October 2015 ~ Balaji Kripa

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May Baba fullfill all the wishes of the Devotees.

जय श्रीराम

भगवान रामभक्त हनुमान की उपासना से जीवन के सारे कष्ट, संकट मिट जाते है। माना जाता है कि हनुमान एक ऐसे देवता है जो थोड़ी-सी प्रार्थना और पूजा से ही शीघ्र प्रसन्न हो जाते है। जहां मंगलवार और शनिवार का दिन इनके पूजन के लिए सर्वश्रेष्ठ हैं।

ॐ हं हनुमंतये नम:

मंगलवार और शनिवार के दिन हनुमान म‍ंदिर में जाकर रामभक्त हनुमान का गुणगान करें और उनसे अपने पापों के लिए क्षमायाचना करें।

Tuesday, 27 October 2015

क्या आप को पता है चौसठ योगिनियो के नाम और मंत्र !!


आदिशक्ति का सीधा सा सम्बन्ध है इस शब्द का जिसमे प्रकृति या ऐसी शक्ति का बोध होता जो उत्पन्न करने और पालन करने का दायित्व निभाती है जिसने भी इस शक्ति की शरण में खुद को समर्पित कर दिया उसे फिर किसी प्रकार कि चिंता करने कि कोई आवश्यकता नहीं वह परमानन्द हो जाता है चौंसठ योगिनियां वस्तुतः माता आदिशक्ति कि सहायक शक्तियों के रूप में मानी जाती हैं जिनकी मदद से माता आदिशक्ति इस संसार का राज काज चलाती हैं एवं श्रष्टि के अंत काल में ये मातृका शक्तियां वापस माँ आदिशक्ति में पुनः विलीन हो जाती हैं और सिर्फ माँ आदिशक्ति ही बचती हैं फिर से पुनर्निर्माण के लिए !बहुत बार देखने में आता है कि लोग वर्गीकरण करने लग जाते हैं और उसी वर्गीकरण के आधार पर साधकगण अन्य साधकों को हीन - हेय दृष्टि से देखने लग जाते हैं क्योंकि उनकी नजर में उनके द्वारा पूजित रूप को वे मूल या प्रधान समझते हैं और अन्य को द्वितीय भाव से देखते हैं जबकि ऐसा उचित नहीं है हर साधक का दुसरे साधक के लिए सम भाव होना चाहिए मैं
किन्तु नैतिक दृष्टिकोण और अध्यात्मिकता के आधार पर यदि देखा जाये तो न तो कोई उच्च है न कोई हीन हम आराधना करते हैं तो कोई अहसान नहीं करते यह सिर्फ अपनी मानसिक शांति और संतुष्टि के लिए और अगर कोई दूसरा करता है तो वह भी इसी उद्देश्य कि पूर्ती के लिए !अब अगर हम अपने विषय पर आ जाएँ तो इस मृत्यु लोक में मातृ शक्ति के जितने भी रूप विदयमान हैं सब एक ही विराट महामाया आद्यशक्ति के अंग,भाग , रूप हैं साधकों को वे जिस रूप की साधना करते हैं उस रूप के लिए निर्धारित व्यवहार और गुणों के अनुरूप फल प्राप्त होता है।चौंसठ योगिनियां वस्तुतः माता दुर्गा कि सहायक शक्तियां है जो समय समय पर माता दुर्गा कि सहायक शक्तियों के रूप में काम करती हैंएवं दुसरे दृष्टिकोण से देखा जाये तो यह मातृका शक्तियां तंत्र भाव एवं शक्तियों से परिपूरित हैं और मुख्यतः तंत्र ज्ञानियों के लिए प्रमुख आकर्षण का केंद्र हैं !


 जिन नामों का अस्तित्व मिलता है वे इस प्रकार हैं :-
१. बहुरूपा
२. तारा
३. नर्मदा
४. यमुना
५. शांति
६. वारुणी
७. क्षेमकरी
८. ऐन्द्री
९. वाराही
१०. रणवीरा
११. वानरमुखी
१२. वैष्णवी
१३. कालरात्रि
१४. वैद्यरूपा
१५. चर्चिका
१६. बेताली
१७. छिनमास्तिका
१८. वृषभानना
१९. ज्वाला कामिनी
२०. घटवारा
२१. करकाली
२२. सरस्वती
२३. बिरूपा
२४. कौबेरी
२५. भालुका
२६. नारसिंही
२७. बिराजा
२८. विकटानन
२९. महालक्ष्मी
३०. कौमारी
३१. महामाया
३२. रति
३३. करकरी
३४. सर्पश्या
३५. यक्षिणी
३६. विनायकी
३७. विन्द्यावालिनी
३८. वीरकुमारी
३९. माहेश्वरी
४०. अम्बिका
४१. कामायनी
४२. घटाबारी
४३. स्तुति
४४. काली
४५. उमा
४६. नारायणी
४७. समुद्रा
४८. ब्राह्मी
४९. ज्वालामुखी
५०. आग्नेयी
५१. अदिति
५२. चन्द्रकांति
५३. वायुबेगा
५४. चामुंडा
५५. मूर्ति
५६. गंगा
५७. धूमावती
५८. गांधारी
५९. सर्व मंगला
६०. अजिता
६१. सूर्य पुत्री
६२. वायु वीणा
६३. अघोरा
६४. भद्रकाली 


चौंसठ योगिनी मंत्र :-
 

१. ॐ काली नित्य सिद्धमाता स्वाहा
२. ॐ कपलिनी नागलक्ष्मी स्वाहा
३. ॐ कुला देवी स्वर्णदेहा स्वाहा
४. ॐ कुरुकुल्ला रसनाथा स्वाहा
५. ॐ विरोधिनी विलासिनी स्वाहा
६. ॐ विप्रचित्ता रक्तप्रिया स्वाहा
७. ॐ उग्र रक्त भोग रूपा स्वाहा
८. ॐ उग्रप्रभा शुक्रनाथा स्वाहा
९. ॐ दीपा मुक्तिः रक्ता देहा स्वाहा
१०. ॐ नीला भुक्ति रक्त स्पर्शा स्वाहा
११. ॐ घना महा जगदम्बा स्वाहा
१२. ॐ बलाका काम सेविता स्वाहा
१३. ॐ मातृ देवी आत्मविद्या स्वाहा
१४. ॐ मुद्रा पूर्णा रजतकृपा स्वाहा
१५. ॐ मिता तंत्र कौला दीक्षा स्वाहा
१६. ॐ महाकाली सिद्धेश्वरी स्वाहा
१७. ॐ कामेश्वरी सर्वशक्ति स्वाहा
१८. ॐ भगमालिनी तारिणी स्वाहा
१९. ॐ नित्यकलींना तंत्रार्पिता स्वाहा
२०. ॐ भेरुण्ड तत्त्व उत्तमा स्वाहा
२१. ॐ वह्निवासिनी शासिनि स्वाहा
२२. ॐ महवज्रेश्वरी रक्त देवी स्वाहा
२३. ॐ शिवदूती आदि शक्ति स्वाहा
२४. ॐ त्वरिता ऊर्ध्वरेतादा स्वाहा
२५. ॐ कुलसुंदरी कामिनी स्वाहा
२६. ॐ नीलपताका सिद्धिदा स्वाहा
२७. ॐ नित्य जनन स्वरूपिणी स्वाहा
२८. ॐ विजया देवी वसुदा स्वाहा
२९. ॐ सर्वमङ्गला तन्त्रदा स्वाहा
३०. ॐ ज्वालामालिनी नागिनी स्वाहा
३१. ॐ चित्रा देवी रक्तपुजा स्वाहा
३२. ॐ ललिता कन्या शुक्रदा स्वाहा
३३. ॐ डाकिनी मदसालिनी स्वाहा
३४. ॐ राकिनी पापराशिनी स्वाहा
३५. ॐ लाकिनी सर्वतन्त्रेसी स्वाहा
३६. ॐ काकिनी नागनार्तिकी स्वाहा
३७. ॐ शाकिनी मित्ररूपिणी स्वाहा
३८. ॐ हाकिनी मनोहारिणी स्वाहा
३९. ॐ तारा योग रक्ता पूर्णा स्वाहा
४०. ॐ षोडशी लतिका देवी स्वाहा
४१. ॐ भुवनेश्वरी मंत्रिणी स्वाहा
४२. ॐ छिन्नमस्ता योनिवेगा स्वाहा
४३. ॐ भैरवी सत्य सुकरिणी स्वाहा
४४. ॐ धूमावती कुण्डलिनी स्वाहा
४५. ॐ बगलामुखी गुरु मूर्ति स्वाहा
४६. ॐ मातंगी कांटा युवती स्वाहा
४७. ॐ कमला शुक्ल संस्थिता स्वाहा
४८. ॐ प्रकृति ब्रह्मेन्द्री देवी स्वाहा
४९. ॐ गायत्री नित्यचित्रिणी स्वाहा
५०. ॐ मोहिनी माता योगिनी स्वाहा
५१. ॐ सरस्वती स्वर्गदेवी स्वाहा
५२. ॐ अन्नपूर्णी शिवसंगी स्वाहा
५३. ॐ नारसिंही वामदेवी स्वाहा
५४. ॐ गंगा योनि स्वरूपिणी स्वाहा
५५. ॐ अपराजिता समाप्तिदा स्वाहा
५६. ॐ चामुंडा परि अंगनाथा स्वाहा
५७. ॐ वाराही सत्येकाकिनी स्वाहा
५८. ॐ कौमारी क्रिया शक्तिनि स्वाहा
५९. ॐ इन्द्राणी मुक्ति नियन्त्रिणी स्वाहा
६०. ॐ ब्रह्माणी आनन्दा मूर्ती स्वाहा
६१. ॐ वैष्णवी सत्य रूपिणी स्वाहा
६२. ॐ माहेश्वरी पराशक्ति स्वाहा
६३. ॐ लक्ष्मी मनोरमायोनि स्वाहा
६४. ॐ दुर्गा सच्चिदानंद स्वाहा

माता श्रीमहिषासुरमर्दिनि स्तोत्रंम् !!



श्री गणेशाय नमः!!

अयि गिरिनंदिनि नंदितमेदिनि विश्वविनोदिनि नंदनुते
गिरिवर विंध्य शिरोधिनिवासिनि विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते ।
भगवति हे शितिकण्ठकुटुंबिनि भूरि कुटुंबिनि भूरि कृते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥१॥

सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि दुर्मुखमर्षिणि हर्षरते
त्रिभुवनपोषिणि शंकरतोषिणि किल्बिषमोषिणि घोषरते ।
दनुज निरोषिणि दितिसुत रोषिणि दुर्मद शोषिणि सिन्धुसुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥२॥

अयि जगदंब मदंब कदंब वनप्रिय वासिनि हासरते
शिखरि शिरोमणि तुङ्ग हिमालय शृंग निजालय मध्यगते ।
मधु मधुरे मधु कैटभ गंजिनि कैटभ भंजिनि रासरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥३॥

अयि शतखण्ड विखण्डित रुण्ड वितुण्डित शुण्ड गजाधिपते
रिपु गज गण्ड विदारण चण्ड पराक्रम शुण्ड मृगाधिपते ।
निज भुज दण्ड निपातित खण्ड विपातित मुण्ड भटाधिपते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥४॥

अयि रण दुर्मद शत्रु वधोदित दुर्धर निर्जर शक्तिभृते
चतुर विचार धुरीण महाशिव दूतकृत प्रमथाधिपते ।
दुरित दुरीह दुराशय दुर्मति दानवदूत कृतांतमते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥५॥

अयि शरणागत वैरि वधूवर वीर वराभय दायकरे
त्रिभुवन मस्तक शूल विरोधि शिरोधि कृतामल शूलकरे ।
दुमिदुमि तामर दुंदुभिनाद महो मुखरीकृत तिग्मकरे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥६॥

अयि निज हुँकृति मात्र निराकृत धूम्र विलोचन धूम्र शते
समर विशोषित शोणित बीज समुद्भव शोणित बीज लते ।
शिव शिव शुंभ निशुंभ महाहव तर्पित भूत पिशाचरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥७॥

धनुरनु संग रणक्षणसंग परिस्फुर दंग नटत्कटके
कनक पिशंग पृषत्क निषंग रसद्भट शृंग हतावटुके ।
कृत चतुरङ्ग बलक्षिति रङ्ग घटद्बहुरङ्ग रटद्बटुके
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥८॥

जय जय जप्य जयेजय शब्द परस्तुति तत्पर विश्वनुते
झण झण झिञ्जिमि झिंकृत नूपुर सिंजित मोहित भूतपते ।
नटित नटार्ध नटीनट नायक नाटित नाट्य सुगानरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥९॥

अयि सुमनः सुमनः सुमनः सुमनः सुमनोहर कांतियुते
श्रित रजनी रजनी रजनी रजनी रजनीकर वक्त्रवृते ।
सुनयन विभ्रमर भ्रमर भ्रमर भ्रमर भ्रमराधिपते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥१०॥

सहित महाहव मल्लम तल्लिक मल्लित रल्लक मल्लरते
विरचित वल्लिक पल्लिक मल्लिक झिल्लिक भिल्लिक वर्ग वृते ।
सितकृत पुल्लिसमुल्ल सितारुण तल्लज पल्लव सल्ललिते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥११॥

अविरल गण्ड गलन्मद मेदुर मत्त मतङ्गज राजपते
त्रिभुवन भूषण भूत कलानिधि रूप पयोनिधि राजसुते ।
अयि सुद तीजन लालसमानस मोहन मन्मथ राजसुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥१२॥

कमल दलामल कोमल कांति कलाकलितामल भाललते
सकल विलास कलानिलयक्रम केलि चलत्कल हंस कुले ।
अलिकुल सङ्कुल कुवलय मण्डल मौलिमिलद्भकुलालि कुले
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥१३॥

कर मुरली रव वीजित कूजित लज्जित कोकिल मञ्जुमते
मिलित पुलिन्द मनोहर गुञ्जित रंजितशैल निकुञ्जगते ।
निजगुण भूत महाशबरीगण सद्गुण संभृत केलितले
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥१४॥

कटितट पीत दुकूल विचित्र मयूखतिरस्कृत चंद्र रुचे
प्रणत सुरासुर मौलिमणिस्फुर दंशुल सन्नख चंद्र रुचे ।
जित कनकाचल मौलिपदोर्जित निर्भर कुंजर कुंभकुचे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥१५॥

विजित सहस्रकरैक सहस्रकरैक सहस्रकरैकनुते
कृत सुरतारक सङ्गरतारक सङ्गरतारक सूनुसुते ।
सुरथ समाधि समानसमाधि समाधिसमाधि सुजातरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥१६॥

पदकमलं करुणानिलये वरिवस्यति योऽनुदिनं स शिवे
अयि कमले कमलानिलये कमलानिलयः स कथं न भवेत् ।
तव पदमेव परंपदमित्यनुशीलयतो मम किं न शिवे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥१७॥

कनकलसत्कल सिन्धु जलैरनु सिञ्चिनुते गुण रङ्गभुवं
भजति स किं न शचीकुच कुंभ तटी परिरंभ सुखानुभवम् ।
तव चरणं शरणं करवाणि नतामरवाणि निवासि शिवं
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥१८॥

तव विमलेन्दुकुलं वदनेन्दुमलं सकलं ननु कूलयते
किमु पुरुहूत पुरीन्दुमुखी सुमुखीभिरसौ विमुखीक्रियते ।
मम तु मतं शिवनामधने भवती कृपया किमुत क्रियते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥१९॥

अयि मयि दीनदयालुतया कृपयैव त्वया भवितव्यमुमे
अयि जगतो जननी कृपयासि यथासि तथाऽनुमितासिरते ।
यदुचितमत्र भवत्युररि कुरुतादुरुतापमपाकुरुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥२०॥
 

॥इति श्रीमहिषासुरमर्दिनि स्तोत्रं संपूर्णम् ॥

माता कमला स्तोत्रम् !!


 


श्री गणेशाय नमः ।
 

ओंकाररूपिणी देवि विशुद्धसत्त्वरूपिणी ॥
देवानां जननी त्वं हि प्रसन्ना भव सुन्दरि ॥

तन्मात्रंचैव भूतानि तव वक्षस्थलं स्मृतम् ।
त्वमेव वेदगम्या तु प्रसन्ना भव सुंदरि ॥

देवदानवगन्धर्वयक्षराक्षसकिन्नरः ।
स्तूयसे त्वं सदा लक्ष्मि प्रसन्ना भव सुन्दरि ॥

लोकातीता द्वैतातीता समस्तभूतवेष्टिता ।
विद्वज्जनकीर्त्तिता च प्रसन्ना भव सुंदरि ॥

परिपूर्णा सदा लक्ष्मि त्रात्री तु शरणार्थिषु ।
विश्वाद्या विश्वकत्रीं च प्रसन्ना भव सुन्दरि ॥

ब्रह्मरूपा च सावित्री त्वद्दीप्त्या भासते जगत् ।
विश्वरूपा वरेण्या च प्रसन्ना भव सुंदरि ॥

क्षित्यप्तेजोमरूद्धयोमपंचभूतस्वरूपिणी ।
बन्धादेः कारणं त्वं हि प्रसन्ना भव सुंदरि ॥

महेशे त्वं हेमवती कमला केशवेऽपि च ।
ब्रह्मणः प्रेयसी त्वं हि प्रसन्ना भव सुंदरि ॥

चंडी दुर्गा कालिका च कौशिकी सिद्धिरूपिणी ।
योगिनी योगगम्या च प्रसन्ना भव सुन्दरि ॥

बाल्ये च बालिका त्वं हि यौवने युवतीति च ।
स्थविरे वृद्धरूपा च प्रसन्ना भव सुन्दरि ॥

गुणमयी गुणातीता आद्या विद्या सनातनी ।
महत्तत्त्वादिसंयुक्‍ता प्रसन्ना भव सुन्दरि ॥

तपस्विनी तपः सिद्धि स्वर्गसिद्धिस्तदर्थिषु ।
चिन्मयी प्रकृतिस्त्वं तु प्रसन्ना भव सुंदरि ॥

त्वमादिर्जगतां देवि त्वमेव स्थितिकारणम् ।
त्वमन्ते निधनस्थानं स्वेच्छाचारा त्वमेवहि ॥

चराचराणां भूतानां बहिरन्तस्त्वमेव हि ।
व्याप्यव्याकरूपेण त्वं भासि भक्‍तवत्सले ॥

त्वन्मायया हृतज्ञाना नष्टात्मानो विचेतसः ।
गतागतं प्रपद्यन्ते पापपुण्यवशात्सदा ॥

तावन्सत्यं जगद्भाति शुक्‍तिकारजतं यथा ।
यावन्न ज्ञायते ज्ञानं चेतसा नान्वगामिनी ॥

त्वज्ज्ञानात्तु सदा युक्‍तः पुत्रदारगृहादिषु ।
रमन्ते विषयान्सर्वानन्ते दुखप्रदान् ध्रुवम् ॥

त्वदाज्ञया तु देवेशि गगने सूर्यमण्डलम् ।
चन्द्रश्च भ्रमते नित्यं प्रसन्ना भव सुन्दरि ॥

ब्रह्मेशविष्णुजननी ब्रह्माख्या ब्रह्मसंश्रया ।
व्यक्‍ताव्यक्‍त च देवेशि प्रसन्ना भव सुन्दरि ॥

अचला सर्वगा त्वं हि मायातीता महेश्वरि ।
शिवात्मा शाश्वता नित्या प्रसन्ना भव सुन्दरि ॥

सर्वकायनियन्त्री च सर्व्वभूतेश्वरी ।
अनन्ता निष्काला त्वं हि प्रसन्ना भवसुन्दरि ॥

सर्वेश्वरी सर्ववद्या अचिन्त्या परमात्मिका ।
भुक्‍तिमुक्‍तिप्रदा त्वं हि प्रसन्ना भव सुन्दरि ॥

ब्रह्माणी ब्रह्मलोके त्वं वैकुण्ठे सर्वमंगला ।
इंद्राणी अमरावत्यामम्बिका वरूणालये ॥

यमालये कालरूपा कुबेरभवने शुभा ।
महानन्दाग्निकोणे च प्रसन्ना भव सुन्दरि ॥

नैऋर्त्यां रक्‍तदन्ता त्वं वायव्यां मृगवाहिनी ।
पाताले वैष्णवीरूपा प्रसन्ना भव सुन्दरि ॥

सुरसा त्वं मणिद्वीपे ऐशान्यां शूलधारिणी ।
भद्रकाली च लंकायां प्रसन्ना भव सुन्दरि ॥

रामेश्वरी सेतुबन्धे सिंहले देवमोहिनी ।
विमला त्वं च श्रीक्षेत्रे प्रसन्ना भव सुन्दरि ॥

कालिका त्वं कालिघाटे कामाख्या नीलपर्वत ।
विरजा ओड्रदेशे त्वं प्रसन्ना भव सुंदरि ॥

वाराणस्यामन्नपूर्णा अयोध्यायां महेश्वरी ।
गयासुरी गयाधाम्नि प्रसन्ना भव सुंदरि ॥

भद्रकाली कुरूक्षेत्रे त्वंच कात्यायनी व्रजे ।
माहामाया द्वारकायां प्रसन्ना भव सुन्दरि ॥

क्षुधा त्वं सर्वजीवानां वेला च सागरस्य हि ।
महेश्वरी मथुरायां च प्रसन्ना भव सुन्दरि ॥

रामस्य जानकी त्वं च शिवस्य मनमोहिनी ।
दक्षस्य दुहिता चैव प्रसन्ना भव सुन्दरि ॥

विष्णुभक्‍तिप्रदां त्वं च कंसासुरविनाशिनी ।
रावणनाशिनां चैव प्रसन्ना भव सुन्दरि ॥

लक्ष्मीस्तोत्रमिदं पुण्यं यः पठेद्भक्सिंयुतः ।
सर्वज्वरभयं नश्येत्सर्वव्याधिनिवारणम् ॥

इदं स्तोत्रं महापुण्यमापदुद्धारकारणम् ।
त्रिसंध्यमेकसन्ध्यं वा यः पठेत्सततं नरः ॥

मुच्यते सर्व्वपापेभ्यो तथा तु सर्वसंकटात् ।
मुच्यते नात्र सन्देहो भुवि स्वर्गे रसातले ॥

समस्तं च तथा चैकं यः पठेद्भक्‍तित्परः ।
स सर्वदुष्करं तीर्त्वा लभते परमां गतिम् ॥

सुखदं मोक्षदं स्तोत्रं यः पठेद्भक्‍तिसंयुक्‍तः ।
स तु कोटीतीर्थफलं प्राप्नोति नात्र संशयः ॥

एका देवी तु कमला यस्मिंस्तुष्टा भवेत्सदा ।
तस्याऽसाध्यं तु देवेशि नास्तिकिंचिज्जगत् त्रये ॥

पठनादपि स्तोत्रस्य किं न सिद्धयति भूतले ।
तस्मात्स्तोत्रवरं प्रोक्‍तं सत्यं हि पार्वति ॥

॥ इति श्रीकमला स्तोत्रं संपूर्णम् ॥

श्रीमद्दक्षिणकालिकायाः स्वरूपाख्यं कर्पूरादिस्तोत्रम् !!



श्री गणेशाय नमः ।।
कर्पूरं मधमान्त्यस्वरपरिरहितं सेन्दुवामाक्षियुक्तं बीजं ते
मातरेतत्त्रिपुरहरवधु त्रिःकृतं ये जपन्ति ।
तेषां गद्यानि पद्यानि च मुकुहुहरादुल्लसन्त्येव वाचः स्वच्छन्दं
ध्वान्तधाराधरुरुचिरुचिरे सर्वसिद्धिं गतानाम्व्व॥१॥

ईशान् सेन्दुवामश्रवणपरिगतो बीजमन्यन्महेशि द्वन्द्वं ते
मन्दचेता यदि जपति जनो वारूमेकं कदाचित् ।
जित्वा वाचामधीशं धनमपि चिरं मोहयन्नम्बुजाक्षीवृन्दं
चन्द्रार्धचूडे प्रभवति स महाघोरबालावतंसेवव॥२॥

ईशो वैश्वानरस्थः शशधरविलसद् वामनेत्रेण युक्तो बीजं ते
द्वन्द्वमन्यद् विगलितचिकुरे कालिके ये जपन्ति ।
द्वेष्टारं घ्नन्ति ते च त्रिभुवनमपि ते वश्यभावं नयन्ति
सृक्कद्वन्दास्रधाराद्वयधरवदने दक्षिणे त्र्यक्षरेति ॥३॥

ऊर्ध्वे वामे कृपाणं करकमलतले छिन्नमुण्डं तथाधः सव्ये
चाभीर्वरं च त्रिजगदघहरे दक्षिणे कालिके च ।
जप्त्वैतन्नाम ये वा तव मनुविभवं भावयन्त्येतदम्ब तेषामष्टौ
करस्था: प्रकटितरदनेसिद्धयस्त्र्यम्बकस्य ॥४॥

वर्गाद्यं वह्निसंस्थं विधुरतिललितं तत्त्रयं कूर्चयुग्मं
लज्जाद्वन्द्वं च पश्चात् स्मितमुखि तदधष्ठद्वयं योजयित्वा ।
मातर्ये ये जपन्ति स्मरहरमहिले भावयन्तः स्वरूपं ते
लक्ष्मीलास्यलीलाकमलदलदृशः कामरूपा भवन्ति ॥५॥

प्रत्येकं वा द्वयं वा त्रयमपि च परं बीजमत्यन्तगुह्यं
त्वन्नाम्ना योजयित्वा सकलमपि सदा भावयन्तो जपन्ति ।
तेषां नेत्रारविन्दे विहरति कमला वक्त्रशुभ्रांशुबिम्बे वाग्देवी
देवि मुण्डस्त्रगतिशयलसत्कण्ठि पीनस्तनाढ्ये ॥६॥

गतासूनां बाहुप्रकरकृतकञ्चीपरिलसन्नितम्बां
दिग्वस्त्रां त्रिभुवनविधात्रीं त्रिणयनां ।
श्मशानस्ते तल्पे शवहृदि महाकालसुरतप्रयुक्तां त्वाम्
ध्यायन् जननि जडचेता अपि कविः ॥७॥

शिवाभिर्घोराभिः शवनिवहमुण्डास्थिकरैः परं
सम्कीर्णायाम् प्रकटितचितायां हरवधूम् ।
प्रविष्टां सम्तुष्टामुपरिसुरतेनातियुवतीं सदा
त्वां ध्यायन्ति क्वचिदपिच न तेषां परिभवः ॥८॥

वदामस्ते किं वा जननि वयमुच्चैर्जडधियो
न धाता नापीशो हरिरपि न ते वेत्ति परमम् ।
तथापि त्वद्भक्तिर्मुखरयति चास्माकममिते
तदेतत्क्षन्तव्यं नखलु पशुरोषः समुचितः ॥९॥

समन्तादापीनस्तनजघनधृघौवनवतीरतासक्तो
नक्तं यदि जपति भक्तस्तव मनुम् ।
विवासास्त्वां ध्यायन् गलितचिकुरस्तस्य वशगाः
समस्ताः सिद्धौघा भुवि चिरतरं जीवति कविः ॥१०॥

समाः सुस्थीभूतो जपति विपरीतां यदि सदा विचिन्त्य त्वाम् ।
ध्यायन्नतिशयमहाकालसुरताम् ।
तदा तस्य क्षोणीतलविहरमाणस्य विदुषः
कराम्भोजे वश्या पुरहस्वधू सिद्धिनिवहाः ॥११॥

प्रसूते सम्सारं जननि भवती पालयति च
समस्तं क्षित्यादि प्रलयसमये स्मरति च ।
अतस्त्वं धातासि त्रिभुवनपतिः श्रीपतिरपि
महेशोऽपि प्रायः सकलमपि किं स्तौमि भवतीम् ॥१२॥

अनेके सेवन्ते भवदधिकगीवार्णनिवहान्
विमूढास्ते मातः किमपिन हि जानन्ति परमम् ।
समाराध्यामाद्यां हरिहरविरिञ्चादिविबुधैः
प्रपन्नोऽस्मि स्वैरं रतिरससमहानन्दनिरताम् ॥१३॥

धरत्रि कीलालं शुचिरपि
समीरोऽपि गगनं त्वमेका कल्याणी ।
गिरिशरमणी कालि सकलम्
प्रसन्नां त्वं भूया भवमनु न भूयान्मम जनुः ॥१४॥

श्मशानस्थः सुस्थो गलितचिकुरो दिक्पटधरः सहस्रं
त्वकार्णाम् निजगलितवीर्येण कुसुमम्।
जपम्स्त्वत्प्रयेकं मनुमपि तव ध्याननिरतो
महाकालि स्वैरं स भवति धरित्रीपरिवृढः ॥१५॥

गृहे सम्मार्ज्यन्या परिगलितविर्यं हि
चिकुरं समूलं मध्याह्ने वितरति चितायां कुजदिने ।
समुच्चार्य प्रमेणा मनुमपि सकृत्कालि
सततं गजारूढो याति क्षितिपरिवृढः सत्कविवरः ॥१६॥

स्वपुष्पैराकीर्णं कुसुमधनुषो मन्दिरमहो
पुरो ध्यायन्ध्यायन् यदि जपति भक्तस्तव मनुम् ।
स गन्धर्वश्रेणीपतिरपि कवित्वामृतनदीनदीनः
पर्यन्ते परमपदलीनः प्रभवति ॥१७॥

त्रिपञ्चारे पीठे शवशिवहृदि स्मेरवदनाम्
महाकालेनोच्चैर्मदनरसलावण्यनिरताम् ।
समासक्तो नक्तं स्वयमपि रतानन्दनिरतो
जनो यो ध्यायेत्त्वामयि जननि स स्यात् स्मरहरः ॥१८॥

सलोमास्थि स्वैरं पललमपि मार्जारमसिते
परं चोष्ट्त्रम् मैशम् नरमहिषयोश्छागमपि वा ।
बलिम् ते पूजायामयि वितरतां मर्त्यवसतां
सतां सिद्धिः सर्वा प्रतिपदमपूर्वा प्रभवति ॥१९॥

वशी लक्षं मन्त्रं प्रजपति हविष्याशनरतो दिवा
मातर्युष्मच्चरणयुगलध्याननिपुणः ।
परं नक्तं नग्नो निधुवनविनोदेन च मनुं
जपेल्लक्षं स स्यात्स्मरहरसमानः क्षितितले ॥२०॥

इदं स्तोत्रं मातस्तव मनुसमुद्धारणजनुः
स्वरूपाख्यम् पादाम्बुजयुगलपूजाविधियुतम् ।
निशार्धं वा पूजासमयमधि वा यस्तु
पठति प्रलापस्तस्यापि प्रसरति कवित्वामृतरसः ॥२१॥

कुरङ्गाक्षीवृन्दं तमनुसरति प्रेमतरलं
वशस्तस्य क्षोणीपतिरपि कुबेरप्रतिनिधिः ।
रिपुः कारागारं कलयति च तं केलिकलया
चिरं जीवन्मुक्तः प्रभवति स भक्तः प्रतिजनुः ॥२२॥

इति श्रीमन्महाकालिविरचितं श्रीमद्दक्षिणकालिकायाः स्वरूपाख्यं स्तोत्रं समाप्तम्

कल्याणवृष्टिस्तवः


श्री गणेशाय नमः ।।

कल्याणवृष्टिभिरिवामृतपूरिताभि-
र्लक्ष्मीस्वयंवरणमङ्गलदीपिकाभिः ।
सेवाभिरम्ब तव पादसरोजमूले
नाकारि किं मनसि भाग्यवतां जनानाम् ॥१॥

एतावदेव जननि स्पृहणीयमास्ते
त्वद्वन्दनेषु सलिलस्थगिते च नेत्रे ।
सांनिध्यमुद्यदरुणायुतसोदरस्य
त्वद्विग्रहस्य परया सुधयाप्लुतस्य ॥२॥

ईशत्वनामकलुषाः कति वा न सन्ति
ब्रह्मादयः प्रतिभवं प्रलयाभिभूताः ।
एकः स एव जननि स्थिरसिद्धिरास्ते
यः पादयोस्तव सकृत्प्रणतिं करोति ॥३॥

लब्ध्वा सकृत्त्रिपुरसुन्दरि तावकीनं
कारुण्यकन्दलितकान्तिभरं कटाक्षम् ।
कन्दर्पकोटिसुभगास्त्वयि भक्तिभाजः
संमोहयन्ति तरुणीर्भुवनत्रयेऽपि ॥४॥

ह्रींकारमेव तव नाम गृणन्ति वेदा
मातस्त्रिकोणनिलये त्रिपुरे त्रिनेत्रे ।
त्वत्संस्मृतौ यमभटाभिभवं विहाय
दिव्यन्ति नन्दनवने सह लोकपालैः ॥५॥

हन्तुः पुरामधिगलं परिपीयमानः
क्रूरः कथं न भविता गरलस्य वेगः ।
नाश्वासनाय यदि मातरिदं तवार्धं
देहस्य शश्वदमृताप्लुतशीतलस्य ॥६॥

सर्वज्ञतां सदसि वाक्पटुतां प्रसूते
देवि त्वदङ्घ्रिसरसीरुहयोः प्रणामः ।
किं च स्फुरन्मकुटमुज्ज्वलमातपत्रं
द्वे चामरे च महतीं वसुधां ददाति ॥७॥

कल्पद्रुमैरभिमतप्रतिपादनेषु
कारुण्यवारिधिभिरम्ब भवात्कटाक्षैः ।
आलोकय त्रिपुरसुन्दरि मामनाथं
त्वय्येव भक्तिभरितं त्वयि बद्धतृष्णम् ॥८॥

हन्तेतरेष्वपि मनांसि निधाय चान्ये
भक्तिं वहन्ति किल पामरदैवतेषु ।
त्वामेव देवि मनसा समनुस्मरामि
त्वामेव नौमि शरणं जननि त्वमेव ॥९॥

लक्ष्येषु सत्स्वपि कटाक्षनिरीक्षणाना-
मालोकय त्रिपुरसुन्दरि मां कदाचित् ।
नूनं मया तु सदृशः करुणैकपात्रं
जातो जनिष्यति जनो न च जायते वा ॥१०॥

ह्रींह्रीमिति प्रतिदिनं जपतां तवाख्यां
किं नाम दुर्लभमिह त्रिपुराधिवासे ।
मालाकिरीटमदवारणमाननीया
तान्सेवते वसुमती स्वयमेव लक्ष्मीः ॥११॥

संपत्कराणि सकलेन्द्रियनन्दनानि
साम्राज्यदाननिरतानि सरोरुहाक्षि ।
त्वद्वन्दनानि दुरिताहरणोद्यतानि
मामेव मातरनिशं कलयन्तु नान्यम् ॥१२॥

कल्पोपसंहृतिषु कल्पितताण्डवस्य
देवस्य खण्डपरशोः परभैरवस्य ।
पाशाङ्कुशैक्षवशरासनपुष्पबाणा
सा साक्षिणी विजयते तव मूर्तिरेका ॥१३॥

लग्नं सदा भवतु मातरिदं तवार्धं
तेजः परं बहुलकुङ्कुमपङ्कशोणम् ।
भास्वत्किरीटममृतांशुकलावतंसं
मध्ये त्रिकोणनिलयं परमामृतार्द्रम् ॥१४॥

ह्रींकारमेव तव नाम तदेव रूपं
त्वन्नाम दुर्लभमिह त्रिपुरे गृणन्ति ।
त्वत्तेजसा परिणतं वियदादिभूतं
सौख्यं तनोति सरसीरुहसंभवादेः ॥१५॥

ह्रींकारत्रयसंपुटेन महता मन्त्रेण संदीपितं
स्तोत्रं यः प्रतिवासरं तव पुरो मातर्जपेन्मन्त्रवित् ।

तस्य क्षोणिभुजो भवन्ति वश्गा लक्ष्मीश्चिरस्थायिनी
वाणी निर्मलसूक्तिभारभारिता जागर्ति दीर्घं वयः ॥१६॥

इति श्रीमत्परमहंसपरिव्रजकाचार्यस्य श्रिगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य श्रीमच्छंकरभगवतः कृतौ कल्याणवृष्टिस्तवः संपूर्णः॥

माता कामकलाकालीस्तोत्रम् !!


श्री गणेशाय नमः ।

महाकाल उवाच -

अथ वक्ष्ये महेशानि देव्याः स्तोत्रमनुत्तमम् ।
यस्य स्मरणमात्रेण विघ्ना यान्ति पराङ्मुखाः ॥१॥

विजेतुं प्रतस्थे यदा कालकस्या-
सुरान् रावणो मुञ्जमालिप्रवर्हान् ।
तदा कामकालीं स तुष्टाव
वाग्भिर्जिगीषुर्मृधे बाहुवीर्य्येण सर्वान् ॥२॥

महावर्त्तभीमासृगब्ध्युत्थवीची-
परिक्षालिता श्रान्तकन्थश्मशाने ।
चितिप्रज्वलद्वह्निकीलाजटाले
शिवाकारशावासने सन्निषण्णाम् ॥३॥

महाभैरवीयोगिनीडाकिनीभिः
करालाभिरापादलम्बत्कचाभिः ।
भ्रमन्तीभिरापीय मद्यामिषास्रान्यजस्रं
समं सञ्चरन्तीं हसन्तीम् ॥४॥

महाकल्पकालान्तकादम्बिनी-
त्विट्परिस्पर्द्धिदेहद्युतिं घोरनादाम् ।
स्फुरद्द्वादशादित्यकालाग्निरुद्र-
ज्वलद्विद्युदोघप्रभादुर्निरीक्ष्याम् ॥५॥

लसन्नीलपाषाणनिर्माणवेदि-
प्रभश्रोणिबिम्बां चलत्पीवरोरुम् ।
समुत्तुङ्गपीनायतोरोजकुम्भां
कटिग्रन्थितद्वीपिकृत्त्युत्तरीयाम् ॥६॥

स्रवद्रक्तवल्गन्नृमुण्डावनद्धा-
सृगाबद्धनक्षत्रमालैकहाराम् ।
मृतब्रह्मकुल्योपक्लृप्ताङ्गभूषां
महाट्टाट्टहासैर्जगत् त्रासयन्तीम् ॥७॥

निपीताननान्तामितोद्धृत्तरक्तो-
च्छलद्धारया स्नापितोरोजयुग्माम् ।
महादीर्घदंष्ट्रायुगन्यञ्चदञ्च-
ल्ललल्लेलिहानोग्रजिह्वाग्रभागाम् ॥८॥

चलत्पादपद्मद्वयालम्बिमुक्त-
प्रकम्पालिसुस्निग्धसम्भुग्नकेशाम् ।
पदन्याससम्भारभीताहिराजा-
ननोद्गच्छदात्मस्तुतिव्यस्तकर्णाम् ॥९॥

महाभीषणां घोरविंशार्द्धवक्त्रै-
स्तथासप्तविंशान्वितैर्लोचनैश्च ।
पुरोदक्षवामे द्विनेत्रोज्ज्वलाभ्यां
तथान्यानने त्रित्रिनेत्राभिरामाम् ॥१०॥

लसद्वीपिहर्य्यक्षफेरुप्लवङ्ग-
क्रमेलर्क्षतार्क्षद्विपग्राहवाहैः ।
मुखैरीदृशाकारितैर्भ्राजमानां
महापिङ्गलोद्यज्जटाजूटभाराम् ॥११॥

भुजैः सप्तविंशाङ्कितैर्वामभागे
युतां दक्षिणे चापि तावद्भिरेव ।
क्रमाद्रत्नमालां कपालं च शुष्कं
ततश्चर्मपाशं सुदीर्घं दधानाम् ॥१२॥

ततः शक्तिखट्वाङ्गमुण्डं भुशुण्डीं
धनुश्चक्रघण्टाशिशुप्रेतशैलान् ।
ततो नारकङ्कालबभ्रूरगोन्माद-
वंशीं तथा मुद्गरं वह्निकुण्डम् ॥१३॥

अधो डम्मरुं पारिघं भिन्दिपालं
तथा मौशलं पट्टिशं प्राशमेवम् ।
शतघ्नीं शिवापोतकं चाथ दक्षे
महारत्नमालां तथा कर्त्तुखड्गौ ॥१४॥

चलत्तर्ज्जनीमङ्कुशं दण्डमुग्रं
लसद्रत्नकुम्भं त्रिशूलं तथैव ।
शरान् पाशुपत्यांस्तथा पञ्च कुन्तं
पुनः पारिजातं छुरीं तोमरं च ॥१५॥

प्रसूनस्रजं डिण्डिमं गृध्रराजं
ततः कोरकं मांसखण्डं श्रुवं च ।
फलं बीजपूराह्वयं चैव सूचीं
तथा पर्शुमेवं गदां यष्टिमुग्राम् ॥१६॥

ततो वज्रमुष्टिं कुणप्पं सुघोरं
तथा लालनं धारयन्तीं भुजैस्तैः ।
जवापुष्परोचिष्फणीन्द्रोपक्लृप्त-
क्वणन्नूपुरद्वन्द्वसक्ताङ्घ्रिपद्माम् ॥१७॥

महापीतकुम्भीनसावद्धनद्ध
स्फुरत्सर्वहस्तोज्ज्वलत्कङ्कणां च ।
महापाटलद्योतिदर्वीकरेन्द्रा-
वसक्ताङ्गदव्यूहसंशोभमानाम् ॥१८॥

महाधूसरत्त्विड्भुजङ्गेन्द्रक्लृप्त-
स्फुरच्चारुकाटेयसूत्राभिरामाम् ।
चलत्पाण्डुराहीन्द्रयज्ञोपवीत-
त्विडुद्भासिवक्षःस्थलोद्यत्कपाटाम् ॥१९॥

पिषङ्गोरगेन्द्रावनद्धावशोभा-
महामोहबीजाङ्गसंशोभिदेहाम् ।
महाचित्रिताशीविषेन्द्रोपक्लृप्त-
स्फुरच्चारुताटङ्कविद्योतिकर्णाम् ॥२०॥

वलक्षाहिराजावनद्धोर्ध्वभासि-
स्फुरत्पिङ्गलोद्यज्जटाजूटभाराम् ।
महाशोणभोगीन्द्रनिस्यूतमूण्डो-
ल्लसत्किङ्कणीजालसंशोभिमध्याम् ॥२१॥

सदा संस्मरामीदृशों कामकालीं
जयेयं सुराणां हिरण्योद्भवानाम् ।
स्मरेयुर्हि येऽन्येऽपि ते वै जयेयु-
र्विपक्षान्मृधे नात्र सन्देहलेशः ॥२२॥

पठिष्यन्ति ये मत्कृतं स्तोत्रराजं
मुदा पूजयित्वा सदा कामकालीम् ।
न शोको न पापं न वा दुःखदैन्यं
न मृत्युर्न रोगो न भीतिर्न चापत् ॥२३॥

धनं दीर्घमायुः सुखं बुद्धिरोजो
यशः शर्मभोगाः स्त्रियः सूनवश्च ।
श्रियो मङ्गलं बुद्धिरुत्साह आज्ञा
लयः शर्म सर्व विद्या भवेन्मुक्तिरन्ते ॥२४॥

॥इतिश्रीमहावामकेश्वरतन्त्रे कालकेयहिरण्यपुरविजये
रावणकृतं कामकलाकालीभुजङ्गप्रयातस्तोत्रराजं सम्पूर्णम् ॥

श्री माता छिन्नमस्ताहृदयम् स्तोत्रम !!


श्रीगणेशाय नमः
 

श्रीपार्वत्युवाच
===========
श्रुतं पूजादिकं सम्यग्भवद्वक्त्राब्जनिःसृतम् ।
हृदयं छिन्नमस्तायाः श्रोतुमिच्छामि साम्प्रतम् ॥१॥
=============
ॐ महादेव उवाच
=============
नाद्यावधि मया प्रोक्तं कस्यापि प्राणवल्लभे ।
यत्वया परिपृष्टोऽहं वक्ष्ये प्रीत्यै तव प्रिये ॥२॥
 

 ध्यानम्=====

रक्ताभां रक्तकेशीं करकमललसत्कर्त्रिकां कालकान्तिं
विच्छिन्नात्मीयमुण्डासृगरुणबहुलोदग्रधारां पिबन्तीम् ।
विघ्नाभ्रौघप्रचण्डश्वसनसमनिभां सेवितां सिद्धसङ्घैः
पद्माक्षीं छिन्नमस्तां छलकरदितिजच्छेदिनीं संस्मरामि ॥
==========
इति ध्यानम्
==========
वन्देऽहं छिन्नमस्तां तां छिन्नमुण्डधरां पराम् ।
छिन्नग्रीवोच्छटाच्छन्नां क्षौमवस्त्रपरिच्छदाम् ॥२॥

सर्वदा सुरसङ्घेन सेविताङ्घ्रिसरोरुहाम् ।
सेवे सकलसम्पत्त्यै छिन्नमस्तां शुभप्रदाम् ॥३॥

यज्ञानां योगयज्ञाय या तु जाता युगे युगे ।
दानवान्तकरीं देवीं छिन्नमस्तां भजामि ताम् ॥४॥

वैरोचनीं वरारोहां वामदेवविवर्द्धिताम् ।
कोटिसूर्य्यप्रभां वन्दे विद्युद्वर्णाक्षिमण्डिताम् ॥५॥

निजकण्ठोच्छलद्रक्तधारया या मुहुर्मुहुः ।
योगिनीस्तर्पयन्त्युग्रा तस्याश्चरणमाश्रये ॥६॥

हूमित्येकाक्षरं मन्त्रं यदीयं युक्तमानसः ।
यो जपेत्तस्य विद्वेषी भस्मतां याति तां भजे ॥७॥

हूं स्वाहेति मनुं सम्यग्यः स्मरत्यर्तिमान्नरः ।
छिनत्ति च्छिन्नमस्ताया तस्य बाधां नमामि ताम् ॥८॥

यस्याः कटाक्षमात्रेण क्रूरभूतादयो द्रुतम् ।
दूरतः सम्पलायन्ते च्छिन्नमस्तां भजामि ताम् ॥९॥

क्षितितलपरिरक्षाक्षान्तरोषा सुदक्षा
छलयुतखलकक्षाच्छेदने क्षान्तिलक्ष्या ।
क्षितिदितिजसुपक्षा क्षोणिपाक्षय्यशिक्षा
जयतु जयतु चाक्षा च्छिन्नमस्तारिभक्षा ॥१०॥

कलिकलुषकलानां कर्त्तने कर्त्रिहस्ता
सुरकुवलयकाशा मन्दभानुप्रकाशा ।
असुरकुलकलापत्रासिकाऽम्लानमूर्ति
जयतु जयतु काली च्छिन्नमस्ता कराली ॥११॥

भुवनभरणभूरिभ्राजमानानुभावा
भवभवविभवानां भारणोद्भातभूतिः ।
द्विजकुलकमलानां भासिनी भानुमूर्ति
भवतु भवतु वाणी च्छिन्नमस्ता भवानी ॥१२॥

मम रिपुगणमाशु च्छेत्तुमुग्रं कृपाणं
सपदि जननि तीक्ष्णं छिन्नमुण्डं गृहाण ।
भवतु तव यशोऽलं छिन्धि शत्रून्खलान्मे
मम च परिदिशेष्टं छिन्नमस्ते क्षमस्व ॥१३॥

छिन्नग्रीवा छिन्नमस्ता छिन्नमुण्डधराऽक्षता ।
क्षोदक्षेमकरी स्वक्षा क्षोणीशाच्छादनक्षमा ॥१४॥

वैरोचनी वरारोहा बलिदानप्रहर्षिता ।
बलिपूजितपादाब्जा वासुदेवप्रपूजिता ॥१५॥

इति द्वादशनामानि च्छिन्नमस्ताप्रियाणि यः ।
स्मरेत्प्रातः समुत्थाय तस्य नश्यन्ति शत्रवः ॥१६॥

यां स्मृत्वा सन्ति सद्यः सकलसुरगणाः सर्वदा सम्पदाढ्याः
शत्रूणां सङ्घमाहत्य विशदवदनाः स्वस्थचित्ताः श्रयन्ति ।
तस्याः सङ्कल्पवन्तः सरसिजचरणां सततं संश्रयन्ति साऽऽद्या
श्रीशादिसेव्या सुफलतु सुतरं छिन्नमस्ता प्रशस्ता ॥१७॥

इदं हृदयमज्ञात्वा हन्तुमिच्छति यो द्विषम् ।
कथं तस्याचिरं शत्रुर्नाशमेष्यति पार्वति ॥१८॥

यदीच्छेन्नाशनं शत्रोः शीघ्रमेतत्पठेन्नरः ।
छिन्नमस्ता प्रसन्ना हि ददाति फलमीप्सितम् ॥१९॥

शत्रुप्रशमनं पुण्यं समीप्सितफलप्रदम् ।
आयुरारोग्यदं चैव पठतां पुण्यसाधनम् ॥२०॥

॥इति श्रीनन्द्यावर्ते महादेवपार्वतीसंवादे श्रीछिन्नमस्ताहृदयस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥


माता श्रीज्वालामुखीस्तोत्रम् !!



श्रीगणेशाय नमः
श्रीभैरव उवाच :-

तारं यो भजते मातर्बीजं तव सुधाकरम् ।
पारावारसुता नित्यं निश्चला तद्गृहे वसेत् ॥१॥

शून्यं यो दहनाधिरूढममलं वामाक्षिसंसेवितं
सेन्दुं बिन्दुयुतं भवानि वरदे स्वान्ते स्मरेत् साधकः ।
मूकस्यापि सुरेन्द्रसिन्धुजलवद्वाग्देवता भारती
गद्यः पद्यमयीं निरर्गलतरा मातर्मुखे तिष्ठति ॥२॥

शुभं वह्न्यारूढं मतियुतमनल्पेष्टफलदं
सबिन्द्वीन्दुं मन्दो यदि जपति बीजं तव प्रियम् ।
तदा मातः स्वःस्त्रीजनविहरणक्लेशसहितः
सुखमिन्द्रोद्याने स्वपिति स भवत्पूजनरतः ॥३॥

ज्वालामुखीति जपते तव नामवर्णान्
यः साधको गिरिशपत्नि सुभक्तिपूर्वम् ।
तस्याङ्घ्रिपद्मयुगलं सुरनाथवेश्याः
सीमन्तरत्नकिरणैरनुरञ्जयन्ति ॥४॥

पाशाम्बुजाभयधरे मम सर्वशत्रून्
शब्दं त्विति स्मरति यस्तव मन्त्रमध्ये ।
तस्याद्रिपुत्रि चरणौ बहुपांसुयुक्तौ
प्रक्षालयन्त्यरिवधूनयनाश्रुपाताः ॥५॥

भक्षयद्वयमिदं यदि भक्त्या साधको जपति चेतसि मातः ।
स स्मरारिरिव त्वत्प्रसादतस्त्वत्पदं च लभते दिवानिशम् ॥६॥

कूर्चबीजमनघं यदि ध्यायेत् साधकस्तव महेश्वरि योऽन्तः ।
अष्ट हस्तकमलेषु सुवश्यास्तस्य त्र्यम्बकसमस्तसिद्धयः ॥७॥

ठद्वयं तव मनूत्तरस्थितं यो जपेत्तु परमप्रभावदम् ।
तस्य देवि हरिशङ्करादयः पूजयन्ति चरणौ दिवौकसः ॥८॥

ॐ ह्रीं श्रीं त्र्यक्षरे देवि सुरासुरनिसुदिनि ।
त्रैलोक्याभयदे मातर्ज्वालामुखि नमोऽस्तु ते ॥९॥

उदितार्कद्युते लक्ष्मि लक्ष्मीनाथसमर्चिते ।
वराम्बुजाभयधरे ज्वालामुखि नमोऽस्तु ते ॥१०॥

सर्वसारमयि सर्वे सर्वामरनमस्कृते ।
सत्ये सति सदाचारे ज्वालामुखि नमोऽस्तु ते ॥११॥

यस्या मूर्ध्नि शशी त्रिलोचनगता यस्या रवीन्द्वग्नयः
पाशाम्भोजवराभयाः करतलाम्भोजेषु सद्धेतयः ।
गात्रे कुङ्कुमसन्निभा द्युतिरहिर्यस्यागले सन्ततं
देवीं कोटिसहस्ररश्मिसदृशीं ज्वालामुखीं नौम्यहम् ॥१२॥

निद्रां नो भजते विधिर्भगवति शङ्का शिवं नो त्यजेद्
विष्णुर्व्याकुलतामलं कमलिनीकान्तोऽपि धत्ते भयम् ।
दृष्ट्वा देवि त्वदीयकोपदहनज्वालां ज्वलन्ति तदा
देवः कुङ्कुमपीतगण्डयुगलः संक्रन्दनः क्रन्दति ॥१३॥

यामाराध्य दिवानिशं सुरसरित्तीरे स्तवैरात्मभू-
रुद्यद्भास्वरघर्मभानुसदृशीं प्राप्तोऽमरज्येष्ठताम् ।
दारिद्र्योरगदष्टलोकत्रितयीसञ्जिवनीं मातरं
देवीं तां हृदये शशाङ्कशकलाचूडावतंसा भजे ॥१४॥

आपीनस्तनश्रोणिभारनमितां कन्दर्पदर्पोज्ज्वलां
लावण्याङ्कितरम्यगण्डयुगलां यस्त्वां स्मरेत् साधकः ।
वश्यास्तस्य धराभृदीश्वरसुते गीर्वाणवामभ्रुवः
पादाम्भोजतलं भजन्ति त्रिदशा गन्धर्वसिद्धादयः ॥१५॥

हृत्वा देवि शिरो विधेर्यदकरोत् पात्रं कराम्भोरुहे
शूलप्रोतममुं हरिं व्यगमयत् सद्भूषणं स्कन्धयोः ।
कालान्ते त्रितयं मुखेन्दुकुहरे शम्भोः शिरः पार्वति
तन्मातर्भुवने विचित्रमखिलं जाने भक्त्याः शिवे ॥१६॥

गायत्री प्रकृतिर्गलेऽपि विधृता सा त्वं शिवे वेधसा
श्रीरूपा हरिणापि वक्षसि धृताप्यर्धाङ्गभागे तथा ।
शर्वेणापि भवानि देवि सकलाः ख्यातुं न शक्ता वयं
त्वद्रूपं हृदि मादृशां जडधियां ध्यातुं कथैवास्ति का ॥१७॥

ज्वालामुखीस्तवमिमं पठते यदन्तः
श्रीमन्त्रराजसहितं विभवैकहेतुम् ।
इष्टप्रदानसमये भुवि कल्पवृक्षं
स्वर्गं व्रजेत् सुरवधूजनसेवितः सः ॥१८॥
 

॥इति श्रीरुद्रयामले तन्त्रे दशविद्यारहस्ये श्रीज्वालामुखीस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

Monday, 26 October 2015

विरह की पीढा विनाशकं ब्रह्म-शक्ति स्तोत्रम्



।।श्रीशिवोवाच।।

ब्राह्मि ब्रह्म-स्वरूपे त्वं, मां प्रसीद सनातनि ।
परमात्म-स्वरूपे च, परमानन्द-रूपिणि ।।
ॐ प्रकृत्यै नमो भद्रे, मां प्रसीद भवार्णवे।
सर्व-मंगल-रूपे च, प्रसीद सर्व-मंगले ।।
विजये शिवदे देवि ! मां प्रसीद जय-प्रदे ।
वेद-वेदांग-रूपे च, वेद-मातः ! प्रसीद मे ।।
शोकघ्ने ज्ञान-रूपे च, प्रसीद भक्त वत्सले ।
सर्व-सम्पत्-प्रदे माये, प्रसीद जगदम्बिके ।।
लक्ष्मीर्नारायण-क्रोडे, स्रष्टुर्वक्षसि भारती ।
मम क्रोडे महा-माया, विष्णु-माये प्रसीद मे ।।
काल-रूपे कार्य-रूपे, प्रसीद दीन-वत्सले ।
कृष्णस्य राधिके भद्रे, प्रसीद कृष्ण पूजिते ।।
समस्त-कामिनीरूपे, कलांशेन प्रसीद मे ।
सर्व-सम्पत्-स्वरूपे त्वं, प्रसीद सम्पदां प्रदे ।।
यशस्विभिः पूजिते त्वं, प्रसीद यशसां निधेः ।
चराचर-स्वरूपे च, प्रसीद मम मा चिरम् ।।
मम योग-प्रदे देवि ! प्रसीद सिद्ध-योगिनि ।
सर्व-सिद्धि-स्वरूपे च, प्रसीद सिद्धि-दायिनि ।।
अधुना रक्ष मामीशे, प्रदग्धं विरहाग्निना ।
स्वात्म-दर्शन-पुण्येन, क्रीणीहि परमेश्वरि ।।

।।फल-श्रुति।।
एतत् पठेच्छृणुयाच्चन, वियोग-ज्वरो भवेत् ।
न भवेत् कामिनीभेदस्तस्य जन्मनि जन्मनि ।।
इस स्तोत्र का पाठ करने अथवा सुनने वाले को कभी प्रियतमा वियोग-पीड़ा नहीं होती और जन्म-जन्मान्तर तक पत्नी -भेद नहीं होता। इस स्तोत्र का पाठ करने से निम्न लाभ होते हैं !
पारिवारिक कलह की शांति होती है !रोग या अकाल-मृत्यु भय का शमन होता हैं ! प्रणय सम्बन्धों में बाधाएँ आने पर दूर होती है !
पूजन विधि :=

अपनी इष्ट-देवता या भगवती गौरी का विविध उपचारों से पूजन करके उक्त स्तोत्र का पाठ करें
इच्छित फल कि प्राप्ति के लिये कातरता और समर्पण बहुत आवश्यक है।
 

विरह पीढा नाशक पति स्तवन -
 

बहुत से लोगों कि समस्याओं को देखकर और आधुनिक समाज के आकलन के पश्चात् मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि आज के हमारे समाज में १०० में से ४० युग्म ऐसे हैं जो किसी न किसी प्रकार से वैचारिक मतभेद या किसी तीसरे पक्ष कि वजह से अपने हस्ते खेलते पारिवारिक जीवन में बहुत सी विषमताओं का शिकार होकर रह गए हैं जिसकी वजह से हर पल कि घुटन और अनिश्चितता कि वजह से अपना शारीरिक और मानसिक संतुलन खोते चले जा रहे हैं और परिणाम ये होता है कि इन सब वजहों से पारिवारिक सामाजिक और आर्थिक स्तर का ह्रास होता जा रहा है हालाँकि कुछ समय के बाद लोगों को अहसास होता है कि उन्होंने कितना गलत कदम उठाया था लेकिन जब तक समझ में आता है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है या फिर सब कुछ तहस नहस हो चूका होता है ! इसलिए सबसे पहले तो मेरी सलाह यही है आप सब लोगों को कि छोटी - मोटी वैचारिक भिन्नताओं को अपने रिश्ते पर इतना भरी न पड़ने दें कि वह आपके रिश्ते को ही खा जाये और एक बात हमेशा अपने दिमाग में रखें कि अवैध रिश्तों कि उम्र और विश्वसनीयता बहुत कम होती है चाहे स्त्री हो या पुरुष यदि वह अपने साथी को भूलकर आज आपकी तरफ आकर्षित हुआ है तो इस बात की क्या गारंटी है कि वह कल आपको छोडकर किसी और कि तरफ नहीं भागेगा ! लेकिन इसके बावजूद भी यदि आप हालात का शिकार हो ही चुके / चुकी हैं तो आपके लिए एक तरीका है जिसे अपने जीवन में शामिल करके आप अपने खोये हुए सौभाग्य / प्रेम को वापस पा सकते हैं - !
 

पति-स्तवनम् -

नमः कान्ताय सद्-भर्त्रे, शिरश्छत्र-स्वरुपिणे ।
नमो यावत् सौख्यदाय, सर्व-देव-मयाय च ।।
नमो ब्रह्म-स्वरुपाय, सती-सत्योद्-भवाय च ।
नमस्याय प्रपूज्याय, हृदाधाराय ते नमः ।।
सती-प्राण-स्वरुपाय, सौभाग्य-श्री-प्रदाय च ।
पत्नीनां परनानन्द-स्वरुपिणे च ते नमः ।।
पतिर्ब्रह्मा पतिर्विष्णुः, पतिरेव महेश्वरः ।
पतिर्वंश-धरो देवो, ब्रह्मात्मने च ते नमः ।।
क्षमस्व भगवन् ! दोषान्, ज्ञानाज्ञान-विधापितान्।
पत्नी-बन्धो, दया-सिन्धो ! दासी-दोषान् क्षमस्व वै ।।

।। फल-श्रुति ।।


स्तोत्रमिदं महालक्ष्मि ! सर्वेप्सित-फल-प्रदम् ।
पतिव्रतानां सर्वासां, स्तोत्रमेतच्छुभावहम् ।।
नरो नारी श्रृणुयाच्चेल्लभते सर्व-वाञ्छितम् ।
अपुत्रा लभते पुत्रं, निर्धना लभते ध्रुवम् ।।
रोगिणी रोग-मुक्ता स्यात्, पति-हीना पतिं लभेत् ।
पतिव्रता पतिं स्तुत्वा, तीर्थ-स्नान-फलं लभेत् ।।
पूजन विधि :=

1- विवाहित स्त्रियों के लिए जो अपने पति के साथ कभी मतभेद नहीं चाहती हैं एवं पति को परमेश्वर तुल्य मानती हैं :-
 

पूजन विधि := प्रातः काल उठाकर अपने दैनिक कार्यों से निवृत्त होकर स्नान करने के उपरांत धुले हुए वस्त्र धारण करके भक्ति पूर्वक पति को सुगन्धित जल से स्नान करवाकर स्वच्छ वस्त्र पहनाएं - तत्पश्चात आसन पर बैठकर उनके मस्तक पर चन्दन का तिलक लगाएं ! गले में पुष्प माला पहनाएं ! धुप दीप अर्पित करें !भोजन करवाकर उन्हें शिव स्वरुप मानकर इस स्तोत्र का पाठ करें !
 

2- उन स्त्रियों के लिए जो पति को प्राणवत प्रेम करती हैं लेकिन उनके पति या तो उन्हें प्रेम नहीं करते या फिर किसी अन्य स्त्री के संपर्क में आ गए हैं :- 
पूजन विधि := प्रातः काल उठाकर अपने दैनिक कार्यों से निवृत्त होकर स्नान करने के उपरांत धुले हुए वस्त्र धारण करके भक्ति पूर्वक पति के चित्र को सांकेतिक रूप से सुगन्धित जल से स्नान करवाकर स्वच्छ वस्त्र पहनाएं तत्पश्चात आसन पर बैठकर उनके मस्तक पर चन्दन का तिलक लगाएं गले में पुष्प माला पहनाएं धुप दीप अर्पित करें भोजन करवाकर उन्हें शिव स्वरुप मानकर इस स्तोत्र का पाठ करें -!
 

3- कुवांरी कन्यायें जो मनोवांछित वर कि इच्छा रखती हैं :-
 

पूजन विधि := भगवान शिव को माता गौरी सहित उपरोक्त विधान से पूजा करने के बाद स्तोत्र का पाठ करें
 

4-  प्रेमी वर्ग कि लड़कियों के लिए :-

यदि आप किसी से प्रेम करती हैं किन्तु आपके माता - पिता या प्रेमी पक्ष के माता - पिता अथवा किसी अन्य व्यक्ति कि वजह से आपके सम्बन्धों में बाधा डाली जा रही है तो आप इस स्तोत्र के पाठ से उन सब बाधाओं को पार करके अपने मनोवांछित तक पहुँच सकती हैं !

डाकिनी स्तोत्रम् !!


आनन्दभैरवी उवाच

अथ वक्ष्ये महाकाल मूलपद्मविवेचनम् ।
यत् कृत्वा अमरो भूत्वा वसेत् कालचतुष्टयम् ॥१॥

अथ षट्चक्रभेदार्थे भेदिनीशक्तिमाश्रयेत् ।
छेदिनीं सर्वग्रन्थीनां योगिनीं समुपाश्रयेत् ॥२॥

तस्या मन्त्रान् प्रवक्ष्यामि येन सिद्धो भवेन्नरः ।
आदौ शृणु महामन्त्रं भेदिन्याः परं मनुम् ॥३॥

आदौ कालींसमुत्कृत्य ब्रह्ममन्त्रं ततः परम् ।
देव्याः प्रणवमुद्धृत्य भेदनी तदनन्तरम् ॥४॥

ततो हि मम गृह्णीयात् प्रापय द्वयमेव च ।
चित्तचञ्चीशब्दान्ते मां रक्ष युग्ममेव च ॥५॥

भेदिनी मम शब्दान्ते अकालमरणं हर ।
हर युग्मं स्वं महापापं नमो नमोऽग्निजायया ॥६॥

एतन्मन्त्रं जपेत्तत्र डाकिनीरक्षसि प्रभो ।
आदौ प्रणवमुद्धृत्य ब्रह्ममन्त्रं ततः परम् ॥७॥

शाम्भवीति ततश्चोक्त्वा ब्राह्मणीति पदं ततः ।
मनोनिवेशं कुरुते तारयेति द्विधापदम् ॥८॥

छेदिनीपदमुद्धृत्य मम मानसशब्दतः ।
महान्धकारमुद्धृत्य छेदयेति द्विधापदम् ॥९॥

स्वाहान्तं मनुमुद्धृत्य जपेन्मूलाम्बुजे सुधीः ।
एतन्मन्त्रप्रसादेन जीवन्मुक्तो भवेन्नरः ॥१०॥

तथा स्त्रीयोगिनीमन्त्रं जपेत्तत्रैव शङ्कर ।
ॐ घोररूपिणिपदं सर्वव्यापिनि शङ्कर ॥११॥

महायोगिनि मे पापं शोकं रोगं हरेति च ।
विपक्षं छेदयेत्युक्त्वा योगं मय्यर्पय द्वयम् ॥१२॥

स्वाहान्तं मनुमुद्धृत्य जपाद्योगी भवेन्नरः ।
खेचरत्वं समाप्नोति योगाभ्यासेन योगिराट् ॥१३॥

डाकिनीं ब्रह्मणा युक्तां मूले ध्यात्वा पुनः पुनः ।
जपेन्मन्त्रं सदायोगी ब्रह्ममन्त्रेण योगवित् ॥१४॥

ब्रह्ममन्त्रं प्रवक्ष्यामि तज्जापेनापि योगिराट् ।
ब्रह्ममन्त्रप्रसादेन जडो योगी न संशयः ॥१५॥

प्रणवत्रयमुद्धृत्य दीर्घप्रणवयुग्मकम् ।
तदन्ते प्रणवत्रीणि ब्रह्म ब्रह्म त्रयं त्रयम् ॥१६॥

सर्वसिद्धिपदस्यान्ते पालयेति च मां पदम् ।
सत्त्वं गुणो रक्ष रक्ष मायास्वाहापदं जपेत् ॥१७॥

डाकिनीमन्त्रराजञ्च शृणुष्व परमेश्वर ।
यज्जप्त्वा डाकिनी वश्या त्रैलोक्यस्थितिपालकाः ॥१८॥

यो जपेत् डाकिनीमन्त्रं चैतन्या कुण्डली झटित् ।
अनायासेन सिद्धिः स्यात् परमात्मप्रदर्शनम् ॥१९॥

मायात्रयं समुद्धृत्य प्रणवैकं ततः परम् ।
डाकिन्यन्ते महाशब्दं डाकिन्यम्बपदं ततः ॥२०॥

पुनः प्रणवमुद्धृत्य मायात्रयं ततः परम् ।
मम योगसिद्धिमन्ते साधयेति द्विधापदम् ॥२१॥

मनुमुद्धृत्य देवेशि जपाद्योगी भवेज्जडः ।
जप्त्वा सम्पूजयेन्मन्त्री पुरश्चरणसिद्धये ॥२२॥

सर्वत्र चित्तसाम्येन द्रव्यादिविविधानि च ।
पूजयित्वा मूलपद्मे चित्तोपकरणेन च ॥२३॥

ततो मानसजापञ्च स्तोत्रञ्च कालिपावनम् ।
पठित्वा योगिराट् भूत्त्वा वसेत् षट्चक्रवेश्मनि ॥२४॥

शक्तियुक्तं विधिं यस्तु स्तौति नित्यं महेश्वर ।
तस्यैव पालनार्थाय मम यन्त्रं महीतले ॥२५॥

तत् स्तोत्रं शृणु योगार्थं सावधानावधारय ।
एतत्स्तोत्रप्रसादेन महालयवशो भवेत् ॥२६॥

ब्रह्माणं हंससङ्घायुतशरणवदावाहनं देववक्त्र ।
विद्यादानैकहेतुं तिमिचरनयनाग्नीन्दुफुल्लारविन्दम् ।।
वागीशं वाग्गतिस्थं मतिमतविमलं बालार्कं चारुवर्णम् ।
डाकिन्यालिङ्गितं तं सुरनरवरदं भावयेन्मूलपद्मे ॥२७॥

नित्यां ब्रह्मपरायणां सुखमयीं ध्यायेन्मुदा डाकिनी।
रक्तां गच्छविमोहिनीं कुलपथे ज्ञानाकुलज्ञानिनीम् ।।
मूलाम्भोरुहमध्यदेशनिकटे भूविम्बमध्ये प्रभा ।
हेतुस्थां गतिमोहिनीं श्रुतिभुजां विद्यां भवाह्लादिनीम् ॥२८॥

विद्यावास्तवमालया गलतलप्रालम्बशोभाकरा।
ध्यात्वा मूलनिकेतने निजकुले यः स्तौति भक्त्या सुधीः ।।
नानाकारविकारसारकिरणां कर्त्री विधो योगिना।
मुख्यां मुख्यजनस्थितां स्थितिमतिं सत्त्वाश्रितामाश्रये ॥२९॥

या देवी नवडाकिनी स्वरमणी विज्ञानिनी मोहिनी ।
मां पातु पिरयकामिनी भवविधेरानन्दसिन्धूद्भवा ।।
मे मूलं गुणभासिनी प्रचयतु श्रीः कीतीचक्रं हि मा ।
नित्या सिद्धिगुणोदया सुरदया श्रीसंज्ञया मोहिता ॥३०॥

तन्मध्ये परमाकला कुलफला बाणप्रकाण्डाकरा ।
राका राशषसादशा शशिघटा लोलामला कोमला ।।
सा माता नवमालिनी मम कुलं मूलाम्बुजं सर्वदा ।
सा देवी लवराकिणी कलिफलोल्लासैकबीजान्तरा ॥३१॥

धात्री धैर्यवती सती मधुमती विद्यावती भारती ।
कल्याणी कुलकन्यकाधरनरारूपा हि सूक्ष्मास्पदा ।।
मोक्षस्था स्थितिपूजिता स्थितिगता माता शुभा योगिना।
नौमि श्रीभविकाशयां शमनगां गीतोद्गतां गोपनाम् ॥३२॥

कल्केशीं कुलपण्डितां कुलपथग्रन्थिक्रियाच्छेदिनी।
नित्यां तां गुणपण्डितां प्रचपलां मालाशतार्कारुणाम् ।।
विद्यां चण्डगुणोदयां समुदयां त्रैलोक्यरक्षाक्षरा।
ब्रह्मज्ञाननिवासिनीं सितशुभानन्दैकबीजोद्गताम् ॥३३॥

गीतार्थानुभवपिरयां सकलया सिद्धप्रभापाटलाम् ।
कामाख्यां प्रभजामि जन्मनिलयां हेतुपिरयां सत्क्रियाम् ।
सिद्धौ साधनतत्परं परतरं साकाररूपायिताम् ॥३४॥

ब्रह्मज्ञानं निदानं गुणनिधिनयनं कारणानन्दयानम् ।
ब्रह्माणं ब्रह्मबीजं रजनिजयजनं यागकार्यानुरागम् ॥३५॥

शोकातीतं विनीतं नरजलवचनं सर्वविद्याविधिज्ञम् ।
सारात् सारं तरुं तं सकलतिमिरहं हंसगं पूजयामि ॥३६॥

एतत्सम्बन्धमार्गं नवनवदलगं वेदवेदाङ्गविज्ञम् ।
मूलाम्भोजप्रकाशं तरुणरविशशिप्रोन्नताकारसारम् ॥३७॥

भावाख्यं भावसिद्धं जयजयदविधिं ध्यानगम्यं पुराणम्
पाराख्यं पारणायं परजनजनितं ब्रह्मरूपं भजामि ॥३८॥

डाकिनीसहितं ब्रह्मध्यानं कृत्वा पठेत् स्तवम् ।
पठनाद् धारणान्मन्त्री योगिनां सङ्गतिर्भवेत् ॥३९॥

एतत्पठनमात्रेण महापातकनाशनम् ।
एकरूपं जगन्नाथं विशालनयनाम्बुजम् ॥४०॥

एवं ध्यात्वा पठेत् स्तोत्रं पठित्वा योगिराड् भवेत् ॥४१॥
 

इति श्रीरुद्रयामले उत्तरतन्त्रे 
महातन्त्रोद्दीपने सिद्धमन्त्रप्रकरणे
षट्चक्रसिद्धिसाधने भैरवभैरवीसंवादे
डाकिनी स्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

माता तारास्तोत्रम् !!


श्रीगणेशाय नमः

मातर्नीलसरस्वति प्रणमतां सौभाग्यसम्पत्प्रदे ।
प्रत्यालीढपदस्थिते शवहृदि स्मेराननाम्भोरुहे ।।
फुल्लेन्दीवरलोचने त्रिनयने कर्त्रीकपालोत्पले खङ्गं ।
चादधती त्वमेव शरणं त्वामीश्वरीमाश्रये ॥१॥

वाचामीश्वरि भक्तिकल्पलतिके सर्वार्थसिद्धिश्वरि ।
गद्यप्राकृतपद्यजातरचनासर्वार्थसिद्धिप्रदे ।।
नीलेन्दीवरलोचनत्रययुते कारुण्यवारान्निधे ।
सौभाग्यामृतवर्धनेन कृपयासिञ्च त्वमस्मादृशम् ॥२॥

खर्वे गर्वसमूहपूरिततनो सर्पादिवेषोज्वले ।
व्याघ्रत्वक्परिवीतसुन्दरकटिव्याधूतघण्टाङ्किते ।।
सद्यःकृत्तगलद्रजःपरिमिलन्मुण्डद्वयीमूर्द्धज-।
ग्रन्थिश्रेणिनृमुण्डदामललिते भीमे भयं नाशय ॥३॥

मायानङ्गविकाररूपललनाबिन्द्वर्द्धचन्द्राम्बिके ।
हुम्फट्कारमयि त्वमेव शरणं मन्त्रात्मिके मादृशः ।।
मूर्तिस्ते जननि त्रिधामघटिता स्थूलातिसूक्ष्मा ।
परा वेदानां नहि गोचरा कथमपि प्राज्ञैर्नुतामाश्रये ॥४॥

त्वत्पादाम्बुजसेवया सुकृतिनो गच्छन्ति सायुज्यतां ।
तस्याः श्रीपरमेश्वरत्रिनयनब्रह्मादिसाम्यात्मनः ।।
संसाराम्बुधिमज्जने पटुतनुर्देवेन्द्रमुख्यासुरान् ।
मातस्ते पदसेवने हि विमुखान् किं मन्दधीः सेवते ॥५॥

मातस्त्वत्पदपङ्कजद्वयरजोमुद्राङ्ककोटीरिणस्ते ।
देवा जयसङ्गरे विजयिनो निःशङ्कमङ्के गताः ।।
देवोऽहं भुवने न मे सम इति स्पर्द्धां वहन्तः परे ।
तत्तुल्यां नियतं यथा शशिरवी नाशं व्रजन्ति स्वयम् ॥६॥

त्वन्नामस्मरणात्पलायनपरान्द्रष्टुं च शक्ता न ते ।
भूतप्रेतपिशाचराक्षसगणा यक्षश्च नागाधिपाः ।।
दैत्या दानवपुङ्गवाश्च खचरा व्याघ्रादिका जन्तवो ।
डाकिन्यः कुपितान्तकश्च मनुजान् मातः क्षणं भूतले ॥७॥

लक्ष्मीः सिद्धिगणश्च पादुकमुखाः सिद्धास्तथा वैरिणां ।
स्तम्भश्चापि वराङ्गने गजघटास्तम्भस्तथा मोहनम् ।।
मातस्त्वत्पदसेवया खलु नृणां सिद्ध्यन्ति ते ते गुणाः ।
क्लान्तः कान्तमनोभवोऽत्र भवति क्षुद्रोऽपि वाचस्पतिः ॥८॥

ताराष्टकमिदं पुण्यं भक्तिमान् यः पठेन्नरः ।
प्रातर्मध्याह्नकाले च सायाह्ने नियतः शुचिः ॥९॥

लभते कवितां विद्यां सर्वशास्त्रार्थविद्भवेत्
लक्ष्मीमनश्वरां प्राप्य भुक्त्वा भोगान्यथेप्सितान् ।
कीर्तिं कान्तिं च नैरुज्यं प्राप्यान्ते मोक्षमाप्नुयात् ॥१०॥

॥इति श्रीनीलतन्त्रे तारास्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

श्री ळलिता त्रिपुरसुन्दरी अपराध क्षमा प्रार्थना स्तोत्रम् !!


 

श्रीगणेशाय नमः !!
कञ्जमनोहर पादचलन्मणि नूपुरहंस विराजिते
कञ्जभवादि सुरौघपरिष्टुत लोकविसृत्वर वैभवे ।
मञ्जुळवाङ्मय निर्जितकीर कुलेचलराज सुकन्यके
पालयहे ललितापरमेश्वरि मामपराधिनमम्बिके ॥१॥

एणधरोज्वल फालतलोल्लस दैणमदाङ्क समन्विते
शोणपराग विचित्रित कन्दुक सुन्दरसुस्तन शोभिते ।
नीलपयोधर कालसुकुन्तल निर्जितभृङ्ग कदम्बके
पालयहे ललितापरमेश्वरि मामपराधिनमम्बिके ॥२॥

ईतिविनाशिनि भीति निवारिणि दानवहन्त्रि दयापरे
शीतकराङ्कित रत्नविभूषित हेमकिरीट समन्विते ।
दीप्ततरायुध भण्डमहासुर गर्व निहन्त्रि पुराम्बिके
पालयहे ललितापरमेश्वरि मामपराधिनमम्बिके ॥३॥

लब्धवरेण जगत्रयमोहन दक्षलतान्त महेषुणा
लब्धमनोहर सालविषण्ण सुदेहभुवापरि पूजिते ।
लङ्घितशासन दानव नाशन दक्षमहायुध राजिते
पालयहे ललितापरमेश्वरि मामपराधिनमम्बिके ॥४॥

ह्रीम्पद भूषित पञ्चदशाक्षर षोडशवर्ण सुदेवते
ह्रीमतिहादि महामनुमन्दिर रत्नविनिर्मित दीपिके ।
हस्तिवरानन दर्शितयुद्ध समादर साहसतोषिते
पालयहे ललितापरमेश्वरि मामपराधिनमम्बिके ॥५॥

हस्तलसन्नव पुष्पसरेक्षु शरासन पाशमहाङ्कुशे
हर्यजशम्भु महेश्वर पाद चतुष्टय मञ्च निवासिनि ।
हंसपदार्थ महेश्वरि योगि समूहसमादृत वैभवे
पालयहे ललितापरमेश्वरि मामपराधिनमम्बिके ॥६॥

सर्वजगत्करणावन नाशन कर्त्रि कपालि मनोहरे
स्वच्छमृणाल मरालतुषार समानसुहार विभूषिते ।
सज्जनचित्त विहारिणि शङ्करि दुर्जन नाशन तत्परे
पालयहे ललितापरमेश्वरि मामपराधिनमम्बिके ॥७॥

कञ्जदळाक्षि निरञ्जनि कुञ्जर गामिनि मञ्जुळ भाषिते
कुङ्कुमपङ्क विलेपन शोभित देहलते त्रिपुरेश्वरि ।
दिव्यमतङ्ग सुताधृतराज्य भरे करुणारस वारिधे
पालयहे ललितापरमेश्वरि मामपराधिनमम्बिके ॥८॥

हल्लकचम्पक पङ्कजकेतक पुष्पसुगन्धित कुन्तले
हाटक भूधर शृङ्गविनिर्मित सुन्दर मन्दिरवासिनि ।
हस्तिमुखाम्ब वराहमुखीधृत सैन्यभरे गिरिकन्यके
पालयहे ललितापरमेश्वरि मामपराधिनमम्बिके ॥९॥

लक्ष्मणसोदर सादर पूजित पादयुगे वरदेशिवे
लोहमयादि बहून्नत साल निषण्ण बुधेश्वर सम्युते ।
लोलमदालस लोचन निर्जित नीलसरोज सुमालिके
पालयहे ललितापरमेश्वरि मामपराधिनमम्बिके ॥१०॥

ह्रीमितिमन्त्र महाजप सुस्थिर साधकमानस हंसिके
ह्रीम्पद शीतकरानन शोभित हेमलते वसुभास्वरे ।
हार्दतमोगुण नाशिनि पाश विमोचनि मोक्षसुखप्रदे
पालयहे ललितापरमेश्वरि मामपराधिनमम्बिके ॥११॥

सच्चिदभेद सुखामृतवर्षिणि तत्वमसीति सदादृते
सद्गुणशालिनि साधुसमर्चित पादयुगे परशाम्बवि ।
सर्वजगत् परिपालन दीक्षित बाहुलतायुग शोभिते
पालयहे ललितापरमेश्वरि मामपराधिनमम्बिके ॥१२॥

कम्बुगळे वर कुन्दरदे रस रञ्जितपाद सरोरुहे
काममहेश्वर कामिनि कोमल कोकिल भाषिणि भैरवि ।
चिन्तितसर्व मनोहर पूरण कल्पलते करुणार्णवे
पालयहे ललितापरमेश्वरि मामपराधिनमम्बिके ॥१३॥

लस्तकशोभि करोज्वल कङ्कणकान्ति सुदीपित दिङ्मुखे
शस्ततर त्रिदशालय कार्य समादृत दिव्यतनुज्वले ।
कश्चतुरोभुवि देविपुरेशि भवानि तवस्तवने भवेत्
पालयहे ललितापरमेश्वरि मामपराधिनमम्बिके ॥१४॥

ह्रीम्पदलाञ्चित मन्त्रपयोदधि मन्थनजात परामृते
हव्यवहानिल भूयजमानक खेन्दु दिवाकर रूपिणि ।
हर्यजरुद्र महेश्वर संस्तुत वैभवशालिनि सिद्धिदे
पालयहे ललितापरमेश्वरि मामपराधिनमम्बिके ॥१५॥

श्रीपुरवासिनि हस्तलसद्वर चामरवाक्कमलानुते
श्रीगुहपूर्व भवार्जित पुण्यफले भवमत्तविलासिनि ।
श्रीवशिनी विमलादि सदानत पादचलन्मणि नूपुरे
पालयहे ललितापरमेश्वरि मामपराधिनमम्बिके ॥१६॥

॥इति श्री ळलिता त्रिपुरसुन्दरी अपराध क्षमा प्रार्थना स्तोत्रम्  सम्पूर्णम् ॥

श्री त्रिपुरसुन्दरी अथ स्तोत्रं !!


श्री गणेशाय नमः ॥
श्रीसेव्य-पादकमले श्रित-चन्द्र-मौले
श्रीचन्द्रशेखर-यतीश्वर-पूज्यमाने।
श्रीखण्ड-कन्दुककृत-स्व-शिरोवतंसे
श्रीमन्महात्रिपुरसुन्दरि सुप्रभातम् ॥१॥

उत्तिष्ठ तुङ्ग-कुलपर्वत-राज-कन्ये
उत्तिष्ठ भक्त-जन-दुःख-विनाश-दक्षे ।
उत्तिष्ठ सर्व-जगती-जननि प्रसन्ने
उत्तिष्ठ हे त्रिपुरसुन्दरि सुप्रभातम् ॥२॥

उत्तिष्ठ राजत-गिरि-द्विषतो रथात् त्वं
उत्तिष्ठ रत्न-खचितत् ज्वलिताच्च पीठात्।
उत्तिष्ठ बन्धन-सुखं परिधूय शंभोः
उत्तिष्ठ विघ्नित-तिरस्करिणीं विपाट्य ॥३॥

यत्पृष्ठभागमवलम्ब्य विभाति लक्ष्मीः
यस्या वसन्ति निखिला अमराश्च देहे ।
स्नात्वा विशुद्धहृदया कपिला सवत्सा
सिद्धा प्रदर्शयितुमिह नस्तव विश्वरूपम् ॥४॥

आकर्ण्यतेऽद्य मदमत्त-गजेन्द्रनादः
त्वं बोध्यसे प्रतिदिनं मधुरेण येन ।
भूपालरागमुखरा मुखवाद्यवीणा
भेरीध्वनिश्च कुरुते भवतीं प्रबुद्धाम् ॥५॥

त्वां सेवितुं विविध-रत्न-सुवर्ण-रूप्य-
खाद्यम्बरैः कुसुम-पत्र-फलैश्च भक्ताः ।
श्रद्धान्विताः जननि विस्मृत-गृह्य-बन्धाः
आयान्ति भारत-निवासि-जनाः सवेगम् ॥६॥

जीवातवः सुकृतिनः श्रुतिरूपमातुः
विप्राः प्रसन्न-मनसो जपितार्क-मन्त्राः ।
श्रीसूक्त-रुद्र-चमकाद्यवधारणाय
सिद्धाः महेश-दयिते तव सुप्रभातम् ॥७॥

फालप्रकासि-तिलकाङ्क-सुवासिनीनां
कर्पूर-भद्र-शिखया तव दृष्टि-दोषम् ।
गोष्ठी विभाति परिहर्तुमनन्यभावा
हे देवि पङ्क्तिश इयं तव सुप्रभातम् ॥८॥

उग्रः सहस्र-किरणोऽपि करं समर्प्य
त्वत्तेजसः पुरत एष विलज्जितः सन् ।
रक्तस्तनावुदयमेत्यगपृष्ठलीनः पद्मं
त्वदास्यसहजं कुरुते प्रसन्नम् ॥९॥

नृत्यन्ति बर्हनिवहं शिखिनः प्रसार्य
गायन्ति पञ्चमगतेन पिकाः स्वरेण।
आस्ते तरङ्गतति-वाद्य-मृदङ्ग-नादः
तौर्यत्रिकं शुभमकृत्रिममस्तु तुभ्यम् ॥१०॥

संताप-पाप-हरणे त्वयि दीक्षितायां
संताप-हारि-शशि-पापहरापगाभ्याम् ।
कुत्रापि धूर्जटि-जटा-विपिने निलीनं
छिन्ना सरित् क्षयमुपैति विधुश्च वक्रः ॥११॥

भुक्त्वा कुचेल-पृतुकं ननु गोपबालः
आकर्ण्य ते व्यरचयत् सुहृदं कुबेरम् ।
व्याजस्य नास्ति तव रिक्त-जनादपेक्षा
निर्व्याजमेव करुणां नमते तनोषि ॥१२॥

प्राप्नोति वृद्धिमतुलां पुरुषः कटाक्षैः
द्वन्द्वी ध्रुवं क्षयमुपैति न चात्र शङ्का।
मित्रस्तवोषसि पदं परिसेव्य वृद्धः
चन्द्रस्त्वदीय-मुखशत्रुतया विनष्टः ॥१३॥

सृष्टि-स्थिति-प्रलय-साक्षिणि विश्व-मातः
स्वर्गापवर्ग-फल-दायनि शंभु-कान्ते ।
श्रुत्यन्तखेलिनि विपक्ष-कठोर-वज्रे
भद्रे प्रसन्न-हृदये तव सुप्रभातम् ॥१४॥

मातः स्वरूपमनिशं हृदि पश्यतां ते
को वा न सिद्ध्यति मनश्चिर-कांक्षितार्थः ।
सिद्ध्यन्ति हन्त धरणी-धन-धान्य-धाम-
धी-धेनु-धैर्य-धृतयः सकलाः पुमार्थाः ॥१५॥

इति श्रीत्रिपुरसुन्दरी स्तोत्रं सम्पूर्णम् !!

दशमहाविद्यास्तोत्रम् !!


श्री गणेशाय नमः ॥
ॐ नमस्ते चण्डिके चण्डि चण्डमुण्डविनाशिनि ।
नमस्ते कालिके कालमहाभयविनाशिनि ॥१॥
शिवे रक्ष जगद्धात्रि प्रसीद हरवल्लभे ।
प्रणमामि जगद्धात्रीं जगत्पालनकारिणीम् ॥२॥
जगत् क्षोभकरीं विद्यां जगत्सृष्टिविधायिनीम् ।
करालां विकटां घोरां मुण्डमालाविभूषिताम् ॥३॥
हरार्चितां हराराध्यां नमामि हरवल्लभाम् ।
गौरीं गुरुप्रियां गौरवर्णालङ्कारभूषिताम् ॥४॥
हरिप्रियां महामायां नमामि ब्रह्मपूजिताम् ।
सिद्धां सिद्धेश्वरीं सिद्धविद्याधरङ्गणैर्युताम् ॥५॥
मन्त्रसिद्धिप्रदां योनिसिद्धिदां लिङ्गशोभिताम् ।
प्रणमामि महामायां दुर्गां दुर्गतिनाशिनीम् ॥६॥
उग्रामुग्रमयीमुग्रतारामुग्रगणैर्युताम् ।
नीलां नीलघनश्यामां नमामि नीलसुन्दरीम् ॥७॥
श्यामाङ्गीं श्यामघटितां श्यामवर्णविभूषिताम् ।
प्रणमामि जगद्धात्रीं गौरीं सर्वार्थसाधिनीम् ॥८॥
विश्वेश्वरीं महाघोरां विकटां घोरनादिनीम् ।
आद्यामाद्यगुरोराद्यामाद्यनाथप्रपूजिताम् ॥९॥
श्रीं दुर्गां धनदामन्नपूर्णां पद्मां सुरेश्वरीम् ।
प्रणमामि जगद्धात्रीं चन्द्रशेखरवल्लभाम् ॥१०॥
त्रिपुरां सुन्दरीं बालामबलागणभूषिताम् ।
शिवदूतीं शिवाराध्यां शिवध्येयां सनातनीम् ॥११॥
सुन्दरीं तारिणीं सर्वशिवागणविभूषिताम् ।
नारायणीं विष्णुपूज्यां ब्रह्मविष्णुहरप्रियाम् ॥१२॥
सर्वसिद्धिप्रदां नित्यामनित्यां गुणवर्जिताम् ।
सगुणां निर्गुणां ध्येयामर्चितां सर्वसिद्धिदाम् ॥१३॥
विद्यां सिद्धिप्रदां विद्यां महाविद्यां महेश्वरीम् ।
महेशभक्तां माहेशीं महाकालप्रपूजिताम् ॥१४॥
प्रणमामि जगद्धात्रीं शुम्भासुरविमर्दिनीम् ।
रक्तप्रियां रक्तवर्णां रक्तबीजविमर्दिनीम् ॥१५॥
भैरवीं भुवनां देवीं लोलजिव्हां सुरेश्वरीम् ।
चतुर्भुजां दशभुजामष्टादशभुजां शुभाम् ॥१६॥
त्रिपुरेशीं विश्वनाथप्रियां विश्वेश्वरीं शिवाम् ।
अट्टहासामट्टहासप्रियां धूम्रविनाशिनीम् ॥१७॥

कमलां छिन्नभालाञ्च मातङ्गीं सुरसुन्दरीम् ।
षोडशीं विजयां भीमां धूमाञ्च वगलामुखीम् ॥१८॥
सर्वसिद्धिप्रदां सर्वविद्यामन्त्रविशोधिनीम् ।
प्रणमामि जगत्तारां साराञ्च मन्त्रसिद्धये ॥१९॥
इत्येवञ्च वरारोहे स्तोत्रं सिद्धिकरं परम् ।
पठित्वा मोक्षमाप्नोति सत्यं वै गिरिनन्दिनि ॥२०॥
इति दशमहाविद्यास्तोत्रं सम्पूर्णम् ।

श्री माँ सरस्वती स्तोत्रम्


श्री गणेशाय नमः ॥
घोररूपे महारावे सर्वशत्रु भयङ्करी ।
भक्तेभ्यो वरदे देवि त्राहि मां शरणागतम् ॥१॥
ॐ सुरासुरार्चिते देवि सिद्ध गन्धर्व सेविते ।
जाड्यपापहरे देवि त्राहि मां शरणागतम् ॥२॥
जटाजूट समायुक्ते लोलजिह्वान्तकारिणी ।
द्रुतबुद्धिकरे देवि त्राहि मां शरणागतम् ॥३॥
सौम्यक्रोधधरे रूपे चण्डरूपे नमोऽस्तु ते ।
सृष्टिरूपे नमस्तुभ्यं त्राहि मां शरणागतम् ॥४॥
जडानां जडतां हन्ति भक्तानां भक्तवत्सला ।
मूढतां हर मे देवि त्राहि मां शरणागतम् ॥५॥
ह्रूं ह्रूंकारमये देवि बलिहोमप्रिये नमः ।
उग्रतारे नमो नित्यं त्राहि मां शरणागतम् ॥६॥
बुद्धिं देहि यशो देहि कवित्वं देहि देवि मे ।
मूढत्वं च हरेर्देवि त्राहि मां शरणागतम् ॥७॥
इन्द्रादिविलसन्देववन्दिते करुणामयी ।
तारे तारधिनाथास्थे त्राहि मां शरणागतम् ॥८॥

॥अथ फलश्रुतिः ॥
अष्टम्यां च चतुर्दश्यां नवम्यां च पठेन्नरः ।
षण्मासैः सिद्धिमाप्नोति नात्र कार्या विचारणा ॥१॥
मोक्षार्थी लभते मोक्षं धनार्थी लभते धनम् ।
विध्यार्थी लभते विद्यां तर्कव्याकरणादिकाम् ॥२॥
इदं स्तोत्रं पठेद्यस्तु सततं श्रद्धयान्वितः ।
तस्य शत्रुः क्षयं याति महाप्रज्ञा प्रजायते ॥३॥
पीडायां यापि सङ्ग्रामे जाड्ये दाने तथा भये ।
य इदं पठति स्तोत्रं शुभं तस्य न संशयः ।
इति प्रणम्य स्तुत्वा च योनिमुद्रां प्रदर्शयेत् ।
॥इति श्री  सरस्वती स्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

बगुलामुखी माता स्तोत्र !!



श्रीगणेशाय नमः ।

चलत्कनककुण्डलोल्लसितचारुगण्डस्थलीं
लसत्कनकचम्पकद्युतिमदिन्दुबिम्बाननाम् ।
गदाहतविपक्षकां कलितलोलजिह्वाञ्चलां
स्मरामि बगलामुखीं विमुखवाङ्मनस्स्तम्भिनीम् ॥१॥

पीयूषोदधिमध्यचारुविलद्रक्तोत्पले मण्डपे
सत्सिंहासनमौलिपातितरिपुं प्रेतासनाध्यासिनीम् ।
स्वर्णाभां करपीडितारिरसनां भ्राम्यद्गदां विभ्रतीमित्थं
ध्यायति यान्ति तस्य सहसा सद्योऽथ सर्वापदः ॥२॥

देवि त्वच्चरणाम्बुजार्चनकृते यः पीतपुष्पाञ्जलीन्भक्त्या
वामकरे निधाय च मनुं मन्त्री मनोज्ञाक्षरम् ।
पीठध्यानपरोऽथ कुम्भकवशाद्बीजं स्मरेत्पार्थिवं
तस्यामित्रमुखस्य वाचि हृदये जाड्यं भवेत्तत्क्षणात् ॥३॥

वादी मूकति रङ्कति क्षितिपतिर्वैश्वानरः शीतति क्रोधी
शाम्यति दुर्जनः सुजनति क्षिप्रानुगः खञ्जति ।
गर्वी खर्वति सर्वविच्च जडति त्वन्मन्त्रिणा यन्त्रितः
श्रीर्नित्ये बगलामुखि प्रतिदिनं कल्याणि तुभ्यं नमः ॥४॥

मन्त्रस्तावदलं विपक्षदलने स्तोत्रं पवित्रं च ते
यन्त्रं वादिनियन्त्रणं त्रिजगतां जैत्रं च चित्रं च ते ।
मातः श्रीबगलेति नाम ललितं यस्यास्ति जन्तोर्मुखे
त्वन्नामग्रहणेन संसदि मुखे स्तम्भो भवेद्वादिनाम् ॥५॥

दुष्टस्तम्भनमुग्रविघ्नशमनं दारिद्र्यविद्रावणं
भूभृत्सन्दमनं चलन्मृगदृशां चेतःसमाकर्षणम् ।
सौभाग्यैकनिकेतनं समदृशः कारुण्यपूर्णेक्षणम्
मृत्योर्मारणमाविरस्तु पुरतो मातस्त्वदीयं वपुः ॥६॥

मातर्भञ्जय मद्विपक्षवदनं जिह्वां च सङ्कीलय
ब्राह्मीं मुद्रय दैत्यदेवधिषणामुग्रां गतिं स्तम्भय ।
शत्रूंश्चूर्णय देवि तीक्ष्णगदया गौराङ्गि पीताम्बरे
विघ्नौघं बगले हर प्रणमतां कारुण्यपूर्णेक्षणे ॥७॥

मातर्भैरवि भद्रकालि विजये वाराहि विश्वाश्रये
श्रीविद्ये समये महेशि बगले कामेशि वामे रमे ।
मातङ्गि त्रिपुरे परात्परतरे स्वर्गापवर्गप्रदे
दासोऽहं शरणागतः करुणया विश्वेश्वरि त्राहि माम् ॥८॥

संरम्भे चौरसङ्घे प्रहरणसमये बन्धने व्याधिमध्ये
विद्यावादे विवादे प्रकुपितनृपतौ दिव्यकाले निशायाम् ।
वश्ये वा स्तम्भने वा रिपुवधसमये निर्जने वा वने वा
गच्छंस्तिष्ठंस्त्रिकालं यदि पठति शिवं प्राप्नुयादाशु धीरः ॥९॥

त्वं विद्या परमा त्रिलोकजननी विघ्नौघसंछेदिनी
योषित्कर्षणकारिणी जनमनःसम्मोहसन्दायिनी ।
स्तम्भोत्सारणकारिणी पशुमनःसम्मोहसन्दायिनी
जिह्वाकीलनभैरवी विजयते ब्रह्मादिमन्त्रो यथा ॥१०॥

विद्या लक्ष्मीर्नित्यसौभाग्यमायुः पुत्रैः पौत्रैः सर्वसाम्राज्यसिद्धिः ।
मानो भोगो वश्यमारोग्यसौख्यं प्राप्तं तत्तद्भूतलेऽस्मिन्नरेण ॥११॥

त्वत्कृते जपसन्नाहं गदितं परमेश्वरि ।
दुष्टानां निग्रहार्थाय तद्गृहाण नमोऽस्तु ते ॥१२॥

पीताम्बरां च द्विभुजां त्रिनेत्रां गात्रकोमलाम् ।
शिलामुद्गरहस्तां च स्मरे तां बगलामुखीम् ॥१३॥

ब्रह्मास्त्रमिति विख्यातं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ।
गुरुभक्ताय दातव्यं न देयं यस्य कस्यचित् ॥१४॥

नित्यं स्तोत्रमिदं पवित्रमिह यो देव्याः पठत्यादराद्धृत्वा
यन्त्रमिदं तथैव समरे बाहौ करे वा गले ।
राजानोऽप्यरयो मदान्धकरिणः सर्पा मृगेन्द्रादिकास्ते
वै यान्ति विमोहिता रिपुगणा लक्ष्मीः स्थिरा सिद्धयः ॥१५॥

॥इति श्रीरुद्रयामले तन्त्रे श्रीबगलामुखीस्तोत्रं समाप्तम् ॥

Saturday, 24 October 2015

क्या आप को पता है कैसे करे देव साधना आप को माता दुर्गा की की साधना के माध्यम से बताते है !!


किसी भी भी देव ये देवी साधना को प्रारम्भ करने के लिए सबसे पहले जो मुख्य चीजें आवश्यक होती हैं उनका क्रम इस प्रकार है :-
 

किसी भी आदिसक्ति कि साधना को चार भागो में बाटा गया है प्रथम पूजन खंड, मध्यम पूजन खंड, अंतिम पूजन खंड, सायंकाल पूजा खंड इन चार चरणों में साधना कि जाती है सर्वप्रथम जिस दिन भी साधना प्रारम्भ करने का विचार करें तो पहले अपने इष्ट का वार पता कर लें जैसे कि माँ चामुंडा कि साधना किसी भी सोमवार या शुक्रवार से प्रारम्भ कि जा सकती है किन्तु इसमें एक चीज और ध्यान देने लायक होती है कि सभी साधनाओं का प्रारम्भ शुक्ल पक्ष से करना चाहिए ! इसके बाद जिस दिन भी आप साधना प्रारम्भ करेंगे उस दिन आपको कुछ ज्यादा समय देना होगा क्योंकि वह दिन मुख्यतः अपने इष्ट को अपने घर और ह्रदय में स्थापित करने का दिन होता है -!

साधना के लिए जो मुख्य बातें ध्यान में रखनी चाहिए वे निम्न प्रकार होंगी :-
१- माँ का एक चित्र ( यदि मूर्ति स्थापित करते हैं जैसे कि पीतल (ब्रॉस) या फिर अन्य किसी धातु की तो एक बात का ध्याना रखना चाहिए कि मूर्ति कि ऊंचाई १२ इंच से अधिक नहीं होनी चाहिए क्योंकि इससे अधिक ऊंचाई कि मूर्ति घर में नहीं रखी जाती बल्कि मंदिर में स्थापित होती है ) लेकिन कागज या पेंटिंग के मामले में यह नियम लागु नहीं होता
२. आसन बहुत बार देखने में आता है कि लोग किसी भी चौकी या किसी भी स्थान पर इष्ट कि स्थापना कर लेते हैं किन्तु यदि वैदिक दृष्टिकोण से देखा जाये तो इष्ट कि मूर्ति कि अवस्था आप जब बैठें तो आपकी नाभि से ऊपर होनी चाहिए कहने का मतलब कि आसन इस प्रकार व्यवस्थित करें कि जब आप साधना के लिए अपने इष्ट के सामने बैठें तो उनका आसन जिस पर उन्हें स्थान दिया गया है उसकी ऊंचाई आपके ह्रदय क्षेत्र के सामने होनी चाहिए
३. स्थान चुनाव :- स्थान का चुनाव भी आपकी साधना में बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखता है साधना के लिए ऐसे स्थान का चुनाव करना चाहिए जहाँ पर आम आना जाना न हो कहने का अभिप्राय ये है कि साधना कक्ष एकांत में होना चाहिए और वहाँ तक सबकी पहुँच नहीं होनी चाहिए
४. दिशा निर्धारण :- साधना के लिए हमेशा अपने इष्ट देव कि स्थापना इस प्रकार करनी चाहिए कि जब आप साधना के लिए उनके समक्ष बैठें तो आपका मुंह उत्तर या पूर्व - की तरफ पड़े !

साधना चरण :-यहा से शुरू होती है साधना की व पूजन विधि !

प्रथम पूजन खंड
षोडशोपचार पूजन :- इस प्रकार करे
षोडशोपचार पूजन 
१.आवाहन - ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डे आगच्छय आगच्छय
२. आसन - ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डे आसनं समर्पयामि
३. पाद्य- ( चरण धोना ) - ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डे पाद्यं निवेदयामि
४. अर्घ्य - ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डे अर्घ्यं निवेदयामि
५, आचमन - ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डे आचमनं समर्पयामि
६. स्नान - ॐ सह त्रिवेणी सलिलाधारम लोक संस्मृति मात्रेण वारिणा स्नापयाम्यहम् - ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डे स्नानं निवेदयामि
७. वस्त्र - वस्त्र समर्पण में हमेशा दो वस्त्रों का समर्पण किया जाता है और उसका रंग लाल होना चाहिए वस्त्र न होने कि स्थिति में मौली धागा ( जो प्रायः अनुष्ठान में रक्षा धागा के रूप में पुरोहितों द्वारा यजमान के हाथ में बंधा जाता है प्रयोग किया जा सकता है किन्तु उनमे से किसी भी धागे कि लम्बाई बारह अंगुल से कम नहीं होनी चाहिए )

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डे प्रथम वस्त्रं समर्पयामि
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डे द्वितीय वस्त्रं समर्पयामि
८. यज्ञोपवीत ( यज्ञोपवीत एक धागा होता है जो गृहस्थ लोगों द्वारा धारण किया जाता है ) ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डे यज्ञोपवीतं समर्पयामि !!
९. चन्दन - ॐ मल्यांचल सम्भूतं नाना गंध समन्वितं - शीतलं बहुलामोदम गन्धं चन्दनं निवेदयामि
१०. अक्षत - ( अक्षत को हिंदी में चावल बोलते हैं अक्षत का पूजा एवं साधना में अभिप्राय होता है आपके इष्ट के पसंदीदा रंग में रंगे हुए चावल जो टूटे-फूटे हुए न हों माँ चामुंडा कि साधना में अक्षत लाल रंग में रंगे हुए प्रयोग किये जाते हैं )
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डे आचमनं समर्पयामि
११. पुष्प - ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डे पुष्पं समर्पयामि
१२. सिंदूर ( सिंदूर समर्पण करते समय एक बात का ध्यान रखना चाहिए कि जब भी आप सिंदूर चढ़ाएंगे तो सिंदूर को माँ के मस्तक या ऊपर नहीं चढ़ाना है बल्कि उस सिन्दूर को उनके चरणों के पास समर्पित करना है ) ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डे सिन्दूरं समर्पयामि
१३. पान -ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डे ताम्बूलं समर्पयामि
१४. सुपारी - ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डे पुन्गीफलं समर्पयामि
१५. धूप - ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डे गुग्गल संयुतं नाना गंध समन्वितं एवं भक्ष्य पदार्थ समन्वितं धूपं समर्पयामि
१६ . दीप - ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डे घृत-कर्पूर-कपास एव स्वर्ण पात्र निर्मित दीपं समर्पयामि
१७ . नैवेद्य - ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डे नाना फल फूल एव खाद्य पदार्थ संयुक्त नैवेद्यम समर्पयामि-
मध्यम पूजन खंड =========
इन उपरोक्त १७ चरणों को प्राथमिक पूजन में शामिल किया जाता है इसके पश्चात् मध्यम पूजन का विधान है जिसमे हम शामिल करते हैं :-

स्तुति :-
सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके।शरन्ये त्रयम्बिके गौरी नारायणी नमोस्तुते।।
शरणागत दीनार्तपरित्राण परायणे। सर्वस्यातिहरे देवि नारायणी नमोस्तुते।।
सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वेशक्तिसमन्विते । भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते ।।
रोगनशेषानपहंसि तुष्टा। रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान्।।
त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां। त्वमाश्रिता हृयश्रयतां प्रयान्ति।।
सर्वाबाधा प्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि। एवमेव त्वया कार्यमस्मद्दैरिविनाशनम्।।
सर्वाबाधा विर्निर्मुक्तो धनधान्यसुतान्वित:। मनुष्यो मत्प्रसादेन भविष्यति न संशय:।।
जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी । दुर्गा शिवा क्षमा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते ।।
देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि देवि परं सुखम् ।रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥

॥ अथ देव्याः कवचम्‌ ॥
विनियोग :-
ॐ अस्य श्रीचण्डीकवचस्य ब्रह्मा ऋषिः, अनुष्टुप्‌ छन्दः, चामुण्डा देवता, अंगन्यासोक्तमातरो बीजम्‌, दिग्बन्धदेवतास्तत्त्वम्‌, श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थे सप्तशतीपाठांगत्वेन जपे विनियोगः।
॥ ॐ नमश्चण्डिकायै॥ 

मार्कण्डेय उवाच
ॐ यद्गुह्यं परमं लोके सर्वरक्षाकरं नृणाम्‌।
यन्न कस्यचिदाख्यातं तन्मे ब्रूहि पितामह॥1॥ 

ब्रह्मोवाच
अस्ति गुह्यतमं विप्र सर्वभूतोपकारकम्‌।
देव्यास्तु कवचं पुण्यं तच्छृणुष्व महामुने॥
प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्‌॥
पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्‌॥
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना॥
अग्निता दह्यमानस्तु शत्रुमध्ये गतो रणे।
विषमे दुर्गमे चैव भयार्ताः शरणं गताः॥
न तेषा जायते किंचिदशुभं रणसंकटे।
नापदं तस्य पश्यामि शोकदुःखभयं न हि॥
यैस्तु भक्त्या स्मृता नूनं तेषां वृद्धि प्रजायते।
ये त्वां स्मरन्ति देवेशि रक्षसे तान्न संशयः!!
प्रेतसंस्था तु चामुण्डा वाराही महिषासना।
ऐन्द्री गजसमानरूढा वैष्णवी गरुडासना॥
माहेश्वरी वृषारूढा कौमारी शिखिवाहना।
लक्ष्मीः पद्मासना देवी पद्महस्ता हरिप्रिया॥
श्वेतरूपधरा देवी ईश्वरी वृषवाहना।
ब्राह्मी हंससमारूढा सर्वाभरणभूषिता॥
इत्येता मातरः सर्वाः सर्वयोगसमन्विताः।
नानाभरणशोभाढ्या नानारत्नोपशोभिताः॥
दृश्यन्ते रथमारूढा देव्यः क्रोधसमाकुलाः।
शंख चक्रं गदां शक्तिं हलं च मुसलायुधम्‌॥
खेटकं तोमरं चैव परशुं पाशमेव च।
कुन्तायुधं त्रिशूलं च शांर्गमायुधमुत्तमम्‌॥
दैत्यानां देहनाशाय भक्तानामभयाय च।
धारयन्त्यायुधानीत्थं देवानां च हिताय वस॥
नमस्तेऽस्तु महारौद्रे महाघोरपराक्रमे।
महावले महोत्साहे महाभयविनाशिनि॥
त्राहि मां देवि दुष्प्रेक्ष्ये शत्रूणां भयवर्धिन।
प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्री आग्नेय्यामग्निदेवता॥
दक्षिणेऽवतु वाराहीनैर्ऋत्यां खड्गधारिणी।
प्रतीच्यां वारुणी रक्षेद् वायव्यां मृगवाहिनी॥
उदीच्यां पातु कौमारी ऐशान्यां शूलधारिणी।
ऊर्ध्वं ब्रह्माणि मे रक्षेद्धस्ताद् वैष्णवी तथा ॥
एवं दश दिशो रक्षेच्चामुण्डा शववाहना।
जया में चाग्रतः पातु विजया पातु पृष्ठतः॥
अजिता वामपार्श्वे तु दक्षिणे चापराजिता।
शिखामुद्योतिनी रक्षेदुमा मूर्ध्नि व्यवस्थिता॥
मालाधारी ललाटे च भ्रुवौ रक्षेद् यशस्विनी।
त्रिनेत्रा च भ्रुवोर्मध्ये यमघण्टा च नासिके॥
शंखिनी चक्षुषोर्मध्ये श्रोत्रयोर्द्वारवासिनी।
कपोलौ कालिका रक्षेत्कर्णमूले च शांकरी॥
नासिकायां सुगन्दा च उत्तरोष्ठे च चर्चिका।
अधरे चामृतकला जिह्वायां च सरस्वती॥
दन्तान्‌ रक्षतु कौमारी कण्ठदेशे तु चण्डिका।
घण्टिकां चित्रघण्टा च महामाया च तालुके॥
कामाक्षी चिबुकं रक्षेद् वाचं मे सर्वमंगला।
ग्रीवायां भद्रकाली च पृष्ठवंशे धनुर्धरी॥
नीलग्रीवा बहिःकण्ठे नलिकां नलकूबरी।
स्कन्धयोः खड्गिनी रक्षेद् बाहू में व्रजधारिणी॥
हस्तयोर्दण्डिनी रक्षेदम्बिका चांगुलीषु च।
नखांछूलेश्वरी रक्षेत्कुक्षौ रक्षेत्कुलेश्वरी॥
स्तनौ रक्षेन्महादेवी मनः शोकविनाशिनी।
हृदये ललिता देवी उदरे शूलधारिणी॥
नाभौ च कामिनी रक्षेद् गुह्यं गुह्येश्वरी तथा।
पूतना कामिका मेढ्रं गुदे महिषवाहिनी॥
कट्यां भगवती रक्षेज्जानुनी विन्ध्यवासिनी।
जंघे महाबला रक्षेत्सर्वकामप्रदायिनी॥
गुल्फयोर्नारसिंही च पादपृष्ठे तु तैजसी।
पादांगुलीषु श्री रक्षेत्पादाधस्तलवासिनी॥
नखान्‌ दंष्ट्राकराली च केशांश्चैवोर्ध्वकेशिनी।
रोमकूपेषु कौबेरी त्वचं वागीश्वरी तथा॥
रक्तमज्जावसामांसान्यस्थिमेदांसि पार्वती।
अन्त्राणि कालरात्रिश्च पित्तं च मुकुटेश्वरी॥
पद्मावती पद्मकोशे कफे चूडामणिस्तथा।
ज्वालामुखी नखज्वालामभेद्या सर्वसंधिषु॥
शुक्रं ब्रह्माणि मे रक्षेच्छायां छत्रेश्वरी तथा।
अहंकारं मनो बुद्धिं रक्षेन्मे धर्मधारिणी॥
प्राणापानौ तथा व्यानमुदानं च समानकम्‌।
वज्रहस्ता च मे रक्षेत्प्राणं कल्याणशोभना॥
रसे रूपे च गन्धे च शब्दे स्पर्शे च योगिनी।
सत्त्वं रजस्तमश्चैव रक्षेन्नारायणी सदा॥
आयू रक्षतु वाराही धर्मं रक्षतु वैष्णवी।
यशः कीर्तिं च लक्ष्मीं च धनं विद्यां च चक्रिणी॥
गोत्रमिन्द्राणि मे रक्षेत्पशून्मे रक्ष चण्डिके।
पुत्रान्‌ रक्षेन्महालक्ष्मीर्भार्यां रक्षतु भैरवी॥
पन्थानं सुपथा रक्षेन्मार्गं क्षेमकरी तथा।
राजद्वारे महालक्ष्मीर्विजया सर्वतः स्थिता॥
रक्षाहीनं तु यत्स्थानं वर्जितं कवचेन तु।
तत्सर्वं रक्ष मे देवि जयन्ती पापनाशिनी॥
पदमेकं न गच्छेतु यदीच्छेच्छुभमात्मनः।
कवचेनावृतो नित्यं यत्र यत्रैव गच्छति॥
तत्र तत्रार्थलाभश्च विजयः सार्वकामिकः।
यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चितम्‌।
परमैश्वर्यमतुलं प्राप्स्यते भूतले पुमान्‌॥
निर्भयो जायते मर्त्यः संग्रामेष्वपराजितः।
त्रैलोक्ये तु भवेत्पूज्यः कवचेनावृतः पुमान्‌॥
इदं तु देव्याः कवचं देवानामपि दुर्लभम्‌।
यः पठेत्प्रयतो नित्यं त्रिसन्ध्यं श्रद्धयान्वितः॥
दैवी कला भवेत्तस्य त्रैलोक्येष्वपराजितः।
जीवेद् वर्षशतं साग्रमपमृत्युविवर्जितः॥
नश्यन्ति व्याधयः सर्वे लूताविस्फोटकादयः।
स्थावरं जंगमं चैव कृत्रिमं चापि यद्विषम्‌॥
अभिचाराणि सर्वाणि मन्त्रयन्त्राणि भूतले।
भूचराः खेचराश्चैव जलजाश्चोपदेशिकाः॥
सहजा कुलजा माला डाकिनी शाकिनी तथा।
अन्तरिक्षचरा घोरा डाकिन्यश्च महाबलाः॥
ग्रहभूतपिशाचाश्च यक्षगन्धर्वराक्षसाः।
ब्रह्मराक्षसवेतालाः कूष्माण्डा भैरवादयः॥
नश्यन्ति दर्शनात्तस्य कवचे हृदि संस्थिते।
मानोन्नतिर्भवेद् राज्ञस्तेजोवृद्धिकरं परम्‌॥
यशसा वर्धते सोऽपि कीर्तिमण्डितभूतले।
जपेत्सप्तशतीं चण्डीं कृत्वा तु कवचं पुरा॥
यावद्भूमण्डलं धत्ते सशैलवनकाननम्‌।
तावत्तिष्ठति मेदिन्यां संततिः पुत्रपौत्रिकी॥
देहान्ते परमं स्थानं यत्सुरैरपि दुर्लभम्‌।
प्राप्नोति पुरुषो नित्यं महामायाप्रसादतः॥
लभते परमं रूपं शिवेन सह मोदते॥ॐ॥
॥ इति देव्याः कवचं संपूर्णम्‌ ॥
कवच पाठ के उपरांत मंत्र जाप सम्पन्न करें जिसमे लाल चन्दन की माला का प्रयोग होगा और जप संख्या १०८
मंत्र जप :- ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै स्वाहा

अंतिम पूजन खंड :=
१८ . दक्षिणा - ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डे कांचनं रजतोपेतं नाना रत्न समन्वितं दक्षिणाम समर्पयामि
१९. पुष्पांजलि - ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डे पुष्पांजलि समर्पयामि
२०. नीराजन - ( वस्तुतः इस चरण में पूजा समापन के स्तर पर आ जाती है और इस चरण में कर्पूर का दीपक जलाकर माँ कि प्राथमिक आरती कि जाती है ) - ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डे नीराजनं निवेदयामि
२१. आरती :- इस चरण में माता कि आरती गाते हुए आरती समपन्न कि जाती है !!
ॐ सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके । शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणी नमोस्तुते ॥
जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी ।
तुमको निशदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी ॥ टेक ॥
मांग सिंदूर विराजत, टीको मृगमद को ।
उज्जवल से दो‌उ नैना, चन्द्रबदन नीको ॥ जय ॥
कनक समान कलेवर, रक्ताम्बर राजै ।
रक्त पुष्प गलमाला, कण्ठन पर साजै ॥ जय ॥
केहरि वाहन राजत, खड़ग खप्परधारी ।
सुर नर मुनिजन सेवक, तिनके दुखहारी ॥ जय ॥
कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती ।
कोटिक चन्द्र दिवाकर, राजत सम ज्योति ॥ जय ॥
शुम्भ निशुम्भ विडारे, महिषासुर घाती ।
धूम्र विलोचन नैना, निशदिन मदमाती ॥ जय ॥
चण्ड मुण्ड संघारे, शोणित बीज हरे ।
मधुकैटभ दो‌उ मारे, सुर भयहीन करे ॥ जय ॥
ब्रहमाणी रुद्राणी तुम कमला रानी ।
आगम निगम बखानी, तुम शिव पटरानी ॥ जय ॥
चौसठ योगिनी गावत, नृत्य करत भैरुं ।
बाजत ताल मृदंगा, अरु बाजत डमरु ॥ जय ॥
तुम हो जग की माता, तुम ही हो भर्ता ।
भक्‍तन् की दुःख हरता, सुख-सम्पत्ति करता ॥ जय ॥
भुजा चार अति शोभित, खड़ग खप्परधारी ।
मनवांछित फल पावत, सेवत नर नारी ॥ जय ॥
कंचन थाल विराजत, अगर कपूर बाती ।
श्री मालकेतु में राजत, कोटि रतन ज्योति ॥ जय ॥
श्री अम्बे जी की आरती, जो को‌ई नर गावै ।
कहत शिवानन्द स्वामी, सुख सम्पत्ति पावै ॥ जय ॥

२२ . प्रदक्षिणा - इस चरण में यदि आपके साधना स्थल में इतनी जगह है कि आप माता कि मूर्ति के चरों और घूमकर परिक्रमा कर सकें तो बहुत बेहतर है अन्यथा अपने स्थान पर खड़े होकर और यह कल्पना करते हुए कि आप माँ के चरों और परिक्रमा लगा रहें हैं अपने स्थान पर ही एक चक्कर लगा लेते है या फिर यदि आप इससे ज्यादा भी लगाना चाहें को कोई निषेध नहीं है !
यानि कानि च पापानि - जन्मान्तर कृतांचा !
तानि तानि विनश्यन्ति प्रदक्षिणं पदे पदे !!
इस प्रकार आपने अपनी साधना का प्रथम सोपान पूरा किया इसके पश्चात् यदि आप चाहें तो इसमें और भी चीजें शामिल कर सकते जैसे कि ( अर्गला स्तोत्र , कीलक स्तोत्र , रात्रिसूक्त , वैकृतिक रहस्यम , चालीसा एवं अन्य बहुत कुछ )

सायंकाल पूजा खंड =
इसके पश्चात् आपके लिए सायंकाल की प्रक्रिया भी करनी अति आवश्यक है क्योंकि यदि आपने माँ को अपने घर में , मंदिर में या ह्रदय में स्थान दिया है तो सायंकाल कि आरती अति आवश्यक है उसमे आप माँ कि स्तुति ,चालीसा चाहें तो कवच का पाठ करके माँ कि आरती संपन्न करें !

विशेष := जिस देव कि साधना करे उस की साधना में माँ के मंत्रों के मंत्रों ,स्तुति और कबच आरती का प्रयोग करे !!

Friday, 23 October 2015

प्रेतादिक संकट निवारण के लिए पंचमुखी हनुमान उपासना सर्वश्रेष्ठ !!


जीवन जितना सत्य है, उतनी ही मृत्यु भी और उतना ही सत्य है मृत्यु के बाद का जीवन। भारतीय चिन्तन धारा के मूल स्रोतों जैसे वेद, उपनिषद्, महाभारत आदि में इस विषय पर बड़ी ही विस्तृत चर्चा की गई है। मनुष्य मृत्युपर्यन्त आकाङ्क्षाओं के पीछे भागता रहता है और मृत्यु के बाद इन्हीं अधूरी इच्छाओं के कारण वह प्रेतयोनि को प्राप्त होता है। मानव की मृत्यु के बाद सूक्ष्म शरीर का इस पार्थिव शरीर से अलगाव हो जाता है। शास्त्रों में कहा गया है कि सूक्ष्म शरीर निराश्रय नहीं रह सकता- ‘न तिष्ठति निराश्रयं लिङ्गम्’’ अतः अगला स्थूल शरीर प्राप्त करने तक वह सूक्ष्म शरीर अपनी वासनाओं के अनुसार प्रेत शरीर को ग्रहण कर लेता है। इन्हीं प्रेत शरीरों द्वारा यदा-कदा मनुष्य को आवेशित कर लेने के कारण विकट परिस्थिति उत्पन्न हो जाती है और यही घटना प्रेतबाधा के नाम से जानी जाती है। ऐसा नहीं है कि केवल प्रेतात्माओं के द्वारा ही मनुष्यों को कष्ट पहुँचाया जाता है। कभी-कभी विभिन्न देव योनियाँ जैसे देव, यक्ष, किन्नर, गंधर्व, नागादि भी कुपित होकर कष्टकारक हो जाते हैं।
 

प्रेतादिक संकट से होने वाली परेशानियां:=
 

व्यक्ति के शरीर के तापमान में अत्यधिक वृद्धि, उन्माद की अवस्था, शरीर के वजन में अधिक वृद्धि या कमी, व्यापार में घाटा ,विभिन्न प्रकार की बीमारियाँ दबा से ठीक ना होना आदि अनेक ऐसे संकेत हैं जिनसे ऊपरी बाधा का प्रकोप प्रकट हो जाता है।
 

प्रेत आत्मा क्यों को पकडती है :=
 

एक बात तो स्पष्ट ही है कि दुर्बल, रोगी, कातर (डरपोक), अत्याधिक खुशबूदार दार पदार्थ प्रयोग करने बाले ,आत्मबल से हीन तथा कमजोर इच्छाशक्ति वाले लोगों पर यह ऊपरी बाध प्रभाव अधिक होता हुआ देखा गया है। कभी-कभी दुष्ट तान्त्रिकों द्वारा भी धन के लालच में आकर निकृष्ट प्रेतात्माओं द्वारा मनुष्य को प्रेतबाधा से पीड़ित करने का दुष्कर्म किया जाता है। तीर्थ स्थलों तथा सिद्ध पीठों पर अपवित्र आचरण के कारण भी वहाँ उपस्थित दिव्यात्माएं क्रोधित होकर कभी-कभी कष्ट पहुँचाने लगती हैं।
 

प्रेत आत्माओ का कब आवेश होता है :=
 

प्रेतात्माओं का आवेश विशेष रूप से दोपहर, सायंकाल तथा मध्यरात्रि के समय होता है। निर्जन स्थान, श्मशान, लंबे समय से खाली पड़े घर आदि भी प्रेतों के वासस्थान माने गए हैं इसलिए यहाँ जाने से बचें। स्त्रियों को बाल खुले रखने से बचना चाहिए विशेष रूप से सायंकाल में। छोटे बच्चों के अकेले रहने पर भी प्रेतों का आवेश हो जाता है।
 

प्रेत बाधा निवारण: =
 

जहाँ तक ऊपरी बाधा के निवारण का प्रश्न है हनुमान जी की उपासना इस समस्या से मुक्ति के लिए अत्यन्त श्रेष्ठ मानी गई है। प्रसिद्ध ही है - ‘‘भूत पिशाच निकट नहीं आवै। महावीर जब नाम सुनावै।’’ भूत-प्रेत-पिशाच आदि निकृष्ट अशरीरी आत्माओं से मुक्ति के उपायों पर जब हम दृष्टिपात करते हैं तो पाते हैं इनसे संबंधित मंत्रों का एक बड़ा भाग हनुमान जी को ही समर्पित है। ऊपरी बाधा दूर करने वाले शाबर मन्त्रों से लेकर वैदिक मन्त्रों में हनुमान जी का नाम बार-बार आता है। वैसे तो हनुमान जी के कई रूपों का वर्णन तंत्रशास्त्र में मिलता है जैसे - एकमुखी हनुमान, पंचमुखी हनुमान, सप्तमुखी हनुमान तथा एकादशमुखी हनुमान। परंतु ऊपरी बाधा निवारण की दृष्टि से पंचमुखी हनुमान की उपासना चमत्कारिक और शीघ्रफलदायक मानी गई है। पंचमुखी हनुमान जी के स्वरूप में वानर, सिंह, गरुड़, वराह तथा अश्व मुख सम्मिलित हैं और इनसे ये पाँचों मुख तंत्रशास्त्र की समस्त क्रियाओं यथा मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण आदि के साथ-साथ सभी प्रकार की ऊपरी बाधाओं को दूर करने में सिद्ध माने गए हैं। किसी भी प्रकार की ऊपरी बाधा होने की शंका होने पर पंचमुखी हनुमान यन्त्र तथा पंचमुखी हनुमान लाकेट को प्राणप्रतिष्ठित कर धारण करने से समस्या से शीघ्र ही मुक्ति मिल जाती है।
 

प्राण-प्रतिष्ठा: =
 

पंचमुखी हनुमान जी की प्रतिमा या चित्र, यंत्र तथा लाकेट का पंचोपचार पूजन करें तथा उसके बाद समुचित विधि द्वारा उपरोक्त सामग्री को प्राणप्रतिष्ठित कर लें। प्राणप्रतिष्ठित यंत्र को पूजन स्थान पर रखें तथा लाकेट को धारण करें। उपरोक्त अनुष्ठान को किसी भी मंगलवार के दिन किया जा सकता है। उपरोक्त विधि अपने चमत्कारपूर्ण प्रभाव तथा अचूकता के लिए तंत्रशास्त्र में दीर्घकाल से प्रतिष्ठित है। श्रद्धापूर्वक किया गया उपरोक्त अनुष्ठान हर प्रकार की ऊपरी बाधा से मुक्ति प्रदान करता है।

Thursday, 22 October 2015

क्या आप को पता है क्यों भगवान शिव को महाकाली के पैरों तले क्यों आना पड़ा !!


भगवती की दस महाविद्याओं में से एक हैं महाकाली जिनके काले और डरावने रूप की उत्पत्ति राक्षसों का नाश करने के लिए हुई थी। यह एकमात्र ऐसी शक्ति है जिनसे स्वयं काल भी भय खाता है। उनका क्रोध इतना विकराल रूप ले लेता है कि संपूर्ण संसार की शक्तियां मिलकर भी उनके गुस्से पर काबू नहीं पा सकती। उनके इस क्रोध को रोकने के लिए स्वयं उनके पति भगवान शंकर उनके चरणों में आकर लेट गए थे। इस संबंध में शास्त्रों में बहुत सारी कथाएं वर्णित हैं। मार्कडेय पुराण के अनुसार दैत्य रक्तबीज ने कठोर तप के बल पर वर पाया था कि अगर उसके खून की एक बूंद भी धरती पर गिरेगी तो उससे अनेक दैत्य पैदा हो जाएंगे। उसने और शुम्भ और निशुम्भ अपनी शक्तियों का प्रयोग निर्दोष लोगों पर करना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे उसने अपना आतंक तीनों लोकों पर मचा दिया।देवताओं ने उसे युद्ध के लिए ललकारा। भयंकर युद्ध का आगाज हुआ। देवता अपनी पूरी शक्ति लगाकर रक्तबीज का नाश करने को तत्पर थे, मगर जैसे ही उसके शरीर की एक भी बूंद धरती पर गिरती, उस एक बूंद से अनेक रक्तबीज पैदा हो जाते। तब देवता युद्ध हार गए और स्वर्ग से निकाल दिए गए तब सभी देवता मिलकर महाकाली की शरण में गए। मां काली असल में सुन्दरी रूप भगवती दुर्गा का काला और डरावना रूप है जिनकी उत्पत्ति राक्षसों को मारने के लिए हुई थी। महाकाली ने देवताओं की रक्षा के लिए विकराल रूप धारण कर युद्ध भूमि में प्रवेश किया। मां काली की प्रतिमा देखें तो देखा जा सकता है कि वे विकराल मां हैं जिसके हाथ में खप्पर है, लहू टपकता है, तो गले में खोप‍ड़ियों की माला है। मगर मां की आंखें और हृदय से अपने भक्तों के लिए प्रेम की गंगा बहती है।महाकाली ने राक्षसों का वध करना आरंभ किया, लेकिन रक्तबीज के खून की एक भी बूंद धरती पर गिरती तो उससे अनेक दानवों का जन्म हो जाता जिससे युद्धभूमि में दैत्यों की संख्या बढ़ने लगी। तब मां ने अपनी जिह्वा का विस्तार किया। दानवों का एक खून धरती पर गिरने की बजाय उनकी जिह्वा पर गिरने लगा। तब वे दैत्यो को मार कर लाशों के ढेर लगाती गईं और उनका खून पीने लगीं। इस तरह महाकाली ने रक्तबीज का वध किया, लेकिन तब तक महाकाली का गुस्सा इतना विकराल रूप ले चुका था कि उनको शांत करना जरूरी था, मगर हर कोई उनके पास जाने से भी डर रहा था। तब सभी देवता भगवान शिव के पास गए और महाकाली को शांत करने के लिए प्रार्थना करने लगे। भगवान शिव ने उनको बहुत प्रकार से शांत करने की कोशिश की। जब सभी प्रयास विफल हो गए, तो वे उनके मार्ग में लेट गए। जब उनके चरण भगवान शिव पर पड़े तो उन के ह्रदय में दर्द हुआ तब वे एकदम से ठिठक गईं। उनका क्रोध शांत हो गया।क्यों की ही शिव सक्ति और शक्ति ही शिव है !! मां प्रकृतिस्वरूपा हैं। वास्तव में आदिशक्ति मां दुर्गा के विविध रूपों का वर्णन मार्कंडेय पुराण में वर्णित है। महासरस्वती, महाकाली और महालक्ष्मी रूपों में मां दुर्गा का विस्तार है।

Wednesday, 21 October 2015

क्या आप को पता है भगबान के छप्पन में क्या क्या आता है !!




भगवान को भक्त छप्पनभोग का प्रसाद चढ़ाते हैं।हिन्दू धर्म में छप्पन भोग लगाना बहुत शुभ माना जाता है इनमे निम्नलिखित भोग आते हैं !

1-रसगुल्ला, 2-चन्द्रकला, 3-रबड़ी, 4-शूली, 5-दधी, 6-भात, 7-दाल, 8-चटनी, 9-कढ़ी, 10-साग-कढ़ी, 11-मठरी, 12-बड़ा, 13-कोणिका, 14- पूरी, 15-खजरा, 16-अवलेह, 17-वाटी, 18-सिखरिणी, 19-मुरब्बा, 20-मधुर, 21-कषाय, 22-तिक्त, 23-कटु पदार्थ, 24-अम्ल {खट्टा पदार्थ}, 25-शक्करपारा, 26-घेवर, 27-चिला, 28-मालपुआ, 29-जलेबी, 30-मेसूब, 31-पापड़, 32-सीरा, 33-मोहनथाल, 34-लौंगपूरी, 35-खुरमा, 36-गेहूं दलिया, 37-पारिखा, 38-सौंफ़लघा, 39-लड़्ड़ू, 40-दुधीरुप, 41-खीर, 42-घी, 43-मक्खन, 44-मलाई, 45-शाक, 46-शहद, 47-मोहनभोग, 48-अचार, 49-सूबत, 50-मंड़का, 51-फल, 52-लस्सी, 53-मठ्ठा, 54-पान, 55-सुपारी, 56-इलायची।

क्या आप को पता है दशहरा क्यों मनाया जाता है !!


दशहरा (विजयदशमी या आयुध-पूजा) हिन्दुओं का एक प्रमुख त्योहार है। अश्विन (क्वार) मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को इसका आयोजन होता है। भगवान राम ने इसी दिन रावण का वध किया था। इसे असत्य पर सत्य की विजय के रूप में मनाया जाता है। इसीलिये इस दशमी को विजयादशमी के नाम से जाना जाता है। दशहरा वर्ष की तीन अत्यन्त शुभ तिथियों में से एक है, अन्य दो हैं चैत्र शुक्ल की एवं कार्तिक शुक्ल की प्रतिपदा।इसी दिन लोग नया कार्य प्रारम्भ करते हैं, शस्त्र-पूजा की जाती है। प्राचीन काल में राजा लोग इस दिन विजय की प्रार्थना कर रण-यात्रा के लिए प्रस्थान करते थे। इस दिन जगह-जगह मेले लगते हैं। रामलीला का आयोजन होता है। रावण का विशाल पुतला बनाकर उसे जलाया जाता है। दशहरा अथवा विजयदशमी भगवान राम की विजय के रूप में मनाया जाए अथवा दुर्गा पूजा के रूप में, दोनों ही रूपों में यह शक्ति-पूजा का पर्व है, शस्त्र पूजन की तिथि है। हर्ष और उल्लास तथा विजय का पर्व है। भारतीय संस्कृति वीरता की पूजक है, शौर्य की उपासक है। व्यक्ति और समाज के रक्त में वीरता प्रकट हो इसलिए दशहरे का उत्सव रखा गया है। दशहरा का पर्व दस प्रकार के पापों- काम, क्रोध, लोभ, मोह मद, मत्सर, अहंकार, आलस्य, हिंसा और चोरी के परित्याग की सद्प्रेरणा प्रदान करता है। इस पर्व को भगवती के 'विजया' नाम पर भी 'विजयादशमी' कहते हैं। इस दिन भगवान रामचंद्र चौदह वर्ष का वनवास भोगकर तथा रावण का वध कर अयोध्या पहुँचे थे। इसलिए भी इस पर्व को 'विजयादशमी' कहा जाता है। ऐसा माना जाता है कि आश्विन शुक्ल दशमी को तारा उदय होने के समय 'विजय' नामक मुहूर्त होता है। यह काल सर्वकार्य सिद्धिदायक होता है। इसलिए भी इसे विजयादशमी कहते हैं।ऐसा माना गया है कि शत्रु पर विजय पाने के लिए इसी समय प्रस्थान करना चाहिए। इस दिन श्रवण नक्षत्र का योग और भी अधिक शुभ माना गया है। युद्ध करने का प्रसंग न होने पर भी इस काल में राजाओं (महत्त्वपूर्ण पदों पर पदासीन लोग) को सीमा का उल्लंघन करना चाहिए। दुर्योधन ने पांडवों को जुए में पराजित करके बारह वर्ष के वनवास के साथ तेरहवें वर्ष में अज्ञातवास की शर्त दी थी। तेरहवें वर्ष यदि उनका पता लग जाता तो उन्हें पुनः बारह वर्ष का वनवास भोगना पड़ता। इसी अज्ञातवास में अर्जुन ने अपना धनुष एक शमी वृक्ष पर रखा था तथा स्वयं वृहन्नला वेश में राजा विराट के यहँ नौकरी कर ली थी। जब गोरक्षा के लिए विराट के पुत्र धृष्टद्युम्न ने अर्जुन को अपने साथ लिया, तब अर्जुन ने शमी वृक्ष पर से अपने हथियार उठाकर शत्रुओं पर विजय प्राप्त की थी। विजयादशमी के दिन भगवान रामचंद्रजी के लंका पर चढ़ाई करने के लिए प्रस्थान करते समय शमी वृक्ष ने भगवान की विजय का उद्घोष किया था। विजयकाल में शमी पूजन इसीलिए होता है।

Tuesday, 20 October 2015

क्या आप को पता है माँ दुर्गा का नवम् रूप सिद्धिदात्री !!


माँ दुर्गाजी की नौवीं शक्ति का नाम सिद्धिदात्री हैं। ये सभी प्रकार की सिद्धियों को देने वाली हैं। नवरात्र-पूजन के नौवें दिन इनकी उपासना की जाती है। इस दिन शास्त्रीय विधि-विधान और पूर्ण निष्ठा के साथ साधना करने वाले साधक को सभी सिद्धियों की प्राप्ति हो जाती है। सृष्टि में कुछ भी उसके लिए अगम्य नहीं रह जाता है। ब्रह्मांड पर पूर्ण विजय प्राप्त करने की सामर्थ्य उसमें आ जाती है।
 

माता की सिद्धियां !!
मार्कण्डेय पुराण के अनुसार अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व- ये आठ सिद्धियाँ होती हैं। ब्रह्मवैवर्त पुराण के श्रीकृष्ण जन्म खंड में यह संख्या अठारह बताई गई है। इनके नाम इस प्रकार हैं- अणिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, महिमा, ईशित्व,वाशित्व, सर्वकामावसायिता, सर्वज्ञत्व, दूरश्रवण, परकायप्रवेशन, वाक्‌सिद्धि, कल्पवृक्षत्व, सृष्टि, संहारकरणसामर्थ्य, अमरत्व, सर्वन्यायकत्व, भावना, सिद्धि !!
 

माता का स्वरूप और साधना का महत्व !!  
माँ सिद्धिदात्री भक्तों और साधकों को ये सभी सिद्धियाँ प्रदान करने में समर्थ हैं। देवीपुराण के अनुसार भगवान शिव ने इनकी कृपा से ही इन सिद्धियों को प्राप्त किया था। इनकी अनुकम्पा से ही भगवान शिव का आधा शरीर देवी का हुआ था। इसी कारण वे लोक में 'अर्द्धनारीश्वर' नाम से प्रसिद्ध हुए।माँ सिद्धिदात्री चार भुजाओं वाली हैं। इनका वाहन सिंह है। ये कमल पुष्प पर भी आसीन होती हैं। इनकी दाहिनी तरफ के नीचे वाले हाथ में कमलपुष्प है।प्रत्येक मनुष्य का यह कर्तव्य है कि वह माँ सिद्धिदात्री की कृपा प्राप्त करने का निरंतर प्रयत्न करे। उनकी आराधना की ओर अग्रसर हो। इनकी कृपा से अनंत दुख रूप संसार से निर्लिप्त रहकर सारे सुखों का भोग करता हुआ वह मोक्ष को प्राप्त कर सकता है।नवदुर्गाओं में माँ सिद्धिदात्री अंतिम हैं। अन्य आठ दुर्गाओं की पूजा उपासना शास्त्रीय विधि-विधान के अनुसार करते हुए भक्त दुर्गा पूजा के नौवें दिन इनकी उपासना में प्रवत्त होते हैं। इन सिद्धिदात्री माँ की उपासना पूर्ण कर लेने के बाद भक्तों और साधकों की लौकिक, पारलौकिक सभी प्रकार की कामनाओं की पूर्ति हो जाती है। सिद्धिदात्री माँ के कृपापात्र भक्त के भीतर कोई ऐसी कामना शेष बचती ही नहीं है, जिसे वह पूर्ण करना चाहे। वह सभी सांसारिक इच्छाओं, आवश्यकताओं और स्पृहाओं से ऊपर उठकर मानसिक रूप से माँ भगवती के दिव्य लोकों में विचरण करता हुआ उनके कृपा-रस-पीयूष का निरंतर पान करता हुआ, विषय-भोग-शून्य हो जाता है। माँ भगवती का परम सान्निध्य ही उसका सर्वस्व हो जाता है। इस परम पद को पाने के बाद उसे अन्य किसी भी वस्तु की आवश्यकता नहीं रह जाती। माँ के चरणों का यह सान्निध्य प्राप्त करने के लिए भक्त को निरंतर नियमनिष्ठ रहकर उनकी उपासना करने का नियम कहा गया है। ऐसा माना गया है कि माँ भगवती का स्मरण, ध्यान, पूजन, हमें इस संसार की असारता का बोध कराते हुए वास्तविक परम शांतिदायक अमृत पद की ओर ले जाने वाला है। विश्वास किया जाता है कि इनकी आराधना से भक्त को अणिमा, लधिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, महिमा, ईशित्व, सर्वकामावसायिता, दूर श्रवण, परकामा प्रवेश, वाकसिद्ध, अमरत्व भावना सिद्धि आदि समस्त सिद्धियों नव निधियों की प्राप्ति होती है। ऐसा कहा गया है कि यदि कोई इतना कठिन तप न कर सके तो अपनी शक्तिनुसार जप, तप, पूजा-अर्चना कर माँ की कृपा का पात्र बन सकता ही है। माँ की आराधना के लिए इस श्लोक का प्रयोग होता है। माँ जगदम्बे की भक्ति पाने के लिए इसे कंठस्थ कर नवरात्रि में नवमी के दिन इसका जाप करने का नियम है।
 

माता की स्तुति = या देवी सर्वभू‍तेषु माँ सिद्धिदात्री रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।
अर्थ= हे माँ! सर्वत्र विराजमान और माँ सिद्धिदात्री के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ। हे माँ, मुझे अपनी कृपा का पात्र बनाओ।
 

माता का उपासना मंत्र= सिद्धगन्धर्वयक्षाघैरसुरैरमरैरपि।सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी॥