April 2015 ~ Balaji Kripa

Welcome to www.balajikripa.com

May Baba fullfill all the wishes of the Devotees.

जय श्रीराम

भगवान रामभक्त हनुमान की उपासना से जीवन के सारे कष्ट, संकट मिट जाते है। माना जाता है कि हनुमान एक ऐसे देवता है जो थोड़ी-सी प्रार्थना और पूजा से ही शीघ्र प्रसन्न हो जाते है। जहां मंगलवार और शनिवार का दिन इनके पूजन के लिए सर्वश्रेष्ठ हैं।

ॐ हं हनुमंतये नम:

मंगलवार और शनिवार के दिन हनुमान म‍ंदिर में जाकर रामभक्त हनुमान का गुणगान करें और उनसे अपने पापों के लिए क्षमायाचना करें।

Saturday, 25 April 2015

अगर आप कुछ विशेष बातों का ध्यान रखेंगे तो मिलती है प्रसिद्धि और सफलता !!

1. जिंदगी में सफल होने के लिए न तो यह जानने में ज्यादा उत्सुक हों कि दूसरे क्या सोच रहे हैं, न ही चीज़ों में रुचि दिखाएं, लेकिन नए आइडिया या किसी नए विचार की खोज करिए। कुछ नया करने से ही आगे बढ़ने का रास्ता बनेगा। प्रसिद्धि मिलेगी।
2. किसी भी व्यक्ति के लिए जीवन आसान नहीं है। फिर क्या किया जाए? इससे बाहर निकलने का एक ही रास्ता है, खुद पर विश्वास रखिए। हर व्यक्ति को सोचना चाहिए कि भगवान ने उन्हें कोई न कोई खास तोहफा दिया है और उस तोहफे को बनाए रखना है।
3. दुनिया में ऐसी कोई भी चीज़ नहीं, जिससे डरने की जरूरत है। फिलहाल जरूरत सिर्फ चीज़ों को सही तरीके से समझने की है। इससे डर कम होगा।
4. आगे बढ़ने का रास्ता न ही आसान होता है और न छोटा, पर नतीजे अच्छे मिलते हैं।
5. उस वक्त तक डरने की कोई जरूरत नहीं है जब तक आप जानते हैं कि जो कर रहे हैं वह बिल्कुल सही है। उससे किसी को नुकसान नहीं पहुंच रहा है।
6. उन लोगों में से एक बनिए जिन्हें कर्म में ही सुंदरता दिखती है। जैसे मुझे भगबान से ज्यादा खूबसूरत कुछ नहीं लगता है।
7. दुनिया में ऐसे लोगों की कोई कमी नहीं जो सिर्फ गलतियां निकालने की कोशिश करते हैं, न कि सत्य की तलाश करते हैं। ऐसा हर जगह है।
8. कम ही लोग इस बात की तरफ ध्यान देते हैं कि क्या हो चुका है, जबकि ज्यादातर लोगों की रुचि इसी बात में रहती है कि क्या बाकी रह गया है।
9. पर्यावरण में आ रहे बदलावों को देखकर बच्चे की तरह खुशी मिलनी चाहिए। मेरे साथ पूरा जीवन ऐसा ही होता रहा है। अद्भुत खुशी का अनुभव।
10. आप शादीशुदा हैं, अपना कॅरिअर बना रही या बना रहे हैं तो अकसर लोग पूछेंगे कि घर और काम को कैसे बैलेंस करती हैं। आपका जवाब सिर्फ इतना-सा होना चाहिए कि यह बिल्कुल आसान नहीं है।
11. किसी चीज़ की गहराई को तभी समझ पाएंगे जब आपके पास पूरी आज़ादी हो।
12. ऐसे लोगों की तरह बनिए जो सोचते हैं कि दूसरों की मदद करने से या किसी के प्रति स्नेह की भावना रखने से ज्यादा खुशी मिलती है। इसकी तुलना किसी दूसरी चीज़ से नहीं की जा सकती है।
13. लोगों में सुधार लाए बिना, सुनहरे भविष्य की कामना करना बिल्कुल गलत है। ऐसा तभी मुमकिन होगा जब हर व्यक्ति खुद को बदलने की कोशिश करें। इसी के साथ वह अपनी जिम्मेदारियों को भी समझे।
14. कोई नया काम या किसी नई चीज की खोज यह सोचकर मत करिए कि इससे कोई फायदा होगा की। आप सिर्फ खोज करिए। अच्छी खोज दूसरों की भलाई के काम आ जाती है।

Thursday, 23 April 2015

किस देव साधना में किस माला का प्रयोग करे !!


प्रत्येक देवी-देवता के मंत्र की सिद्धि के लिए एक निश्चित माला का विशेष महत्व होता है अतः  साधक को अपने इष्ट की मंत्र साधना के लिए विशेष माला से मंत्रानुष्ठान करना चाहिए।
1. शक्ति उपासना में लाल चंदन और रुद्राक्ष की माला का प्रयोग करें।
2. बगलामुखी के लिए हल्दी की माला, मातंगी व लक्ष्मी के लिए कमल गट्टे, चंदन की माला  अथवा स्फटिक एवं रत्नों की माला का उपयोग भी कर सकते हैं।
3. दुर्गा हेतु रुद्राक्ष, लाल चंदन एवं मूंगे की माला से मंत्रानुष्ठान करें।
4. शांति कर्म के लिए चंदन एवं स्फटिक की माला का प्रयोग करें।
5. वशीकरण व मारणादि में काले वर्ण की माला या कमल गट्टे की माला का प्रयोग करें।
 6. धूमावती साधना में रुद्राक्ष एवं उग्र कर्म में अस्थि की माला का उपयोग करें।
 7. गणेश के लिए गजदंत, शिव के लिए रुद्राक्ष, विष्णु के लिए तुलसी की माला का उपयोग करें।

आजीवन सुरक्षित रहेगे अगर जप करेगे यह विशेष हनुमान मंत्र !!



जीवन में शक्ति और सिद्धि की कामना को पूरी करने के लिए श्रीहनुमान उपासना अचूक मानी जाती है। दरअसल, श्रीहनुमान व उनका चरित्र जीवन में संकल्प, बल, ऊर्जा, बुद्धि, चरित्र शुद्धि, समर्पण, शौर्य, पराक्रम, दृढ़ता के साथ जीवन में हर चुनौतियों या कठिनाइयों का सामना करने व उनसे पार पाने की अद्भुत प्रेरणा है। श्री हनुमान चिरंजीवी भी माने जाते हैं। ऐसी अद्भुत शक्तियों व गुणों के स्वामी होने से ही वे जाग्रत देवता के रूप में पूजनीय हैं। इसलिए किसी भी वक्त हनुमान की भक्ति संकटमोचन के साथ ही तन, मन व धन से संपन्न बनाने वाली मानी गई है।
मंत्र जप की विधि =
स्नान के बाद श्रीहनुमान की पंचोपचार पूजा यानी सिंदूर, गंध, अक्षत, फूल, नैवेद्य चढ़ाकर करें। गुग्गल धूप व दीप जलाकर नीचे लिखा हनुमान मंत्र लाल आसन या साल पर बैठ कर  जीवन को सफल व पीड़ामुक्त बनाने की इच्‍छा से बोलें और अंत में श्रीहनुमान की आरती करें।
 

हनुमान मंत्र -
 ॐ नमो हनुमते रुद्रावताराय
विश्वरूपाय अमित विक्रमाय
प्रकटपराक्रमाय महाबलाय
सूर्य कोटिसमप्रभाय रामदूताय स्वाहा।।

यहां बताए गए इस विशेष हनुमान मंत्र के स्मरण करने से जीवन संकटमुक्त रहने की कामनासिद्धि के साथ मंगलकारी भी साबित होगा।

Tuesday, 21 April 2015

ज्ञान, कर्म और भक्ति से बनती है सकारात्मक सोच और सकारात्मक सोच से मनुष्य बनता है महान !!

 
जीवन नीरस नहीं होना चाहिए। रसाभोर रहना चाहिए रासभोर रहना रहने का अर्थ हम हनुमानजी से सीख सकते हैं। श्रीराम की कथा सुनने में हनुमानजी को विशेष रस आता है। बजरंग बली श्रीराम, लखनजी और सीताजी के मन में बसे हुए हैं। हनुमान चालीसा की आठवीं चौपाई में उनके लिए लिखा है- 
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया। राम लखन सीता मन बसिया।।
श्रीराम कथा को हनुमानजी केवल सुनते ही नहीं हैं, रसिया रसिक भी हैं। कथा तीन तरीके से सुनी जाती है। श्रोता समझदार हो, हरि का दास हो और रसिक हो। वे श्रोता तो बहुत अच्छे हैं ही, उतने ही अच्छे वक्ता भी हैं। सामान्यत: ऐसा होता है कि जो बहुत अच्छे वक्ता होते हैं, वे फिर अच्छे श्रोता नहीं बन पाते। अगली पंक्ति है राम लखन सीता मन बसिया। हनुमानजी श्रीराम, सीताजी और लखनजी के मन में बसते हैं। इसका एक अर्थ यह भी होता है कि श्रीराम, लखनजी और सीताजी आपके मन में बसते हैं। दोनों अर्थ एक समान हैं। श्रीराम ज्ञान, सीताजी भक्ति और लक्ष्मणजी कर्म का प्रतीक हैं। इस चौपाई का रहस्य यह है कि ज्ञान, भक्ति और कर्म, तीनों हनुमानजी हृदय में बसते हैं। हनुमानजी सेवा धर्म के प्रतीक हैं। इन पंक्तियों से यह संकेत मिलता है कि एक सेवक में ज्ञान, कर्म और भक्ति का कैसा संतुलन होना चाहिए। इससे उसका व्यवहार सदैव संयत और मीठा होता है। यह सेवा-युग है। कई  संस्थानों का तो प्रोडक्ट ही समाज सेवा है । सेवा के अन्तर्गत  व्यवहार में तीन क्रियाएं महत्वपूर्ण मानी जाती है- दृष्टि, वाणी और शारीरिक मुद्रा । यदि हनुमानजी की तरह हृदय में, ज्ञान-कर्म-भक्ति है तो फिर जीवन में सोच सकारात्मक और पवित्र बनती है।और हनुमान जी की तरह युगों युगों तक लोग पूजा करते है !!

अगर संतान को बनाना है संस्कारी तो न बने गान्धारी और धृतराष्ट्र !!


परिवार पति-पत्नी और संतान के अलावा अन्य रिश्ते भी शामिल होते हैं। सुखी वैवाहिक जीवन के लिए सभी रिश्तों पर उचित ध्यान देना चाहिए, यदि किसी एक पक्ष में भी ध्यान नहीं दिया गया तो परेशानियां उत्पन्न हो सकती हैं। इस बात को धृतराष्ट्र और गांधारी के जीवन से समझा जा सकता है !
इस कारण धृतराष्ट्र और गांधारी के पुत्र संस्कारहीन हो गए !!
धृतराष्ट्र जन्म से अंधे थे। उनका विवाह सुंदर गांधारी से हुआ। गांधारी ने जब देखा कि मेरे पति जन्म से अंधे हैं तो उसने भी अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली। पिता अंधा था, माता ने अंधत्व ओढ़ लिया। दोनों अपनी संतानों के प्रति कर्तव्य से विमुख हो गए। संस्कार और शिक्षा दोनों की व्यवस्था सेवकों के हाथों में आ गई। माता-पिता में से कोई भी उनकी ओर देखने वाला नहीं था। सो, सारी संतानें दुराचारी हो गईं।अगर गृहस्थी की बात करें तो यह शुरू होती है दाम्पत्य से। पति-पत्नी के रिश्ते में समर्पण, प्रेम और कर्तव्य का भाव ना हो तो गृहस्थी सफल हो ही नहीं सकती। हमारे प्रेम और कर्मों से ही हमारी संतानों के संस्कार और भविष्य दोनों जुड़े हैं। पति-पत्नी सिर्फ खुद के लिए ना जीएं, संतान हमारी सम्पत्ति हैं, इन्हें व्यर्थ ना जाने दें। संस्कार दें, समझ दें और कर्तव्य का भाव पैदा करें।गांधारी अगर यह सोचकर आंखों पर पट्टी नहीं बांधती कि संतानों का क्या होगा, उनके लालन-पालन की व्यवस्था कौन देखेगा तो शायद महाभारत का युद्ध होने से रुक जाता। लेकिन पति-पत्नी ने सिर्फ अपने दांपत्य के सुख को देखा, गृहस्थी यानी संतान और अन्य कामों की तरफ ध्यान ही नहीं दिया। संतानें सिर्फ संपत्ति नहीं होती, वे हमारा कर्तव्य भी हैं। अगर अपने रिश्तों में इस बात का ध्यान नहीं दिया तो परिणाम भी हमें ही देखना होगा।

Sunday, 19 April 2015

आज आप को बताते है किसे धारण करना चाहिए सूर्य रत्न माणिक !!


ज्योतिषियों और भविष्यवक्ताओ के अनुसार तेजस्विता प्रदान करने वाला तेजोमय ग्रह सूर्य का रत्न माणिक सभी को शुभ फल नहीं देता है। जन्मकुंडली में सूर्य की स्थिति जाने बिना माणिक धारण करना अनुचित भी हो सकता है। यह रत्न तेज एवं समृद्धि का कारक है। मान-सम्मान एवं लोकप्रियता भी सूर्य की शुभ स्थिति से ही प्राप्त होती है, पेट संबंधी रोगों को भी माणिक नष्ट करता है। इससे शारीरिक शक्ति भी प्राप्त होती है तथा राजनेताओं को माणिक जनता के बीच लोकप्रियता देता है।चूंकि सूर्य एक ऊर्जावान ग्रह है अतः धारक को सूर्य ऊर्जा मुफ्त में ही प्राप्त होती रहती है। सूर्य सिंह राशि का स्वामी होता है अतः माणिक धारण करने से व्यक्ति आत्मनिर्भर भी बनता है। वर्चस्व की क्षमता भी बढ़ती है, मानसिक एवं आध्यात्मिक शक्तियां भी बढ़ती हैं, अस्थिरता नष्ट होकर स्थिरता प्राप्त होती है, आत्मोन्नति एवं संतान सुख भी बढ़ता है।यह ध्यान रखना आवश्यक है कि माणिक लग्न, दशा तथा ग्रह-गोचर का अध्ययन करके ही धारण करें। इस रत्न के साथ कभी भी हीरा, गोमेद एवं नीलम नहीं पहनना चाहिए। अच्छा माणिक आभायुक्त चमकदार होता है, हाथ में पकड़ने पर भारी लगेगा और हल्की-हल्की गर्मी महसूस होगी। माणिक रक्तवर्धक, वायुनाशक और पेट रोगों में लाभकारी सिद्ध होता है। यह मानसिक रोग एवं नेत्र रोग में भी फायदा करता है। माणिक धारण करने से नपुंसकता नष्ट होती है।
मेष- मेष राशि वाले जातकों को सूर्य पंचम का स्वामी होने से माणिक धारण करना संतान सुख, ईष्ट कृपा तथा शिक्षा में उन्नति होती है। मेष का स्वामी मंगल और सूर्य में मित्रता होने के कारण माणिक धारण करने से शासकीय एवं पराक्रम से संबंधी कार्यों में भी विजय प्राप्त होती है।
वृषभ- वृषभ राशि वालों का चतुर्थेश सूर्य होने के कारण माणिक होने के कारण तथा चतुर्थ हृदय भाव होने से यदि आपको हृदय संबंधी रोग हो तो माणिक पहन सकते हैं। सूर्य की महादशा में भी माणिक पहन सकते हैं। वृषभ राशि का स्वामी शुक्र तथा सूर्य की आपस में शत्रुता होने से वृषभ राशि वाले जातकों को माणिक धारण नहीं करना चाहिए।
मिथुन- मिथुन जातकों को माणिक सूर्य रोगों को नष्ट करने के लिए ही धारण करना चाहिए अन्यथा नहीं। मिथुन राशि का स्वामी बुध और सूर्य आपस में मित्र होने से माणिक धारण किया जा सकता है। माणिक पराक्रमेश होने से न खराब, न ही अच्छा होता है अतः कुंडली का विशेष विश्लेषण करने के बाद ही माणिक धारण करना चाहिए।
कर्क- कर्क जातक धन एवं विद्या की प्राप्ति के लिए माणिक धारण कर सकते हैं। सूर्य चन्द्र मित्र होने से भी माणिक धारण किया जा सकता है लेकिन द्वितीय मारक होने से माणिक धारण करना उचित नहीं है। नेत्र या हृदयरोग हो तो धारण कर सकते हैं। कई ज्योतिषियों का मानना है कि सूर्य चन्द्र को मारकत्व दोष नहीं लगता है अतः माणिक धारण कर सकते हैं।
सिंह- सिंह राशि वाले जातक माणिक धारण कर सकते हैं। यह जीवनरत्न है, जो मान-सम्मान और स्वास्थ्य के लिए उत्तम है, क्योंकि यह सिंह का स्वामी ग्रह का रत्न है अतः शुभ फलदायक है। लग्नेश का रत्न होने से व्यक्तित्व को निखारता है।
कन्या- कन्या जातकों को माणिक धारण करना अशुभ रहेगा, क्योंकि सूर्य बारहवें भाव का स्वामी होता है और बारहवां भाव त्रिकभाव है। यदि हृदयरोग के लिए रत्न धारण करना है, तो ज्योतिषी की सलाह लेकर ही धारण करें।
तुला- तुला जातकों का सूर्य एकादश भाव का स्वामी होता है और एकादश भाव लाभ है लेकिन तुला राशि के स्वामी शुक्र और सूर्य में शत्रुता होने से माणिक धारण करना कष्टदायी हो सकता है अतः हड्डी रोग हो तो योग्य ज्योतिषी की सलाह लेकर माणिक धारण कर सकते हैं। ध्यान रहे सूर्य की मित्र दशा होना आवश्यक है। यदि जन्मकुंडली नहीं हो तो योग्य हस्तरेखा विशेषज्ञ से सलाह लेकर ही माणिक पहनें।
वृश्चिक- वृश्चिक जातकों को माणिक धारण करना शुभ है। वृश्चिक का स्वामी मंगल, सूर्य का मित्र होने से कल्याणकारी हो गया है। दशम भावेश होने के कारण माणिक धारण करना राज्य सुख प्रदायक तथा खेलकूद, सर्विस, चिकित्सीय व्यापार से लाभ करता है अतः वृश्चिक जातक सूर्य, मंगल, गुरु, बुध एवं चन्द्र की महादशा में माणिक धारण कर सकते हैं।
धनु- धनु राशि में सूर्य भाग्यवान का स्वामी होता है तथा राशिश गुरु का भी मित्र है अतः धनु राशि वालों को आजीवन माणिक धारण करना चाहिए जिससे भाग्योन्नति के शुद्धावसर प्राप्त होते हैं। आर्थिक पक्ष भी मजबूत होता है तथा अचानक भाग्य से धन प्राप्त होता है। पराक्रम की प्राप्ति होती है नेत्र एवं हृदयरोग में लाभ होता है।
मकर- मकर राशि से अष्टम होने के कारण माणिक कभी भी धारण नहीं करना चाहिए, मकर राशि का स्वामी शनि तथा सूर्य में शत्रुता अनुचित होगी।
कुंभ- कुंभ से सप्तम सूर्य की राशि होने से धारण करना कष्टप्रद रहेगा राशिश शनि तथा सूर्य में भी शत्रुता होती है फलस्वरूप माणिक भूलकर भी धारण न करें, क्योंकि सप्तम मारक स्थान है।
मीन- मीन राशि गुरु की राशि है तथा सूर्य और गुरु में मित्रता है, लेकिन सूर्य षष्ठेश होकर अशुभ हो गया है फलस्वरूप माणिक धारण करना शुभ नहीं है।

Saturday, 18 April 2015

अक्षय तृतीया के दिन करें ये उपाय, हो सकती है आप की हर इच्छा पूरी !!



ज्योतिष शास्त्र के अनुसार वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि बहुत ही खास है क्योंकि इस दिन अक्षय तृतीया का पर्व मनाया जाता है। इसे अबूझ मुहूर्त भी किया जाता है क्योंकि इस दिन कोई भी शुभ कार्य बिना मुहूर्त देखे किया जा सकता है। इस बार अक्षय तृतीया का पर्व 21 अप्रैल, मंगलवार को है। मान्यता है कि इस दिन किए गए उपाय शीघ्र ही शुभ फल प्रदान करते हैं। आज हम आपको अक्षय तृतीया पर किए जाने वाले कुछ खास उपाय बता रहे हैं। इन उपायों को विधि-विधान पूर्वक करने से आपकी हर मनोकामना पूरी हो सकती है। 
धन लाभ के लिए उपाय=
अक्षय तृतीया की रात साधक (उपाय करने वाला) शुद्धता के साथ स्नान कर पीली धोती धारण करें और एक आसन पर उत्तर की ओर मुंह करके बैठ जाएं। अब अपने सामने सिद्ध लक्ष्मी यंत्र को स्थापित करें जो विष्णु मंत्र से सिद्ध हो और स्फटिक माला से नीचे लिखे मंत्र का 21 माला जाप करें। मंत्र जाप के बीच उठे नहीं, चाहे घुंघरुओं की आवाज सुनाई दे या साक्षात लक्ष्मी ही दिखाई दे।
मंत्र= ऊँ श्रीं ह्रीं श्रीं ऐं ह्रीं श्रीं फट्
इस उपाय को विधि-विधान पूर्वक संपन्न करने से धन की देवी मां लक्ष्मी प्रसन्न हो सकती हैं और साधक की धन संबंधी समस्या दूर कर सकती हैं।
ग्रहों का अशुभ प्रभाव कम करने का उपाय=
यदि आपकी जन्म कुंडली में स्थित ग्रह आपके जीवन पर अशुभ प्रभाव डाल रहे हैं तो इसके लिए उपाय भी अक्षय तृतीया से प्रारंभ किया जा सकता है।अक्षय तृतीया के दिन सुबह जल्दी उठकर नित्य कर्मों से निपट कर तांबे के बर्तन में शुद्ध जल लेकर भगवान सूर्य को पूर्व की ओर मुख करके चढ़ाएं तथा इस मंत्र का जाप करें-
 मंत्र = ऊँ भास्कराय विग्रहे महातेजाय धीमहि, तन्नो सूर्य: प्रचोदयात् ।
यह उपाय रोज करें। इस उपाय से ग्रहों का अशुभ प्रभाव कम हो सकता है और आपकी हर मनोकामना पूरी हो सकती है। अगर यह उपाय सूर्योदय के एक घंटे के भीतर किया जाए तो और भी शीघ्र फल देता है। 
सभी समस्याओं के निदान के लिए उपाय=
अपने सामने सात गोमती चक्र और महालक्ष्मी यंत्र को स्थापित करें और सात तेल के दीपक लगाएं। यह सब एक ही थाली में करें और यह थाली अपने सामने रखें और शंख माला से इस मंत्र की 51 माला जाप करें-
मंत्र- हुं हुं हुं श्रीं श्रीं ब्रं ब्रं फट्
अक्षय तृतीया के दिन यह उपाय करने से समस्याओं का निदान संभव है। 
मां लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए उपाय=
अक्षय तृतीया की रात को अकेले में लाल वस्त्र पहन कर बैठें। सामने दस लक्ष्मीकारक कौड़ियां रखकर एक बड़ा तेल का दीपक जला लें और प्रत्येक कौड़ी को सिंदूर से रंग कर हकीक की माला से इस मंत्र का पांच माला जाप करें-
मंत्र- ऊं ह्रीं श्रीं श्रियै फट्
इस प्रयोग से धन की देवी लक्ष्मी शीघ्र ही प्रसन्न हो जाती हैं और उसके जीवन में फिर कभी धन की कमी नहीं होती। 
सुखों की प्राप्ति के लिए उपाय=
अपने सामने सात गोमती चक्र और महालक्ष्मी यंत्र को स्थापित करें और सात तेल के दीपक लगाएं। यह सब एक ही थाली में करें और यह थाली अपने सामने रखें और शंख माला से इस मंत्र की 51 माला जाप करें-
मंत्र- हुं हुं हुं श्रीं श्रीं ब्रं ब्रं फट्
नोट = इस प्रकार साधना करने से जीवन के सभी सुख प्राप्त हो सकते हैं।

Thursday, 9 April 2015

रामायण की रचना केसे हुई और कितनी है रामायण !!


कहते हैं हरि अनंत, हरि कथा अनंता। सबसे पहले श्रीराम की कथा हनुमानजी ने लिखी थी फिर महर्षि वाल्मीकि ने। वाल्मीकि राम के ही काल के ऋषि थे। उन्होंने राम और उनके जीवन को देखा था। वे ही अच्छी तरह जानते थे कि राम क्या और कौन हैं? लेकिन जब सवाल लिखने का आया, तब नारद मुनि ने उनकी सहायता की। राम के काल में देवता धरती पर आया-जाया करते थे और वे धरती पर ही हिमालय के उत्तर में रहते थे।रामायण के बाद राम से जुड़ी हजारों कथाएं प्रचलन में आईं और सभी में राम की कथा में थोड़े-बहुत रद्दोबदल के साथ ही कुछ रामायणों में ऐसे भी प्रसंग मिलते हैं जिनका उल्लेख वाल्मीकि रामायण में नहीं मिलता है।राम की कथा को वाल्मीकि के लिखने के बाद दक्षिण भारतीय लोगों ने अलग तरीके से लिखा। दक्षिण भारतीय लोगों के जीवन में राम का बहुत महत्व है। कर्नाटक और तमिलनाडु में राम ने अपनी सेना का गठन किया था। तमिलनाडु में ही श्रीराम ने रामेश्वरम् ज्योतिर्लिंग की स्थापना की थी।वाल्मीकि रामायण और बाकी की रामायण में जो अंतर देखने को मिलता है वह इसलिए कि वाल्मीकि रामायण को तथ्यों और घटनाओं के आधार पर लिखा गया था, जबकि अन्य रामायण को श्रुति के आधार पर लिखा गया। जैसे बुद्ध ने अपने पूर्व जन्मों का वृत्तांत कहते हुए अपने शिष्यों को रामकथा सुनाई, जैसे बहुत समय बाद तुलसीदास को उनके गुरु ने सोरों क्षेत्र में रामकथा सुनाई। इसी तरह जनश्रुतियों के आधार पर हर देश ने अपनी रामायण को लिखा।रामकथा सामान्यतः बताने के लिए सुनाई जाती है। रामायणों की संख्या और पिछले 2500 या उससे भी अधिक सालों से दक्षिण तथा दक्षिण-पूर्व एशिया में उनके प्रभाव का दायरा बहुत व्यापक है। जितनी भाषाओं में रामकथा पाई जाती है, उनकी फेहरिस्त बनाने में ही आप थक जाएंगे- अन्नामी, बाली, बांग्ला, कम्बोडियाई, चीनी, गुजराती, जावाई, कन्नड़, कश्मीरी, खोटानी, लाओसी, मलेशियाई, मराठी, ओड़िया, प्राकृत, संस्कृत, संथाली, सिंहली, तमिल, तेलुगु, थाई, तिब्बती, कावी आदि हजारों भाषाओं में उस काल में और उसके बाद कृष्ण काल, बौद्ध काल में चरित रामायण में अनुवाद के कारण कई परिवर्तन होते चले गए, लेकिन मूल कथा आज भी वैसी की वैसी ही है।कवियों और साहित्यकारों ने रामायण को और रोचक बनाने के लिए उनकी मूलकथा के साथ तो छेड़छाड़ नहीं की लेकिन उन्होंने कथा को एक अलग रूप और रंग से सज्जित कर दिया। नृत्य-नाटिकाओं के अनुसार भी कथाएं लिखी गईं और शास्त्रीय तथा लोक परंपरा दोनों के ही अनुसार राम और रावण की कथा को श्रृंगारिक बनाया गया। इस तरह रामायणों की संख्या और भी बढ़ जाती है।सदियों के सफर के दौरान इनमें से कुछ तो बदलाव हुआ ही होगा। लेकिन सदियों के इस सफर के कारण ही लोग इसे महज काव्य मानने की भूल और पाप करते हैं। दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों और संस्कृतियों में राम और रावण के युद्ध को अलग संदर्भों में लिया गया। दक्षिण भारत, श्रीलंका, इंडोनेशिया, मलेशिया, माली आदि द्वीप राष्ट्रों में रावण की बहुत ख्याति और सम्मान था इसलिए उक्त देशों में रामकथा को अलग तरीके से लिखा गया। सर्वप्रथम श्रीराम की कथा भगवान श्री शंकर ने माता पार्वतीजी को सुनाई थी। उस कथा को एक कौवे ने भी सुन लिया। उसी कौवे का पुनर्जन्म कागभुशुण्डि के रूप में हुआ। काकभुशुण्डि को पूर्व जन्म में भगवान शंकर के मुख से सुनी वह रामकथा पूरी की पूरी याद थी। उन्होंने यह कथा अपने शिष्यों को सुनाई। इस प्रकार रामकथा का प्रचार-प्रसार हुआ। भगवान शंकर के मुख से निकली श्रीराम की यह पवित्र कथा अध्यात्म रामायण के नाम से विख्यात है।इसके अलावा एक कथा और प्रचलित है। कहते हैं कि सर्वप्रथम रामकथा हनुमानजी ने लिखी थी और वह भी शिला पर। यह रामकथा वाल्मीकिजी की रामायण से भी पहले लिखी गई थी और 'हनुमन्नाटक' के नाम से प्रसिद्ध है।वैदिक साहित्य के बाद जो रामकथाएं लिखी गईं, उनमें वाल्मीकि रामायण सर्वोपरि है। यह इसी कल्प की कथा है और यही प्रामाणिक है। वाल्मीकिज‍ी ने राम से संबंधित घटनाचक्र को अपने जीवनकाल में स्वयं देखा या सुना था इसलिए उनकी रामायण सत्य के काफी निकट है, लेकिन उनकी रामायण के सिर्फ 6 ही कांड थे। उत्तरकांड को बौद्धकाल में जोड़ा गया। उत्तरकांड का वाल्मीकि रामायण से कोई संबंध नहीं है।
अद्भुत रामायण संस्कृत भाषा में रचित 27 सर्गों का काव्य-विशेष है। कहा जाता है कि इस ग्रंथ के प्रणेता भी वाल्मीकि थे। किंतु शोधकर्ताओं के अनुसार इसकी भाषा और रचना से लगता है कि किसी बहुत परवर्ती कवि ने इसका प्रणयन किया है अर्थात अब यह वाल्मीकि कृत नहीं रही।

1. अध्यात्म रामायण
2. वाल्मीकि की 'रामायण' (संस्कृत)
3. आनंद रामायण
4. 'अद्भुत रामायण'
5. रंगनाथ रामायण (तेलुगु)
6. कवयित्री मोल्डा रचित मोल्डा रामायण (तेलुगु)
7. रूइपादकातेणपदी रामायण (उड़िया)
8. रामकेर (कंबोडिया)
9. तुलसीदास की 'रामचरित मानस' (अव‍धी)
10. कम्बन की 'इरामावतारम' (तमिल)
11. कुमार दास की 'जानकी हरण' (संस्कृत)
12. मलेराज कथाव (सिंहली)
13. किंरस-पुंस-पा की 'काव्यदर्श' (तिब्बती)
14. रामायण काकावीन (इंडोनेशियाई कावी)
15. हिकायत सेरीराम (मलेशियाई भाषा)
16. रामवत्थु (बर्मा)
17. रामकेर्ति-रिआमकेर (कंपूचिया खमेर)
18. तैरानो यसुयोरी की 'होबुत्सुशू' (जापानी)
19. फ्रलक-फ्रलाम-रामजातक (लाओस)
20. भानुभक्त कृत रामायण (नेपाल)
21. अद्भुत रामायण
22. रामकियेन (थाईलैंड)
23. खोतानी रामायण (तुर्किस्तान)
24. जीवक जातक (मंगोलियाई भाषा)
25. मसीही रामायण (फारसी)
26. शेख साद (या सादी???) मसीह की 'दास्ताने राम व सीता'।
27. महालादिया लाबन (मारनव भाषा, फिलीपींस)
28. दशरथ कथानम (चीन)
29. खोज जारी है

हनुमान चालीसा का पाठ क्यों करते हैं?


जब मनुष्य को मंदिर, दर्गा, बाबा, गुरु, देवी-देवता आदि सभी जगहों पर भटकने के बाद भी कोई शांति और सुख नहीं मिलता और संकटों का जरा भी समाधान नहीं होता है। साथ ही मृत्युतुल्य कष्ट हो रहा हो तो सिर्फ हनुमान की भक्ति ही बचा सकती है। ऐसे व्यक्ति को हनुमनजी की शरण में आना ही पड़ता है, लेकिन जो पहले से ही उनकी शरण में हैं उन्हें किसी भी प्रकार का कष्ट नहीं होता। हनुमानजी सर्वशक्तिमान और एकमात्र ऐसे देवता हैं जिनका नाम जपने से ही संकट शरीर और मन से दूर हटने शुरू हो जाते हैं। शास्त्रों अनुसार कलयुग में हनुमानजी की भक्ति को सबसे जरूरी, प्रथम और उत्तम बताया गया है लेकिन अधिकतर जनता भटकी हुई है। वह ज्योतिष और तथाकथित बाबाओं, गुरुओं को ही अपना सबकुछ मानकर बैठी है। ऐसे भटके हुए लोगों को राम ही बचाने वाले हैं। हनुमानजी की भक्ति सबसे सरल और जल्द ही फल प्रदान करने वाली मानी गई है। यह भक्ति जहां हमें भूत-प्रेत जैसी न दिखने वाली आपदाओं से बचाती है, वहीं यह ग्रह-नक्षत्रों के बुरे प्रभाव से भी बचाती है। जो व्यक्ति प्रतिदिन हनुमान चालीसा पढ़ता है उसके साथ कभी भी घटना-दुर्घटना नहीं होती। श्रीराम के अनन्य भक्त श्रीहनुमान अपने भक्तों और धर्म के मार्ग पर चलने वाले लोगों की हर कदम पर मदद करते हैं, शर्त यह है कि 'और देवता चित्त न धरहीं।' हनुमानजी को मनाने के लिए सबसे सरल उपाय है हनुमान चालीसा का नित्य पाठ। हनुमानजी की यह स्तुति का सबसे सरल और सुरीली है। तुलसीदास द्वारा रचित हनुमान चालीसा बहुत प्रभावकारी है। इसकी सभी चौपाइयां मंत्र ही हैं। जिनके निरंतर जप से ये सिद्ध हो जाती है और पवनपुत्र हनुमानजी की कृपा प्राप्त हो जाती है। यदि आप मानसिक अशांति झेल रहे हैं, कार्य की अधिकता से मन अस्थिर बना हुआ है, घर-परिवार की कोई समस्यां सता रही है तो ऐसे में इसके पाठ से चमत्कारिक फल प्राप्त होता है, इसमें कोई शंका या संदेह नहीं है।

क्यों धारण किया हनुमान जी ने पंचमुखी रूप !!


श्रीराम और रावण युद्ध में भाई रावण की मदद के लिए अहिरावण ने ऐसी माया रची कि सारी सेना गहरी निद्रा में सो गई। तब अहिरावण श्रीराम और लक्ष्मण का अपहरण करके उन्हें निद्रावस्था में पाताल लोक ले गया। इस विपदा के समय में सभी ने संकट मोचन हनुमानजी का स्मरण किया।हनुमान जी तुरंत पाताल लोक पहुंचे और द्वार पर रक्षक के रूप में तैनात मकरध्वज से युद्घ कर उसे परास्त किया। जब हनुमानजी पातालपुरी के महल में पहुंचे तो श्रीराम और लक्ष्मण बंधक अवस्था में थे। हनुमान ने देखा कि वहां चार दिशाओं में पांच दीपक जल रहे थे और मां भवानी के सम्मुख श्रीराम एवं लक्ष्मण की बलि देने की पूरी तैयारी थी। अहिरावण का अंत करना है तो इन पांच दीपकों को एक साथ एक ही समय में बुझाना था। रहस्य पता चलते ही हनुमान जी ने पंचमुखी रूप धरा। उत्तर दिशा में वराह मुख, दक्षिण में नरसिंह मुख, पश्चिम में गरूड़ मुख, आकाश की ओर हयग्रीव मुख एवं पूर्व दिशा में हनुमान मुख। सारे दीपकों को बुझाकर उन्होंने अहिरावण का अंत किया।

हिन्दी पंचांग के अनुसार दूसरा माह है वैशाख इस प्रकार करें शिव पूजा, दूर होंगे दुख और कष्ट !!



हिन्दी पंचांग के अनुसार दूसरा माह है वैशाख
हिन्दी पंचांग के अनुसार चैत्र मास के बाद दूसरा वैशाख मास है। इस माह को बहुत पवित्र और पूजन कर्म के लिए श्रेष्ठ माना जाता है, क्योंकि इसका संबंध कई देव अवतारों से है। प्राचीन काल में इस माह के शुक्ल पक्ष की अक्षय तृतीया तिथि पर भगवान विष्णु के नर-नारायण, परशुराम, नृसिंह और ह्ययग्रीव अवतार हुए हैं। शुक्ल पक्ष की नवमी को माता सीता धरती से प्रकट हुई थीं। चार धाम में से एक बद्रीनाथ धाम के कपाट वैशाख माह की अक्षय तृतीया से ही खुलते हैं। वैशाख के शुक्ल पक्ष की द्वितीया को भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा भी निकलती है। वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या पर देववृक्ष वट की पूजा की जाती है। इस माह में किए गए दान, स्नान, जप, यज्ञ आदि शुभ कर्मों से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। पंचांग के अनुसार अभी वैशाख माह (4 मई 2015 तक) चल रहा है। इस माह में भगवान विष्णु और शिवजी का विशेष पूजन किया जाता है। जो लोग वैशाख मास में इन देवताओं का पूजा करते हैं, उनके सभी दुख और परेशानियां दूर हो जाती हैं। यहां जानिए शिवलिंग पूजा का आसान उपाय, इस उपाय से अक्षय पुण्य के साथ ही सुख-समृद्धि प्राप्त होती है।
इस प्रकार करें उपाय
1. हर रोज सुबह नित्यकर्म और स्नान कर पवित्र हो जाएं।
2. शिव उपासना के लिए सफेद वस्त्र पहनें।
3. पंचोपचार पूजन करें। चंदन, फूल, नैवेद्य, धूप और दीप आदि पूजा में शामिल करें।
4. शिवजी को जल व बिल्वपत्र चढ़ाएं। पूजन में भगवान विष्णु के मंत्र या शिव मंत्र का जप किया जा सकता है।

मंत्र-
ॐ विष्णुवल्लभाय नम:
ॐ महेश्वराय नम:
ॐ शंकराय नम:

4. भगवान को प्रसाद के रूप में फल या दूध से बनी मिठाई अर्पित करें।
5. पूजन के बाद धूप, दीप, कर्पूर से आरती करें।

मोह और छल से ही बढ़ती हैं जीवन में परेशानियां कर देता है विनाश !!

जीवन में उत्थान और पतन चलता ही रहता है। भौतिक सुख-सुविधाएं जुटाने के प्रयासों में ऐसा हो तो आश्चर्य की बात नहीं है, लेकिन आध्यात्मिक यात्रा में भी ऐसा हो जाता है तो इसकी चिंता पालना चाहिए। कई बार पतन के बाद भी उत्थान का क्रम बन जाता है, लेकिन जीवन की कुछ स्थितियां ऐसी होती हैं कि पतन पर पहुंचकर आदमी उत्थान पर पहुंचना ही नहीं चाहता। इसका उदाहरण है रावण। रावण एक ऐसा पात्र है, जिसको कई बार अनेक पात्रों ने अपने-अपने स्तर पर समझाया था। हनुमानजी, अंगद, शूर्पणखा, मंदोदरी, मारीच जैसे लोगों ने उसे समझाया, लेकिन उसे समझ में नहीं आया। इन वैचारिक रोगों का वर्णन करते हुए लिखा है कि-
'मोह सकल व्याधिन कर मूला।'
मोह ही मूल है और रावण साक्षात मोह का प्रतीक है। मेघनाथ काम है और शूर्पणखा अंदर की वासना है। रावण को मेघनाथ और शूर्पणखा दोनों बहुत प्यारे थे। शूर्पणखा का अर्थ है जिसके नाखून बड़े हों। इंद्रियों में जो वासनाएं होती हैं, उसकी तुलना नाखूनों से की जाती है। यानी एक सीमा तक वासना ठीक है, उसके बाद नाखूनों को काट देना चाहिए। जो अपने नाखून नहीं काटेगा, समाज में उसका जीवन अमर्यादित हो जाएगा। कुछ लोगों का मानना है कि रावण ने कुछ गलत नहीं किया था। उसकी बहन की नाक काटे जाने पर उसने श्रीराम की पत्नी का हरण कर लिया। शूर्पणखा ने श्रीराम-लक्ष्मण से विवाह का प्रस्ताव रखा, इसमें क्या गलत था। इस प्रसंग को लोग गहराइयों में नहीं देखते। शूर्पणखा ने पूरे समय झूठ बोला था, छल किया था। रावण ने शूर्पणखा यानी छल का पक्ष लिया। जो छल का पक्ष लेता है, वह रावण के समान होता है और पतन में गिरने के बाद उत्थान की संभावना को रावण ने स्वयं नकार दिया था।