परशुराम ने किस लिए 21 बार क्षत्रियों का नाश किया !! ~ Balaji Kripa

Saturday, 2 May 2015

परशुराम ने किस लिए 21 बार क्षत्रियों का नाश किया !!


राजा पुरुरवा ने उर्वशी अप्सरा से जो वंशवृद्धि की उसी वंश में गाधि नाम का एक राजा हुआ। उसकी कन्या सत्यवती थी। ऋचीक मुनि गाधी की पुत्री से विवाह करना चाहते थे। गाधि ने ऋचीक को अयोग्य है ये कहकर पुत्री से विवाह की अनुमति नहीं दी। फिर ऋचीक के बार-बार अनुरोध करने पर गाधी ने कहा- यदि तुम एक हजार एक सफेद घोड़े जिनके कान काले हों, शुल्क के रूप में देने को तैयार हो तो मैं अपनी पुत्री का विवाह तुमसे कर सकता हूं।ऋषि वरुण देवता के पास गए और उन्हें सारी बात बताई। वरुण देवता ने ऋषि को एक हजार सफेद घोड़े दे दिए। ऋचीक सत्यवती को ब्याह कर अपने घर ले आए। एक दिन सत्यवती ने ऋचीक मुनि से पुत्र की कामना की। सत्यवती की माता ने भी पुत्र प्राप्ति के लिए प्रार्थना की। तब मुनि ऋचीक ने दो अलग-अलग पात्रो में भोजन तैयार किया और स्नान के लिए चले गए। उस समय सत्यवती की माता वहीं थी। उन्हें लगा कि ऋचीक ने सत्यवती के लिए स्वादिष्ट भोजन तैयार किया होगा। यह सोचकर उन्होंने भोजन ग्रहण कर लिया।ऋषि को जब पता चला तो उन्होंने कहा ये तो बड़ा अनर्थ हो गया। अब तुम्हारा पुत्र तो ब्राह्मण विरोधी और क्रूरकर्मी होगा और तुम्हारी माता का पुत्र स्वभाव से ब्राह्मण होगा। सत्यवती घबरा गई। उसने पति से विनती की। तब ऋषि ने कहा- तुम्हारा पुत्र नहीं तो पौत्र अवश्य ही क्रूर कर्मी होगा। सत्यवती के यहां जमदग्नि ने जन्म लिया। इनका विवाह ऋषि कन्या रेणुका से हुआ। रेणुका के गर्भ से ही परशुराम का जन्म हुआ। उन्होंने संपूर्ण पृथ्वी को 21 बार क्षत्रियविहीन कर दिया था। एक बार राजा सहस्त्रबाहु अर्जुन शिकार खेलते-खेलते जमदग्नि के आश्रम में पहुंच गया। मुनि जमदग्नि ने उसका आदर सत्कार किया। जमदग्नि के यहां कामधेनु गाय थी। उसी के गोरस के भंडार से जमदग्नि वैभवशाली तरीके से सबका सत्कार करते थे। सहस्त्रबाहु बिना पूछे ही कामधेनु को खोलकर बलपूर्वक अपने नगर में ले गया। परशुराम ने आश्रम में लाैट आने पर सहस्त्रबाहु की विशाल सेना का संहार किया और उसका सिर अपने फरसे से काट डाला।जमदग्नि ऋषि ने जब यह सुना तो उन्हें बहुत दुख हुआ।उन्होंने परशुराम को उनके पापों के प्रायश्चित के लिए तीर्थयात्रा पर भेज दिया। एक वर्ष तक परशुराम सभी तीर्थों का भ्रमण करते हुए अंत में अपने आश्रम पहुंचे। एक दिन परशुराम की माता रेणुका जल लेने गइं। वहां उन्हें चित्ररथ के प्रति मन में प्रेम जागा। वे जल लेकर अनमनी सी आश्रम लौटीं। पत्नी की मानसिक स्थिति का अवलोकन कर जमदग्नि मुनि ने परशुराम को अपनी माता का वध करने को कहा। परशुराम ने पिता की आज्ञा मानकर अपनी माता का वध कर दिया। पुत्र के इस कर्म से प्रसन्न् होकर मुनि ने उनसे पूछा बोलो तुम्हे क्या वर दूं। परशुराम ने कहा माता को फिर से जीवित कर दीजिए और ऐसा वर दीजिए की उन्हें यह भी याद न रहे की उनका वध मैंने किया था। ऋषि ने परशुराम की इच्छा पूरी की। एक बार सहस्त्रबाहु अर्जुन के पुत्रों ने अवसर पाकर समाधि में बैठे जमदग्नि को मार डाला और उनका सिर काटकर ले गया। तब रेणुका ने इक्कीस बार छाती पीटकर परशुराम को पुकारा था इसलिए भगवान परशुराम ने 21 बार पृथ्वी को क्षत्रिय विहीन किया था।

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