अगर आप संस्कृत में मंत्र उच्चारण न कर पाएं तो चौपाई से आप का बेड़ा पार लगाएंगे हनुमान जी !! ~ Balaji Kripa

Thursday, 13 August 2015

अगर आप संस्कृत में मंत्र उच्चारण न कर पाएं तो चौपाई से आप का बेड़ा पार लगाएंगे हनुमान जी !!



ग्रंथों के अनुसार कलयुग में श्री हनुमान जी की शक्ति निर्बल इंसान को सहायता प्रदान करती है। कलयुग में संस्कृत के मंत्र, जिनका उच्चारण व प्रयोग न सिर्फ बहुत कठिन है उससे लाभ प्राप्ति के लिए भी बहुत तप इत्यादि की आवश्यकता पड़ती है। ऐसे में भगवान राम व हनुमान भक्त गोस्वामी तुलसीदास जी ने जन बोलचाल की भाषा में रामचरित मानस की रचना की और वाराणसी में भगवान शंकर ने मानस की चौपाइयों को मंत्र शक्ति प्रदान की।रामचरित मानस की चौपाइयां से सभी मनोरथ सिद्ध होते हैं। मानस सिद्ध मंत्र का विधान यह है की पहले रात को दस बजे के बाद अष्टांग हवन के द्वारा सिद्ध करना चाहिए।  फिर जिस-जिस कार्य के लिए मंत्र जप की आवश्यकता हो उसके लिए नित्य जप करना चाहिए। जिस उद्देश्य की पूर्ति के लिए जिस चौपाई का जप बतलाया गया है उसको सिद्ध करने के लिए सर्व प्रथम श्री हनुमान जी की आशीर्वाद मुद्रा वाली तस्वीर या मूर्ति अथवा रामदरबार की तस्वीर या मूर्ति के समक्ष उसी चौपाई द्वारा 108 बार हवन करना चाहिए। हवन की प्रत्येक आहुति में चौपाई आदि के अंत में 'स्वाहा' शब्द का उच्चारण करना चाहिए। एक दिन हवन करने से मानस के मंत्र सिद्ध हो जाते हैं। इसके पश्चात जब तक की कार्य सफल न हो जाएं तब तक उस चौपाई का जप प्रतिदिन एक माला अर्थात एक सौ आठ बार जपना चाहिए।
हवन सामग्री  -
चन्दन का बुरादा, काले तिल, शुद्ध देसी घी, शुद्ध शक्कर, अगर, तगर, कपूर, शुद्ध केसर, नागरमोथा, पंचमेवा(गरी, पिस्ता, बादाम, किशमिश, अखरोट या काजू ले सकते हैं), जौ, चावल

विविध कामना सिद्धि के कुछ चोपाई  निम्नलिखित है जिनसे आप लाभ प्राप्त कर सकते हैं :-मुकदमे में जीत हेतु -
पवन तनय बल पवन सामना, बुद्धि बिबेक बिज्ञान निधाना।
कवन सो काज कठिन जग माही, जो नहीं होइ तात तुम पाहि।।


श्री हनुमान जी की प्रसन्नता प्राप्ति के लिए -
सुमिरि पवनसुत पावन नामू अपने बस करी राखे रामू।।
मस्तिष्क की पीड़ा दूर करने के लिए -
हनुमान अंगद रन गाजे। हांक सुनत रजनीचर भाजे।।

डर व भूत भागने के लिए -
प्रनवउं पवनकुमार खेल बन पावक ग्यान घन।
जासु हृदय अगर बसहि राम सर चाप धार।।


ज्ञान-प्राप्ति के लिये-
छिति जल पावक गगन समीरा। पंच रचित अति अधम सरीरा।।
 

यात्रा की सफलता के लिए-
प्रबिसि नगर कीजै सब काजा। ह्रदयं राखि कोसलपुर राजा॥
 

विवाह के लिए-
तब जनक पाइ वशिष्ठ आयसु ब्याह साजि संवारि कै।
मांडवी श्रुतकीरति उरमिला, कुंअरि लई हंकारि कै


शत्रुता समाप्ति हेतु -
बयरु न कर काहू सन कोई। राम प्रताप विषमता खोई॥

मनचाहे कार्यों की सफलता हेतु -
भव भेषज रघुनाथ जसु सुनहिं जे नर अरु नारि।
तिन्ह कर सकल मनोरथ सिद्ध करहिं त्रिसिरारि।।


काम धंदे के लिए-
बिस्व भरण पोषन कर जोई। ताकर नाम भरत जस होई।।

गरीबी समाप्ति हेतु -
अतिथि पूज्य प्रियतम पुरारि के। कामद धन दारिद दवारि के।।

विविध रोगों तथा उपद्रवों की शान्ति के लिए-
दैहिक दैविक भौतिक तापा।राम राज काहूहिं नहि ब्यापा॥
 

शिक्षा में सफलता के लिए-
जेहि पर कृपा करहिं जनु जानी। कबि उर अजिर नचावहिं बानी॥
मोरि सुधारिहि सो सब भांती। जासु कृपा नहिं कृपां अघाती॥
 

संकट-नाश के लिए-
जौं प्रभु दीन दयालु कहावा। आरति हरन बेद जसु गावा।।
जपहिं नामु जन आरत भारी। मिटहिं कुसंकट होहिं सुखारी।।
दीन दयाल बिरिदु संभारी। हरहु नाथ मम संकट भारी।।

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