गुरू पूर्णिमा विशेष : गुरुभक्ति जीवन के सुखद, सुलभ और सुगम साधन !! ~ Balaji Kripa

Thursday, 30 July 2015

गुरू पूर्णिमा विशेष : गुरुभक्ति जीवन के सुखद, सुलभ और सुगम साधन !!

गुरू  क्या होता है !!
जिस प्रकार शीघ्र ईश्वर दर्शन के लिए कलयुग में भजन-कीर्तन-साधना-प्रवचन है, उसी प्रकार इस वर्तमान काल में नास्तिकता, अंहकार के युग में गुरु एवं गुरु की भक्ति तथा कृपा से ही आपके जीवन काल में अमोघ प्रभाव देता है अध्यात्म-मार्ग में हर एक साधक को गुरु कि आवश्यकता पड़ती है. केवल गुरु ही वास्तविक जीवन का अर्थ एवं उसका रहस्य प्रकट कर सकते हैं तथा ईश्वर का साक्षात्कार का मार्ग दिखा सकते हैं. केवल गुरु ही शिष्य को साधना का रहस्य बता सकते हैं. ऐसे गुरु मन, वचन और कर्म से पवित्र हैं. ऐसे गुरु अपने मन एवं इन्द्रियों पर प्रभुत्व रखते हैं, वे सब शास्त्रों का रहस्य समझते हैं. शिष्य ने अगर पूर्वजन्म में शुभ कर्म किये होंगे, वर्तमान जीवन में अगर वह शुभ कर्म करता होगा, अगर सच्चा, निष्टावान ह्रदयवाला तथा ईश्वर प्राप्ति कि तड़पवाला होगा तो उसे सदगुरू अवश्य प्राप्त होंगे !! गुरु और कोई नहीं हैं अपितु साधक कि उन्नति के लिए विश्व में अवतरित परात्पर साधक जगत जननी दिव्य माता स्वयं ही हैं. गुरु को देव मनो, तभी आपको वास्तविक लाभ होगा. गुरु कि अथक सेवा करो. वे स्वयं ही आप पर दीक्षा के सर्वश्रेष्ट आशीर्वाद बरसाएँगे.गुरु मन्त्र प्रदान करते हैं यह दीक्षा कहलाती है. दीक्षा के द्बारा आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त होता है, पापों का विनाश होता है. जिस प्रकार एक ज्योति से दूसरी ज्योति प्रज्ज्वलित होती है उसी प्रकार गुरु मन्त्र के रूप में अपनी दिव्य शक्ति शिष्य में संक्रमित करते हैं. शिष्य उपवास करता है, ब्रह्मचर्य का पालन करता है और गुरु से मन्त्र ग्रहण करता है. शिष्य को यह जरूर याद रखना चाहिए कि गुरु मन्त्र प्राप्त करने के बाद उनके द्बारा किया गया पुण्य का दसवां हिस्सा गुरु के भाग में जाता है, तो पाप भी जरूर जायेगा, तो हमेशा इस बात को ध्यान में रखे और सत्य का मार्ग पर चलें. दीक्षा के रहस्य का पर्दा हट जाता है और शिष्य वेदशास्त्रों के गूढ़ रहस्य समझने में शक्तिमान बन जाता है. सामान्यतः ये रहस्य ये गूढ़ भाषा में छुपे हुए होते हैं. खुद ही अभ्यास करने से वे रहस्य प्रकट नहीं होते. खुद ही अभ्यास करने से तो मनुष्य अधिक अज्ञान में गर्क होता है. केवल गुरु ही आपको शास्त्राभ्यास के लिए योग्य दृष्टि दीक्षा के द्बारा करते हैं. गुरु अपनी आत्म साक्षात्कार कि ज्योति का प्रकाश उन शास्त्रों के सत्य पर डालेंगे और वे सत्य आपको शीघ्र ही समझ में आ जाएँगी.
गुरु भक्ति  के अंश:============
*. गुरु भक्ति सदगुरु को सम्पूर्ण आत्मसमर्पण करना.
*. गुरु भक्ति के लिए सच्चे ह्रदय की स्थिर महेच्छा. सदगुरु के विचार, वाणी और कार्यों में सम्पूर्ण श्रद्धा. गुरु के नाम का उच्चारण और गुरु को नम्रतापूर्वक साष्टांग प्रणाम. सम्पूर्ण आज्ञाकारिता के साथ गुरु के आदेशों का पालन. बिना फलप्राप्ति की अपेक्षा गुरु की सेवा. भक्तिपूर्वक हर रोज सदगुरु के चरणकमलों की पूजा. सदगुरु के दैवी कार्य के लिए आत्म समर्पण...तन, मन, धन समर्पण. गुरु की कल्याणकारी कृपा प्राप्त करने के लिए एवं उनका पवित्र उपदेश सुनकर उसका आचरण करने के लिए सदगुरु के पवित्र चरणों का ध्यान.
*. गुरु भक्ति खुद की सुतंत्रता है.
*. मुमुक्षु जब तक गुरु भक्ति नहीं करता तब तक ईश्वर के साथ एकरूप होने के लिए आध्यात्मिक मार्ग में प्रवेश करना उसके लिए संभव नहीं है.
*. जो व्यक्ति गुरु भक्ति की महत्ता समझता है वही गुरु को बिनशरती आत्म-समर्पण का सकता है.
*. जीवन के परम ध्येय अर्थात आत्म-साक्षात्कार की प्राप्ति गुरु भक्ति द्बारा ही हो सकती है.
*. गुरु भक्ति सच्चा एवं सुरक्षित साधन है, जिसको करने में किसी भी प्रकार का भय नहीं है.
*. आज्ञाकारी बनकर गुरु के आदेशों का पालन करना, उनके उपदेशों को जीवन में उतारना, यही गुरु भक्ति का सार है.
*. जो व्यक्ति गुरु भक्ति  करता है वह बिना किसी विपत्ति से अहंभाव को निर्मूल कर सकता है, संसार में मलिन जल को बहुत सरलता से पार कर जाता है और अमरत्व एवं शाश्वत सुख प्राप्त करता है.
*. गुरु भक्ति मन को शांत और निश्चल बनाने बाली है.

गुरु भक्ति के सिद्धांत:=========
नम्रतापूर्वक अपने परम पूज्य सदगुरु के पदारविंद के पास जाकर, उनके जीवनदायी चरणों में साष्टांग प्रणाम करके पावन चरणों का पूजन एवं ध्यान करना चाहिए. सदगुरु के यशःकारी चरणों की सेवा में जीवन अर्पण करके और उनके दैवी चरणों की धूलि बनना चाहिए. ऐसे गुरु भक्त हठयोगी, लययोगी और राजयोगियों से ज्यादा सरलतापूर्वक सत्य स्वरुप का साक्षात्कार करके धन्य हो जाता है. सदगुरु के दैवी आत्मसमर्पण करनेवाले को निश्चिन्तता, निर्भयता और आनंद सहजता से प्राप्त होता है. सदगुरु के प्रति भक्ति इस योग का सबसे महत्वपूर्ण अंग है.गुरु भक्ति योग का अभ्यास मने गुरु के प्रति शुद्ध उत्कट प्रेम. ईमानदारी के सिवाय गुरु भक्ति योग का बिलकुल प्रगति नहीं हो सकती. गुरु का अखंड श्रद्धा गुरु भक्ति योग रुपी वृक्ष का मूल है. गुरु भक्ति योग का अभ्यास सद्गुरु की निगरानी में करना आवश्यक होता है.
गुरु भक्ति योग ले अभ्यास में गुरुसेवा सर्वस्व है.जो शिष्य चार प्रकार के साधनों से सज्ज है वही ईश्वर से अभिन्न ब्रह्मनिष्ट गुरु के समक्ष बैठने के एवं उनसे महावाक्य सुनने के लिए लायक है. चार प्रकार के साधन यानी साधनचतुष्ट्य इस प्रकार है:
१. विवेक = आत्मा-अनात्मा, नित्य-अनित्य, कर्म-अकर्म आदि का भेद समझने की शक्ति
२. वैराग्य = इन्द्रियजन्य सुख और सांसारिक विषयों से विरक्ति
३. षट्संपति = शम (वासनाओं एवं कामनाओं से मुक्त निर्मल मन की शांति), दम (इन्द्रियों पर काबू), उपरती (विषय-विकारी जीवन से उपरामता), तितिक्षा = हर एक स्थिति में स्थिरता एव, धैर्य के साथ सहनशक्ति), श्रद्धा और समाधान (बाहरी आकर्षणों से अलिप्त मन की एकाग्र स्थिति)
४. मुमुक्षुत्व = मोक्ष अथवा आत्म-साक्षात्कार के लिए तीव्र आकांक्षा.

गुरु भक्ति का महत्त्व:============
कर्मयोगी, भक्तियोगी, हठयोगी, राजयोगी आदि सन योगों की नींव गुरु भक्ति है. जो मनुष्य गुरु भक्ति के मार्ग से विमुख है वह अज्ञान, अंधकार एवं मृत्यु की परंपरा को प्राप्त होता है. गुरु भक्ति जीवन के परम ध्येय की प्राप्ति का मार्ग दिखाती है. गुरु भक्ति में सब योग समाविष्ट हो जाते हैं. गुरु भक्ति के आश्रय बिना अन्य कोई योग, जिनका आचरण अति कठिन है, उनका सम्पूर्ण अभ्यास किसीसे नहीं हो सकता. गुरु भक्ति में आचार्य की उपासना के द्बारा गुरुकृपा की प्राप्ति को खूब महत्त्व दिया जाता है. गुरु भक्ति वेद एवं उपनिषद के समय जितना प्राचीन है. गुरु भक्ति जीवन के सब दुःख एवं दर्दों को दूर करने का मार्ग दिखता है. गुरु भक्ति का मार्ग केवल योग्य शिष्य को ही तत्काल फल देनेवाला है. गुरु भक्ति सर्वोत्तम है. परम शांति का राजमार्ग गुरु भक्ति से शुरू होता है. जो जो सिद्धियाँ संन्यास, त्याग, अन्य योग, दान एवं शुभ कार्य आदि से प्राप्त की जा सकती हैं वे सब सिद्धियाँ गुरु भक्ति से शीघ्र प्राप्त हो सकती हैं. गुरु भक्ति एक विशुद्ध विज्ञान है, जो निम्न प्रकृति को वश में लाकर परम सुख प्राप्त करने की पद्धति हमें सिखाता है. गुरु भक्ति, गुरु सेवा, गुरु शरण आदि समानार्थी शब्द हैं. उनमें कोई अर्थभेद नहीं है. गुरु भक्ति ज्ञान के लिए सबसे सरल, सबसे निश्चित, सबसे शीघ्रगामी, सबसे सस्ता भयरहित मार्ग है.
गुरू साधना मार्ग के भयस्थान :============
*. गुरु के पावन चरणों में साष्टांग प्रणाम करने में संकोच होना यह गुरु भक्ति योग के अभ्यास में बड़ा अवरोध है.
*. आत्म-बड़प्पन, आत्म-न्यायीपना, मिथ्या-भिमान, आत्मवंचना, दर्प, स्वच्छंदीपना, दीर्घसूत्रता, हठाग्रह, छिन्द्रान्वेषीपना, कुसंग, बेईमानी, अभिमान, विषय-वासना, क्रोध, लोभ, अहंभाव...ये सब गुरु भक्ति योग के मार्ग में आनेवाले विघ्न हैं.
*. गुरु भक्ति योग के सतत अभ्यास के द्बारा मन की चंचल प्रकृति का नाश करो.
*. गुरु भक्ति योग का शास्त्र समाधि एवं आत्म-साक्षात्कार करने हेतु ह्रदयशुद्धि प्राप्त करने के लिए गुरु सेवा पर खूब जोर देता है.
*. तमाम दुर्गुणों को निर्मूल करने का एक मात्र असरकारक उपाय है गुरु भक्ति योग का आचारण.
*. सांसारिक लोगों का संग, अधिक खाना, अभिमानी एवं राजसी प्रकृति, निद्रा, काम, क्रोध, लोभ - ये सब गुरु भक्ति योग एवं गुरु कृपा में विघ्न है.
*. शिष्य को अपने गुरु की निंदा नहीं करना चाहिए. जो गुरु की निंदा करता है वह रौरव नर्क में गिरता है.

गुरु भक्ति के लिए योग्यता :==========
गुरु रहित जीवन मृत्यु के सामान है. गुरु के पास जाने के लिए आप योग्य अधिकारी होने चाहिए. आपमें वैराग्य की भावना, विवेक, गांभीर्य, आत्मसंयम एवं सदाचार जैसा गुण होने चाहिए. अगर आप ऐसा कहेंगे कि "अच्छा गुरु कोई है ही नहीं" तो गुरु भी कहेंगे कि "कोई अच्छा शिष्य है ही नहीं". आप शिष्य कि योग्यता प्राप्त करें तो आपको सदगुरु की योग्यता, महत्ता दिखेगी और समझ में आयेगी. नहीं तो आप संतो कि बुराई करते रहेगे !और जीवन मै गुरू के चरण प्राप्त नहीं होगे !
*. गुरु आपके उद्धारक एवं संरक्षक हैं. सदैव उनकी पूजा करो, उनका आदर करो.
*. गुरुपद भयंकर शाप है.
*. जो सत्, चित् और परमानन्द स्वरुप हैं ऐसे गुरु को सदा साष्टांग प्रणाम करो.
*. शिष्य को गुरु की मूर्ति एवं उनके पावन चरणों को सदा स्मरण में रखना चाहिए. गुरु के चरणों की पूजा ही श्रेष्ट पूजा है. गुरु के पवित्र नाम का सदा जप करना चाहिए. इसीमें साधना का रहस्य निहित है.
*. शिष्य को गुरु की चरणों की पूजा करनी चाहिए क्योंकि गुरु के चरणों में ही ब्रह्माण्ड का वास है.
*. गुरु के चरणामृत से संसारसागर सुख जाता है और मनुष्य आवश्यक आत्मसम्पत्ति प्राप्त कर सकता है.
*. गुरु की चरणामृत शिष्य की तृषा शांत का सकता है.
*. जब आप ध्यान करने बैठें तब अपने गुरु का एवं पूर्वकालीन सब संतों का स्मरण करें. आपको उनके आशीर्वाद प्राप्त होंगे.
*. गुरु एवं महात्माओं के ज्ञान के शब्द सुनें और उसका अनुसरण करें.
*. शास्त्र एवं गुरु के द्बारा निर्दिष्ट शुभ कर्म करें.
*. श्रद्धा माने शास्त्रों में, गुरु के शब्दों में, ईश्वर में और अपने आप में विश्वास.
*. किसी भी प्रकार के फल की अपेक्षा से रहित होकर गुरु की सेवा करना यह सर्वोच्च साधना है.
*. जितनी भक्ति भावना प्रभु के प्रति रखनी चाहिए उतनी ही गुरु के प्रति रखो, तभी सत्य की अनुभूति होगी.
*. गुरु महाराज के प्रति संपूर्णतः आज्ञापालन का भावः शिष्यत्व की नींव है.
*. गुरु से मिलने की उत्कट इच्छा और उनकी सेवा करने की तीव्र आकांक्षा मुमुक्षुत्व की निशानी है.
*. जो आखें गुरु के चरणकमलों का सौंदर्य नहीं देख सकती वे आखें सचमुच अंधी हैं.
*. जो कान गुरु की लीला की महिमा नहीं सुनते वे कान सचमुच बहरे हैं.
*. भवसागर को पार करने के लिए गुरु के सत्संग जैसी और कोई सुरक्षित नौका नहीं है.
*. गुरु अवज्ञा महापाप है. गुरु की आज्ञा का पालन उनके सम्मान करने से भी बढ़कर है.
*. गुरु के द्बारा निर्दिष्ट पद्धति कभी कभी शिष्य की रूचि को तत्काल अनुकूल न भी हो,फिर भी उसे श्रद्धा रखना चाहिए कि वह उसके हित और लाभ के लिए है.
*. मनुस्मृति में कहा गया है कि शिष्यों को सदा वेदाध्ययन में निमग्न रहना चाहिए. परम श्रद्धा एवं भक्तिभावपूर्वक सदगुरु कि सेवा के दौरान शिष्य को मदिरा, मांस, तेल, इत्र, स्त्री, स्वादु भोजन, चेतन प्राणियों को हानि पहुँचाना, काम, क्रोध, लोभ, नृत्य, गान, क्रीडा, वाजिन्त्र बजाना, रंग, गपशप लगाना, निंदा करना, अति निंद्रा लेना आदि से अलिप्त रहना चाहिए. उसे असत्य नहीं बोलना चाहिए.

मन्त्र दीक्षा के नियम :===
गुरु में सम्पूर्ण श्रद्धा तथा विश्वास रखना चाहिए तथा शिष्य को पूर्णरूपेण उनके प्रति आत्मसमर्पण करना चाहिए. दीक्षा काल में गुरु के द्बारा दिये गये तमाम निर्देशों का पूर्ण रूप से पलान करना चाहिए. यदि गुरु ने विशेष नियमों की चर्चा न की हो तो आगे दिये गये सर्व सामान्य नियमों का पालन करना चाहिए :
१. मन्त्रजप से कलयुग में इश्वर-साक्षात्कार सिद्ध होता है, इस बात पर विश्वास रखना चाहिए.
२. मंत्रदीक्षा की क्रिया एक अत्यंत पवित्र क्रिया है, उसे मनोरंजन का साधना नहीं मन्ना चाहिए. अन्य की देखादेखी दीक्षा ग्रहण करना उचित नहीं. अपने मन को स्थिर और सुदृढ़ करने के पश्चात् गुरु की शरण में जाना चाहिए.
३. मन्त्र को ही भगवान समझना चाहिए तथा गुरु में ईश्वर का प्रत्यक्ष दर्शन करना चाहिए.
४. मंत्रदीक्षा को सांसारिक सुख-प्राप्ति का माध्यम नहीं बनाना चाहिए, भगवत्प्राप्ति का माध्यम बनाना चाहिए.
५. मंत्रदीक्षा के अनन्तर मंत्रजप को छोड़ देना घोर अपराध है, इससे मन्त्र का घोर अपमान होता है तथा साधक को हानि होने की सम्भावना भी रहती है.
६. साधक को आसुरी प्रवृत्तियाँ - काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, द्वेष आदि का त्याग करके दैवी संपत्ति सेवा, त्याग, दान, प्रेम, क्षमा, विनम्रता आदि गुणों को धारण करने का प्रयत्न करते रहना चाहिए.
७. गृहस्थ को व्यवहार की दृष्टि से अपना कर्त्तव्य आवश्यक मानकर पूरा करना चाहिए, परन्तु उसे गौण कार्य समझना चाहिए. समग्र परिवार के जीवन को आध्यात्मिक बनाने का प्रयत्न करना चाहिए.
८. मन, वचन तथा कर्म से सत्य, अहिंसा तथा ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए.
९. प्रति सप्ताह मंत्रदीक्षा ग्रहण किये गये दिन एक वक़्त फलाहार पे रहना चाहिए और वर्ष के अंत में उस दिन उपवास रखना चाहिए.
१०. भगवान को निराकार-निर्गुण और साकर-सगुण दोनों स्वरूपों में देखना चाहिए. ईश्वर को अनेक रूपों में जानकार श्रीराम, श्रीकृष्ण, शंकरजी, गणेशजी, विष्णु भगवान, दुर्गा, लक्ष्मी इत्यादि किसी भी देवी-देवता में विभेद नहीं करना चाहिए. सभी के इष्टदेव सर्वव्यापक, सर्वज्ञ सभी के आत्मा में स्थित तथा सर्वान्तर्यामी हैं, अन्तः दूसरों के देवता के प्रति विरोधभाव प्रकट नहीं करना चाहिए.
११. अपना गुरु मन्त्र गुप्त रखना चाहिए. लिखित मंत्रजप करना चाहिए तथा उसे किसी पवित्र स्थान में सुरक्षित रखना चाहिए. इससे वातावरण शुद्ध रहता है.
१२. पति-पत्नी यदि एक ही गुरु की दीक्षा लें तो यह अति उत्तम है, परन्तु अनिवार्य नहीं है.
१३. मंत्रजप के लिए पूजा का एक कमरा अथवा कोई स्थान अलग रखना संभव हो तो उत्तम है. उस स्थान को अपवित्र नहीं करना चाहिए.
१४. प्रत्येक समय अपने गुरु तथा इष्टदेव की उपस्थिति का अनुभव करते रहने चाहिए.
१५. मंत्र की शक्ति पर विश्वास रखना चाहिए. उससे सारे विघ्नों का निवारण हो जाता है.
१६. प्रतिदिन कम से कम ११ माला का जप करना चाहिए. प्रातः और संध्याकाल को नियमानुसार जप करना चाहिए.
१७. माला फिराते समय तर्जनी, अंगूठे के पास की तथा कनिष्ठिका (छोटी) उँगली का उपयोग नहीं करना चाहिए. माला नाभि के नीचे जाकर लटकती हुई नहीं रखनी चाहिए. यदि संभव हो तो किसी वस्त्र (गौमुखी) में रखकर माला फिराना चाहिए. सुमेरु के मनके को (मुख्य मनके को) पार करके माला नहीं फेरना चाहिए. माला फेरते समय सुमेरु तक पहुँचकर पुनः माला घुमाकर ही दूसरी माला का प्रारंभ करना चाहिए.
१८. अंत में तो ऐसी स्थिति में आ जानी चाहिए कि निरंतर उठते-बैठते, खाते-पीते, चलते, काम करते तथा सोते समय भी जप चलते रहना चाहिए.
आप सभी को गुरुदेव का अनुग्रह प्राप्त हो, यह हार्दिक कामना है. आप सभी मंत्रजप के द्बारा इच्छानुसार लक्ष्य प्राप्त करने में संपूर्णतः सफल हों, ईश्वर आपको शांति, आनंद समृद्धि तथा आध्यात्मिक प्रगति प्रदान करें. यही प्रार्थना है.

विशेष :=
किसी भी योग साधना का अभ्यास गुरु के सान्निध्य में करना चाहिए. विशेषतः तंत्रयोग के बारे में यह बात अत्यंत आवश्यक है. साधक कौन सी कक्षा का है, यह निश्चित करना एवं उसके लिए योग्य साधना करना गुरु का कार्य है. आजकल साधकों में एक ऐसा खतरनाक एवं गलत ख्याल प्रवर्तमान है कि वे साधना के प्रारंभ में ही उच्च प्रकार का योग साधने के लिए काफी योग्यता रखते हैं. प्रायः सब साधकों का जल्दी पतन होता है इसका यही कारण है. इसीसे सिद्ध होता है कि अभी वह योग साधना के लिए तैयार नहीं है.

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