क्या आप को पता है आज के मनुष्य का जीवन एवं उद्देश्य क्या है !!! ~ Balaji Kripa

Tuesday, 11 August 2015

क्या आप को पता है आज के मनुष्य का जीवन एवं उद्देश्य क्या है !!!

इस ब्रह्माण्ड में जन्म लेने वाले सभी जीव-जन्तुओं में मनुष्य जाति सर्वश्रेष्ठ है - ऐसा मैंने कई जगह पढ़ा एवं सुना है। परन्तु हमेशा से यह सवाल मेरे मन में उठता रहा है कि ऐसे दावों की प्रमाणिकता क्या है? मनुष्य सभी प्रजातियों में सर्वश्रेष्ठ है - इस बात को किन कसौटियों पर रखकर और किसके द्वारा परखा गया है? क्या कभी किसी तीसरी निष्पक्ष शक्ति ने ऐसा घोषित किया? क्या कभी कोई आकाशवाणी हुई? क्या कभी किसी दूसरी प्रजाति ने इसकी सत्यता को स्थापित किया? मेरी जानकारी में तो नहीं।हमने आदि काल से ही अपने आप को महिमामण्डित करके मनुष्य को सर्वश्रेष्ठ बताया है। शायद हमारी इस मान्यता का कारण हमारी तर्क-वितर्क करने की क्षमता को माना गया है। यहाँ पर सोचने योग्य बात यह है कि क्या केवल तर्क-वितर्क करने की क्षमता होने से मनुष्य सर्वश्रेष्ठ हो सकता है? मेरा तो यह मानना है कि हमारी इसी क्षमता के कारण हम इस धरती की सबसे खतरनाक और विनाशकारी प्रजाति हैं। इसी तर्क-वितर्क, सही-गलत, हानि-लाभ, यश-अपयश का भाव होने की वजह से मनुष्य दिग्भ्रमित हो गया है। इन्हें हम मोह का नाम दे सकते हैं। अपने इसी मोह के कारण मनुष्य स्वार्थी होता है। पूरे ब्रह्माण्ड में वह सबसे पहले अपने बारे में सोचता है। वह अपने इर्द-गिर्द सबसे पहले एक सामाजिक कवच बनाता है जिससे वह खुद का बचाव कर सके। यह सामाजिक कवच केवल उसके अस्तित्व को बचाने के लिए नहीं होता बल्कि उसके सम्पूर्ण व्यक्तित्व को एक पहचान देने के लिए बनाया जाता है। इसी कवच के अंदर रहकर वह तमाम कार्यों को करता है जिसे वह अपनी तरक्की समझता है। परन्तु दुःख की बात यह है कि जिसे हम कवच कहते या मानते हैं वह सत्य से बिल्कुल परे होता है। यह कवच सिर्फ सतह पर ही काम करता है। दूसरों को अपनी रंगीन तस्वीर दिखाने के लिए। अंदर से इंसान वैसा ही नंगा होता है जैसा जन्म के समय। दरअसल उसका पूरा अस्तित्व महज़ एक नियम के तहत बाध्य होता है जिस पर उसका कोई वश नहीं होता। यह नियम प्रकृति द्वारा संचालित होता है। मज़े की बात यह है की हर इंसान का सत्य यही है। मेरा और आपका भी। फिर भी हम एक दूसरे को अपने अपने कवच दिखा कर आकर्षित करने की कोशिश करते हैं और इसी कोशिश में अपनी पूरी ज़िन्दगी गुज़ार देते हैं। इसके लिए कितने कष्ट, द्वेष, छल-कपट, सब करते हैं। पूरी ज़िन्दगी भागते रहते हैं। अपना फायदा समझ कर पूरी प्रकृति के नियमों से खिलवाड़ करते हैं। और फिर हमारा सोचा हुआ काम पूरा हुआ या नहीं, हमने जो सामाजिक लक्ष्य निर्धारित किया, वो प्राप्त हुआ या नहीं, इसका कोई अर्थ नहीं रह जाता। नियम के तहत हमारी मृत्यु हो जाती है। इसीलिए मेरा मानना है की तर्क और वितर्क मनुष्य के महानता का नहीं बल्कि विनाश का कारण है। यह हमें प्रकृति के नियमों से दूर कर रहा है। हमने इसका प्रयोग खुद को भव्य और महान दिखाने के सिवा और कहीं नहीं किया। यही कारण है कि हमने अपनी प्रजाति को तथा अपने साथ अन्य प्रजातियों को भी खतरे में डाल दिया है। अगर इस ब्रह्माण्ड के सभी जीव-जन्तुओं की ध्यानपूर्वक समीक्षा करें तो पाएंगे की उनका जीवन बेहद सामान्य होता है। चाहे वह जंगल में रहने वाले जानवर हों या अन्य पशु-पक्षी। इन सबके अंदर किसी प्रकार की व्याकुलता नहीं होती। उनका जीवन अपने भरण-पोषण से ज्यादा और कुछ नहीं होता। वह प्रकृति के नियम से बंधे अपनी दिनचर्या पूर्ण करते हैं। यह व्याकुलता सिर्फ मनुष्यों में होती है। इससे भी गहराई में अगर समस्त सृष्टि के निर्माण को समझें तो पाएंगे की यहाँ धरती, आकाश, पाताल, समुद्र, नदी, पर्वत, रेगिस्तान, पेड़, फूल-पौधे, जानवर, पक्षी, कीड़े-मकौड़े, इंसान - सब अपनी अपनी जगह वास कर रहे हैं। इन सब चीज़ों को मिलाकर सृष्टि का निर्माण होता है। जैसे फूलों से पौधों की खूबसूरती बढ़ती है वैसे ही इन सभी चीज़ों से यह सृष्टि खूबसूरत होती है। यहाँ पर समझने योग्य बात यह है की इस सृष्टि की रचना तथा उसका पूरा जीवन काल प्रकृति के नियमों के तहत बंधा हुआ है। सिर्फ यही सत्य है और कुछ नहीं। कोई दूसरा नियम या किसी और प्रकार की व्यवस्था यहाँ काम नहीं कर सकती। इन नियमों के सामने मनुष्य का अस्तित्व बिल्कुल तुच्छ है। हम तो कई करोड़ प्रजातियों में से एक हैं। जितनी एक चींटी के अस्तित्व की अहमियत है, बिल्कुल उतनी ही हमारी भी। नदी अपनी जगह बह रही है। अगर कोई ये कहे कि नदी इसलिए बहती है ताकि हमारे खेतों को पानी मिल सके तो यह गलत होगा। नदी तो बहती ही रहेगी। इंसान हों या ना हों, खेत हों या ना हों, नदी तो अपनी जगह बहती ही रहेगी। वैसे ही फूल इसलिए नहीं खिलते ताकि आप उनकी खूबसूरती देख सकें, आप उनकी खुशबु महसूस कर सकें। आप हों या ना हों, फूल खिलते ही रहेंगे। जंगल में फूलों को देखने के लिए इंसान नहीं होते, फिर भी वह खिलते हैं, फिर भी उनमें खुशबु होती है और अपनी आयु समाप्त होने पर वो मुर्झा कर गिर जाते हैं। सभी चीज़ों की रचना अलग अलग है। इनके स्वभाव, आयु अलग अलग हैं। सबकी अलग अलग जीवन एवं मृत्यु निश्चित है। परन्तु उद्देश्य एक ही है। सृष्टि का निर्माण एवं संचालन। इसमें किसी का कोई हस्तक्षेप नहीं हो सकता। अब विचार करने योग्य बात यह है की मनुष्य जो इतना कुछ करता है, क्या उसका कोई अर्थ है !!

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