ज्ञान, कर्म और भक्ति से बनती है सकारात्मक सोच और सकारात्मक सोच से मनुष्य बनता है महान !! ~ Balaji Kripa

Tuesday, 21 April 2015

ज्ञान, कर्म और भक्ति से बनती है सकारात्मक सोच और सकारात्मक सोच से मनुष्य बनता है महान !!

 
जीवन नीरस नहीं होना चाहिए। रसाभोर रहना चाहिए रासभोर रहना रहने का अर्थ हम हनुमानजी से सीख सकते हैं। श्रीराम की कथा सुनने में हनुमानजी को विशेष रस आता है। बजरंग बली श्रीराम, लखनजी और सीताजी के मन में बसे हुए हैं। हनुमान चालीसा की आठवीं चौपाई में उनके लिए लिखा है- 
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया। राम लखन सीता मन बसिया।।
श्रीराम कथा को हनुमानजी केवल सुनते ही नहीं हैं, रसिया रसिक भी हैं। कथा तीन तरीके से सुनी जाती है। श्रोता समझदार हो, हरि का दास हो और रसिक हो। वे श्रोता तो बहुत अच्छे हैं ही, उतने ही अच्छे वक्ता भी हैं। सामान्यत: ऐसा होता है कि जो बहुत अच्छे वक्ता होते हैं, वे फिर अच्छे श्रोता नहीं बन पाते। अगली पंक्ति है राम लखन सीता मन बसिया। हनुमानजी श्रीराम, सीताजी और लखनजी के मन में बसते हैं। इसका एक अर्थ यह भी होता है कि श्रीराम, लखनजी और सीताजी आपके मन में बसते हैं। दोनों अर्थ एक समान हैं। श्रीराम ज्ञान, सीताजी भक्ति और लक्ष्मणजी कर्म का प्रतीक हैं। इस चौपाई का रहस्य यह है कि ज्ञान, भक्ति और कर्म, तीनों हनुमानजी हृदय में बसते हैं। हनुमानजी सेवा धर्म के प्रतीक हैं। इन पंक्तियों से यह संकेत मिलता है कि एक सेवक में ज्ञान, कर्म और भक्ति का कैसा संतुलन होना चाहिए। इससे उसका व्यवहार सदैव संयत और मीठा होता है। यह सेवा-युग है। कई  संस्थानों का तो प्रोडक्ट ही समाज सेवा है । सेवा के अन्तर्गत  व्यवहार में तीन क्रियाएं महत्वपूर्ण मानी जाती है- दृष्टि, वाणी और शारीरिक मुद्रा । यदि हनुमानजी की तरह हृदय में, ज्ञान-कर्म-भक्ति है तो फिर जीवन में सोच सकारात्मक और पवित्र बनती है।और हनुमान जी की तरह युगों युगों तक लोग पूजा करते है !!

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