंध दुर्गा की पहली शक्ति शैल पुत्री से है, जिसकी उपासना 'प्रथम नवरात्र' को की जाती है। दूसरा अक्षर ह्रीं है, जो चंद्रमा ग्रह को नियंत्रित करता है। इसका संबंध दुर्गा की दूसरी शक्ति ब्रह्मचारिणी से है, जिसकी पूजा दूसरे नवरात्रि को होती है।इसी प्रकार तीसरा अक्षर क्लीं है, चौथा अक्षर चा, पाँचवाँ अक्षर मुं, छठा अक्षर डा, सातवाँ अक्षर यै, आठवाँ अक्षर वि तथा नौवा अक्षर चै है। जो क्रमशः मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु तथा केतु ग्रहों को नियंत्रित करता है।इन अक्षरों से संबंधित दुर्गा की शक्तियाँ क्रमशः चंद्रघंटा, कूष्माण्डा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी तथा सिद्धिदात्री हैं, जिनकी आराधना क्रमश : तीसरे, चौथे, पाँचवें, छठे, सातवें, आठवें तथा नौवें नवरात्रि को की जाती है। इस नवार्ण मंत्र के तीन देवता ब्रह्मा, विष्णु और महेश हैं तथा इसकी तीन देवियाँ महाकाली, महालक्ष्मी तथा महासरस्वती हैं, दुर्गा की ये नवो शक्तियाँ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चार पुरुषार्थों की प्राप्ति में भी सहायक होती हैं।नवार्ण मंत्र का जाप 108 दाने की माला पर कम से कम तीन बार अवश्य करना चाहिए। यद्यपि नवार्ण मंत्र नौ अक्षरों का ही है, परंतु विजयादशमी की महत्ता को ध्यान में रखते हुए, इस मंत्र के पहले ॐ अक्षर जोड़कर इसे दशाक्षर मंत्र का रूप दुर्गा सप्तशती में दे दिया गया है, लेकिन इस एक अक्षर के जुड़ने से मंत्र के प्रभाव पर कोई असर नहीं पड़ता। वह नवार्ण मंत्र की तरह ही फलदायक होता है। अतः कोई चाहे, तो दशाक्षर मंत्र का जाप भी निष्ठा और श्रद्धा से कर सकता है।

Wednesday, 25 March 2015

नवदुर्गा प्रश्नावली चक्र !!


चैत्र नवरात्रि का पर्व 21 मार्च, शनिवार से प्रारंभ हो चुका है। सभी चाहते हैं कि इन नौ दिनों में माता की कृपा उन्हें प्राप्त हो। इसके लिए हर भक्त अपने तरीके से माता की आराधना करता है। दरअसल नवरात्रि सिर्फ एक पर्व ही नहीं बल्कि इसमें जीवन प्रबंधन से जुड़े कई सूत्र भी छिपे हैं। आवश्यकता है तो बस उन्हें समझने की।चैत्र नवरात्रि के शुभ अवसर पर हम आपके लिए लाएं हैं नवदुर्गा प्रश्नावली चक्र। इसके माध्यम से आप अपने जीवन की परेशानियों व सवालों का हल आसानी से पा सकते हैं। नवदुर्गा प्रश्नावली चक्र की उपयोग विधि इस प्रकार है-
उपयोग विधि=
जिसे भी अपने सवालों का जवाब या परेशानियों का हल जानना है, वो पहले पांच बार ऊँ ऐं ह्लीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे मंत्र का जप करने के बाद 1 बार इस मंत्र का जाप करें-
या देवी सर्वभूतेषु मातृरुपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

इसके बाद आंखें बंद करके अपना सवाल पूछें और माता दुर्गा का स्मरण करते हुए प्रश्नावली चक्र पर कर्सर घुमाते हुए रोक दें। जिस कोष्ठक (खाने) पर कर्सर रुके, उस कोष्ठक में लिखे अंक के फलादेश को ही अपने अपने प्रश्न का उत्तर समझें।
अंक 1 से 15 तक का फलादेश इस प्रकार है-
1. धन लाभ होने के योग बन रहे हैं साथ ही मान-सम्मान भी मिलेगा।
2. धन हानि अथवा अन्य प्रकार का अनिष्ट होने की आशंका है।
3. किसी पुराने खास मित्र से मुलाकात हो सकती है, जिससे मन खुश होगा।
4. कोई रोग होने की संभावना बन रही है, इसलिए अभी कोई नया काम शुरू न करें।
5. जो भी कार्य आपने सोचा है, उसमें आपको सफलता मिलने के योग बन रहे हैं, निश्चिंत रहें।
6. आप जो काम करना चाहते हैं, उसे कुछ दिनों के लिए टाल दें। इसमें किसी से कलह अथवा कहासुनी हो सकती है, जिसके दूरगामी प्रभाव हो सकते हैं।
7. आपका अच्छा समय शुरू हो गया है। शीघ्र ही सुंदर एवं स्वस्थ पुत्र होने के योग हैं। इसके अतिरिक्त आपकी अन्य मनोकामनाएं भी पूर्ण हो सकती है।
8. जो विचार आपके मन है, उसे पूरी तरह त्याग दें। इस काम में बहुत परेशानी होने के योग बन रहे हैं।
9. समाज अथवा सरकार की दृष्टि में सम्मान बढ़ेगा। आपका सोचा हुआ कार्य अच्छा है।
10. जिस लाभ के बारे में आप सोच रहे हैं, वह जरूर मिलेगा। नया काम भी शुरू कर सकते हैं।
11. आप जिस कार्य के बारे में सोच रहे हैं, उसमें हानि की आशंका अधिक है। सोच-विचार कर ही कोई निर्णय लें।
12. आपकी मनोकामना पूर्ण होगी। पुत्र से भी आपको विशेष लाभ मिलेगा।
13. शनिदेव की उपासना करें, कार्य में आ रही बाधाएं दूर होंगी।
14. आपका अच्छा समय शुरू हो गया है। चिंताएं मिटेंगी, सुख-संपत्ति प्राप्त होगी।
15. आर्थिक तंगी के कारण ही आपके घर में सुख-शांति नहीं है। एक माह बाद स्थितियां बदलने लगेंगी, धैर्य एवं संयम रखें।

चैत्र नवरात्रिः इन उपायों से हो सकती है आपकी मनोकामना पूरी !!

इन दिनों चैत्र नवरात्रि का पर्व चल रहा है। नौ दिनों तक चलने वाले इस पर्व में माता के विभिन्न स्वरूपों की पूजा की जाती है और उन्हें प्रसन्न करने के लिए विभिन्न साधनाएं भी की जाती हैं। चैत्र नवरात्रि में मनचाही सफलता के लिए विशेष उपाय भी किए जाते हैं। मान्यता है कि नवरात्रि में किए गए उपाय जल्दी ही शुभ फल प्रदान कर सकते हैं।धन, नौकरी, स्वास्थ्य, संतान, विवाह, प्रमोशन आदि कई मनोकामनाएं इन 9 दिनों में किए गए उपायों से प्राप्त हो सकती है। अगर आपके मन में भी कोई मनोकामना है तो आगे बताए गए उपायों से वह पूरी हो सकती है। ये उपाय इस प्रकार हैं-
 
मनपसंद वर के लिए उपाय=
नवरात्रि के दौरान किसी भी दिन अपने आस-पास स्थित किसी शिव मंदिर में जाएं। वहां भगवान शिव एवं मां पार्वती पर जल एवं दूध चढ़ाएं और पंचोपचार (चंदन, पुष्प, धूप, दीप एवं नैवेद्य) से उनका पूजन करें। अब मौली (पूजा में उपयोग किया जाने वाला लाल धागा) से उन दोनों के मध्य गठबंधन करें। अब वहां बैठकर लाल चंदन की माला से इस मंत्र का जाप 108 बार करें-
हे गौरी शंकरार्धांगी। यथा त्वं शंकर प्रिया।
तथा मां कुरु कल्याणी, कान्त कान्तां सुदुर्लभाम्।।

इसके बाद तीन महीने तक रोज इसी मंत्र का जाप शिव मंदिर में अथवा अपने घर के पूजा कक्ष में मां पार्वती के सामने 108 बार करें। घर पर भी आपको पंचोपचार (देवता को गंध लगाना, फूल चढ़ाना, धूप दिखाना, दीपक से आरती उतारना व भोग अर्पित करना) पूजा करनी है।
 
शीघ्र विवाह के लिए उपाय=
नवरात्रि में भगवान शिव-पार्वती का एक चित्र अपने पूजास्थल में रखें और उनकी पूजा-अर्चना करने के बाद नीचे लिखे मंत्र का 3, 5 अथवा 10 माला जाप करें। जाप के बाद भगवान शिव से विवाह में आ रही बाधाओं को दूर करने की प्रार्थना करें-
मंत्र- ऊं शं शंकराय सकल-जन्मार्जित-पाप-विध्वंसनाय,
पुरुषार्थ-चतुष्टय-लाभाय च पतिं मे देहि कुरु कुरु स्वाहा।।

 
दांपत्य सुख के लिए उपाय=
यदि जीवनसाथी से अनबन होती रहती है तो नवरात्रि में रोज नीचे लिखे मंत्र को पढ़ते हुए 108 बार अग्नि में घी से आहुतियां दें। इससे यह मंत्र सिद्ध हो जाएगा। अब रोज सुबह उठकर पूजा के समय इस मंत्र को 21 बार पढ़ें। यदि संभव हो तो अपने जीवनसाथी से भी इस मंत्र का जाप करने के लिए कहें-
मंत्र =सब नर करहिं परस्पर प्रीति।
चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीति।।

 
धन लाभ के लिए उपाय=
नवरात्रि के दौरान किसी भी दिन सभी कार्यों से निवृत्त होकर उत्तर दिशा की ओर मुख करके पीले आसन पर बैठ जाएं। अपने सामने तेल के 9 दीपक जला लें। ये दीपक साधनाकाल (जब तक उपाय करते रहें) तक जलते रहने चाहिए। दीपक के सामने लाल चावल (चावल को रंग लें) की एक ढेरी बनाएं फिर उस पर एक श्रीयंत्र रखकर उसका कुंकुम, फूल, धूप, तथा दीप से पूजन करें।इसके बाद एक प्लेट पर स्वस्तिक बनाकर उसे अपने सामने रखकर पूजन करें। श्रीयंत्र को अपने पूजा स्थल पर स्थापित कर लें और शेष सामग्री को नदी में प्रवाहित कर दें। इस प्रयोग से आपको अचानक धन लाभ होने के योग बन सकते हैं।
 
मनचाही दुल्हन के लिए उपाय=
नवरात्रि के दौरान किसी भी दिन सुबह किसी शिव मंदिर में जाएं। वहां शिवलिंग पर दूध, दही, घी, शहद और शक्कर चढ़ाते हुए उसे अच्छी तरह से साफ करें। फिर शुद्ध जल चढ़ाएं और पूरे मंदिर में झाड़ू लगाकर उसे साफ करें। अब भगवान शिव की चंदन, पुष्प एवं धूप, दीप आदि से पूजा-अर्चना करें।
रात 10 बजे बाद अग्नि प्रज्वलित कर ऊं नम: शिवाय मंत्र का उच्चारण करते हुए घी से 108 आहुति दें। अब 40 दिनों तक रोज इसी मंत्र का पांच माला जाप शिवलिंग के सामने बैठकर करें। इससे शीघ्र ही आपकी मनोकामना पूर्ण होने के योग बनेंगे।
 
मोखिक परीछा में सफलता का उपाय=
नवरात्रि में किसी भी दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करने के बाद सफेद रंग का सूती आसन बिछाकर पूर्व दिशा की ओर मुख करके उस पर बैठ जाएं। अब अपने सामने पीला कपड़ा बिछाकर उस पर 108 दानों वाली स्फटिक की माला रख दें और इस पर केसर व इत्र छिड़क कर इसका पूजन करें।इसके बाद धूप, दीप और अगरबत्ती दिखाकर नीचे लिखे मंत्र का 31 बार उच्चारण करें। इस प्रकार 11 दिन तक करने से वह माला सिद्ध हो जाएगी। जब भी किसी इंटरव्यू में जाएं तो इस माला को पहन कर जाएं। ये उपाय करने से इंटरव्यू में सफलता की संभावना बढ़ सकती है।
मंत्र- ऊं ह्लीं वाग्वादिनी भगवती मम कार्य सिद्धि कुरु कुरु फट् स्वाहा।
 
बरकत बढ़ाने का उपाय=
नवरात्रि में किसी भी दिन सुबह स्नान कर साफ कपड़े में अपने सामने मोती शंख को रखें और उस पर केसर से स्वस्तिक का चिह्न बना दें। इसके बाद नीचे लिखे मंत्र का जाप करें-
श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्मयै नम:
मंत्र का जाप स्फटिक माला से ही करें। मंत्रोच्चार के साथ एक-एक चावल इस शंख में डालें। इस बात का ध्यान रखें की चावल टूटे हुए ना हो। इस प्रयोग नवरात्रि समाप्त होने तक करें। इस प्रकार रोज एक माला जाप करें। उन चावलों को एक सफेद रंग के कपड़े की थैली में रखें और नवरात्रि के बाद चावल के साथ शंख को भी उस थैली में रखकर तिजोरी में रखें। इस उपाय से घर की बरकत बढ़ सकती है।

Tuesday, 24 March 2015

तांबे के लोटे में पानी भरकर करें ये उपाय, भाग्योदय हो सकता है।

पुण्य और शुभ फल पाने के लिए कई परंपरागत उपाय आज भी प्रचलित हैं। सर्वाधिक प्रचलित उपायों में से एक उपाय है देवी-देवताओं को जल अर्पित करना। यदि आपके घर के आसपास कोई मंदिर नहीं है या आप मंदिर जा नहीं पाते हैं, तो घर के मंदिर में इष्टदेवी-देवताओं की मूर्तियों पर हर रोज जल अर्पित करें। देवी-देवताओं पर जल चढ़ाने के साथ ही एक लोटा पानी अपनी राशि से संबंधित वृक्ष को अर्पित करें। ऐसा करेंगे तो कुंडली के दोषों का निवारण हो जाएगा। भाग्योदय में आ रही बाधाएं दूर हो सकती हैं और धन संबंधी परेशानियां समाप्त हो सकती हैं। ज्योतिष में सभी ग्रहों के लिए अलग-अलग वृक्ष बताए गए हैं। इन वृक्षों की विधि-विधान से पूजा करने पर कुंडली में स्थित सभी नौ ग्रहों के दोष दूर होते हैं। यदि आप विधिवत पूजा नहीं करवा पा रहे हैं तो प्रतिदिन केवल एक लोटा जल अपनी राशि से संबंधित वृक्ष में चढ़ाएं। ऐसा करने पर भी आपको सकारात्मक फल प्राप्त होंगे। जल चढ़ाने के लिए तांबे के लोटे का इस्तेमाल करना चाहिए।

राशि अनुसार इन पेड़ों को करें एक लोटा जल अर्पित...
मेष एवं वृश्चिक- खैर
वृषभ एवं तुला- गूलर
मिथुन एवं कन्या- अपामार्ग
कर्क- पलाश
सिंह- आंकड़े का पौधा
धनु एवं मीन- पीपल
मकर एवं कुंभ- शमी
विशेष = इन्हीं पेड़ों की लकड़ियों से संबंधित राशि के ग्रह स्वामी की शांति हेतु हवन भी किया जाता है।

कुण्डली में पितृ दोष बनने के कारण !1

पाप कर्मों का अशुभ फल : 
जो लोग पाप कर्म करते है ऐसे व्यक्तियों को अगले जन्म-जन्मांतर तक मृत्यु बाद भी नाम लेने वाला, तर्पण या शुभगति करने वाला कोई नहीं होता क्योंकि पितृदोष के कारण संतान नाश का श्राप भोगना पड़ता है। ऐसे लोगों द्वारा बाहुबल से अर्जित सम्पत्ति का कोई वारिस भी नहीं होता। संतानहीनता के आगे अन्य सभी दुख कष्ट कम पड़ जाते हैं।ऐसे जातक को प्रकट फल के रूप में संतान जन्म न लेना, जन्म लेकर मर जाना, संतान लगातार बीमार रहना, दुराचारी और कुलनाशक संतान होना आदि अशुभ फल मिलते हैं।
शांति के उपाय : ईश्वर आराधना, जप, तप, दान।

निम्रलिखित दुष्कर्म (पापकर्म) पितृऋण बनकर संतानहीनता का दुर्भाग्य देते हैं :
* पिता, चाचा, श्वसुर का घोर अपमान, उनसे कटु वचन कहना, उनकी अवहेलना करना, वृद्धावस्था, बीमारी में उनका पालन पोषण न करना, उन्हें घर से निकाल देना।
* माता, चाची, सास आदि का अनादर करना, उन पर अत्याचार करना, सब कुछ छीन कर निकाल देना।
* मृत्यु के बाद माता-पिता का उनकी संतानों, संबंधियों, आश्रितों द्वारा कर्म-धर्म के अनुसार विधिपूर्वक अंत्येष्टि, श्राद्ध, तर्पण आदि न करना।
* भाई, जीजा, साला आदि के साथ अनुचित व्यवहार करना, उनके बाल-बच्चों का हक मारकर उन्हें लावारिस बना देना।
* धोखे से प्रेमिका का शील हरण करना, विवाह न करके उसे निराश्रित छोड़ देना, आत्महत्या के लिए विवश करना या हत्या कर देना।
* मामा, मौसी को या उनकी संतान को सताना।
* ससुराल पक्ष के लोगों को सताना।
* गर्भपात करवाना, गर्भवती स्त्री अथवा प्राणी की हत्या करना।
* ब्राह्मण, साधु, महात्मा अथवा फकीरों के धार्मिक कार्यों में व्यवधान खड़ा करना, धर्म की, ईश्वर की, देवी-देवताओं की निंदा करना, मजाक उड़ाना, मूर्तियां खंडित करना अथवा अपमानित करना, नास्तिक विचार रखना।
* पीपल, बरगद, हरे-भरे फलदार वृक्षों को काटकर क्षति पहुंचाना।
* निरीह जीवों पशु, पक्षियों आदि की व्यर्थ सामूहिक हत्या करना, उनके बच्चों, अंडों का नाश करना।
* सर्प मारना।
* निर्धन मजदूरों से बेगार कराना, उनकी सम्पत्ति, खेत फसल छीनना, नष्ट करना, उनकी महिलाओं, बच्चों से अनाचार करना।

Wednesday, 18 March 2015

हिंदू नववर्ष 21 से, किस राशि पर कैसा रहेगा शनि का असर !!

 21 मार्च, शनिवार से हिंदू नव वर्ष विक्रम संवत्सर 2072 प्रारंभ हो रहा है। ज्योतिषियों के अनुसार इस संवत्सर का नाम कीलक है। इस संवत्सर के राजा शनिदेव व मंत्री मंगल हैं। खास बात यह है कि इस हिंदू नव वर्ष का प्रारंभ भी शनिवार से ही हो रहा है। इस वर्ष का राजा शनि होने से इस पर शनि का विशेष प्रभाव देखने को मिलेगा। वर्तमान में शनि वृश्चिक राशि में वक्रीय स्थिति में है, जो 2 अगस्त को पुन: मार्गी हो जाएगा। विक्रम संवत्सर 2072 में शनि किस राशि पर क्या असर डालेगा, ये आप को हम बताते है !!
मेष राशि
विक्रम संवत्सर में शनिदेव आपकी राशि से आठवे स्थान में चलायमान रहेंगे। शनि की ढय्या आपको चल रही है। अष्टम शनि के प्रभाव से शत्रु पीड़ा पहुंचाएंगे। अष्टम शनि जहां एक ओर स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं रहेगा। वहीं, दूसरी ओर दशम भाव पर दृष्टि भी व्यवसाय व नौकरी में उतार-चढ़ाव की स्थिति निर्मित करेगा। नौकरी व व्यवसाय में लक्ष्य प्राप्ति बहुत कठिनता से होगी।2 अगस्त तक शनि वक्र स्थिति में रहेगा, इस दौरान कोई बड़ी हानि हो सकती है। परिवार में या किसी नजदीकी रिश्तेदार या मित्र की क्षति भी संभव है। कोई काम होते-होते रह जाएगा। संपत्ति से संबंधित विवाद भी हो सकते हैं। शनि की पंचम स्थान पर दृष्टि संतान के प्रति चिंता बढ़ाएगी। अधिकारी आपके काम से नाखुश रहेंगे।
उपाय
1. सवा पांच रत्ती का नीलम या उपरत्न (नीली) सोना, चांदी या तांबे की अंगूठी में अभिमंत्रित करवा कर धारण करें।
2. शनि यंत्र के साथ नीलम या फिरोजा रत्न गले में लॉकेट की आकृति में पहन सकते हैं, यह उपाय भी उत्तम है।
3. किसी भी विद्वान ब्राह्मण से या स्वयं शनि के मंत्रों के 23000 जाप करें या करवाएं। ये है शनि का मंत्र-
ऊं प्रां प्रीं स: श्नैश्चराय नम:
4. शनिवार को व्रत रखें। चींटियों को आटा डालें।
5. जूते, काले कपड़े, मोटा अनाज व लोहे के बर्तन दान करें।


वृषभ राशि- 
विक्रम संवत्सर 2072 में शनिदेव आपकी राशि से गोचरवश सातवे स्थान पर गतिशील रहेंगे। इसके कारण आपके स्वास्थ्य में सुधार रहेगा, लेकिन परिवार में किसी को रोग होने की संभावना बन सकती है, जिसके कारण आप चिंतित रहेंगे। इस साल परिवार के लोगों में विवाद बढ़ेंगे। पति-पत्नी के बीच भी दूरियां बढ़ सकती हैं। व्यापार व नौकरी के लिए ये साल ठीक रह सकता है। इस साल आपको लाभ के प्रबल योग बन रहे हैं।नौकरी व कार्यक्षेत्र में सहकर्मी आपके काम की प्रशंसा करेंगे, वहीं बॉस व अधिकारी भी आपके काम से खुश रहेंगे। घर-परिवार में किसी बुजुर्ग सदस्य का गिरता हुआ स्वास्थ्य आपकी चिंता का कारण बन सकता है। किसी पर जरूरत से ज्यादा भरोसा हानि का कारण बन सकता है। शनि की वक्र स्थिति (2 अगस्त तक) में कोई भी निर्णय बड़ी सोच-समझकर लें। पैरों से संबंधित कष्ट हो सकते हैं।
उपाय
1. शनिवार को काले घोड़े की नाल या समुद्री नाव की कील से लोहे की अंगूठी बनवाएं। उसे तिल्ली के तेल में सात दिन शनिवार से शनिवार तक रखें तथा उस पर शनि मंत्र के 23000 जाप करें। शनिवार के दिन शाम के समय इसे धारण करें।
2. यह अंगूठी मध्यमा (शनि की अंगुली) में ही पहनें तथा इसके लिए पुष्य, अनुराधा, उत्तरा, भाद्रपद एवं रोहिणी नक्षत्र सर्वश्रेष्ठ है।
3. किसी भी विद्वान ब्राह्मण से या स्वयं शनि के मंत्रों के 23000 जाप करें या करवाएं।
मंत्र- ऊँ ऐं ह्लीं श्रीशनैश्चराय नम:।

मिथुन राशि-
 विक्रम संवत्सर 2072 मिथुन राशि वालों के लिए उन्नति प्रदान करने वाला रहेगा। साल भर छठे भाव में शनि की स्थिति से शत्रु व षडय़ंत्र करने वाले परास्त हो जाएंगे। इस साल आपको कई उपलब्धियां मिलेंगी। मिथुन राशि के लोग इस साल जी-तोड़ मेहनत करेंगे और उसका फल भी उन्हें मिलेगा। व्यापार बढ़ाने की जो योजना आप बना रहे थे, उसे पूरा करने का समय अब आ गया है। नौकरी व कार्यक्षेत्र में भी आपको आगे बढऩे के अवसर मिलेंगे। बॉस व अधिकारी आपके काम से खुश रहेंगे। 2 अगस्त तक शनि की वक्र स्थिति में परिवार के किसी बुजुर्ग सदस्य के स्वास्थ्य को लेकर चिंता रहेगी। अगस्त के बाद धन का निवेश करेंगे, उसका फायदा आपको आगे जाकर मिलेगा। अगस्त के बाद का समय घर-परिवार के लिए भी सुख-समृद्धि देने वाला रहेगा।
उपाय
1. शनि के दुष्प्रभाव को कम करने के लिए 7 प्रकार के अनाज व दालों को मिश्रित करके पक्षियों को चुगाएं।
2. बैंगनी रंग का सुगंधित रूमाल अपने पास रखें।
3. शनिदेव के सामने खड़े रहकर दर्शन न करें, एक ओर खड़े रहकर दर्शन करें, जिससे की शनिदेव की दृष्टि सीधे आप पर नहीं पड़े।
4. सवा पांच रत्ती का नीलम या उपरत्न (नीली) सोना, चांदी या तांबे की अंगूठी में अभिमंत्रित करवा कर धारण करें।

कर्क राशि- 
विक्रम संवत्सर 2072 में शनि का परिभ्रमण आपकी राशि में पंचम स्थान में रहेगा। इसलिए ये साल आपके लिए उन्नति देने वाला रहेगा। मित्र व सहयोगी आपके काम में सहायता करेंगे। नौकरी व व्यवसाय में नई तकनीक व हुनर का इस्तेमाल कर आप अपनी महत्वाकांक्षा पूरी करेंगे। कार्यक्षेत्र में आपको नए अवसर मिलने की पूरी-पूरी संभावना बन रही है।नौकरी में प्रमोशन भी हो सकता है। कर्क राशि के विद्यार्थियों को इस समय पूरा ध्यान अपनी पढ़ाई पर लगाना चाहिए। पति-पत्नी के बीच संबंध मधुर होंगे। भाइयों में विवाद संभव है। स्वास्थ्य भी अपेक्षाकृत ठीक ही रहेगा। खान-पान पर विशेष ध्यान रखें। क्रोध व आवेश में आकर कोई गलत कदम न उठाएं। शत्रु व षडयंत्रकारियों से सावधान रहें।
उपाय
1. प्रत्येक शनिवार को शाम के समय बड़ (बरगद) और पीपल के पेड़ के नीचे सूर्योदय से पहले स्नान आदि करने के बाद सरसों के तेल का दीपक लगाएं और दूध एवं धूप आदि अर्पित करें।
2. काले धागे में बिच्छू घास की जड़ को अभिमंत्रित करवा कर शनिवार के दिन श्रवण नक्षत्र में या शनि जयंती के शुभ मुहूर्त में धारण करने से भी शनि संबंधी सभी कार्यों में सफलता मिलती है।

3. शनिवार को इन 10 नामों से शनिदेव का पूजन करें-
कोणस्थ पिंगलो बभ्रु: कृष्णो रौद्रोन्तको यम:।
सौरि: शनैश्चरो मंद: पिप्पलादेन संस्तुत:।।
अर्थात: 1- कोणस्थ, 2- पिंगल, 3- बभ्रु, 4- कृष्ण, 5- रौद्रान्तक, 6- यम, 7, सौरि, 8- शनैश्चर, 9- मंद व 10- पिप्पलाद। इन दस नामों से शनिदेव का स्मरण करने से सभी शनि दोष दूर हो जाते हैं।

सिंह राशि- 
विक्रम संवत्सर 2072 में शनि की ढय्या का प्रभाव आपकी राशि पर रहेगा। इसलिए ये साल आपके लिए अच्छा नहीं कहा जा सकता। व्यापार व कार्यक्षेत्र में हानि के योग बन रहे हैं। कोई नया काम करने की योजना बनेगी, लेकिन बात बनते-बनते रुक जाएगी। इस साल बॉस की नाराजगी का खामियाजा आपको उठाना पड़ सकता है। इसलिए अपना काम मन लगाकर करते रहे। हालांकि पारिवारिक दृष्टिकोण से समय अनुकूल है।घर-परिवार के लोग मुश्किल समय में आपका साथ देंगे। विद्यार्थी मन लगाकर सिर्फ पढ़ाई पर ध्यान दें। संतान का व्यवहार, अध्ययन, विवाह आदि आपकी चिंता का कारण रहेगा। कामकाज की भागदौड़ में स्वास्थ्य का ध्यान रखें। वाहन का प्रयोग सावधानी से करें। व्यापार में निवेश से पहले अच्छी तरह से सोच लें।
उपाय
1. काली गाय की सेवा करने से शनिदेव प्रसन्न होते हैं। उसके शीश पर रोली लगाकर सींगों में कलावा बांधकर धूप-आरती करनी चाहिए। फिर परिक्रमा करके गाय को बूंदी के चार लड्डू खिला दें।
2. हर शनिवार उपवास रखें। सूर्यास्त के बाद हनुमानजी का पूजन करें। पूजन में सिंदूर, काली तिल्ली का तेल, इस तेल का दीपक एवं नीले रंग के फूल का प्रयोग करें।
3. सवा पांच रत्ती का नीलम या उपरत्न(नीली) सोना, चांदी या तांबे की अंगूठी में अभिमंत्रित करवा कर धारण करें।
4. जूते, काले कपड़े, मोटा अनाज व लोहे के बर्तन दान करें।

कन्या राशि- 
विक्रम संवत्सर 2072 कन्या राशि वालों के लिए अनुकूल फल देने वाला रहेगा। हालांकि स्वास्थ्य को लेकर चिंता जरूर रहेगी, पुराने रोग फिर से उभर सकते हैं। नौकरी व व्यापार में स्थितियां आपके पक्ष में रहेंगी। व्यापार में कोई बड़ा फायदा होने के योग बन सकते हैं। आर्थिक स्थिति पहले से बेहतर रहेगी। पैसों की आवक बनी रहेगी। घर-परिवार में हालात संतोषजनक रहेंगे। पति-पत्नी में आपसी सामंजस्य बना रहेगा।नौकरी में कोई महत्वपूर्ण पद या कार्य आपको मिल सकता है। कुछ लोग आपकी तरक्की से जलकर षडय़ंत्र रच सकते हैं इसलिए बचकर रहें तो बेहतर रहेगा। माता-पिता के स्वास्थ्य को लेकर चिंता बनी रहेगी। इस वर्ष यात्राओं के योग बन रहे हैं। ये यात्राएं परेशानी बढ़ाने वाली रहेगी। विद्यार्थियों के लिए समय अनुकूल रहेगा।
उपाय
1. शनिवार को बंदरों और काले कुत्तों को लड्डू खिलाने से भी शनि का कुप्रभाव कम हो जाता है अथवा काले घोड़े की नाल या नाव में लगी कील से बना छल्ला धारण करें।
2. शुक्रवार की रात काले चने पानी में भिगो दे। शनिवार को ये चने, कच्चा कोयला, हल्की लोहे की पत्ती एक काले कपड़े में बांधकर मछलियों के तालाब में डाल दें। यह टोटका पूरा एक साल करें। इस दौरान भूल से भी मछली का सेवन न करें।
3. किसी भी विद्वान ब्राह्मण से या स्वयं शनि के मंत्रों के 23000 जाप करें या करवाएं। ये है शनि का मंत्र-
ऊँ प्रां प्रीं स: श्नैश्चराय नम:
4. शनिवार को व्रत रखें। चींटियों को आटा डालें।

तुला राशि- 
शनि की साढ़ेसाती का प्रभाव विक्रम संवत्सर 2072 में तुला राशि पर साफ-साफ दिखाई दे रहा है। इस साल स्वास्थ्य को लेकर आपकी परेशानियां बढ़ सकती हैं। साथ ही, धन भाव में शनि की स्थिति के कारण धन नाश के योग भी बन रहे हैं। नौकरी व व्यापार में भी स्थिति अनुकूल नहीं रहेगी। प्रत्येक काम में अड़चन आएगी और निराशा हाथ लगेगी।नौकरीपेशा लोग सावधान रहें, शत्रु आपके विरुद्ध षडय़ंत्र रच सकते हैं या झूठा आरोप लगा सकते हैं। घर-परिवार में खुशहाली रहेगी, पारिवारिक दृष्टिकोण से यह साल अच्छा रहेगा। विपरीत परिस्थिति में घर वाले आपकी हरसंभव मदद करेंगे। स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए योग-व्यायाम करेंगे तो ठीक रहेगा। वाहन सावधानी से चलाएं।
उपाय
1. शनिवार को सवा-सवा किलो काले चने अलग-अलग तीन बर्तनों में भिगो दें। इसके बाद नहाकर, साफ वस्त्र पहनकर शनिदेव का पूजन करें और चनों को सरसों के तेल में छौंक कर इनका भोग शनिदेव को लगाएं और अपनी समस्याओं के निवारण के लिए प्रार्थना करें।
इसके बाद पहला सवा किलो चना भैंसे को खिला दें। दूसरा सवा किलो चना कुष्ट रोगियों में बांट दें और तीसरा सवा किलो चना अपने ऊपर से उतारकर किसी सुनसान स्थान पर रख आएं। इस टोटके को करने से शनिदेव के प्रकोप में अवश्य कमी होगी।
2. सवा किलो काला कोयला, एक लोहे की कील एक काले कपड़े में बांधकर अपने सिर पर से घुमाकर बहते हुए जल में प्रवाहित कर दें।

 वृश्चिक राशि- 
वृश्चिक राशि वालों को विक्रम संवत्सर 2072 में शनि की साढ़ेसाती का प्रभाव रहेगा। नौकरी व व्यापार में संघर्ष की स्थिति बन सकती है। लक्ष्यों को पूरा करने का दबाव आप पर बना रहेगा। आप जी-तोड़ मेहनत करने के बाद भी अपने अधिकारियों को खुश नहीं कर पाएंगे। 2 अगस्त तक शनि वक्रीय होकर स्वास्थ्य संबंधित परेशानियां उत्पन्न करेगा।पारिवारिक दृष्टि से ये साल आपके लिए ठीक रहेगा। परिवार में मांगलिक प्रसंग हो सकता है। नौकरी में बॉस के साथ तालमेल का अभाव रह सकता है। विरोधियों से सावधान रहें तो बेहतर रहेगा। व्यापार में निवेश करते समय सोच-समझकर निर्णय लें। फिजूलखर्ची पर नियंत्रण रखें। जितनी मेहनत करेंगे, फल उतना नहीं मिलने से परेशान रहेंगे।
उपाय
1. शनिवार को शनि यंत्र की स्थापना व पूजन करें। इसके बाद प्रतिदिन इस यंत्र की विधि-विधान पूर्वक पूजा करने से शनिदेव प्रसन्न होते हैं। प्रतिदिन यंत्र के सामने सरसों के तेल का दीप जलाएं। नीला या काला पुष्प चढ़ाएं ऐसा करने से लाभ होगा।
2. शनिवार या शनि जयंती के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर कुश (एक प्रकार की घास) के आसन पर बैठ जाएं। सामने शनिदेव की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें व उसकी पंचोपचार से विधिवत पूजन करें। इसके बाद रूद्राक्ष की माला से नीचे लिखे किसी एक मंत्र की कम से कम पांच माला जाप करें तथा शनिदेव से सुख-संपत्ति के लिए प्रार्थना करें। यदि प्रत्येक शनिवार को इस मंत्र का इसी विधि से जाप करेंगे तो शीघ्र लाभ होगा।

वैदिक मंत्र-
ऊँ शन्नोदेवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये शन्योरभिस्त्रवन्तु न:।

धनु राशि- 
विक्रम संवत्सर 2072 में धनु राशि पर शनि की साढ़ेसाती का प्रभाव रहेगा, जिसके चलते स्वास्थ्य में निराशा व नकारात्मकता रहेगी। कोई पुराना रोग फिर से उभर सकता है। नौकरी व व्यापार में स्थितियां आपके पक्ष में नहीं रहेंगी। बिजनेस पार्टनर आपको धोखा दे सकता है। कर्मचारियों की गतिविधियों पर नजर रखें। मित्र व सहयोगी आपकी सहायता करेंगे। घर के किसी सदस्य का स्वास्थ्य कमजोर हो सकता है।आप जी-तोड़ मेहनत करेंगे, लेकिन परिणाम आपके पक्ष में नहीं रहेंगे। अगर आप व्यापार बढ़ाने के बारे में सोच रहें हैं तो इसमें परेशानियां आएंगी। आर्थिक स्थिति भी कमजोर रहेगी। किसी से कर्ज लेना पड़ सकता है। कुल मिलाकर शनि की साढ़ेसाती का प्रभाव व्यापार, नौकरी, घर-परिवार, स्वास्थ्य सभी पर दिखाई देगा।
उपाय
1. शनिवार के दिन किसी हनुमान मंदिर में जाकर हनुमान चालीसा का पाठ करें और शनि दोष की शांति के लिए हनुमानजी से प्रार्थना करें। बूंदी के लड्डू का भोग भी लगाएं।
2. शनिवार को 11 साबूत नारियल बहते हुए जल में प्रवाहित करें और शनिदेव से जीवन को सुखमय बनाने के लिए प्रार्थना करें।
3. प्रत्येक शनिवार को शाम के समय बड़ (बरगद) और पीपल के पेड़ के नीचे सूर्योदय से पहले स्नान आदि करने के बाद सरसों के तेल का दीपक लगाएं और दूध एवं धूप आदि अर्पित करें।
4. सवा पांच रत्ती का नीलम या उपरत्न(नीली) सोना, चांदी या तांबे की अंगूठी में अभिमंत्रित करवा कर धारण करें।

मकर राशि- 
विक्रम संवत्सर 2072 मकर राशि वालों के लिए उन्नति देने वाला रहेगा। इस साल आपको कोई शुभ समाचार भी मिल सकता है। शनि इस वर्ष आपकी राशि में एकादश स्थान में गतिशील रहेंगे। 2 अगस्त तक शनि वक्र स्थिति में आपके लिए परेशानी खड़ी कर सकता है। इस दौरान वाहन सावधानी से चलाएं।स्वास्थ्य की दृष्टि से यह साल आपके लिए अपेक्षाकृत ठीक रहेगा। व्यापार में भी अति विश्वास हानि का कारण बन सकता है। मित्रों व सहयोगियों का इस साल आपको सहयोग मिलेगा। शत्रु भी आपके आगे टिक नहीं पाएंगे। हालांकि साल भर पैसों का उतार-चढ़ाव बना रहेगा। घर-परिवार का वातावरण आपके अनुकूल रहेगा।
उपाय
1. शमी वृक्ष की जड़ को विधि-विधान पूर्वक घर लेकर आएं। शनिवार के दिन श्रवण नक्षत्र में या शनि जयंती के दिन किसी योग्य विद्वान से अभिमंत्रित करवा कर काले धागे में बांधकर गले या बाजू में धारण करें। शनिदेव प्रसन्न होंगे तथा शनि के कारण जितनी भी समस्याएं हैं, उनका निदान होगा।
2. काले धागे में बिच्छू घास की जड़ को अभिमंत्रित करवा कर शनिवार के दिन श्रवण नक्षत्र में या शनि जयंती के शुभ मुहूर्त में धारण करने से भी शनि संबंधी सभी कार्यों में सफलता मिलती है।
3. शनिवार को इन10 नामों से शनिदेव का पूजन करें-
कोणस्थ पिंगलो बभ्रु: कृष्णो रौद्रोन्तको यम:।
सौरि: शनैश्चरो मंद: पिप्पलादेन संस्तुत:।।
अर्थात: 1- कोणस्थ, 2- पिंगल, 3- बभ्रु, 4- कृष्ण, 5- रौद्रान्तक, 6- यम, 7, सौरि, 8- शनैश्चर, 9- मंद व 10- पिप्पलाद। इन दस नामों से शनिदेव का स्मरण करने से सभी शनि दोष दूर हो जाते हैं।

 कुंभ राशि- 
विक्रम संवत्सर 2072 में शनि आपकी राशि से दसवें भाव में चलायमान रहेगा। शनि का यह परिभ्रमण आपके लिए शुभ फल देने वाला रहेगा। इस साल आपके आय के स्त्रोत बढ़ सकते हैं। व्यापार बढ़ाने की जो योजना आप काफी समय से बना रहे हैं, उसे साकार करने का समय आ गया है। आर्थिक रूप से भी यह साल आपके लिए अच्छा ही रहेगा।इस साल मित्र आपको भरपूर सहयोग देंगे। शनि की वक्र स्थिति (2 अगस्त तक) में कोई बुरा समाचार मिल सकता है। इस दौरान स्वास्थ्य का भी ध्यान रखें। सरकारी नौकरी वाले लोगों को काम में लापरवाही बरतने पर नुकसान हो सकता है। विद्यार्थियों के लिए भी इस साल सफलता का कोई विशेष योग नहीं बन रहे हैं।
उपाय
1. शनिवार को बंदरों और काले कुत्तों को लड्डू खिलाने से भी शनि का कुप्रभाव कम हो जाता है अथवा काले घोड़े की नाल या नाव में लगी कील से बना छल्ला धारण करें।
2. शनि यंत्र के साथ नीलम या फिरोजा रत्न गले में लॉकेट की आकृति में पहन सकते हैं, यह उपाय भी उत्तम है।
3. बैंगनी रंग का सुगंधित रूमाल अपने पास रखें।
4. शनिदेव के सामने खड़े रहकर दर्शन न करें, एक ओर खड़े रहकर दर्शन करें, जिससे की शनिदेव की दृष्टि सीधे आप पर नहीं पड़े।
5. शनिवार को हनुमानजी को चोला चढ़ाएं। चोले में सरसों या चमेली के तेल का उपयोग करें और इन तेलों से ही दीपक भी जलाएं।

 मीन राशि- 
विक्रम संवत्सर 2072 में शनि आपकी राशि से नवम भाव में चलायमान रहेगा। भाग्योदय व उन्नति के अवसर आपको इस साल मिल सकते हैं। जो काम आप हाथ में लेंगे, उसे पूरा करके ही दम लेंगे। इस साल परिश्रम के साथ-साथ भाग्य भी आपका साथ दे रहा है। व्यापार में विस्तार को जो योजना आपने बनाई है, वह पूरी हो सकती है।नौकरी में आगे बढऩे के अवसर मिलेंगे। अधिकारी भी आपके काम से खुश होंगे। इस साल आप किसी महत्वपूर्ण कार्य की योजना बनाएंगे। शनि की वक्र स्थिति (2 अगस्त तक) के दौरान शत्रु आपके विरुद्ध षडय़ंत्र रच सकते हैं। स्वास्थ्य व पारिवारिक सुख की दृष्टि से भी यह साल आपके लिए शुभ रहेगा। मित्रों से सहयोग मिलेगा।
उपाय
1. चोकर युक्त आटे की 2 रोटी लेकर एक पर तेल और दूसरी पर घी दें। घी वाली रोटी पर थोड़ा मिष्ठान रखकर काली गाय को खिला दें तथा दूसरी रोटी काले कुत्ते को खिला दें और शनिदेव का स्मरण करें।
2. शनिवार को एक कांसे की कटोरी में तिल का तेल भर कर उसमें अपना मुख देख कर और काले कपड़े में काले उड़द, सवा किलो अनाज, दो लड्डू, फल, काला कोयला और लोहे की कील रख कर डाकोत(शनि का दान लेने वाला) को दान कर दें।
3. शनिवार को किसी हनुमान मंदिर में जाकर हनुमान चालीसा का पाठ करें और शनि दोष की शांति के लिए हनुमानजी से प्रार्थना करें। बूंदी के लड्डू का भोग भी लगाएं।
4. शनिवार को 11 साबूत नारियल बहते हुए जल में प्रवाहित करें और शनिदेव से जीवन को सुखमय बनाने के लिए प्रार्थना करें।
5. किसी भी विद्वान ब्राह्मण से या स्वयं शनि के मंत्रों के 23000 जाप करें या करवाएं। ये है शनि का मंत्र-
ऊँ प्रां प्रीं स: श्नैश्चराय नम:


Friday, 6 March 2015

माता बगलामुखी मुखी के कुछ चुने हुये मंत्र !!


अब नीचे लिखे मंत्र का हल्दी की माला जप करें-
 
गायत्री मंत्र- ऊँ ह्लीं ब्रह्मास्त्राय विद्महे स्तम्भनबाणाय धीमहि। तन्नो बगला प्रचोदयात्।।
 

अष्टाक्षर गायत्री मंत्र- ऊँ ह्रीं हं स: सोहं स्वाहा। हंसहंसाय विद्महे सोहं हंसाय धीमहि। तन्नो हंस: प्रचोदयात्।।
 

अष्टाक्षर मंत्र- ऊँ आं ह्लीं क्रों हुं फट् स्वाहा
 
त्र्यक्षर मंत्र- ऊँ ह्लीं ऊँ
 
नवाक्षर मंत्र- ऊँ ह्लीं क्लीं ह्लीं बगलामुखि ठ:
 

एकादशाक्षर मंत्र- ऊँ ह्लीं क्लीं ह्लीं बगलामुखि स्वाहा।
ऊँ ह्ल्रीं हूं ह्लूं बगलामुखि ह्लां ह्लीं ह्लूं सर्वदुष्टानां ह्लैं ह्लौं ह्ल: वाचं मुखं पदं स्तम्भय स्तम्भय ह्ल: ह्लौं ह्लैं जिह्वां कीलय ह्लूं ह्लीं ह्लां बुद्धिं विनाशाय ह्लूं हूं ह्लीं ऊँ हूं फट्।

षट्त्रिंशदक्षरी मंत्र- ऊँ ह्ल्रीं बगलामुखि सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तम्भय जिह्वां कीलय बुद्धिं विनाशय ह्लीं ऊँ स्वाहा।

1) भय नाशक मंत्र—–
अगर आप किसी भी व्यक्ति वस्तु परिस्थिति से डरते है और अज्ञात डर सदा आप पर हावी रहता है तो देवी के भय नाशक मंत्र का जाप करना चाहिए…
ॐ ह्लीं ह्लीं ह्लीं बगले सर्व भयं हन
पीले रंग के वस्त्र और हल्दी की गांठें देवी को अर्पित करें…
पुष्प,अक्षत,धूप दीप से पूजन करें…
रुद्राक्ष की माला से 6 माला का मंत्र जप करें…
दक्षिण दिशा की और मुख रखें….


2) शत्रु नाशक मंत्र—-
अगर शत्रुओं नें जीना दूभर कर रखा हो, कोर्ट कचहरी पुलिस के चक्करों से तंग हो गए हों, शत्रु चैन से जीने नहीं दे रहे, प्रतिस्पर्धी आपको परेशान कर रहे हैं तो देवी के शत्रु नाशक मंत्र का जाप करना चाहिए….
ॐ बगलामुखी देव्यै ह्लीं ह्रीं क्लीं शत्रु नाशं कुरु
नारियल काले वस्त्र में लपेट कर बगलामुखी देवी को अर्पित करें….
मूर्ती या चित्र के सम्मुख गुगुल की धूनी जलाये ….
रुद्राक्ष की माला से 5 माला का मंत्र जप करें…
मंत्र जाप के समय पश्चिम कि ओर मुख रखें….


3) जादू टोना नाशक मंत्र—-
यदि आपको लगता है कि आप किसी बुरु शक्ति से पीड़ित हैं, नजर जादू टोना या तंत्र मंत्र आपके जीवन में जहर घोल रहा है, आप उन्नति ही नहीं कर पा रहे अथवा भूत प्रेत की बाधा सता रही हो तो देवी के तंत्र बाधा नाशक मंत्र का जाप करना चाहिए….
ॐ ह्लीं श्रीं ह्लीं पीताम्बरे तंत्र बाधाम नाशय नाशय
आटे के तीन दिये बनाये व देसी घी ड़ाल कर जलाएं….
कपूर से देवी की आरती करें….
रुद्राक्ष की माला से 7 माला का मंत्र जप करें…
मंत्र जाप के समय दक्षिण की और मुख रखे….

4) प्रतियोगिता नोकरी में सफलता का मंत्र—–
आपने कई बार इंटरवियु या प्रतियोगिताओं को जीतने की कोशिश की होगी और आप सदा पहुँच कर हार जाते हैं, आपको मेहनत के मुताबिक फल नहीं मिलता, किसी क्षेत्र में भी सफल नहीं हो पा रहे, तो देवी के साफल्य मंत्र का जाप करें….
ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं बगामुखी देव्यै ह्लीं साफल्यं देहि देहि स्वाहा:
बेसन का हलवा प्रसाद रूप में बना कर चढ़ाएं…
देवी की प्रतिमा या चित्र के सम्मुख एक अखंड दीपक जला कर रखें…
रुद्राक्ष की माला से 8 माला का मंत्र जप करें…
मंत्र जाप के समय पूर्व की और मुख रखें…


5) बच्चों की रक्षा का मंत्र—-
यदि आप बच्चों की सुरक्षा को ले कर सदा चिंतित रहते हैं, बच्चों को रोगों से, दुर्घटनाओं से, ग्रह दशा से और बुरी संगत से बचाना चाहते हैं तो देवी के रक्षा मंत्र का जाप करना चाहिए.. .
ॐ हं ह्लीं बगलामुखी देव्यै कुमारं रक्ष रक्ष
देवी माँ को मीठी रोटी का भोग लगायें…
दो नारियल देवी माँ को अर्पित करें…
रुद्राक्ष की माला से 6 माला का मंत्र जप करें….
मंत्र जाप के समय पश्चिम की ओर मुख रखें…


6) लम्बी आयु का मंत्र—-
यदि आपकी कुंडली कहती है कि अकाल मृत्यु का योग है, या आप सदा बीमार ही रहते हों, अपनी आयु को ले कर परेशान हों तो देवी के ब्रह्म विद्या मंत्र का जाप करना चाहिए…
ॐ ह्लीं ह्लीं ह्लीं ब्रह्मविद्या स्वरूपिणी स्वाहा:
पीले कपडे व भोजन सामग्री आता दाल चावल आदि का दान करें…
मजदूरों, साधुओं,ब्राह्मणों व गरीबों को भोजन खिलाये…
प्रसाद पूरे परिवार में बाँटें….
रुद्राक्ष की माला से 5 माला का मंत्र जप करें…
मंत्र जाप के समय पूर्व की ओर मुख रखें…

7) बल प्रदाता मंत्र—-
यदि आप बलशाली बनने के इच्छुक हो अर्थात चाहे देहिक रूप से, या सामाजिक या राजनैतिक रूप से या फिर आर्थिक रूप से बल प्राप्त करना चाहते हैं तो देवी के बल प्रदाता मंत्र का जाप करना चाहिए…
ॐ हुं हां ह्लीं देव्यै शौर्यं प्रयच्छ
पक्षियों को व मीन अर्थात मछलियों को भोजन देने से देवी प्रसन्न होती है…
पुष्प सुगंधी हल्दी केसर चन्दन मिला पीला जल देवी को को अर्पित करना चाहिए…
पीले कम्बल के आसन पर इस मंत्र को जपें….
रुद्राक्ष की माला से 7 माला मंत्र जप करें…
मंत्र जाप के समय उत्तर की ओर मुख रखें…

 
8) सुरक्षा कवच का मंत्र—-
प्रतिदिन प्रस्तुत मंत्र का जाप करने से आपकी सब ओर रक्षा होती है, त्रिलोकी में कोई आपको हानि नहीं पहुंचा सकता ….
ॐ हां हां हां ह्लीं बज्र कवचाय हुम
देवी माँ को पान मिठाई फल सहित पञ्च मेवा अर्पित करें..
छोटी छोटी कन्याओं को प्रसाद व दक्षिणा दें…
रुद्राक्ष की माला से 1 माला का मंत्र जप करें…
मंत्र जाप के समय पूर्व की ओर मुख रखें…
ये स्तम्भन की देवी भी हैं। कहा जाता है कि सारे ब्रह्मांड की शक्ति मिलकर भी इनका मुकाबला नहीं कर सकती। शत्रु नाश, वाक सिद्धि, वाद-विवाद में विजय के लिए देवी बगलामुखी की उपासना की जाती है।
 

बगलामुखी देवी को प्रसन्न करने के लिए 36 अक्षरों का बगलामुखी महामंत्र —-
‘ऊं हल्रीं बगलामुखी सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तम्भय, जिहवां कीलय बुद्धिं विनाशय हल्रीं ऊं स्वाहा’ का जप,
हल्दी की माला पर करना चाहिए।

माँ बगलामुखी की साधना कर अपना जीवन सफल बनायें !!

 माँ बगलामुखी की साधना करने के  लिए सबसे पहले एकाक्षरी मंत्र ह्ल्रीं की दीक्षा अपने गुरुदेव के मुख से प्राप्त करें। एकाक्षरी मंत्र के एक लाख दस हजार जप करने के पश्चात क्रमशः चतुराक्षरी, अष्टाक्षरी , उन्नीसाक्षरी, छत्तीसाक्षरी (मूल मंत्र ) आदि मंत्रो की दीक्षा अपने गुरुदेव से प्राप्त करें एवं गुरु आदेशानुसार मंत्रो का जाप संपूर्ण करें।यदि एक बार आपने  यह साधना पूर्ण कर ली तो इस संसार में ऐसी कोई भी वस्तु नहीं है जिसे आप प्राप्त नहीं कर सकते। यदि आप भोग विलास के  पीछे दौड़ेंगे तो आपकी यह दौड़ कभी भी समाप्त नहीं होगी। लेकिन यदि आपका लक्ष्य प्रभु प्राप्ति होगा तो भोग विलास स्वयं ही आपके दास बनकर आपकी सेवा करेंगे।  मानव जन्म बड़ी  मुश्किल से प्राप्त होता है। इसे व्यर्थ ना गँवाये। हम सभी जानते है कि हम इस संसार से कुछ भी साथ लेकर नहीं जायेगे। यदि आपने यहाँ करोड़ो रुपये भी जोड़ लिए तो भी वो व्यर्थ ही हैं जब तक आप उस परमपिता को प्राप्त नहीं कर लेते। उस परमात्मा कि शरण में जो सुख है वह सुख इस संसार के किसी भी भोग विलास में नहीं है  
कौन है बगलामुखी मां..???
मां बगलामुखी जी आठवी महाविद्या हैं। इनका प्रकाट्य स्थल गुजरात के सौरापट क्षेत्र में माना जाता है। हल्दी रंग के जल से इनका प्रकट होना बताया जाता है। इसलिए, हल्दी का रंग पीला होने से इन्हें पीताम्बरा देवी भी कहते हैं। इनके कई स्वरूप हैं। इस महाविद्या की उपासना रात्रि काल में करने से विशेष सिद्धि की प्राप्ति होती है। इनके भैरव महाकाल हैं।माँ बगलामुखी स्तंभव शक्ति की अधिष्ठात्री हैं अर्थात यह अपने भक्तों के भय को दूर करके शत्रुओं और उनके बुरी शक्तियों का नाश करती हैं. माँ बगलामुखी का एक नाम पीताम्बरा भी है इन्हें पीला रंग अति प्रिय है इसलिए इनके पूजन में पीले रंग की सामग्री का उपयोग सबसे ज्यादा होता है. देवी बगलामुखी का रंग स्वर्ण के समान पीला होता है अत: साधक को माता बगलामुखी की आराधना करते समय पीले वस्त्र ही धारण करना चाहिए !देवी बगलामुखी दसमहाविद्या में आठवीं महाविद्या हैं यह स्तम्भन की देवी हैं. संपूर्ण ब्रह्माण्ड की शक्ति का समावेश हैं माता बगलामुखी शत्रुनाश, वाकसिद्धि, वाद विवाद में विजय के लिए इनकी उपासना की जाती है. इनकी उपासना से शत्रुओं का नाश होता है तथा भक्त का जीवन हर प्रकार की बाधा से मुक्त हो जाता है. बगला शब्द संस्कृत भाषा के वल्गा का अपभ्रंश है, जिसका अर्थ होता है दुलहन है अत: मां के अलौकिक सौंदर्य और स्तंभन शक्ति के कारण ही इन्हें यह नाम प्राप्त है.बगलामुखी देवी रत्नजडित सिहासन पर विराजती होती हैं रत्नमय रथ पर आरूढ़ हो शत्रुओं का नाश करती हैं. देवी के भक्त को तीनो लोकों में कोई नहीं हरा पाता, वह जीवन के हर क्षेत्र में सफलता पाता है पीले फूल और नारियल चढाने से देवी प्रसन्न होतीं हैं. देवी को पीली हल्दी के ढेर पर दीप-दान करें, देवी की मूर्ति पर पीला वस्त्र चढाने से बड़ी से बड़ी बाधा भी नष्ट होती है, बगलामुखी देवी के मन्त्रों से दुखों का नाश होता है.पीताम्बरा की उपासना से मुकदमा में विजयी प्राप्त होती है। शत्रु पराजित होते हैं। रोगों का नाश होता है। साधकों को वाकसिद्धि हो जाती है। इन्हें पीले रंग का फूल, बेसन एवं घी का प्रसाद, केला, रात रानी फूल विशेष प्रिय है। पीताम्बरा का प्रसिद्ध मंदिर मध्यप्रदेश के दतिया और नलखेडा(जिला-शाजापुर) और आसाम के कामाख्या में है।
सामान्य बगलामुखी मंत्र —–
ऊँ ह्रीं बगलामुखी सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तंभय जिह्ववां कीलय बुद्धि विनाशय ह्रीं ओम् स्वाहा।
माँ बगलामुखी की साधना करने वाला साधक सर्वशक्ति सम्पन्न हो जाता है. यह मंत्र विधा अपना कार्य करने में सक्षम हैं. मंत्र का सही विधि द्वारा जाप किया जाए तो निश्चित रूप से सफलता प्राप्त होती है. बगलामुखी मंत्र के जाप से पूर्व बगलामुखी कवच का पाठ अवश्य करना चाहिए. देवी बगलामुखी पूजा अर्चना सर्वशक्ति सम्पन्न बनाने वाली सभी शत्रुओं का शमन करने वाली तथा मुकदमों में विजय दिलाने वाली होती है.

जानिए श्री सिद्ध बगलामुखी देवी महामंत्र को—–
ॐ ह्लीं बगलामुखी देव्यै सर्व दुष्टानाम वाचं मुखं पदम् स्तम्भय जिह्वाम कीलय-कीलय बुद्धिम विनाशाय ह्लीं ॐ नम:
इस मंत्र से काम्य प्रयोग भी संपन्न किये जाते हैं जैसे —-
1. मधु. शर्करा युक्त तिलों से होम करने पर मनुष्य वश में होते है।
2. मधु. घृत तथा शर्करा युक्त लवण से होम करने पर आकर्षण होता है।
3. तेल युक्त नीम के पत्तों से होम करने पर विद्वेषण होता है।
4. हरिताल, नमक तथा हल्दी से होम करने पर शत्रुओं का स्तम्भन होता है।

केसे करें मां बगलामुखी पूजन…??
माँ बगलामुखी की पूजा हेतु इस दिन प्रात: काल उठकर नित्य कर्मों में निवृत्त होकर, पीले वस्त्र धारण करने चाहिए. साधना अकेले में, मंदिर में या किसी सिद्ध पुरुष के साथ बैठकर की जानी चाहिए. पूजा करने के लुए पूर्व दिशा की ओर मुख करके पूजा करने के लिए आसन पर बैठें चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर भगवती बगलामुखी का चित्र स्थापित करें.इसके बाद आचमन कर हाथ धोएं। आसन पवित्रीकरण, स्वस्तिवाचन, दीप प्रज्जवलन के बाद हाथ में पीले चावल, हरिद्रा, पीले फूल और दक्षिणा लेकर संकल्प करें. इस पूजा में ब्रह्मचर्य का पालन करना आवशयक होता है मंत्र- सिद्ध करने की साधना में माँ बगलामुखी का पूजन यंत्र चने की दाल से बनाया जाता है और यदि हो सके तो ताम्रपत्र या चाँदी के पत्र पर इसे अंकित करें.
इस अवसर पर मां बगलामुखी को प्रसन्न करने के लिए इस प्रकार पूजन करें-
साधक को माता बगलामुखी की पूजा में पीले वस्त्र धारण करना चाहिए। इस दिन सुबह जल्दी उठकर नित्य कर्मों में निवृत्त होकर पूर्व दिशा की ओर मुख करके आसन पर बैठें। चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर भगवती बगलामुखी का चित्र स्थापित करें। इसके बाद आचमन कर हाथ धोएं। आसन पवित्रीकरण, स्वस्तिवाचन, दीप प्रज्जवलन के बाद हाथ में पीले चावल, हरिद्रा, पीले फूल और दक्षिणा लेकर इस प्रकार संकल्प करें-
  संकल्प--------
ऊँ विष्णुर्विष्णुर्विष्णु: अद्य……(अपने गोत्र का नाम) गोत्रोत्पन्नोहं ……(नाम) मम सर्व शत्रु स्तम्भनाय बगलामुखी जप पूजनमहं करिष्ये। तदगंत्वेन अभीष्टनिर्वध्नतया सिद्ध्यर्थं आदौ: गणेशादयानां पूजनं करिष्ये।
यह हें माँ बगलामुखी मंत्र —-विनियोग -
श्री ब्रह्मास्त्र-विद्या बगलामुख्या नारद ऋषये नम: शिरसि।
त्रिष्टुप् छन्दसे नमो मुखे। श्री बगलामुखी दैवतायै नमो ह्रदये।
ह्रीं बीजाय नमो गुह्ये। स्वाहा शक्तये नम: पाद्यो:।
ऊँ नम: सर्वांगं श्री बगलामुखी देवता प्रसाद सिद्धयर्थ न्यासे विनियोग:।

इसके पश्चात आवाहन करना चाहिए….
ऊँ ऐं ह्रीं श्रीं बगलामुखी सर्वदृष्टानां मुखं स्तम्भिनि सकल मनोहारिणी अम्बिके इहागच्छ सन्निधि कुरू सर्वार्थ साधय साधय स्वाहा।
अब देवी का ध्यान करें इस प्रकार…..
सौवर्णामनसंस्थितां त्रिनयनां पीतांशुकोल्लसिनीम्
हेमावांगरूचि शशांक मुकुटां सच्चम्पकस्रग्युताम्
हस्तैर्मुद़गर पाशवज्ररसना सम्बि भ्रति भूषणै
व्याप्तांगी बगलामुखी त्रिजगतां सस्तम्भिनौ चिन्तयेत्।

इसके बाद भगवान श्रीगणेश का पूजन करें। नीचे लिखे मंत्रों से गौरी आदि षोडशमातृकाओं का पूजन करें-
गौरी पद्मा शचीमेधा सावित्री विजया जया।
देवसेना स्वधा स्वाहा मातरो लोक मातर:।।
धृति: पुष्टिस्तथातुष्टिरात्मन: कुलदेवता।
गणेशेनाधिकाह्योता वृद्धौ पूज्याश्च षोडश।।

इसके बाद गंध, चावल व फूल अर्पित करें तथा कलश तथा नवग्रह का पंचोपचार पूजन करें।
तत्पश्चात इस मंत्र का जप करते हुए देवी बगलामुखी का आवाह्न करें-
नमस्ते बगलादेवी जिह्वा स्तम्भनकारिणीम्।
भजेहं शत्रुनाशार्थं मदिरा सक्त मानसम्।।

आवाह्न के बाद उन्हें एक फूल अर्पित कर आसन प्रदान करें और जल के छींटे देकर स्नान करवाएं व इस प्रकार पूजन करें-
गंध- ऊँ बगलादेव्यै नम: गंधाक्षत समर्पयामि। का उच्चारण करते हुए बगलामुखी देवी को पीला चंदन लगाएं और पीले फूल चड़ाएं।
पुष्प- ऊँ बगलादेव्यै नम: पुष्पाणि समर्पयामि। मंत्र का उच्चारण करते हुए बगलामुखी देवी को पीले फूल चढ़ाएं।
धूप- ऊँ बगलादेव्यै नम: धूपंआघ्रापयामि। मंत्र का उच्चारण करते हुए बगलामुखी देवी को धूप दिखाएं।
दीप- ऊँ बगलादेव्यै नम: दीपं दर्शयामि। मंत्र का उच्चारण करते हुए बगलामुखी देवी को दीपक दिखाएं।
नैवेद्य- ऊँ बगलादेव्यै नम: नैवेद्य निवेदयामि। मंत्र का उच्चारण करते हुए बगलामुखी देवी को पीले रंग की मिठाई का भोग लगाएं।

अब इस प्रकार प्रार्थना करें-
जिह्वाग्रमादाय करणे देवीं, वामेन शत्रून परिपीडयन्ताम्।
गदाभिघातेन च दक्षिणेन पीताम्बराढ्यां द्विभुजां नमामि।।

अब क्षमा प्रार्थना करें-
आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्।
पूजां चैव न जानामि क्षम्यतां परमेश्वरि।।
मंत्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वरि।
यत्पूजितं मया देवि परिपूर्णं तदस्तु मे।।
अंत में माता बगलामुखी से ज्ञात-अज्ञात शत्रुओं से मुक्ति की प्रार्थना करें।

बगलामुखी साधना की सावधानियां :-
1. बगलामुखी साधना के दौरान पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना अत्यधिक आवश्यक है।
2. इस क्रम में स्त्री का स्पर्श, उसके साथ किसी भी प्रकार की चर्चा या सपने में भी उसका आना पूर्णत: निषेध है। अगर आप ऐसा करते हैं तो आपकी साधना खण्डित हो जाती है।
3. किसी डरपोक व्यक्ति या बच्चे के साथ यह साधना नहीं करनी चाहिए। बगलामुखी साधना के दौरान साधक को डराती भी है। साधना के समय विचित्र आवाजें और खौफनाक आभास भी हो सकते हैं इसीलिए जिन्हें काले अंधेरों और पारलौकिक ताकतों से डर लगता है, उन्हें यह साधना नहीं करनी चाहिए।
4. साधना से पहले आपको अपने गुरू का ध्यान जरूर करना चाहिए।
5. मंत्रों का जाप शुक्ल पक्ष में ही करें। बगलामुखी साधना के लिए नवरात्रि सबसे उपयुक्त है।
6. उत्तर की ओर देखते हुए ही साधना आरंभ करें।
7. मंत्र जाप करते समय अगर आपकी आवाज अपने आप तेज हो जाए तो चिंता ना करें।
8. जब तक आप साधना कर रहे हैं तब तक इस बात की चर्चा किसी से भी ना करें।
9. साधना करते समय अपने आसपास घी और तेल के दिये जलाएं।
10. साधना करते समय आपके वस्त्र और आसन पीले रंग का होना चाहिए।

विशेष  ;-माता के कुछ विशेष मंत्र अलग से दिए जा रहे है जो प्रतिएक परेशानी के अलग -अलग दिए गए है उन का भी जाप विशेष परेशानी मै किया जाता है !!

Monday, 2 March 2015

24 साल बाद होली पर दुर्लभ योग का आपकी नाम राशि पर क्या असर करेगा !!


शुक्रवार, 6 मार्च 2015 को होली है और इस बार 24 वर्ष बाद ज्योतिषीय दुर्लभ योग बन रहे हैं। होली शुक्रवार को पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र में मनाई जाएगी, इस नक्षत्र का स्वामी शुक्र है। चंद्रमा पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र यानी सिंह राशि में रहेगा। इस दिन गुरु एवं शुक्र दोनों अपनी उच्च राशि में रहेंगे। सूर्य कुंभ राशि में रहेगा।ज्योतिष के अनुसार 24 वर्ष पूर्व 1991 में ऐसा योग बना था, जब शुक्रवार को होली थी और शुक्र के स्वामित्व वाले पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र था, चंद्रमा भी सिंह राशि में था और गुरु-शुक्र भी अपनी-अपनी उच्च राशि में स्थित थे। यही योग इस वर्ष 2015 में बन रहा है। भविष्य में इस प्रकार का योग 24 वर्ष 2039 में बनेगा। उस समय शुक्रवार को गुरु-शुक्र उच्च के रहेंगे और होली आएगी, लेकिन चंद्रमा नक्षत्र बदल लेगा।
शुभ योग रहेगा होली पर
यह योग शुभ रहेगा। शुक्र के नक्षत्र में एवं शुक्रवार को होली एवं शुक्र का वर्तमान में उच्च राशि मीन में स्थित होना सभी के लिए फायदेमंद हो सकता है। शुक्रवार की होली प्राकृतिक रूप से भी श्रेष्ठ रहेगी। व्यापार श्रेष्ठ रहेगा एवं उत्तम फसल की प्राप्ति होगी। इस बार की होली मीन एवं कन्या राशि वालों के लिए खास रहेगी। साथ ही, सिंह राशि पर शनि का ढय्या होने के बावजूद सफलता मिल सकती है। कुंभ राशि के जातक भी लाभ में रहेंगे।
१. मेष राशि
होली के दौरान उत्साह एवं धन वृद्धि का समय रहेगा। चंद्रमा पंचम रहने से समस्याओं का अंत होगा एवं किसी प्रकार की परेशानी आने की संभावना नहीं है। मार्च मध्य का समय धन के मामलों में कमी कर सकता है। संतान के स्वास्थ्य का ध्यान रखना होगा।
उपाय: आप होली के दिन शिवलिंग पर दूध और लाल पुष्प अर्पित करें।
2. वृषभ राशि
आपकी राशि से शुक्र ग्यारहवां एवं गुरु तीसरा है। इसके साथ में शनि की दृष्टि होने से हर कार्य में आगे लाभ प्राप्त करेंगे। विवादपूर्ण मामलों में सफलता मिलेगी एवं नए कार्यों की योजनाएं भी बनेंगी। कारोबार का विस्तार होगा एवं आय अच्छी बनी रहेगी।
उपाय: आप होली के दिन शिवलिंग पर काले तिल अर्पित करें और दीपक जलाएं।
3. मिथुन राशि
चंद्र का गोचर तृतीय रहेगा एवं यह समय सभी प्रकार से अनुकूल रहेगा। जीवन साथी से लाभ और सहयोग प्राप्त होगा। अविवाहित लोगों को प्रेम-प्रसंग में सफलता मिलेगी। कारोबार की योजनाएं सफल होंगी। यात्राएं शुभ फलदायक होंगी। नए मित्रों की प्राप्ति होगी।
उपाय: होली के दिन आप गाय को हरी घास खिलाएं और हरा वस्त्र दान करें।
4. कर्क राशि
पंचम भाव में राशि का गोचर एवं गुरु सब प्रकार से श्रेष्ठ फल प्रदान करता है। संतान से खुशियां मिलेंगी। नौकरी में भी प्रमोशन के योग बन रहे हैं। योजनाएं सफल होंगी। आय भी उत्तम बनी रहेगी। निकट भविष्य में कोई बड़ा कार्य हो सकता है।
उपाय: इस राशि के लोग होली पर शिवलिंग पर दूध, शहद और जल अर्पित करें।
5. सिंह राशि
सूर्य की दृष्टि से समाज और घर-परिवार में आपकी ताकत बनी रहेगी, लेकिन स्वास्थ्य में असंतुलन हो सकता है। कोई बड़ा कार्य होने की संभावना है। राजपक्ष से लाभ होगा। संतान से सहयोग मिलेगा एवं जीवन साथी से अनुकूलता रहेगी।
उपाय: इस राशि के लोग होली के दिन सुबह सूर्य को जल अर्पित करें। जल में अक्षत और कुमकुम भी डालें।
6. कन्या राशि
कोई शुभ समाचार प्राप्त होगा एवं होली पर खुशियों भरा वातावरण रहेगा। प्रेम में वैचारिक मतभेद समाप्त होंगे। धन की आवक सुगम होगी। व्यापार में भी कोई नया सौदा प्राप्त हो सकता है। पैर मे चोट लगने का भय रहेगा।
उपाय: होली पर आप श्रीगणेश को दूर्वा अर्पित करें। शनि के लिए काले कंबल का दान करें।
7. तुला राशि
शुक्र राशि से षष्ठम एवं गुरु दशम रहेगा। यह समय सभी प्रकार से अनुकूल रहेगा। योजनाएं सफल होंगी। जिम्मेदारी बढऩे की संभावनाएं हैं। होली पर उत्साह बना रहेगा एवं स्वास्थ्य लाभ प्राप्त होगा।
उपाय: होली के दिन आप किसी नदी में या सरोवर में मछलियों को आटे की गोलियां बनाकर खिलाएं।
8. वृश्चिक राशि
दशम चंद्रमा एवं शनि का गोचर कष्टदायक हो सकता है। वाहन आदि का प्रयोग सावधानी से करें। अपना कार्य स्वयं ही करें। 15 तारीख के बाद राहत मिलेगी एवं लाभ के आसार बढ़ जाएंगे। बंधुओं से सहयोग प्राप्त होगा।
उपाय: आप होली के दिन शिवलिंग पर लाल पुष्प अर्पित करें। यदि संभव हो तो शिवजी का भात पूजन करें।
9. धनु राशि
नवम चंद्र से आय उत्तम बनी रहेंगी तथा कार्य की अधिकता होने के बावजूद प्रसन्नता बनी रहेगी। परिवार के साथ समय व्यतीत करने का मौका मिलेगा। जीवन साथी से सुख प्राप्त होगा। कारोबारी यात्राएं सफल होंगी तथा व्यापार की नई योजनाएं बनेंगी।
उपाय: कार्यों में सफलता के लिए होलिका दहन के समय होलिका पर गोबर के कंडे (उपले) अर्पित करें। अपने इष्टदेव के मंत्रों का जप करें।
10. मकर राशि
इस राशि पर उच्च के गुरु की दृष्टि है एवं बुध का गोचर राशि में हो रहा है, यह समय बुद्धि संबंधी कार्यों के लिए लाभदायक होगा। संतान को भी सफलता दिलाने वाला समय रहेगा। नौकरी में प्रमोशन के साथ ट्रांसफर के योग बनेंगे। हर कार्य में सफलता प्राप्त होगी। 18 एवं 19 मार्च महत्वपूर्ण दिन रहेंगे।
उपाय: होली पर किसी मंदिर में काले तिल का दान करें। किसी गरीब व्यक्ति को तेल का दान करें।
11. कुंभ राशि
राशि स्वामी शनि के शत्रु सूर्य का गोचर कुछ कार्यों को बाधित करेगा। व्यय की अधिकता भी करेगा। रोग में वृद्धि हो सकती है। स्वास्थ्य का ध्यान रखें। चंद्र अष्टम रहेगा, लेकिन धन की कमी नहीं होने देगा। परिवार से सहयोग बना रहेगा। न्यायालयीन मामलों में सफलता मिलेगी एवं शत्रुओं की पराजय होगी।
उपाय:  होली के दिन हनुमानजी को सिंदूर अर्पित करें और हनुमान चालीसा का जप करें।
12. मीन राशि
शुक्र, मंगल, केतु का गोचर राशि में और राहु की दृष्टि होने से योजनाएं सफल होंगी। अचानक किसी बड़े कार्य में सफलता मिलने के योग हैं। धन की आवक बनी रहेगी। पुराने साथी से मुलाकात होगी। स्वास्थ्य की समस्या हो सकती है।
उपाय: होली पर आप किसी शिव मंदिर जाएं और शिवलिंग पर पीले रंग के पुष्प अर्पित करें।

क्या आप जानते है आप की राशि क्या है !!

 
अगर आप अपनी राशि नहीं जानते तो नीचे दिए गए के अक्षरो के अनुसार अपनी राशि अपने नाम के पहले अक्षर से देखे !!
राशि और नाम अक्षर
मेष- चू, चे, चो, ला, ली, लू, ले, लो, आ.
वृष- ई, ऊ, ए, ओ, वा, वी, वू, वे, वो
मिथुन- का, की, कू, घ, ङ, छ, के, को, ह
कर्क- ही, हू, हे, हो, डा, डी, डू, डे, डो
सिंह- मा, मी, मू, मे, मो, टा, टी, टू, टे
कन्या- ढो, पा, पी, पू, ष, ण, ठ, पे, पो
तुला- रा, री, रू, रे, रो, ता, ती, तू, ते
वृश्चिक- तो, ना, नी, नू, ने, नो, या, यी, यू
धनु- ये, यो, भा, भी, भू, धा, फा, ढा, भे
मकर- भो, जा, जी, खी, खू, खे, खो, गा, गी
कुंभ- गू, गे, गो, सा, सी, सू, से, सो, दा
मीन- दी, दू, थ, झ, ञ, दे, दो, चा, ची