क्या आप को रत्नों की विशेषता पता है !! ~ Balaji Kripa

Saturday, 1 August 2015

क्या आप को रत्नों की विशेषता पता है !!


यदि संक्षिप्त में रत्न की विशेषता ज़ाहिर करनी है तो हम कह सकते हैं कि जिसमें अदभुत सौंदर्य व लावण्य हो, वह रत्न है। लेकिन रत्न की यह परिभाषा भी अधूरी है, क्योंकि केवल सौंदर्य व लावण्य ही किसी पम्थर को रत्न की संज्ञा से विभूषित नहीं करता। रत्न उसे ही कहेंगे, जिसका सौंदर्य व लावण्य अत्यधिक टिकाऊपन के गुण से भरपूर हो, अर्थात् जिसका सौंदर्य व लावण्य लम्बे समय तक बरक़रार रहे। साथ ही साथ स्थिर भी रहे। इन दोनों गुणों के मेल से रत्नों में एक दिव्यता आती है, उसके प्रति एक स्वाभाविक श्रद्धा मन में उमड़ती है। इसके अलावा जिन पत्थरों को रत्न कहा जाता है, उनमें दो गुण और होते हैं। पहला गुण है, ऐसे पत्थरों का कम पाया जाना। इसी वजह से इन्हें दुर्लभ पत्थर भी कहा जाता है। अत: लोग इन्हें आदर और प्रमुखता देते हैं। दूसरा गुण है, जिस पत्थर का अधिक चलन हो, मांग हो और फ़ैशन हो, उसे भी रत्न की संज्ञा दी जाती है।उदाहरण स्वरूप, सन् 1920 से 1922 तक यूरोप व कुछ अन्य देशों में अम्बर अथवा तृणमणि की खूब मांग थी। वर्तमान में तारे की तरह चमकने वाले हीरे अथवा बारह किरणें छोड़ने वाले नीलम की मांग बहुत है। दरअसल, समय और बदलती अभिरुचि के अनुसार रत्नों की मांग भी परिवर्तित होती रहती है। रत्न की अंगूठी या लॉकेट पहने से व्यापार में उन्नति, नौकरी में पदोन्नति, राजनीति में सफलता, कोर्ट-कचहरी में सफलता, शत्रु नाश, कर्ज़ से मुक्ति, वैवाहिक ‍तालमेल में बाधा को दूर कर अनुकूल बनाना, संतान कष्ट, विद्या में रुकावटें, विदेश, आर्थिक उन्नति आदि में सफल‍ता मिलती है। मानवीय उत्थान-पतन में इनकी अद्भुत भूमिका को आँकना आसान नहीं है; तभी तो भारतीय कोहनूर हीरा अपनी दमक एवं प्रभाव से विश्व स्तर पर श्रेष्ठता बनाए हुए है।

क्या आप को पता है रत्नों की चमक केसी होती है

मनुष्य जब कोई वस्तु देखता है तो सबसे पहले उसकी दृष्टि उस वस्तु के बाह्य परत पर पड़ती है। उसके अतिरिक्त परत पर यकायक दृष्टि का जाना अस्वाभाविक है। रत्नों के बाहरी परत अथवा सतह पर एक विशेष तरह की चमक विद्यमान रहती है, जिसे मनुष्य पहली नज़र में ही देख लेता है। रत्नों की यह चमक अथवा ज्योति मुख्य रूप से इस बात पर निर्भर करती है कि उस पर पड़ने वाली प्रकाश की किरणों को कितनों अंशों व मात्रा में वापस लौटाता है। कहने का मतलब यह है कि उससे टकराकर या फिर उसके अन्दर प्रवेश करके कितने प्रतिशत प्रकाश की किरणें वापस लौटती हैं। रत्नों से टकराकर या प्रवेश करके जो किरणें लौटती हैं, वे गुण के आधार पर कई तरह की होती हैं-
तुतिया चमक- यह चमक प्राय: प्रत्येक रत्नों के बाहरी सतह पर ही दिखाई देती है।
धात्विक चमक- यह चमक धात्विक होती है, अर्थात् किसी धातु पर प्रकाश की किरणें पड़ने के बाद उससे निकलने वाली किरणें होती हैं। पीतल, सोना, इस्पात, ताँबा, चाँदी, प्लेटिनम आदि धातु पर प्रकाश पड़ता है, तो उसमें जैसी चमक होती है, ठीक उसी तरह की किरणें किसी रत्न पर प्रकाश पड़ने पर निकलती हैं। इसीलिए इसे धात्विक चमक कहते हैं।
मोती की चमक- मोती की अपनी एक विशेष चमक होती है। इसीलिए जौहरी इसे मोती की चमक या मुक्ता-ज्योति कहते हैं। इसे प्राच्य चमक भी कहा जाता है।
राल चमक- यह चमक कुछ लालिमा लिए हुए होती है। वस्तुत: यह रत्न जैसी ही चमक है। इसीलिए इसे राल चमक या राज ज्योति कहते हैं।
रेशमी चमक- यह चमक रेशम-सी चिकनी और मुलायम होती है। रत्नों पर जब प्रकाश की किरणें पड़ती हैं तो उससे निकलने वाली चमक रेशम की तरह मुलायम-सी दिखती हैं। अत: रेशमी इसे चमक कहते हैं। ऐसी चमक सभी रत्नों में नहीं होती है। 
इनके अतिरिक्त भी कई प्रकार की चमक होती हैं-जैसे हीरक ज्योति, मंद ज्योति और काचर ज्योति। ये भी रत्नों में पाई जाती हैं। लेकिन ये सभी रत्नों में प्रकट नहीं होती हैं।

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