May 2015 ~ Balaji Kripa

Welcome to www.balajikripa.com

May Baba fullfill all the wishes of the Devotees.

जय श्रीराम

भगवान रामभक्त हनुमान की उपासना से जीवन के सारे कष्ट, संकट मिट जाते है। माना जाता है कि हनुमान एक ऐसे देवता है जो थोड़ी-सी प्रार्थना और पूजा से ही शीघ्र प्रसन्न हो जाते है। जहां मंगलवार और शनिवार का दिन इनके पूजन के लिए सर्वश्रेष्ठ हैं।

ॐ हं हनुमंतये नम:

मंगलवार और शनिवार के दिन हनुमान म‍ंदिर में जाकर रामभक्त हनुमान का गुणगान करें और उनसे अपने पापों के लिए क्षमायाचना करें।

Saturday, 9 May 2015

क्यों हुआ हनुमान जी का विवाह :-

हनुमान भक्त बालाजी को बाल ब्रह्मचारी कहते है और वे जीवन पर्यन्त ब्रह्मचारी रहे भी है पर एक प्रसंग के अनुसार उनके विवाह होने की बात की गयी है | और उनके इस विवाह और धर्मपत्नी के साथ एक मंदिर भी स्थित है |श्री हनुमान अपनी पत्नी के साथ मानयता है की इस मंदिर में हनुमान के साथ उनकी पत्नी के दर्शन करने से वैवाहिक जीवन में बड रहे तनाव दूर होते है और वैवाहिक जीवन में शांति बनी रहती है | यह मंदिर आन्ध्र प्रदेश के खम्मम जिले में बना हुआ है | इस मंदिर में हनुमानजी गृहस्थ रूप में अपनी पत्नी सुवर्चला जो सूर्य की पुत्री थी , के साथ विराजमान है.यह विवाह पराशर संहिता में हनुमान जी के विवाह का उल्लेख है | बताया गया है हनुमानजी सूर्य के शिष्य थे और उनसे शिक्षा प्राप्त करते थे | सूर्य को उन्हें नो विद्या का ज्ञान देना था | ब्रह्मचारी रूप में हनुमानजी ने पाँच विद्या आसानी से सिख ली थी और बची हुई विद्या एक विवाहित ही सिख सकता था अतः सूर्य ने उनसे विवाह करने को कहा | सूर्य देव ने अपनी परम तपस्वी पुत्री सुवर्चला को हनुमान जी के साथ शादी के लिए तैयार कर लिया। इसके बाद हनुमान जी ने अपनी शिक्षा पूर्ण की और सुवर्चला सदा के लिए अपनी तपस्या में रत हो गई। इस तरह हनुमान जी भले ही शादी के बंधन में बांध गए हो लेकिन शाररिक रूप से वे आज भी एक ब्रह्मचारी ही हैं |

Saturday, 2 May 2015

परशुराम ने किस लिए 21 बार क्षत्रियों का नाश किया !!


राजा पुरुरवा ने उर्वशी अप्सरा से जो वंशवृद्धि की उसी वंश में गाधि नाम का एक राजा हुआ। उसकी कन्या सत्यवती थी। ऋचीक मुनि गाधी की पुत्री से विवाह करना चाहते थे। गाधि ने ऋचीक को अयोग्य है ये कहकर पुत्री से विवाह की अनुमति नहीं दी। फिर ऋचीक के बार-बार अनुरोध करने पर गाधी ने कहा- यदि तुम एक हजार एक सफेद घोड़े जिनके कान काले हों, शुल्क के रूप में देने को तैयार हो तो मैं अपनी पुत्री का विवाह तुमसे कर सकता हूं।ऋषि वरुण देवता के पास गए और उन्हें सारी बात बताई। वरुण देवता ने ऋषि को एक हजार सफेद घोड़े दे दिए। ऋचीक सत्यवती को ब्याह कर अपने घर ले आए। एक दिन सत्यवती ने ऋचीक मुनि से पुत्र की कामना की। सत्यवती की माता ने भी पुत्र प्राप्ति के लिए प्रार्थना की। तब मुनि ऋचीक ने दो अलग-अलग पात्रो में भोजन तैयार किया और स्नान के लिए चले गए। उस समय सत्यवती की माता वहीं थी। उन्हें लगा कि ऋचीक ने सत्यवती के लिए स्वादिष्ट भोजन तैयार किया होगा। यह सोचकर उन्होंने भोजन ग्रहण कर लिया।ऋषि को जब पता चला तो उन्होंने कहा ये तो बड़ा अनर्थ हो गया। अब तुम्हारा पुत्र तो ब्राह्मण विरोधी और क्रूरकर्मी होगा और तुम्हारी माता का पुत्र स्वभाव से ब्राह्मण होगा। सत्यवती घबरा गई। उसने पति से विनती की। तब ऋषि ने कहा- तुम्हारा पुत्र नहीं तो पौत्र अवश्य ही क्रूर कर्मी होगा। सत्यवती के यहां जमदग्नि ने जन्म लिया। इनका विवाह ऋषि कन्या रेणुका से हुआ। रेणुका के गर्भ से ही परशुराम का जन्म हुआ। उन्होंने संपूर्ण पृथ्वी को 21 बार क्षत्रियविहीन कर दिया था। एक बार राजा सहस्त्रबाहु अर्जुन शिकार खेलते-खेलते जमदग्नि के आश्रम में पहुंच गया। मुनि जमदग्नि ने उसका आदर सत्कार किया। जमदग्नि के यहां कामधेनु गाय थी। उसी के गोरस के भंडार से जमदग्नि वैभवशाली तरीके से सबका सत्कार करते थे। सहस्त्रबाहु बिना पूछे ही कामधेनु को खोलकर बलपूर्वक अपने नगर में ले गया। परशुराम ने आश्रम में लाैट आने पर सहस्त्रबाहु की विशाल सेना का संहार किया और उसका सिर अपने फरसे से काट डाला।जमदग्नि ऋषि ने जब यह सुना तो उन्हें बहुत दुख हुआ।उन्होंने परशुराम को उनके पापों के प्रायश्चित के लिए तीर्थयात्रा पर भेज दिया। एक वर्ष तक परशुराम सभी तीर्थों का भ्रमण करते हुए अंत में अपने आश्रम पहुंचे। एक दिन परशुराम की माता रेणुका जल लेने गइं। वहां उन्हें चित्ररथ के प्रति मन में प्रेम जागा। वे जल लेकर अनमनी सी आश्रम लौटीं। पत्नी की मानसिक स्थिति का अवलोकन कर जमदग्नि मुनि ने परशुराम को अपनी माता का वध करने को कहा। परशुराम ने पिता की आज्ञा मानकर अपनी माता का वध कर दिया। पुत्र के इस कर्म से प्रसन्न् होकर मुनि ने उनसे पूछा बोलो तुम्हे क्या वर दूं। परशुराम ने कहा माता को फिर से जीवित कर दीजिए और ऐसा वर दीजिए की उन्हें यह भी याद न रहे की उनका वध मैंने किया था। ऋषि ने परशुराम की इच्छा पूरी की। एक बार सहस्त्रबाहु अर्जुन के पुत्रों ने अवसर पाकर समाधि में बैठे जमदग्नि को मार डाला और उनका सिर काटकर ले गया। तब रेणुका ने इक्कीस बार छाती पीटकर परशुराम को पुकारा था इसलिए भगवान परशुराम ने 21 बार पृथ्वी को क्षत्रिय विहीन किया था।

क्या आप जानते है भगवान विष्णु के सिर पर शेषनाग क्यों है?

नागराज अनंत को ही शेष भी कहा गया है। जो भगवान विष्णु के प्रिय और स्वयं भगवत स्वरूप माने गए हैं। प्रलयकाल में नई सृष्टि से पूर्व विश्व का जो शेष या मूल अव्यक्त रह जाता है। हिंदू धर्मकोश के अनुसार वे उसी के प्रतीक माने गए हैं। भविष्य पुराण में इनका ध्यान एक हजार फन वाले सर्प के रूप में किया गया है। ये जीव तत्व के अधिष्ठाता हैं और ज्ञान व बल नाम के गुणों की इनमें प्रधानता होती है। इनका आवास पाताल लोक के मूल में माना गया है। प्रलयकाल में इन्हीं के मुखों से संवर्तक अग्नि प्रकट होकर पूरे संसार को भस्म करती है। ये भगवान विष्णु के पलंग के रूप में क्षीर सागर में रहते हैं और अपने हजार मुखों से भगवान का गुणानुवाद करते हैं।भक्तों के सहायक और जीव को भगवान की शरण में ले जाने वाले भी शेष ही हैं, क्योंकि इनके बल, पराक्रम और प्रभाव को गंधर्व, अप्सरा, सिद्ध, किन्नर, नाग आदि भी नही जान पाते, इसलिए इन्हें अनंत भी कहा गया है। ये पंचविष ज्योति सिद्धांत के प्रवर्तक माने गए हैं। भगवान के निवास शैया, आसन, पादुका, वस्त्र, पाद पीठ, तकिया और छत्र के रूप में शेष यानी अंगीभूत होने के कारण् इन्हें शेष कहा गया है। लक्ष्मण और बलराम इन्हीं के अवतार हैं जो राम व कृष्ण लीला में भगवान के परम सहायक बने।