क्या आप को पता है कैसे हुआ नारियल का जन्म !! ~ Balaji Kripa

Saturday, 29 August 2015

क्या आप को पता है कैसे हुआ नारियल का जन्म !!



हिन्दू धर्म में नारियल का विशेष महत्तव है।  नारियल के बिना कोई भी धार्मिक कार्यक्रम संपन्न नहीं होता है।नारियल से जुडी एक पौराणिक कथा भी प्रचलित है जो जिसके अनुसार नारियल का इस धरती पर अवतरण ऋषि विश्वामित्र द्वारा किया गया था। आज हम आपको नारियल के जन्म से जुडी यही कहानी बता रहे है।यह कहानी प्राचीन काल के एक राजा सत्यव्रत से जुड़ी है। सत्यव्रत एक प्रतापी राजा थे, जिनका ईश्वर में सम्पूर्ण विश्वास था। उनके पास सब कुछ था लेकिन उनके मन की एक इच्छा थी जिसे वे किसी भी रूप में पूरा करना चाहते थे।वे चाहते थे की वे किसी भी प्रकार से पृथ्वीलोक से स्वर्गलोक जा सकें। स्वर्गलोक की सुंदरता उन्हें अपनी ओर आकर्षित करती थी, किंतु वहां कैसे जाना है, यह सत्यव्रत नहीं जानते थे।एक बार ऋषि विश्वामित्र  तपस्या करने के लिए अपने घर से काफी दूर निकल गए थे और लम्बे समय से वापस नहीं आए थे। उनकी अनुपस्थिति में क्षेत्र में सूखा पड़ा गया और उनका परिवार भूखा-प्यासा भटक रहा था। तब राजा सत्यव्रत ने उनके परिवार की सहायता की और उनकी देख-रेख की जिम्मेदारी ली।जब ऋषि विश्वामित्र वापस लौटे तो उन्हें परिवार वालों ने राजा की अच्छाई बताई। वे राजा से मिलने उनके दरबार पहुंचे और उनका धन्यवाद किया। शुक्रिया के रूप में राजा ने ऋषि विश्वामित्र द्वारा उन्हें एक वर देने के लिए निवेदन किया। ऋषि विश्वामित्र ने भी उन्हें आज्ञा दी।तब राजा बोले की वो स्वर्गलोक जाना चाहते हैं, तो क्या ऋषि विश्वामित्र अपनी शक्तियों का सहारा लेकर उनके लिए स्वर्ग जाने का मार्ग बना सकते हैं ! अपने परिवार की सहायता का उपकार मानते हुए ऋषि विश्वामित्र ने जल्द ही एक ऐसा मार्ग तैयार किया जो सीधा स्वर्गलोक को जाता था।राजा सत्यव्रत खुश हो गए और उस मार्ग पर चलते हुए जैसे ही स्वर्गलोक के पास पहुंचे ही थे, कि स्वर्गलोक के देवता इन्द्र ने उन्हें नीचे की ओर धकेल दिया। धरती पर गिरते ही राजा ऋषि विश्वामित्र के पास पहुंचे और रोते हुए सारी घटना का वर्णन करने लगे।देवताओं के इस प्रकार के व्यवहार से ऋषि विश्वामित्र भी क्रोधित हो गए, परन्तु अंत में स्वर्गलोक के देवताओं से वार्तालाप करके आपसी सहमति से एक हल निकाला गया। इसके मुताबिक राजा सत्यव्रत के लिए अलग से एक स्वर्गलोक का निर्माण करने का आदेश दिया गयाये नया स्वर्गलोक पृथ्वी  एवं असली स्वर्गलोक के मध्य में स्थित होगा, ताकि ना ही राजा को कोई परेशानी हो और ना ही देवी-देवताओं को किसी कठिनाई का सामना करना पड़े। राजा सत्यव्रत भी इस सुझाव से बेहद प्रसन्न हुए, किन्तु ना जाने ऋषि विश्वामित्र को एक चिंता ने घेरा हुआ था।उन्हें यह बात सत्ता रही थी  कि धरती और स्वर्गलोक के बीच होने के कारण कहीं हवा के ज़ोर से यह नया स्वर्गलोक डगमगा ना जाए। यदि ऐसा हुआ तो राजा फिर से धरती पर आ गिरेंगे। इसका हल निकालते हुए ऋषि विश्वामित्र ने नए स्वर्गलोक के ठीक नीचे एक खम्बे का निर्माण किया, जिसने उसे सहारा दिया।माना जाता है की यही खम्बा समय आने पर एक पेड़ के मोटे तने के रूप में बदल गया और राजा सत्यव्रत का सिर एक फल बन गया। इसी पेड़ के तने को नारियल का पेड़ और राजा के सिर को नारियल कहा जाने लगा। इसीलिए आज के समय में भी नारियल का पेड़ काफी ऊंचाई पर लगता है।इस कथा के अनुसार सत्यव्रत को समय आने पर एक ऐसे व्यक्ति की उपाधि दी गई ‘जो ना ही इधर का है और ना ही उधर का। यानी कि एक ऐसा इंसान जो दो धुरों के बीच में लटका हुआ है।

भगबान पर नारियल चढाने का क्या उद्देश्य होता है !!
 

हिन्दू धर्म में भगवान की पूजा-अर्चना करते समय विभिन्न चीज़ों पर ध्यान देना पड़ता है। पूजा मंत्रों से लेकर पूजा में इस्तेमाल होने वाली सामग्रियों का भी विशेष महत्व है। इन्हीं सामग्रियों में से एक है ‘नारियल’, जो भारत के दक्षिणी राज्यों के अलावा समुद्र तटीय राज्यों में उगता है।नारियल के फल को बांग्ला में नारिकेल भी कहा जाता है। अकसर इसे किसी शुभ कार्य करने से पहले या कई बार पूजा करने के बाद बाद भगवान के सामने फोड़ा जाता है, और फिर बाद में प्रसाद के रूप में इसका सेवन भी किया जाता है। आजकल घरों में कोई भी नई चीज़ लेने के बाद भी भगवान का नाम लेते नारियल फोड़ा जाता है।हिन्दू परम्पराओं के अनुसार नारियल को सात्विक फल माना जाता है। मान्यता है कि नारियल एक शुद्ध, पवित्र, फलदायी एवं भगवान से मनुष्य को जोड़ने वाला फल है। यही कारण है कि मंदिरों में आमतौर पर इसे पूजा के दौरान भगवान की मूर्ति के सामने तोड़ा जाता है। तोड़ने के बाद यह नारियल ‘भोग’ अथवा प्रसाद के रूप में भगवान के सामने अर्पित किया जाता है और बाद में मंदिर में उपस्थित भक्तों में बांटा जाता है। मान्यता है कि नारियल पर बने काले निशान भगवान शिव के तीसरे नेत्र को दर्शाते हैं, जो हिन्दू धर्म में अत्यंत महत्त्व रखता है। इसके अलावा नारियल का फल मनुष्य जाति की झलक भी दिखाता है। कहते हैं कि नारियल का आकार मनुष्य के सिर को दर्शाता है। नारियल के चारों ओर उपस्थित भूरे रंग की जटाएं व्यक्ति के बालों की प्रतीक हैं। इसके अलावा उसका सख्त हिस्सा व्यक्ति की खोपड़ी को दर्शाता है।यहां केवल मनुष्य के शारीरिक अंगों को नारियल से नहीं जोड़ा जाता, बल्कि नारियल का हर पहलू मनुष्य जाति को सामाजिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से दर्शाता है। जैसे-जैसे नारियल को इस्तेमाल में लाया जाता है, उसे तोड़ने तक की प्रक्रिया मनुष्य के जीवन के कई पहलुओं पर रोशनी डालती है। जैसे कि नारियल को फोड़ने से पहले हमेशा उसके ऊपर उपस्थित जटाओं को खींचकर निकाला जाता है। यहां हमारे संस्कार हमें समझाते हैं कि नारियल की जटाएं, जो कि मनुष्य के बालों को दर्शाती हैं, इन्हें निकालकर फेंका जाता है। ठीक इसी प्रकार से मनुष्य को भी अपने दिमाग में चल रही इच्छाओं को बाहर निकाल देना चाहिए।यह इच्छाएं दिन-प्रतिदिन हमें अंदर ही अंदर खत्म कर देती हैं। अंत में मनुष्य अपनी इन्हीं इच्छाओं को पूर्ण करने के लालच में ज़िंदगी का आनंद लेना भूल जाता है। जटाएं हटाने के बाद नारियल को आखिरकार फोड़ा जाता है। नारियल टुकड़ों में जब टूटता है तो उसके भीतर से पानी भी निकलता है। यहां नारियल का टूटना हमें समझाता है कि मनुष्य को भी नारियल की तरह ही टूट कर अपने भीतर से सभी अहंकार एवं दोष का प्रवाह कर देना चाहिए। जिस प्रकार से नारियल के अंदर पानी भरा होता है, उसी प्रकार से मानवीय मस्तिष्क के अंदर अहम, अहंकार, ईर्ष्या की भावना कूट-कूट कर भरी होती है। हमें इसी भावना को बाहर निकालना है।

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