कुण्डली में पितृ दोष बनने के कारण !1 ~ Balaji Kripa

Tuesday, 24 March 2015

कुण्डली में पितृ दोष बनने के कारण !1

पाप कर्मों का अशुभ फल : 
जो लोग पाप कर्म करते है ऐसे व्यक्तियों को अगले जन्म-जन्मांतर तक मृत्यु बाद भी नाम लेने वाला, तर्पण या शुभगति करने वाला कोई नहीं होता क्योंकि पितृदोष के कारण संतान नाश का श्राप भोगना पड़ता है। ऐसे लोगों द्वारा बाहुबल से अर्जित सम्पत्ति का कोई वारिस भी नहीं होता। संतानहीनता के आगे अन्य सभी दुख कष्ट कम पड़ जाते हैं।ऐसे जातक को प्रकट फल के रूप में संतान जन्म न लेना, जन्म लेकर मर जाना, संतान लगातार बीमार रहना, दुराचारी और कुलनाशक संतान होना आदि अशुभ फल मिलते हैं।
शांति के उपाय : ईश्वर आराधना, जप, तप, दान।

निम्रलिखित दुष्कर्म (पापकर्म) पितृऋण बनकर संतानहीनता का दुर्भाग्य देते हैं :
* पिता, चाचा, श्वसुर का घोर अपमान, उनसे कटु वचन कहना, उनकी अवहेलना करना, वृद्धावस्था, बीमारी में उनका पालन पोषण न करना, उन्हें घर से निकाल देना।
* माता, चाची, सास आदि का अनादर करना, उन पर अत्याचार करना, सब कुछ छीन कर निकाल देना।
* मृत्यु के बाद माता-पिता का उनकी संतानों, संबंधियों, आश्रितों द्वारा कर्म-धर्म के अनुसार विधिपूर्वक अंत्येष्टि, श्राद्ध, तर्पण आदि न करना।
* भाई, जीजा, साला आदि के साथ अनुचित व्यवहार करना, उनके बाल-बच्चों का हक मारकर उन्हें लावारिस बना देना।
* धोखे से प्रेमिका का शील हरण करना, विवाह न करके उसे निराश्रित छोड़ देना, आत्महत्या के लिए विवश करना या हत्या कर देना।
* मामा, मौसी को या उनकी संतान को सताना।
* ससुराल पक्ष के लोगों को सताना।
* गर्भपात करवाना, गर्भवती स्त्री अथवा प्राणी की हत्या करना।
* ब्राह्मण, साधु, महात्मा अथवा फकीरों के धार्मिक कार्यों में व्यवधान खड़ा करना, धर्म की, ईश्वर की, देवी-देवताओं की निंदा करना, मजाक उड़ाना, मूर्तियां खंडित करना अथवा अपमानित करना, नास्तिक विचार रखना।
* पीपल, बरगद, हरे-भरे फलदार वृक्षों को काटकर क्षति पहुंचाना।
* निरीह जीवों पशु, पक्षियों आदि की व्यर्थ सामूहिक हत्या करना, उनके बच्चों, अंडों का नाश करना।
* सर्प मारना।
* निर्धन मजदूरों से बेगार कराना, उनकी सम्पत्ति, खेत फसल छीनना, नष्ट करना, उनकी महिलाओं, बच्चों से अनाचार करना।

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