रामचरितमानस, वाल्मीकि रामायण !! ~ Balaji Kripa

Sunday, 26 July 2015

रामचरितमानस, वाल्मीकि रामायण !!


वाल्मीकि जी कृत महाकाव्य श्रीरामचरितमानस मूल संस्कृत भाषा में है लेकिन हिन्दी में भावार्थ सहित यहाँ उपलब्ध है। यह प्रयास धर्मार्थ किया गया है। अगर कोई भूल बस गलती हो गई उस के लिए हम छमा प्रार्थी है ! इसका उद्देश्य जन-जन की प्रिय श्रीरामचरितमानस से इंटरनेट के पाठकों को भी जोड़ना है। नीचे इस महाकाव्य के सभी काण्डों को दिया जा रहा है। आप जिस भी काण्ड का अध्ययन करना चाहते हैं उसी खंड पर क्लिक करें।

रामचरितमानस, बालकाण्ड (वाल्मीकि रामायण) कथा आरम्भ !!

प्रयाग में तपस्वी श्री भरद्वाज मुनि का आश्रम स्थित है। माघ मास में जब सूर्य मकर राशि में आते हैं तब लोगों का समूह तीर्थराज प्रयाग में आकर आदरपूर्वक त्रिवेणी स्नान करते हैं। इस अवसर पर आये हुए समस्त ऋषि मुनि भरद्वाज मुनि के अतिथि होते हैं। एक बार की बात है कि समस्त भरद्वाज के अतिथिगण माघ मास की समाप्ति पर वापस चले गये किन्तु परमज्ञानी मुनि याज्ञवल्क्य को भरद्वाज जी ने रोक लिया और उनसे श्री राम की सम्पूर्ण कथा सुनाने का आग्रह किय ! भरद्वाज जी का आग्रह सुनकर याज्ञवल्क्य मुनि ने कहा, “हे तात्! श्री रामचन्द्र जी की कथा को भगवान शिव ने जिस प्रकार से पार्वती जी को बताया था, उसी प्रकार से मैं तुम्हें सुनाता हूँ। तुम ध्यान देकर सुनो।” इतना कह कर याज्ञवल्क्य मुनि ने कथा सुनाना आरम्भ किया।

सती मोह:=

एक बार त्रेता युग में महादेव जी जगत्जननी भवानी सती जी के साथ अगस्त्य ऋषि के आश्रम में पहुँचे और उनसे श्री राम की कथाएँ सुनते रहे। कुछ दिनों के पश्चात् उन्होंने मुनि से विदा माँग कर दक्षकुमारी सती जी के साथ अपने निवास कैलास पर्वत के लिये प्रस्थान किया। उन्हीं दिनों पृथ्वी का भार उतारने के लिये श्री हरि ने रघुवंश में राम के रूप में अवतार लिया था और पिता के आदेश से राज्य का त्याग कर राम तपस्वी वेश में दण्डकवन मे विचर रहे थे। राम के उस वनवासकाल में रावण ने राम की पत्नी सीता का हरण कर लिया था। सती जी के साथ अगस्त्य ऋषि के आश्रम से कैलास जाते हुए उन्हीं श्री राम को शिव जी ने देखा। राम के पास जाने की इच्छा होते हुए भी शिव जी राम के अवतार होने का भेद खुल जाने के डर से उनके पास नहीं गये और दूर से ही चुपचाप उन्हे प्रणाम कर लिया। शिव जी के साथ जाती हुईं सती जी ने देखा कि जिन राम को उनके पति महादेव जी ने प्रणाम किया है उन राम के नेत्र सीता के वियोग के कारण अश्रु से भरे हुए हैं और वे साधारण मनुष्यों की भाँति विरह से व्याकुल हैं। राम को इस प्रकार से साधारण मनुष्य के रूप में देखकर राम के विष्णु के अवतार होने के विषय में सती जी के हृदय में सन्देह हो गया। यद्यपि भवानी सती ने अपने इस सन्देह के विषय में महादेव जी को नहीं बताया तथापि अन्तर्यामी होने के कारण शिव जी को उनके सन्देह के विषय में ज्ञान हो गया। वे बोले, “हे सती! स्त्रीस्वभाववश तुम्हारे हृदय में सन्देह ने स्थान बना लिया है जबकि ये वही राम हैं जिनकी कथा हम अगस्त्य मुनि के आश्रम से सुन कर आ रहे हैं। अतः अपने हृदय से इस सन्देह को दूर कर दो।” किन्तु बारम्बार समझाने पर भी जब सती का सन्देह दूर नहीं हुआ तो उनके इस सन्देह को हरि इच्छा समझकर शिव जी ने कहा, “यदि मेरे कथन से तुम्हारे सन्देह का निवारण नहीं हो पा रहा है तो तुम जाकर राम की परीक्षा ले लो। तुम्हारे वापस आने तक मैं इस वट वृक्ष के नीचे बैठकर तुम्हारी प्रतीक्षा करूँगा। परीक्षा लेने के लिये तुम सोच विचार कर ऐसा कार्य करो जिससे कि तुम्हारा यह अज्ञानजनित भारी भ्रम दूर हो जाये।” सती जी वहाँ से राम की परीक्षा लेने के लिये चली गईं और शिव जी सोचने लगे कि सती के हृदय में सन्देह हो जाना अच्छा नहीं है, ऐसा प्रतीत होता है कि विधाता सती के विरुद्ध हो गये हैं और अब उनका कुशल नहीं है। अस्तु, जो भी विधि ने रच रखा है वही होगा, तर्क करने से कोई लाभ नहीं है। इधर सती जी ने राम के समीप पहुँचने से पहले सीता जी का रूप धारण कर लिया और राम तथा लक्ष्मण के निकट से जाने लगीं। उन्हें देख कर लक्ष्मण जी तो चकित हो गये किन्तु श्री राम ने उनके कपट को पहचान लिया। श्री राम ने हाथ जोड़ कर सती को प्रणाम किया और अपना महाराज दशरथ के पुत्र के रूप में अपना परिचय देने के बाद पूछा, “आप इस वन में अकेली कैसे फिर रही हैं? वृषकेतु श्री शिव जी कहाँ हैं?” श्री राम के प्रश्न को सुनकर सती जी को अत्यन्त संकोच का अनुभव हुआ और वे भगवान शिव जी के पास वापस जाने लगीं। उनके इस प्रकार से वापस जाने पर श्री राम ने उनके सन्देह को पूर्ण रूप से दूर करने के लिये अपना और भी प्रभाव दिखाया और सती जी को दृष्टिगत हुआ कि उनके आगे आगे राम, सीता और लक्ष्मण चले जा रहे हैं। उन्होंने पीछे फिर कर देखा तो उन्हें अपने पीछे भी राम, सीता और लक्ष्मण ही दिखाई पड़े। वे जिस ओर भी दृष्टिपात करती थीं उन्हें राम, सीता और लक्ष्मण ही दृष्टिगत होते थे। उसके पश्चात् उन्हें अनगिनत अनुपम सती, ब्रह्माणी और लक्ष्मी जी के दर्शन हुए। श्री राम के अनेकोनेक रूप उन्हें दिखाई दिये। जब सती जी महादेव जी के पास पहुँचीं तो शिव जी ने मुस्कुरा कर उनके परीक्षा लेने के विषय में पूछा किन्तु वे सब कुछ छुपा गईं और कहा कि उन्होंने किसी प्रकार की कोई परीक्षा ही नहीं ली है। परन्तु अन्तर्यामी शंकर जी को ज्ञात हो गया कि सती ने सीता (जिन्हें वे माता मानते थे) का रूप धारण करके राम की परीक्षा ली है। सती के द्वारा माता (सीता) का रूप धारण करने के विषय में ज्ञात होने पर शिव जी के हृदय में अत्यन्त विषाद हुआ और उन्होंने भविष्य में सती से दैहिक सम्बन्ध नहीं बनाने का मन ही मन संकल्प ले लिया। कैलास पहुँचने पर शिव जी तपस्या में रत हो गये और उन्होंने अखण्ड समाधि ले लिया। शंकर जी के इस रुख को देख कर सती जी भी समझ गईं कि महादेव जी ने मेरे त्याग की प्रतिज्ञा कर ली है अतः वे भी विधाता से प्रार्थना करने लगीं कि शीघ्रातिशीघ्र उनकी मृत्यु हो जाये।

0 comments:

Post a Comment