क्या आप को पता है गणेश चतुर्थी आज पूरे दिन जानिए शुभ योग, ये है पूजन विधि !! ~ Balaji Kripa

Thursday, 17 September 2015

क्या आप को पता है गणेश चतुर्थी आज पूरे दिन जानिए शुभ योग, ये है पूजन विधि !!


धर्म ग्रंथों के अनुसार भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को भगवान श्रीगणेश का जन्म हुआ था। इसीलिए इस चतुर्थी को विनायक चतुर्थी, सिद्धिविनायक चतुर्थी और श्रीगणेश चतुर्थी के नाम से जाना जाता है। इस बार गणेश चतुर्थी का पर्व आज 17 सितंबर, गुरुवार को है। ग्रंथों के अनुसार इस दिन जो स्नान, उपवास और दान किया जाता है, उसका फल भगवान श्रीगणेश की कृपा से सौ गुना हो जाता है। व्रत करने से मनोवांछित फल मिलता है। इस दिन श्रीगणेश भगवान का पूजन व व्रत इस प्रकार करें ! और पूरे वर्ष भी व्रत कर सकते है विशेष आवश्कता अनुसार कभी भी गणेश की प्रतिमा स्थापित कर सकते है !

पूजन विधि-
 

सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करने के बाद अपनी इच्छा के अनुसार सोने, चांदी, तांबे, पीतल या मिट्टी से बनी भगवान श्रीगणेश की प्रतिमा स्थापित करें (शास्त्रों में मिट्टी से बनी गणेश प्रतिमा की स्थापना को ही श्रेष्ठ माना है)। संकल्प मंत्र के बाद षोडशोपचार पूजन व आरती करें। गणेशजी की मूर्ति पर सिंदूर चढ़ाएं। मंत्र बोलते हुए 21 दूर्वा दल चढ़ाएं। 21 लड्डुओं का भोग लगाएं। इनमें से 5 लड्डू मूर्ति के पास रखें और 5 ब्राह्मण को दान कर दें। शेष लड्डू प्रसाद रूप में बांट दें। ब्राह्मणों को भोजन कराएं और उन्हें दक्षिणा देने के बाद शाम के समय स्वयं भोजन करें। पूजन के समय यह मंत्र बोलें- ऊं गं गणपतये नम:

दूर्वा दल चढ़ाने का मंत्र -
 

गणेशजी को 21 दूर्वा दल चढ़ाई जाती है। दूर्वा दल चढ़ाते समय नीचे लिखे मंत्रों का जाप करें-
ऊं गणाधिपतयै नम:
ऊं उमापुत्राय नम:
ऊं विघ्ननाशनाय नम:
ऊं विनायकाय नम:
ऊं ईशपुत्राय नम:
ऊं सर्वसिद्धप्रदाय नम:
ऊं एकदन्ताय नम:
ऊं इभवक्त्राय नम:
ऊं मूषकवाहनाय नम:
ऊं कुमारगुरवे नम:

इस तरह पूजन करने से भगवान श्रीगणेश अति प्रसन्न होते हैं और अपने भक्तों की हर मुराद पूरी करते हैं।
 

मिट्टी से बनी गणेश प्रतिमा की ही स्थापना क्यों की जाती है -
 

श्रीगणेश प्रतिमा का निर्माण मिट्टी से करना ही श्रेष्ठ होता है क्योंकि ये न केवल पर्यावरण के लिए उपयुक्त है बल्कि शास्त्र सम्मत भी है। इसका रहस्य गणेशजी के जन्म की कथा में ही छुपा हुआ है। धर्म ग्रंथों के अनुसार, माता पार्वती ने मिट्टी से एक बालक गढ़ा। (कई ग्रंथों में यह उबटन से निर्मित भी बताया जाता है।) उसमें प्राण फूंके और देवी स्नान के लिए चली गईं।यह बालक मां की आज्ञा से द्वार पर पहरा देने लगा। शिवजी का आगमन हुआ और बालक ने उन्हें भीतर जाने से रोका तो क्रोध में शिवजी ने बालक का सिर काट दिया। पार्वतीजी की गंभीर आपत्ति और क्रोध के बाद हाथी का मस्तक जोड़ा गया और उसमें प्राण भी फूंके गए। इस तरह गणेशजी पुनर्जीवित होकर एक नए और दिव्य स्वरूप में भक्तों के सामने आए। यह कथा उनके जन्म में पार्थिव तत्व अर्थात मिट्टी के महत्व को सामने लाती है। इस आग्रह के साथ कि इस बार जब प्रतिमाएं स्थापित की जाएं तो वे मिट्टी से निर्मित ही हों न कि अन्य कृत्रिम सामग्री से।

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