अब आप को बताते है रत्न की परिभाषा !! ~ Balaji Kripa

Sunday, 2 August 2015

अब आप को बताते है रत्न की परिभाषा !!

उपरोक्त विश्लेषण से अब हम रत्न को परिभाषित कर सकते हैं। निचोड़ के रूप में यह कहा जा सकता है कि जिस पत्थर से आभूषण की शोभा बढ़कर दुगुनी हो तथा उसकी लावण्यता आकर्षण पैदा करे, रत्न कहा जाएगा। इस श्रेणी में हम मोती को ले सकते हैं। लेकिन यह रत्न दुर्लभ नहीं है। इसमें उतना टिकाऊपन भी नहीं है, क्योंकि मोती मुलायम होता है। इसके अलावा यह कोई पत्थर भी नहीं है। यह तो समुद्र में पाया जाने वाला एक पदार्थ है। फिर भी अपने सौंदर्य व लावण्यता के कारण इसे रत्नों की श्रेणी में रखा जाता है। इन रत्नों की ख़ूबसूरती यूँ तो कई बातों पर आधारित होती है, लेकिन इनका सौन्दर्य प्रकाश की किरणों के छलावा से अत्यधिक बढ़ जाता है। प्रकाश कि किरणों का यह छलावा अजीबो-ग़रीब होता है। जब ये किरणें किसी रत्न पर पड़ती हैं तो कुछ रत्नों से टकराकर देखने वाले की आँखों की ओर लौट आती हैं। कुछ घुसकर पार चली जाती हैं और कुछ घुसकर फिर वापस लौटती हैं। इस तरह किरणों के पुंजों का एक मनभावन खेल आकर्षक पुंजों के रूप में दिखाई पड़ता है, जो बरबर मन को मोह लेता है। प्रकाश की यह किरण पुंज हमें स्वच्छ-धवल दिखाई पड़ती है, लेकिन इसकी सफ़ेदी में सात रंग होते हैं। इन्हीं सात रंगों का मिश्रण होता है यह सफ़ेदी। दरअसल, जब कोई प्रकाश की किरण किसी रत्न के भीतर जाकर वापस लौटती है तो वह सात रंगों में बंट जाती है। ऐसी स्थिति में लगता है कि वह रत्न सतरंगी किरणों से ढकी हुई अदभुत वस्तु है। स्वाभाविकत: यही दृश्य मनुष्य को अपनी ओर आकृष्ट कर लेता है। इसी आकर्षण से मनुष्य में रत्न प्राप्ति की इच्छा जन्म लेती है। रत्नों के गुण को प्रकाशीय गुण कहते हैं।

जैविक व वानस्पतिक रत्नों की उत्पत्ति-

प्रकृति में खनिज रत्नों के अलावा जैविक व वानस्पतिक रत्न भी पाए जाते हैं, जो इनकी क्रिया-प्रतिक्रियाओं के फलस्वरूप उत्पन्न होते हैं। मोती एवं मूँगा जैविक रत्न हैं जबकि तृणमणि और जेड वानस्पतिक रत्न। खनिज रत्न खानों से प्राप्त होते हैं, लेकिन जैविक रत्न समुद्रों में पाए जाते हैं। वानस्पतिक रत्न पर्वतों से प्राप्त होता हैं। दूसरी ओर कृत्रिम रत्नों के निर्माण का प्रचलन भी प्राचीनकाल से है, लेकिन आज इस क्षेत्र में भारी उन्नति हुई है। वर्तमान में कृत्रिम रत्नों का उत्पादन व्यापक पैमाने पर हो रहा है। सच कहें तो प्राकृतिक व शुद्ध रत्नों की अपेक्षा कई गुना अधिक कृत्रिम रत्न अब बाज़ार में पट गए हैं, जिन्हें पहचानने के मामले में बड़े-बड़े अनुभवी जौहरी व रत्न विशेषज्ञ भी धोखा खा जाते हैं।अंत में निष्कर्ष के तौर पर यह कहा जा सकता है कि प्रकृति की गोद में पड़े रत्नों का अस्तित्व मानव से पहले था, जो एक लम्बी प्रक्रिया के दौरान सामने आए। इन्होंने प्रकृति की गर्भ में रहकर न जाने कितने घात-प्रतिघात, उथल-पुथल, क्रिया-प्रतिक्रिया आदि सहे और खुद को ऐसा बना लिया कि उन पर इनका कोई असर ही न हो। फलतः ये मानव के लिए अत्यंत ही उपयोगी सिद्ध हुए। ज्योतिष के क्षेत्र में इनके उपयोग का मुक़ाबला कोई नहीं कर सकता-ऐसा कहना असंगत नहीं लगता। क्योंकि इनमें विभिन्न प्रकार की परिस्थितियों को सहने की अभूतपुर्व शक्ति निहित होती है।
रत्नों की पहचान कैसे करे -
प्रत्येक रत्न में रंगों का 'फिंगर प्रिन्ट' होता है। इसे शोषक स्पेक्ट्रम कहते हैं। यह 'फिंगर प्रिन्ट' प्रत्येक रत्न में भिन्न-भिन्न होता है जो रत्न की पहचान स्थापित करता है। इसे आँखों से यूँ ही नहीं देखा जा सकता। इसलिए रत्नशास्त्री इसे 'स्पेक्ट्रोस्कोप' यंत्र से देखते हैं। यह यंत्र रत्न से निकलने वाली रोशनी को इसके रंगों के स्पेक्ट्रम में विभाजित कर देता है। यह प्रत्येक रत्न में अलग-अलग होता है। इसलिए रत्न की पहचान आसानी से होती है। कुछ रत्नों पर कृत्रिम प्रकाश पड़ने से उसका असली रंग और आभा बदल जाती है, जैसे-पुखराज सूर्य की रोशनी में जितनी अच्छी प्राकृतिक आभा देगा, वैसी बिजली के लैम्प के नीचे नहीं दे सकता। लेकिन माणिक्य और पन्ने की आभा कृत्रिम प्रकाश में दुगुनी हो जाती है। सबसे विस्मयकारी असर एलेक्जेन्ड्राइट पर होता है, जो सूर्य की रोशनी में हरा और विद्युत प्रकाश में लाल दिखाई देता है। हीरे के अतिरिक्त अन्य सभी रत्नों में प्राकृतिक एवं कृत्रिम प्रकाश का एक अनूठा प्रभाव और अन्तर देखने को मिलता है, जो प्रयोगशालाओं में परीक्षण के दौरान विशेष रूप से परिलक्षित होता है। अलग-अलग श्रेणी के रत्नों में जो प्रकाशीय चमक होती है, ठीक वैसी ही रंग काग़ज़ पर दर्शाना बहुत मुश्किल है। इनके वास्तविक रंग के जितने भी भेद और अन्तर दिखाई पड़ते हैं, हम उतने रंगों का चित्रण नहीं कर सकते। किसी भी रत्न में कोई भी रंग एकसार समान मात्रा में नहीं होता। हज़ारों प्रकार के रत्नों के रंग भी हज़ारों हैं। रंग विज्ञान और रत्नों के व्यापारी इन सभी रंगों के समतुल्य प्राकृतिक रंगों की सीमित श्रेणी से ही इनकी शुद्धता की जाँच करते हैं।

रत्नों के प्रकार एवं प्राप्ति -

रत्नों को तीन श्रेणियों में बांटा गया है। इसका आधार इनके प्राप्ति स्थान व देशान्तर भिन्नता को बनाया गया है-
पाषाण रत्न- चट्टानों, शिलाखण्डों एवं कुछ नदियों से प्राप्त रत्न जैसे- हीरा, माणिक्य, नीलम, अकीक, इत्यादि पाषाण रत्न कहलाते हैं।
प्राणिज रत्न- जलीय जीवों व अन्य प्राणियों से प्राप्त रत्न जैसे- हाथी दांत, मोती सीप तथा नागमणि आदि इस श्रेणी में आते हैं।
वानस्पति रत्न- इसमें कहरुवा जैसे- अश्मीहूत रत्नों की गणना की जाती है।

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