महासंकट निवारक है महामृत्युंजय मंत्र और जप विधि !! ~ Balaji Kripa

Wednesday, 7 October 2015

महासंकट निवारक है महामृत्युंजय मंत्र और जप विधि !!


मृत्युंजय शिव का स्वरूप भगवान शिव की पांच कलाएं उपनिषदों में वर्णित हैं, 1- आनंद 2- विज्ञान 3- मन 4- प्राण 5- वाक। शिव की आनंद नामक कला उनका महामृत्यंजय स्वरूप है। विज्ञानकला दक्षिणामूर्ति शिव, मन कला कामेश्वर, प्राणकला पशुपति शिव एवं वाक कला भूतेशभावन शिव कहलाती है। उपनिषदों की व्याख्या के आधार पर जीवन में आनंद प्राप्ति के निमित्त शिव के मृत्युंजय स्वरूप की आराधना आदि काल से प्रचलित है। महामृत्युंजय शिव षड्भुजा धारी हैं, जिनमें से चार भुजाओं में अमृत कलश रखते हैं, अर्थात् वे अमृत से स्नान करते हैं, अमृत का ही पान करते हैं एवं अपने भक्तों को भी अमृत पान कराते हुए अजर-अमर कर देते हैं। इनकी शक्ति भगवती अमृतेश्वरी हैं। महामृत्युंजय मंत्र का स्वरूप और भाव ˜यंबकं यजामहे सुगंधिम् पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बंधनान्मृत्योमरुक्षीय मामृतात।। शिव के सूर्य, चंद्र एवं अग्नि के प्रतीक त्रिनेत्रों के कारण उन्हें ‘˜यंबक’ कहा गया है। ˜यंबक शिव के प्रति यज्ञ आदि कर्मो से संबंध जोड़ते हुए स्वयं को समर्पित करने की प्रक्रिया ‘यजामहे’ है। जीवन दायी तत्वों को अपना सुगंधमय स्वरूप देकर विकृति से रक्षा करने वाले शिव ‘सुगंधि’ पद में समाहित हैं। पोषण एवं लक्ष्मी की अभिवृद्धि करने वाले शिव ‘पुष्टिवर्धनम्’ हैं। रोग एवं अकालमृत्यु रूपी बंधनों से मुक्ति प्रदान करने वाले मृत्यंजय ‘उर्वारुक मिव बंधनात’ पद में समाहित है। तीन प्रकार की मृत्यु से मुक्ति पाकर अमृतमय शिव से एकरूपता की याचना ‘मृत्योमरुक्षीय मामृतात’ पद में है।

महामृत्युंजय मंत्र (मृत संजीवन) जप विधि !!
 

भगवान शिव को महामृत्युंजय भी कहा गया है। मृत संजीवन जप विधि से हर प्रकार की आधि-व्याधियों का शमन होता है। भगवान महामृत्युंजय यश और शारीरिक शक्ति की वृद्धि करने वाले हैं। उनकी अनुकंपा से हर प्रकार की प्रतिकूलताओं का शमन हो जाता है। शास्त्रोक्त विधि से मृत संजीवन जप का फल तुरंत प्राप्त हो जाता है।
जपकर्ता आचमनं प्राणायामञ्च कृत्वां।जपकर्ता आचमन व प्राणायाम कर गणपति आदि निम्न देवताओं को प्रणाम कर हाथ में जल, अक्षत, पुष्प, फल व दक्षिणा-द्रव्य लेकर संकल्प करें।
श्रीमन्महागणाधिपतये नम:।लक्ष्मीनारायणाभ्यां नम:।उमामहेश्वाराभ्यां नम:।वाणीहिरण्यगर्भाभ्यां नम:।शचीपुरन्दराभ्यां नम:।मातृपितृचरणकमलेभ्यो नम:।इष्टदेवताभ्यो नम:।कुलदेवताभ्योनम:। ग्रामदेवताभ्यो नम:।वास्तुदेवताभ्यो नम:।सर्वेभ्योग्रहेभ्यो नम:।सवेभ्यो शक्तिभ्यो नम:।सर्वेभ्यो देवेभ्यो नम:।सर्वेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो नम:।एतत् कर्म देवताश्री महा मृत्युञ्जयाय नम:। इति देवानां स्मरणं नमस्कारं च कृत्वा संकल्पं कुर्यात्।।
 

प्रधान संकल्प -
 

विष्णर्विष्णुर्विष्णु:। श्रीमद् भगवतोविष्णोराज्ञयाप्र- वर्तमानस्य- ब्रह्मणोह्निद्वितीयेपराद्र्धे वैवस्वतमन्वन्तरे- अष्टाविंशतितमेकलियुगे कलिप्रथमचरणे जम्बू द्वीपे भरत खण्डे भारत वर्षे आर्यावतन्तिर्गत कुमारिका क्षेत्रे गंगा यमुनयो: अमुक तटे अमुक नाम्नि नगरे/ग्रामे अमुकनाम्नि विक्रमसंवत्सरे अमुक अयनेसूर्ये अमुकऋतौ अमुक मासे अमुकपक्षे अमुकतिथौ यथा यथा राशिस्थितेषु ग्रहेषु एवं गुण विशेषेण विशिष्टायां शुभ पुण्य तिथौ मम (यजमानस्य वा) आत्मन: श्रुति स्मृति पुराणोक्त पुण्य फल प्राप्ति पूर्वक शरीरे सञ्जातानां तापाद्यखिल महारोगाणामुपशमनार्थं सर्वारिष्टशान्त्यर्थञ्च षट् प्रणव संयुक्तस्य श्री महामृत्युञ्जय (मृतसञ्जीवन) मन्त्रस्य अमुक संख्याकं जप (ब्राह्मण द्वारा) वा अहं करिष्ये।।
 

विनियोग -
 

पुनर्जलं गृहीत्वा
(पुन: हाथ में जल लेकर संकल्प सहित विनियोग करें।)
संकल्पं कृत्वा
अस्य श्री मृत्युञ्जय मन्त्रस्य वसिष्ठ ऋषि:। श्री मृत्युञ्जयरुद्रो देवता। अनुष्टुप्छन्द:। हौं बीजम्। जूं शक्ति:। स: कीलकम्। श्री मृत्युञ्जय प्रीतये मम (यजमानस्य वा) अभीष्ट सिद्ध्यर्थे जपे विनियोग:।।
ऋष्यादि न्यास:
वसिष्ठ ऋषये नम: शिरसि।
अनुष्टुप्छन्दसे नमो मुखे।
श्री मृत्युञ्जय रुद्रदेवतायै नमो हृदये।
हौं बीजाय नमो गुह्ये।
जूं शूलये नम: पादयो:।
स: कीलकाय नम: सर्वाङ्गेषु।।
करादि न्यास:
त्र्यम्बकं अङ्गुष्ठाभ्यां नम:।
यजामहे तर्जनीभ्यां नभ:।
सुगन्धि पुष्टिवर्धनं मध्यमाभ्यां नम:।
उर्वारुकमिव बन्धनात् अनामिकाभ्यां नम:।
मृत्योर्मुक्षीय कनिष्ठिकाभ्यां नम:।
मामृतात् करतलकरपृष्ठाभ्यां नम:।
हृदयादि न्यास:
त्र्यम्बकं हृदयाय नम:।
यजामहे शिरसे स्वाहा।
सुगन्धिं पुष्टिवर्धनं शिखायै वषट्।
उर्वारुकमिव बन्धनात् कवचाय हुम्।
मृत्योर्मुक्षीय नेत्र त्रयाय वौषट्।
मामृतात् आय फट्।।

माथे पर चंदन तिलक लगाकर, रुद्राक्ष की माला पहनें, इसके बाद ही जाप आरंभ करना चाहिए। प्रयोग विधि में मृत्युंजय देवता के सम्मुख पवित्र आसन पर पूर्व दिशा की ओर मुख कर बैठें। ‘मृत्युंजय महादेवो त्राहिमाम् शरणामम्। जन्म-मृत्यु जरारोगै: पीड़ितम् कर्मबंधनै:’ मंत्र के साथ जाप निवेदन करना चाहिए। इस के बाद मंत्र जप प्रारम्भ करे !!

 शारीरिक एवं मानसिक रोगों से मुक्ति पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु एवं आकाश- इन पंच तत्वों से मनुष्य की प्रकृति का निरूपण होता है एवं किसी एक तत्व के कुपित हो जाने से रोग एवं मृत्यु की उत्पत्ति होती है। पृथ्वी तत्व के अधिपति शिव, जल तत्व के गणोश, अग्नि तत्व की दुर्गा, वायु तत्व के सूर्य एवं आकाश तत्व के अधिपति विष्णु माने गए हैं। किसी भी तत्व के असंतुलित हो जाने की दशा में तत्वों से संबंधित देवता की उपासना से शीघ्र लाभ होता है, परंतु जब संपूर्ण पंच तत्वों का असंतुलन मानव शरीर में होता है, तो असाध्य रोगों की उत्पत्ति होती है, जिसके निवारणार्थ महामृत्युंजय मंत्र का प्रयोग अमोघ माना जाता है। रजोगुण एवं तमोगुण से उत्पन्न समस्त मानसिक विकारों जैसे- क्रोध, काम, द्वेष, अवसाद आदि दोषों के शमन हेतु महामृत्युंजय मंत्र का नियमित जाप शीघ्र आरोग्य प्रदान करता है। अनिष्ट ग्रहों का निवारण मारक एवं बाधक ग्रहों से संबंधित दोषों का निवारण महामृत्युंजय मंत्र की आराधना से संभव है। मान्यता है कि बारह ज्योतिर्लिगों के दर्शन मात्र से समस्त बारह राशियों संबंधित शुभ फलों की प्राप्ति होती है। काल संबंधी गणनाएं ज्योतिष का आधार हैं तथा शिव स्वयं महाकाल हैं, अत: विपरीत कालखंड की गति महामृत्युंजय साधना द्वारा नियंत्रित की जा सकती है। जन्म पत्रिका में काल सर्पदोष, चंद्र-राहु युति से जनित ग्रहण दोष, मार्केश एवं बाधकेश ग्रहों की दशाओं में, शनि के अनिष्टकारी गोचर की अवस्था में महामृत्युंजय का प्रयोग शीघ्र फलदायी है। इसके अलावा विषघटी, विषकन्या, गंडमूल एवं नाड़ी दोष आदि अनेकानेक दोषों को निमरूल करने की क्षमता इस मंत्र में है।

राशि अनुसार मंत्र के लाभ !!!


मेष- महामृत्युंजय जाप से भूमि-भवन संबंधी परेशानियों एवं कार्यो में लाभ। व्यापार में विस्तार। 
वृषभ- उत्साह एवं ऊर्जा की प्राप्ति होगी। भाई-बहनों से पूर्ण सुख एवं सहयोग मिलता रहेगा।
मिथुन- आर्थिक लाभ। स्वास्थ्य संबंघी बाधाओं एवं पीड़ाओं की निवृत्ति हेतु अचूक। पारिवारिक सुख। 
कर्क- इस मंत्र का जाप करते रहें। जीवन का सर्वागीण विकास होगा। 
सिंह- अनावश्यक प्रवृत्तियों पर अंकुश। आराम दायक नींद एवं पारिवारिक सुख की प्राप्ति। 
कन्या- धन-धान्य संबंधी लाभ। मनोकामनाओं की पूर्ति। सुख एवं ऐश्वर्य की प्राप्ति। 
तुला- कार्य क्षेत्र में सफलताएं मिलेगी। व्यापारिक अवरोधों समाप्त होंगे। पदोन्नति हेतु विशेष लाभप्रद। 
वृश्चिक- भाग्योदय कारक है। आध्यात्मिक उन्नति की संभावनाएं बनेंगी। 
धनु- पैतृक संपत्ति की प्राप्ति। दुर्घटनाओं एवं आकस्मिक आपदाओं से रक्षा। 
मकर- सुयोग्य जीवनसाथी की प्राप्ति। दांपत्य जीवन में मधुरता एवं व्यापारिक उन्नति के अवसर। 
कुंभ- शत्रु एवं ऋण संबंधी सारे दोष दूर होंगे। प्रतियोगिताओं एवं वाद-विवाद में सफलताएं मिलेगी। 
मीन- मानसिक स्थिरता। संतानोत्पत्ति। शिक्षा संबंधी बाधाओं का निवारण।

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