क्या आप को पता है गर्भस्थ शिशु क्या सोचता है, क्या प्रार्थना करता है और क्या कस्ट उठता है !!! ~ Balaji Kripa

Sunday, 30 August 2015

क्या आप को पता है गर्भस्थ शिशु क्या सोचता है, क्या प्रार्थना करता है और क्या कस्ट उठता है !!!


एक महिला के लिए शायद दुनिया का सबसे सुनहरा पल वह होता है जब वह मां बनती है। उससे पहले तो उसे यह एहसास भी नहीं होता कि उसकी ज़िंदगी कितनी अधूरी थी। आजकल की मॉडर्न ख्यालात की महिलाएं शायद इस बात को गंभीरता से ना लें, लेकिन यह कोई किताबी बातें नहीं हैं। ना ही शब्दों को खूबसूरती से उतारने का तरीका है, बल्कि यह तो उन महिलाओं का अनुभव है जिन्होंने पहली बार अपने बच्चे को अपने हाथों में लिया।साइंस ने एक महिला के गर्भ धारण करने से लेकर गर्भावस्था में वह और उसका होने वाला शिशु क्या महसूस करते हैं, उसके बारे में बताया है। लेकिन साइंस के इस आविष्कार से बहुत पहले ही हिन्दू धार्मिक ग्रंथों में से एक गरुण पुराण में इसका उल्लेख कर दिया गया था।मान्यतानुसार, भगवान विष्णु के परम भक्त गरुण को स्वयं विष्णुजी ने जो सीख दी थी, उसे गरुण पुराण के रूप में भक्त पाते हैं। इस पुराण में जीवन-मृत्यु, स्वर्ग, नरक, पाप-पुण्य, मोक्ष पाने के उपाय आदि के बारे में विस्तार से बताया गया है। इसके साथ ही गरुड़ पुराण में यह भी बताया गया है कि शिशु को माता के गर्भ में क्या-क्या कष्ट भोगने पड़ते हैं और वह किस प्रकार भगवान का स्मरण करता है।शिशु मां के गर्भ में क्या महसूस करता है, उस समय उसके मन एवं मस्तिष्क में क्या-क्या बातें चलती हैं इसके बारे में बताया गया है। एक अजन्मा बच्चा गर्भ में क्या सोच रहा है यह तो साइंस भी नहीं बता सकता, लेकिन हम आपको गरुण पुराण के इन तथ्यों के जरिये कुछ रोचक जानकारी देने जा रहे हैं।कुछ भी बताने से पहले गरुण पुराण में एक गर्भवती स्त्री के बारे में क्या बताया गया है, यह भी जान लें। गरुड़ पुराण के अनुसार, स्त्रियों में ऋतु काल आने से संतान की उत्पत्ति होती है। यह काल स्त्रियों के लिए तीन दिन का होता है जिस दौरान पौराणिक मान्यताओं के आधार पर उन्हें अपवित्र माना जाता है। ऋतु काल में पहले दिन स्त्री चांडाली, दूसरे दिन ब्रह्मघातिनी के समान तथा तीसरे दिन धोबिन के समान रहती है। ऐसा माना जाता है कि इन तीन दिनों में नरक से आए हुए जीव उत्पन्न होते हैं। यह बात सभी जानते हैं कि एक शिशु की उत्पत्ति एक पुरुष के वीर्य द्वारा होती है। जब इस वीर्य की एक भी बूंद स्त्री के भीतर प्रवेश लेती है तो यह स्त्री के भीतर मौजूद अंडे से जुड़कर शिशु को बनाती है।गरुण पुराण के अनुसार, वीर्य का स्त्री के भीतर मौजूद अंडे से संम्पर्क होने के बाद एक-एक दिन शिशु आकार बदलता है। पहली रात्रि यह आकार एक बिंदु यानि कि सूक्ष्म आकार का होता है लेकिन दूसरी रात्रि यह आकार कुछ बढ़कर बुलबुले जैसा हो जाता है। परंतु इसके बाद कुछ दिन बीतते ही यह शिशु मांसल आकार लेना आरंभ कर देता है। एक महीने में शिशु का मस्तक बन जाता है और फिर दूसरे महीने में हाथ आदि अंगों की रचना होती है। तीसरे महीने में शिशु के उन शारीरिक अंगों को आकार मिलना आरंभ हो जाता है। जैसे कि अंगुलियों पर नाखून का आना, त्वचा पर रोम की उत्पत्ति, हड्डी, लिंग, नाक, कान, मुंह आदि अंग बन जाते हैं। तीसरे महीने के खत्म होने तक तथा चौथे महीने के शुरू होने के कुछ समय में ही त्वचा, मांस, रक्त, मेद, मज्जा का निर्माण होता है। पांचवें महीने में शिशु को भूख-प्यास लगने लगती है। छठे महीने में शिशु गर्भ की झिल्ली से ढंककर माता के गर्भ मे घूमने लगता है। इसके बाद आरंभ होते हैं उसके कष्ट, जिन्हें आम इंसान सोच भी नहीं सकता। लेकिन छ्ठे महीने के बाद जब शिशु भूख-प्यास को महसूस करने लगता है और माता के गर्भ में अपना स्थान बदलने के भी लायक हो जाता है, तभी वह कुछ कष्ट भी भोगता है। माता जो भी खाद्य पदार्थ ग्रहण करती है वह उसकी कोमल त्वचा से होकर गुजरता है। ऐसा माना गया है कि इन कष्टों के कारण कई बार शिशु माता के गर्भ में ही बेहोश भी हो जाता है। माता जो भी तीखा, मसालेदार या गर्म तासीर वाला भोजन ग्रहण करती है वह बच्चे की त्वचा को कष्ट देता है। कहते हैं कि माता द्वारा खाए गए अन्न आदि से बढ़ता हुआ वह शिशु गंदगी, मूत्र आदि का स्थान तथा जहां अनेक जीवों की उत्पत्ति होती है, ऐसे स्थान पर सोता है। वह कितनी भी कोशिश करे लेकिन उस स्थान से अधिक दूर नहीं जा सकता।लेकिन इसके बाद भी उसके कष्ट कम नहीं होते, बल्कि और भी बढ़ जाते हैं। क्योंकि इसके बाद शिशु का मस्तक नीचे की ओर तथा पैर ऊपर की ओर हो जाते हैं। अब वह चाहकर भी इधर-उधर हिल नहीं सकता, वह खुद को एक पिंजरे में बंद कर दिए पक्षी की तरह महसूस करता है। ऐसी मान्यता है कि इन कष्टों से निवारण पाने के लिए ही शिशु हाथ जोड़ ईश्वर की स्तुति करने लगता है।माता के गर्भ में पल रहा शिशु जैसे ही अपने सातवें महीने में आता है, उसे ज्ञान की प्राप्ति हो जाती है। तभी ऐसा माना गया है कि वह अपनी भावनाओं के बारे में सोचता है, यह महज़ एक मान्यता नहीं है। उस समय शिशु यह सोचता है कि अभी तो मैं बेहद कष्टों में हूं लेकिन जैसे ही मैं इस गर्भ से बाहर जाऊंगा तो ईश्वर को भूल जाऊंगा। क्योंकि यही इस संसार की नियति है, ऐसा सोचकर वह दु:खी होता है और इधर-उधर घूमने लगता है। सातवें महीने में शिशु अत्यंत दु:ख से वैराग्ययुक्त हो ईश्वर की स्तुति इस प्रकार करता है - लक्ष्मी के पति, जगदाधार, संसार को पालने वाले और जो तेरी शरण आए उनका पालन करने वाले भगवान विष्णु का मैं शरणागत होता हूं।गर्भस्थ शिशु भगवान विष्णु का स्मरण करता हुआ सोचता है कि हे भगवन! तुम्हारी माया से मैं मोहित देह आदि में और यह मेरे ऐसा अभिमान कर जन्म मरण को प्राप्त होता हूं। मैंने परिवार के लिए शुभ काम किए, वे लोग तो खा-पीकर चले गए। मैं अकेला दु:ख भोग रहा हूं। हे भगवन! इस योनि से अलग हो तुम्हारे चरणों का स्मरण कर फिर ऐसे उपाय करूंगा, जिससे मैं मुक्ति को प्राप्त कर सकूं।इसके बाद अपने आसपास गंदगी देख वह फिर से भगवान से प्रार्थना करता है और कहता है - हे भगवन, मुझे कब बाहर निकालोगे? सभी पर दया करने वाले ईश्वर ने मुझे ये ज्ञान दिया है, उस ईश्वर की मैं शरण में जाता हूं, इसलिए मेरा पुन: जन्म-मरण होना उचित नहीं है। फिर माता के गर्भ में पल रहा शिशु भगवान से कहता है कि मैं इस गर्भ से अलग होने की इच्छा नहीं करता क्योंकि बाहर जाने से पाप कर्म करने पड़ते हैं, जिससे नरक आदि प्राप्त होते हैं। इस कारण बड़े दु:ख से व्याप्त हूं फिर भी दु:ख रहित हो आपके चरण का आश्रय लेकर मैं आत्मा का संसार से उद्धार करूंगा।माता के गर्भ में पूरे नौ महीने शिशु भगवान से प्रार्थना ही करता है, लेकिन यह समय पूरा होते ही जब प्रसूति के समय वायु से तत्काल बाहर निकलता है, तो उसे कुछ याद नहीं रहता। साइंस के अनुसार मां के गर्भ से बाहर आने वाले शिशु को काफी पीड़ा का सामना करना पड़ता है जिस कारण उसके मस्तिष्क पर काफी ज़ोर पड़ता है। शायद यही कारण है कि उसे कुछ भी याद नहीं रहता।लेकिन गरुण पुराण के अनुसार प्रसूति की हवा से जैसे ही श्वास लेता हुआ शिशु माता के गर्भ से बाहर निकलता है तो उसे किसी बात का ज्ञान भी नहीं रहता। गर्भ से अलग होकर वह ज्ञान रहित हो जाता है, इसी कारण जन्म के समय वह रोता है।

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