रत्नों में रंगों का प्रभाव क्या होता है - ~ Balaji Kripa

Sunday, 2 August 2015

रत्नों में रंगों का प्रभाव क्या होता है -



रत्नों के बाह्म रूप को आभामंडित करने में रंगों का बहुत बड़ा योगदान है। अगर रंग-रूप में रत्न द्युतिमान न हों तो उनकी कोई कीसम नहीं रह जाती। कई प्रकार के रत्न असली-मूल्यवान रत्नों से मिलते-जुलते हैं, परन्तु रंग में ज़रा-सा भेद होने से उनकी असलियत खुल जाती है। रत्नों में रंग का प्रभाव रंगहनी डालने पर नज़र आता है। रंगों को सोख लेने तथा उसे प्रतिबिम्बित करने की क्षमता पर ही रत्न का रंग आधारित होता है। सफ़ेद रंग इन्द्रधनुषी रंगों से बना है। जब यह रत्न पर पड़ता है तो स्पेक्ट्रम के कुछ रंग रत्न द्वारा सोख लिए जाते हैं। जो रंग रत्न द्वारा नहीं सोखा जाता, वह या तो रत्न से निकल जाता है या प्रतिबिम्बित होता है। प्रतिबिमित रंग ही रत्न को रंगीन आभा देता है। कुछ रत्न केवल एक ही रंग के होते हैं, जैसे-मैलाकाइट सदैव हरा होता है। यदि कोई रत्न लाल नज़र आता है तो उससे केवल लाल रंग ही प्रतिबिम्बित होता है, जबकि अन्य सभी रंग रत्न द्वारा आत्मसात् कर लिए जाते हैं।

रत्नों के संरचना तथा आकार कैसा होता है -

अधिकांश रत्न खनिज रूप में पाए जाते हैं। इनकी रचना धरती के गर्भ में कुछ विशेष भौतिक तथा रासायनिक परिवर्तनों के फलस्वरूप होती है। रत्नों की उत्पत्ति का कारण ताप तथा दाब होता है। कुछ खनिज धरती के गर्भ में कालान्तर में आए लावे से तथा कुछ अन्य धरती के भीतर जता ईधन या गैसों से निर्मित होते हैं। कुछ ऐसे भी रत्न हैं जो पारदर्शी या वर्तमान खनिजों पर पड़ने वाले धरती के तापमान और दबाव के कारण अपनी अलग संरचना बना लेते हैं। कुछ रत्न चट्टानों से अलग होकर झरनों तथा जलस्रोतों आदि के साथ बहकर नदियों की तलहटी में जमा हो जाते हैं। जल में बहते रहने से इनकी सतह चिकनी हो जाती है। ये गोल या अण्डाकार हो जाते हैं। खनिज रत्नों के अलावा जैविक प्रक्रिया से प्राप्त होने वाले रत्न मोती हैं। ये सीप द्वारा निर्मित होते हैं। सीप के भीतर रहने वाले घोघें को अपने अन्दर (सीप में) किसी विजातीय तत्त्व के प्रवेश कर जाने से कष्ट होता है। फलत: वह एक विशेष प्रकार का द्रव्य उस तत्त्व के चारों ओर लपेट देता है। ऐसी स्थिति में यह द्रव्य गोल आकार में मोती बन जाता है। इसी सिद्धान्त के आधार पर कृत्रिम मोतियों का निर्माण होता है। मूंगे का निर्माण 'पोलिप्स' नामक समुद्री जीव की अस्थियों से होता है। तृणमणि या कहरुवा की उत्पत्ति पेड़ों से निकले रेजिन के जीवाश्म के रूप में परिवर्तित होने से होती है। यह एक वानस्पतिक उत्पत्ति है।
रत्नों पर प्रकाश तथा रंगों का प्रभाव कैसा होता है -

बहुत से रत्नों पर तीव्र प्रकाश या रंग का प्रभाव ऐसा दिखाई देता है कि जिनका सम्बन्ध न तो उनकी रासायनिक बनावट से होता है और न ही उनमें उपस्थित अशुद्धियों से, जो रंगीय आभा युक्त होती हैं। ये रंग प्रभाव मात्र रोशनी के वर्तनांक में अवरोध के कारण पैदा होते हैं। ये निम्न प्रकार के होते हैं-
इन्द्रधनुषीपन-अगर रत्नों के अन्दर दरारों और बेमेल लहरों में रोशनी डाली जाए तो वह कई कोणों में फैल जाती है। इसके परिणामस्वरूप रत्न के प्रभावमण्डल में इन्द्रधनुष जैसी आभा बिख़र जाती है। 
दूधियापन-  इस प्रकार की चमक मूनस्टोन श्रेणी के उन रत्नों में नज़र आती है, जिनको कैविकोन कट में तराशा जाता है। 
बिल्लौरीपन-  जब किसी रत्न को कैविकोन कट में तराशा जाता है तो रत्न के भीतर से परावर्तित होता प्रकाश बिल्ली की आँख जैसा प्रतीत होता है। 
झिलमिलापन-  इसमें रत्नों की ठोस पृष्ठभूमि पर झिलमिलाने वाला बहुरंगी प्रकाश नज़र आने लगता है।जगमगाहट- जिन रत्नों में भौतिक या रासायनिक प्रक्रिया के फलस्वरूप ज़रा सी रोशनी के प्रभाव से ढेर सारी जगमगाहट पैदा हो जाए, उनको उज्ज्वल प्रकाश के वर्तनांक श्रेणी का रत्न माना गया है। परन्तु इसमें जगमगाहट ताप उत्सर्जन सम्मिलित नहीं है। इन्फ़्रा-रेड किरणें डालने पर रत्नों को जाँचने-परख़ने से जो परिणाम निकलते हैं, वे सिद्धान्त रूप से प्रतिदीप्ति कहलाते हैं। इस प्रक्रिया से रत्न की रोशनी या जगमगाहट देखी जाती है।ओपल रंगी- आमतौर से नीली सूक्ष्म तरंगों के परावर्तन के कारण सामान्य ओपल रत्नों में नीली या मुक्ताभ आभा दिखाई देती है।
बहुरंगी- ऐसे रंगों की छटा ओपल श्रेणी के रत्नों से प्रस्फुटित होती है। पत्थर को घुमाने या हिलाने-डुलाने से बहुत सारे रंगों की वर्ण आभा प्रभावमण्डल में बिख़र जाती है। 
दोगलापन- धात्विक चमक ख़ासतौर से लेब्रेडोराइट और स्पेक्ट्रोलाइट श्रेणी के रत्नों में पाई जाती है। इन रत्नों की प्रधान वर्ण आभा हरे व नीले रंग में होती है। परन्तु उसका समूचा दृश्य-पटल रंग-बिरंगा होना ज़रूरी है।

नव रत्न कोन-कोन से होते है -

सामान्य तौर पर ग्राहों-नक्षत्रों के अनुसार ज्योतिष में मात्र नवरत्नों को ही लिया जाता है। इन रत्नों के उपलब्ध न होने पर इनके उपरत्न या समान प्रभावकारी रत्नों का प्रयोग किया जाता है। भारतीय मान्यता के अनुसार कुल 84 रत्न पाए जाते हैं, जिनमें माणिक्य, हीरा, मोती, नीलम, पन्ना, मूँगा, गोमेद, तथा वैदूर्य (लहसुनिया) को नवरत्न माना गया है। ये रत्न ही समस्त सौरमण्डल के प्रतिनिधि माने जाते हैं। यहीं कारण है कि इन्हें धारण करने से शीघ्र फल की प्राप्ति होती है।
नवग्रह और रत्न ग्रहों के अनुसार रत्नों की अनुकूलता

ग्रह                                   संबंधित रत्न                                        उपयुक्त धातु
सुर्य                                  माणिक्य                                                    स्वर्ण
चंद्र                                    मोती                                                        चाँदी
मंगल                                   मूँगा                                                       स्वर्ण
बुध                                    पन्ना                                                       स्वर्ण,काँसा
बृहस्पति                            पुखराज                                                    चाँदी
शुक्र                                   हीरा                                                            चाँदी
शनि                                  नीलम                                                       लोहा, सीसा
राहु                                   गोमेद                                                        चाँदी, सोना, ताँबा, लोहा, काँसा
केतु                                  लहसुनिया                                                 चाँदी, सोना, ताँबा, लोहा, काँसा
 

लग्न  राशि और   स्वामी ग्रह  के अनुसार रत्नों की अनुकूलता

लग्न साशि                           स्वामी ग्रह                                                          अनुकूल
मेष                                         मंगल                                                                 मूँगा
वृषभ                                      शुक्र                                                                    हीरा
मिथुन                                     बुध                                                                    पन्ना
कर्क                                        चंद्र                                                                    मोती
सिंह                                      सूर्य                                                                     माणिक्य
कन्या                                     बुध                                                                     पन्ना
तुला                                      शुक्र                                                                      हीरा
वृश्चिक                                 मंगल                                                                    मूँगा
धनु                                       गुरु                                                                        पुखराज
मकर                                     शनि                                                                       नीलम
कुंभ                                      शनि                                                                        नीलम
मीन                                     गुरु                                                                          पुखराज


नव रत्न
माणिक्य रत्न-  माणिक्य सूर्य ग्रह का रत्न है। माणिक्य को अंग्रेज़ी में 'रूबी' कहते हैं। यह गुलाब की तरह गुलाबी सुर्ख श्याम वर्ण का एक बहुमूल्य रत्न है और यह काले रंग का भी पाया जाता है। इसे सूर्य-रत्न की संज्ञा दी गई है। अरबी में इसको 'लाल बादशाह ' कहते हैं। यह कुरुंदम समूह का रत्न है। गुलाबी रंग का माणिक्य श्रेष्ठ माना गया है।
पन्ना रत्न-  पन्ना बुध ग्रह का रत्न है। पन्ना को अंग्रेज़ी में 'एमेराल्ड' कहते हैं जो कई रंगों में पाया जाता है। यह हरा रंग लिए सफ़ेद लोचदार या नीम की पत्ती जैसे रंग का पारदर्शक होता है। नवरत्न में पन्ना भी होता है। हरे रंग का पन्ना सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। पन्ना अत्यंत नरम पत्थर होता है तथा अत्यंत मूल्यवान पत्थरों में से एक है। रंग, रूप, चमक, वजन, पारदर्शिता के अनुसार इसका मूल्य निर्धारित होता है।
हीरा रत्न-  हीरा शुक्र ग्रह का रत्न है। अंग्रेज़ी में हीरा को 'डायमंड' कहते हैं। हीरा एक प्रकार का बहुमूल्य रत्न है जो बहुत चमकदार और बहुत कठोर होता है। यह भी कई रंगों में पाया जाता है, जैसे- सफ़ेद, पीला, गुलाबी, नीला, लाल, काला आदि। इसे नौ रत्नों में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। हीरा रत्न अत्यन्त महंगा व दिखने में सुन्दर होता है। सफ़ेद हीरा सर्वोत्तम है और हीरा सभी प्रकार के रत्नों में श्रेष्ठ है। हीरे को हीरे के कणों के द्वारा पॉलिश करके ख़ूबसूरत बनाया जाता है।
नीलम रत्न-  नीलम शनि ग्रह का रत्न है। नीलम का अंग्रेज़ी नाम 'सैफायर' है। नीलम रत्न गहरे नीले और हल्के नीले रंग का होता है। यह भी कई रंगों में पाया जाता है; मसलन- मोर की गर्दन जैसा, हल्का नीला, पीला आदि। मोर की गर्दन जैसे रंग वाला नीलम उत्तम श्रेणी का माना जाता है। नीलम पारदर्शी, चमकदार और लोचदार रत्न है। नवरत्न में नीलम भी होता है। शनि का रत्न नीलम एल्यूमीनियम और ऑक्सिजन के मेल से बनता है। इसे कुरुंदम समूह का रत्न माना जाता है।
मोती रत्न-  मोती चन्द्र ग्रह का रत्न है। मोती को अंग्रेज़ी में 'पर्ल' कहते हैं। मोती सफ़ेद, काला, आसमानी, पीला, लाला आदि कई रंगों में पाया जाता है। मोती समुद्र से सीपों से प्राप्त किया जाता है। मोती एक बहुमूल्य रत्न जो समुद्र की सीपी में से निकलता है और छूटा, गोल तथा सफ़ेद होता है। मोती को उर्दू में मरवारीद और संस्कृत में मुक्ता कहते हैं।
लहसुनिया रत्न-  लहसुनिया केतु ग्रह का रत्न है। लहसुनिया रत्न में बिल्लि की आँख की तरह का सूत होता है। इसमें पीलापन्, स्याही या सफ़ेदी रंग की झाईं भी होती है। लहसुनिया रत्न को वैदूर्य भी कहा जाता है। 
मूँगारत्न-  मूँगा मंगल ग्रह का रत्न है। मूँगा को अंग्रेज़ी में 'कोरल' कहा जाता है, जो आमतौर पर सिंदूरी लाल रंग का होता है। मूँगा लाल, सिंदूर वर्ण, गुलाबी, सफ़ेद और कृष्ण वर्ण में भी प्राप्य है। मूँगा का प्राप्ति स्थान समुद्र है। वास्तव में मूँगा एक किस्म की समुद्री जड़ है और मूँगा समुद्री जीवों के कठोर कंकालों से निर्मित एक प्रकार का निक्षेप है। मूँगा का दूसरा नाम प्रवाल भी है। इसे संस्कृत में विद्रुम और फ़ारसी में मरजां कहते हैं।
गोमेद रत्न-  गोमेद राहु ग्रह का रत्न है। गोमेद का अंग्रेज़ी नाम 'जिरकॉन' है। सामान्यतः इसका रंग लाल धुएं के समान होता है। रक्त-श्याम और पीत आभायुक्त कत्थई रंग का गोमेद उत्त्म माना जाता है। नवरत्न में गोमेद भी होता है। गोमेद रत्न पारदर्शक होता है। गोमेद को संस्कृत में गोमेदक कहते हैं।
पुखराज रत्न-  पुखराज गुरु ग्रह का रत्न है। पुखराज को अंग्रेज़ी में 'टोपाज' कह जाता हैं। पुखराज एक मूल्यवान रत्न है। पुखराज रत्न सभी रत्नों का राजा है। यह अमूनन पीला, सफ़ेद, तथा नीले रंगों का होता है। वैसे कहावत है कि फूलों के जितने रंग होते हैं, पुखराज भी उतने ही रंग के पाए जाते हैं। पुखराज रत्न एल्युमिनियम और फ्लोरीन सहित सिलिकेट खनिज होता है। संस्कृत भाषा में पुखराज को पुष्पराग कहा जाता है। अमलतास के फूलों की तरह पीले रंग का पुखराज सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।

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