क्या आप को पता है कुण्डली के ग्रह "योगो में छिपाहैं आप का भविष्य" !! ~ Balaji Kripa

Wednesday, 9 September 2015

क्या आप को पता है कुण्डली के ग्रह "योगो में छिपाहैं आप का भविष्य" !!



जब दो या दो से अधिक  ग्रह एक साथ एक ही राशि में बैठते हैं तो इसे ‘योग’ कहा जाता है। नौ ग्रह और बारह राशियां, इन सभी के हजारों प्रकार की ‘संगत’ बनती हैं अर्थात हजारों योग एवं प्रत्येक का अलग नाम। हजारों प्रकार के ज्योतिषीय योग, कुछ अच्छे व कुछ बुरे। अच्छे योग अच्छा फल देने वाले एवं बुरे योग कठिनाई उत्पन्न करने वाले। एकत्र होने के अतिरिक्त जब ग्रह अलग-अलग भावों में शृंखलाबध्द होकर एक विशेष क्रम में उपस्थित होते हैं तब भी अनेक योगों का निर्माण होता है। जब कुछ ग्रह आपस में दृष्टि संबंध् बनाते हैं तब भी विशेष योग बनते हैं। साथ ही सूर्य एवं चन्द्र से जब कुछ अन्य ग्रह विशेष क्रम या संबंध् बनाते हैं तब भी अनेक योगों का निर्माण होता है। अलग-अलग बैठे ग्रह अपने स्वभाव के अनुसार, जिस भाव में बैठे हैं उससे संबंधित  एवं जिस राशि में हैं उससे अपने शत्रु -मैत्र संबंधनुसार ग्रहों की दृष्टि प्राप्त करते हैं। इसी क्षमता के अनुरूप समय आने पर ये अपने फल अपने-अपने कारकत्वों के अनुसार प्रदान करते हैं। किन्तु जैसे ही ये अलग-अलग बैठे ग्रह किसी कुण्डली में एक भाव में दो या दो से अधिक एकत्र होते हैं तो उत्पन्न होता है एक चमत्कार। अलग-अलग बैठे ग्रह फल प्रदान करने की जो क्षमता रखते हैं, योग बनने पर उनकी क्षमता कई गुणा प्रभावित हो जाती है। ज्योतिष शास्त्र में फलित करने के लिए या भविष्यवाणी करने के लिए या जातक का मार्गदर्शन करने के लिए ज्योतिषी की दृष्टि इन्हीं योगों में से गुजर कर शब्द पाती है। बिना योगों के निरीक्षण किए कोई भी भविष्य-कथन अपूर्ण ही नहीं अपितु अमान्य है। इन्हीं योगों का संसार ज्योतिष के फलित या भविष्य-कथन का सर्वाधिक महत्वपूर्णा तत्व है। इन योगों में से अनेक के नाम से ही इनका महत्व स्पष्ट होता है। कुछ नाम जो सर्वसाधरण में प्रचलित हैं उन्हें देखिए- ‘धन योग’, ‘राज योग’, ‘कुबेर योग’, ‘हंस योग’, ‘महाभाग्य योग’, ‘शंख योग’, ‘शिव योग’, ‘विष्णु योग’ या फिर  ‘दरिद्र योग’, ‘सर्पशाप योग’, ‘जार योग’, ‘शकट योग’, ‘विहग योग’ जैसे हजरों योग, योगों की अनेक श्रेणियां व अनेक प्रकार। ज्योतिष में योगों का महत्व अतुलनीय व अवर्णनीय है।

           ज्योतिषीय योग बन गया तो फल देगा यह आवश्यक नहीं है। यदि ऐसा होता तो एक ही कुण्डली में बनने वाले अनेक योग अपनी-अपनी प्रकृति अनुसार अच्छे या बुरे फल देते, पर क्या एक साथ? यह तो संभव नहीं है। तो क्या आगे-पीछे क्रमश:? तो फिर क्रम कैसे तय हो? ऐसे अनेक प्रश्न खड़े होते हैं जिनका उत्तार उस जिज्ञासा को शांत करता है कि किसी कुण्डली में अनेक अच्छे योग होने पर भी जातक को सुख या उपलब्धियां प्राप्त क्यों नहीं हुई? या फिर उस जिज्ञासा को कि किसी कुण्डली में अनेक बुरे योग बनते हैं फिर भी जातक क्यों सुख अनुभव करते हुए उन्नत हुआ? यहीं पर ज्योतिष की वह महत्वपूर्ण सीढ़ी प्राप्त होती है जो फलित करने या भविष्य-कथन कहने या फिर मार्गदर्शन करने के लिए परमावश्यक है और देती है ‘उत्तर’ उन सभी प्रश्नों व जिज्ञासाओं का जिनका वर्णन उपर किया है। यह परमावश्यक तत्व है- ‘दशा-अन्तर्दशा’। ज्योतिष में अनेक प्रकार की दशाओं का वर्णन किया गया है। ‘दशा-अन्तर्दशा’ कुण्डली में उपस्थित राशियों व ग्रहों से संबंध्ति जो अलग-अलग कालखंड ‘जातक’ को प्राप्त होते हैं, उनकी वैज्ञानिक गणना है। यह गणना व्यक्ति या जातक के जन्म से मृत्यु-पर्यन्त पूर्ण समय का ज्योतिषीय गणित बहुत सूक्ष्म विभाजन है। इस गणना में व्यक्ति प्रत्येक पल जन्म से मृत्यु तक किसी न किसी ग्रह की दशा-अन्तर्दशा के आधीन जीवन व्यतीत करता है अर्थात जीवन के हर क्षण किसी न किसी ग्रह का आध्पित्य जातक पर होता है अर्थात वह उसी के प्रभाव में होता है। दशा-अन्तर्दशा के अनुसार ही, जो योग जन्म-कुण्डली में प्राप्त हुए हैं, उन पर विचार किया जाता है। यदि प्राप्त ‘योगों’ का संबंध् चल रही ‘दशा-अन्तर्दशा’ से होगा तब तो योग फलित होगा अन्यथा वह योग संबंध्ति दशा-अन्तर्दशा के आने तक कोई विशेष प्रभाव उत्पन्न नहीं करेगा अर्थात ‘योग’ तो बना किन्तु फलित होगा अपने से संबंध्ति ‘दशा-अन्तर्दशा’ के कालखंड में। प्राय: ऐसा भी होता है कि संबंधित  ‘दशा’ जीवन पर्यन्त प्राप्त नहीं हुई तो इस ‘योग’ का किसी भी प्रकार का कैसा भी फल प्राप्त नहीं होगा। योगों में वह क्षमता हैं कि वे जब फलित हों तो आश्चर्यजनक व अनपेक्षित लाभ या हानि ; योग की प्रकृतिनुसार प्रदान करते हैं।

विशेष :- ज्योतिष में योगों का महत्व वही है जो शरीर में आंखों व कानों का। कुण्डली को समझना व भविष्य-कथन कहना‘ज्योतिषीय योगों’ के बिना असंभव व अतार्किक है।

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