November 2015 ~ Balaji Kripa

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May Baba fullfill all the wishes of the Devotees.

जय श्रीराम

भगवान रामभक्त हनुमान की उपासना से जीवन के सारे कष्ट, संकट मिट जाते है। माना जाता है कि हनुमान एक ऐसे देवता है जो थोड़ी-सी प्रार्थना और पूजा से ही शीघ्र प्रसन्न हो जाते है। जहां मंगलवार और शनिवार का दिन इनके पूजन के लिए सर्वश्रेष्ठ हैं।

ॐ हं हनुमंतये नम:

मंगलवार और शनिवार के दिन हनुमान म‍ंदिर में जाकर रामभक्त हनुमान का गुणगान करें और उनसे अपने पापों के लिए क्षमायाचना करें।

Thursday, 26 November 2015

क्या आप को पता है मानव जीवन के लिए अवतारी देवो ने क्या संदेश दिए !!



सनातन धर्म में सर्वोच्च सत्ता 'ब्रह्म' को माना गया है। सभी देवी और देवता उस एक सर्वोच्च सत्ता के प्रतिनिधि मात्र हैं। 'भगवान' उसे कहते हैं जिसने मानव रूप में जन्म लेकर चेतना के सर्वोच्च शिखर को छू लिया है। हम आपको बताएंगे ऐसे ही 5 भगवानों के बारे में जिनका जीवन पंच तत्व (आकाश, अग्नि, वायु, जल और पृथ्वी) से मेल रखता है और जिनका जीवन कुछ संदेश देता है। बताए जा रहे सभी 5 भगवानों के जीवन के छोटे से संदेश को अपनाने से आपका जीवन बदल सकता है। उल्लेखनीय है कि हम उनके विचारों की या अनमोल वचन की बात नहीं कर रहे हैं।

भगवान शंकर : जीवन में जल, पानी या नीर जरूरी है। यह नहीं होगा तो जीवन नहीं चलेगा। जल की शुद्धता उतनी ही जरूरी है जितनी कि मन की। जल से मन शुद्ध होता है। जल हमारे शरीर और मन को शीतलता और शांति प्रदान करता है। जल का गुण है शांत रहना, लेकिन इसी जल में धरती को जलप्रलय से नष्ट करने की क्षमता भी है।
संदेश : अहिंसक और शांतिप्रिय बनो। प्रकृति में दखल मत दो। बदलाव के लिए जरूरी है ध्यान। ध्यान करो। ध्यान विचारों की मृत्यु है और मृत्यु ही जीवन है इसलिए मरना सीखो।
सर्वप्रथम जीवन की उत्पत्ति जल में ही हुई थी। जल को मन का कारक माना गया है। जल से मन शांत रहता है। मस्तिष्क में 80 प्रतिशत जल ही रहता है। शरीर में जल का संतुलन जरूरी है। भगवान शंकर को हिन्दू धर्म में सर्वोच्च और प्रथम माना गया है। पंच तत्वों में जल तत्व प्रधान देव को जलाभिषेक प्रिय है। इनका स्थान भी हिमालय में कैलाश पर्वत पर है, जहां शीतलता प्रधान है। वरुणदेव को जल तत्व का अधिपति माना गया है।
 

भगबान राम : राम एक आदर्श पुत्र हैं। पिता की आज्ञा उनके लिये सर्वोपरि है। पति के रूप में राम ने सदैव एकपत्नीव्रत का पालन किया। राजा के रूप में प्रजा के हित के लिये स्वयं के हित को हेय समझते हैं। विलक्षण व्यक्तित्व है उनका। वे अत्यन्त वीर्यवान, तेजस्वी, विद्वान, धैर्यशील, जितेन्द्रिय, बुद्धिमान, सुंदर, पराक्रमी, दुष्टों का दमन करने वाले, युद्ध एवं नीतिकुशल, धर्मात्मा, मर्यादापुरुषोत्तम, प्रजावत्सल, शरणागत को शरण देने वाले, सर्वशास्त्रों के ज्ञाता एवं प्रतिभा सम्पन्न हैं।
संदेश : भगबान राम ने मानव अवतार लेकर मृत्युलोक में मानवजाति को आदर्श जीवन का संदेश दिया ।

भगबान हनुमान : जगत में वायु नहीं होगी, तो प्राण चले जाएंगे। वायु का आधार है जल और जल का आधार है वायु। जल कुछ दिन नहीं मिलेगा तो चलेगा, लेकिन वायु तो पल-प्रतिपल चाहिए। वायु पर संयम से अपार शक्ति और सिद्धि मिलती है। अपार शक्ति और सिद्धि को संयमित रखने के लिए भक्ति जरूरी है।
संदेश : यदि शक्तिशाली हो तो भक्त बनो। खुद के भीतर की बुराइयों से लड़ो। कार्य शुरू करो तो खत्म करके ही उठो। सक्षम और योग्य व्यक्ति वह है, जो समझदार, सजग और सक्रिय है।
वायु का एक गुण यह भी है कि उससे शरीर और मन में शीतलता और बल का संचार होता है। वायु से ही बल मिलता है। वायु की शुद्धता से शरीर के सभी अंग पुष्ट और संतुष्ट रहते हैं। संपूर्ण शरीर में वायु से ही बल और शक्ति का संचार होता है। मस्तिष्क को जल से ज्यादा वायु की जरूरत होती है। पवनदेव को वायु का अधिपति माना गया है। हनुमानजी पवनपुत्र और राम के भ‍क्त हैं। उनकी बुद्धि वायु की गति से भी तेज है और उनका बल वायु के वेग से भी अधिक है। जब तूफान उठता है तो धरती के पहाड़ तक हिल जाते हैं, समुद्र उफनने लगता है, क्योंकि धरती पर जल से 10 गुना ज्यादा वायु तत्व ही मौजूद है।

भगवान श्रीकृष्ण : यह दिखाई देने वाला जगत जड़ तत्व है जिसे पृथ्वी तत्व भी कहते हैं। व्यावहारिक ज्ञान यही कहता है कि जीवन धरती के बिना अधूरा है। धरती नहीं होगी तो जीवन नहीं होगा। धरती पर जो भी व्यक्ति जीवित है, वह हर पल खुद को जीवित रखने के लिए संघर्ष कर रहा है या कर्म कर रहा है।
संदेश : जीवन एक संघर्ष है इसीलिए योग्य और कर्मवान बनो। कला, विद्या और शिक्षा से प्रेम करो। यही हर तरह के जीवन में काम आएगी।
जीवन में कर्म की प्रधानता को समझना जरूरी है। कर्म से ही भाग्य जाग्रत होता है। उन कर्महीन लोगों का भाग्य सोया रहता है, जो किसी चमत्कार की आशा करते हैं या जो अयोग्य हैं।
भगवान श्रीकृष्ण के अनुसार परिणाम की चिंता किए बगैर श्रेष्ठ और उत्तम कर्म करना चाहिए। कर्म से ही जीवन चलता है। कर्म एक जड़त्व प्रक्रिया है।

भगवान बुद्ध : पृथ्वी, जल, वायु और अग्नि का आधार है आकाश। आकाश स्वरूप है आत्मा। शून्य, निराकार, निर्विकार और निर्मल। आकाश का आधार आत्मा है। कोई व्यक्ति कितना ही हासिल कर ले लेकिन उसने खुद को हासिल नहीं किया है तो सब कुछ व्यर्थ है।
संदेश : अपना दीया खुद बनो अर्थात आत्मवान बनो। अपना रास्ता खुद चुनो। निर्विचार हो जाना ही आत्मवान बनने की ओर उठाया गया पहला कदम है।
भगवान बुद्ध दर्शन और धर्म का अंतिम वक्तव्य हैं। भगवान बुद्ध कहते हैं कि विचार से कर्म की उत्पत्ति होती है, कर्म से आदत की उत्पत्ति होती है, आदत से चरित्र की उत्पत्ति होती है और चरित्र से आपके प्रारब्ध की उत्पत्ति होती है। अत: आप जैसा सोचते हैं, वैसा ही बनते जाते हैं। कोई कर्ता-धर्ता नहीं है। तुम ही हो तुम्हारे कर्म और भाग्य के निर्माता इसीलिए खुद को समझो और मुक्त हो जाओ। आकाश समान हो जाओ।

क्या आप को पता है देवी अपराजिता साधना की साधना कैसे करे !!


अपराजिता का अर्थ है जो कभी पराजित नहीं होता।देवी अपराजिता के सम्बन्ध में कुछ महत्वपूर्ण तथ्य भी जानने योग्य हैं जैसे कि उनकी मूल प्रकृति क्या है ?देवी अपराजिता के पूजनारम्भ तब से हुआ जब देवासुर संग्राम के दौरान नवदुर्गाओं ने जब दानवों के संपूर्ण वंश का नाश कर दिया तब माँ दुर्गा अपनी मूल पीठ शक्तियों में से अपनी आदि शक्ति अपराजिता को पूजने के लिए शमी की घास लेकर हिमालय में अन्तरध्यान हुईं। क्रमशः बाद में आर्यावर्त के राजाओं ने विजय पर्व के रूप में विजय दशमी की स्थापना की। जो कि नवरात्रों के बाद प्रचलन में आई। स्मरण रहे कि उस वक्त की विजय दशमी मूलतः देवताओं द्वारा दानवों पर विजय प्राप्त के उपलक्ष्य में थी। स्वभाविक रूप से नवरात्र के दशवें दिन ही विजय दशमी मनाने की परंपरा चली। इसके पश्चात पुनः जब त्रेता युग में रावण के अत्याचारों से पृथ्वी एवं देव-दानव सभी त्रस्त हुए तो पुनः पुरुषोत्तम राम द्वारा दशहरे के दिन रावण का अंत किया गया जो एक बार पुनः विजयादशमी के रूप सामने आया और इसके साथ ही एक सोपान और जुड़ गया दशमी के साथ।अगर यह कहा जाये कि विजय दशमी और देवी अपराजिता का सम्बन्ध बहुत हद तक क्षत्रिय राजाओं के साथ ज्यादा गहरा और अनुकूल है तो संभवतः कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी किन्तु इसे किसी पूर्वधारणा की तरह नहीं स्वीकार करना चाहिए कि अपराजिता क्षत्रियों की देवी हैं और अन्य वर्ण के लोग इनकी साधना-आराधना नहीं कर सकते ।बहुत से स्थलों में देवी अपराजिता के सम्बन्ध में विभिन्न कथाएं और विधियां मिल जाती हैं लेकिन उनमे मूल भेद बहुत परिलक्षित होते हैं अस्तु उनका साधन करने से पूर्व किसी जानकार व्यक्ति से सलाह अवश्य ही कर लेनी चाहिए जिससे अशुद्धिओं और गलतियों से कुछ हद तक छुटकारा पाया जा सके हालाँकि शत प्रतिशत शुद्धता ला पाना सर्वसाधारण के वश की बात नहीं हैं किन्तु अल्प अशुद्धियाँ सफलता के मापदंडों को बढ़ा ही देती हैं साथ ही भावयुक्त साधना भी अशुद्धिओं को तिरस्कृत कर देती है जिससे अधिक अच्छे परिणाम मिल ही जाते हैं -!देवी अपराजिता शक्ति की नौ पीठ शक्तियों में से एक हैं जिनका क्रम निम्न प्रकार है एवं जया और विजया से सम्बंधित बहुत सी कथाएं भी प्रचलित हैं जो देवी पार्वती की बहुत ही अभिन्न सखियों के रूप में जानी जाती हैं - शक्ति की बहुत ही संहारकारी शक्ति है अपराजिता जो कभी अपराजित नहीं हो सकती और ना ही अपने साधकों को कभी पराजय का मुख देखने देती है - विषम परिस्थिति में जब सभी रास्ते बंद हों उस स्थिति में भी हंसी-खेल में अपने साधक को बचा ले जाना बहुत मामूली बात है अपराजिता के लिए।

अपराजिता की साधना के सम्बन्ध में" धर्मसिन्धु "जो वर्णन है वह निम्न प्रकार है :-

धर्मसिंधु में अपराजिता की पूजन की विधि संक्षेप में इस प्रकार है‌ :-

"अपराह्न में गाँव के उत्तर पूर्व जाना चाहिए, एक स्वच्छ स्थल पर गोबर से लीप देना चाहिए, चंदन से आठ कोणों का एक चित्र खींच देना चाहिए उसके पश्चात संकल्प करना चहिए :

"मम सकुटुम्बस्य क्षेमसिद्ध्‌यर्थमपराजितापूजनं करिष्ये"

राजा के लिए विहित संकल्प अग्र प्रकार है :

" मम सकुटुम्बस्य यात्रायां विजयसिद्ध्‌यर्थमपराजितापूजनं करिष्ये"

इसके उपरांत उस चित्र (आकृति) के बीच में अपराजिता का आवाहन करना चाहिए और इसी प्रकार उसके दाहिने एवं बायें जया एवं विजया का आवाहन करना चहिए और 'साथ ही क्रियाशक्ति को नमस्कार' एवं 'उमा को नमस्कार' कहना चाहिए।
इसके उपरांत :
"अपराजितायै नम:,
जयायै नम:,
विजयायै नम:, मंत्रों के साथ अपराजिता, जया, विजया की पूजा 16 उपचारों के साथ करनी चाहिए और यह प्रार्थना करनी चाहिए, 'हे देवी, यथाशक्ति जो पूजा मैंने अपनी रक्षा के लिए की है, उसे स्वीकर कर आप अपने स्थान को गमन करें जिससे कि मैं अगली बार पुनः आपका आवाहन और पूजन वंदन कर सकूँ "।

राजा के लिए इसमें कुछ अंतर है।

राजा को विजय के लिए ऐसी प्रार्थना करनी चाहिए :

"वह अपाराजिता जिसने कंठहार पहन रखा है, जिसने चमकदार सोने की मेखला (करधनी) पहन रखी है, जो अच्छा करने की इच्छा रखती है, मुझे विजय दे"

इसके उपरांत उसे उपर्युक्त प्रार्थना करके विसर्जन करना चाहिए। तब सबको गाँव के बाहर उत्तर पूर्व में उगे शमी वृक्ष की ओर जाना चाहिए और उसकी पूजा करनी चाहिए।

शमी की पूजा के पूर्व या या उपरांत लोगों को सीमोल्लंघन करना चाहिए। कुछ लोगों के मत से विजयादशमी के अवसर पर राम और सीता की पूजा करनी चाहिए, क्योंकि उसी दिन राम ने लंका पर विजय प्राप्त की थी। राजा के द्वारा की जाने वाली पूजा का विस्तार से वर्णन हेमाद्रि तिथितत्त्व में वर्णित है। निर्णय सिंधु एवं धर्मसिंधु में शमी पूजन के कुछ विस्तार मिलते हैं।

यदि शमी वृक्ष ना हो तो अश्मंतक वृक्ष की पूजा की जानी चाहिए।

अस्तु मेरे अपने हिसाब से देवी अपराजिता का पूजन शक्ति क्रम में ही किया जाना चाहिए ठीक जैसे अन्य शक्ति साधनाएं संपन्न की जाती हैं -!

    प्रथम गुरु पूजन ,द्वितीय गणपति पूजन ,भैरव पूजन , देवी पूजन

अपनी सुविधानुसार पंचोपचार,षोडशोपचार इत्यादि से पूजन संपन्न करें मन्त्र जप - स्तोत्र जप आदि संपन्न करें और अंत में होम विधि संपन्न करें।


मन्त्र जप : मंत्रों के सम्बन्ध में बहुधा भ्रम की स्थिति रहती है क्योंकि यदि आपने थोड़ा सा भी अध्ययन और खोज आदि पूर्व में की हैं तो उस स्थिति में बहुत से मंत्र ऐसे होते हैं जो आपकी जानकारी से बाहर के होते हैं अर्थात कई बार उनके बीज भिन्न हो सकते हैं और कई बार मंत्र विन्यास भिन्न हो सकता है तो इस दशा में सीमित ज्ञान आपको भ्रमित कर देता है - अस्तु सभी मित्रों को मेरी एक ही सलाह है कि शक्ति मंत्रों में यदि "ह्रीं,क्लीं,क्रीं, ऐं,श्रीँ आदि आते हैं तो उन मंत्रों को भेदात्मक दृष्टि से ना देखें क्योंकि एक परम आद्या शक्ति के तीन भेद भक्तों के हितार्थ बने जिन्हे त्रिशक्ति के नाम से भी जाना जाता है ( महाकाली-महालक्ष्मी-महासरस्वती) अन्य शक्ति भेद अथवा क्रम इन्ही तीन मूलों से निःसृत हैं अस्तु समस्त मन्त्र आदि इन्ही कुछ मूल बीजों के आस-पास घूमते हैं इसके अतिरिक्त इस बात पर मंत्र विन्यास निर्भर करता है कि जिस भी मंत्र वेत्ता ने उस मंत्र का निर्माण किया होगा उस समय वास्तव में उनका दृष्टिकोण और आवश्यकता क्या रही होगी ?

हालंकि यह सब बातें तो बहुत दूर की और लम्बी सोच की हैं अस्तु ज्यादा ना भटकते हुए बस इतना ही कहूँगा कि यदि कभी भी मंत्रों का संसार समझ में ना आये तो सबसे आसान उपाय है कि उस देवता या देवी के गायत्री मंत्र का प्रयोग करें।

यथा :

"ॐ सर्वविजयेश्वरी विद्महे शक्तिः धीमहि अपराजितायै प्रचोदयात"

अपनी सामर्थ्यानुसार उपरोक्त गायत्री का जप करें और देवी अपराजिता का वरदहस्त प्राप्त करें - देवी आपको सदा अजेय और संपन्न रखें यही मेरी कामना है।

।।अथ श्री अपराजिता स्तोत्र ।।
 

ॐ नमोऽपराजितायै ।।
ॐ अस्या वैष्णव्याः पराया अजिताया महाविद्यायाः वामदेव-बृहस्पति-मार्केण्डेया ऋषयः ।
गायत्र्युष्णिगनुष्टुब्बृहती छन्दांसि ।
श्री लक्ष्मीनृसिंहो देवता ।
ॐ क्लीं श्रीं ह्रीं बीजम् ।
हुं शक्तिः ।
सकलकामनासिद्ध्यर्थं अपराजितविद्यामन्त्रपाठे विनियोगः ।।
ध्यान:

ॐ निलोत्पलदलश्यामां भुजङ्गाभरणान्विताम् ।।
शुद्धस्फटिकसङ्काशां चन्द्रकोटिनिभाननाम् ।।१।।

शङ्खचक्रधरां देवी वैष्ण्वीमपराजिताम् ।।
बालेन्दुशेखरां देवीं वरदाभयदायिनीम् ।।२।।

नमस्कृत्य पपाठैनां मार्कण्डेयो महातपाः ।।३।।

मार्ककण्डेय उवाच :

शृणुष्वं मुनयः सर्वे सर्वकामार्थसिद्धिदाम् ।।
असिद्धसाधनीं देवीं वैष्णवीमपराजिताम् ।।४।।

ॐ नमो नारायणाय,
नमो भगवते वासुदेवाय,
नमोऽस्त्वनन्ताय सहस्रशीर्षायणे,
क्षीरोदार्णवशायिने,
शेषभोगपर्य्यङ्काय,
गरुडवाहनाय,
अमोघाय
अजाय
अजिताय
पीतवाससे ।।

ॐ वासुदेव सङ्कर्षण प्रद्युम्न, अनिरुद्ध, हयग्रिव, मत्स्य कूर्म्म, वाराह नृसिंह, अच्युत, वामन, त्रिविक्रम, श्रीधर राम राम राम ।
वरद, वरद, वरदो भव, नमोऽस्तु ते, नमोऽस्तुते, स्वाहा ।।

ॐ असुर-दैत्य-यक्ष-राक्षस-भूत-प्रेत -पिशाच-कूष्माण्ड-सिद्ध-योगिनी-डाकिनी-शाकिनी-स्कन्दग्रहान् उपग्रहान्नक्षत्रग्रहांश्चान्या हन हन पच पच मथ मथ विध्वंसय विध्वंसय विद्रावय विद्रावय चूर्णय चूर्णय शङ्खेन चक्रेण वज्रेण शूलेन गदया मुसलेन हलेन भस्मीकुरु कुरु स्वाहा ।।

ॐ सहस्रबाहो सहस्रप्रहरणायुध, जय जय, विजय विजय, अजित, अमित, अपराजित, अप्रतिहत, सहस्रनेत्र, ज्वल ज्वल, प्रज्वल प्रज्वल, विश्वरूप बहुरूप, मधुसूदन, महावराह, महापुरुष, वैकुण्ठ, नारायण, पद्मनाभ, गोविन्द, दामोदर, हृषीकेश, केशव, सर्वासुरोत्सादन, सर्वभूतवशङ्कर, सर्वदुःस्वप्नप्रभेदन, सर्वयन्त्रप्रभञ्जन, सर्वनागविमर्दन, सर्वदेवमहेश्वर, सर्वबन्धविमोक्षण, सर्वाहितप्रमर्दन, सर्वज्वरप्रणाशन, सर्वग्रहनिवारण, सर्वपापप्रशमन, जनार्दन, नमोऽस्तुते स्वाहा ।।

विष्णोरियमनुप्रोक्ता सर्वकामफलप्रदा ।।
सर्वसौभाग्यजननी सर्वभीतिविनाशिनी ।।५।।

सर्वैंश्च पठितां सिद्धैर्विष्णोः परमवल्लभा ।।
नानया सदृशं किङ्चिद्दुष्टानां नाशनं परम् ।।६।।

विद्या रहस्या कथिता वैष्णव्येषापराजिता ।।
पठनीया प्रशस्ता वा साक्षात्सत्त्वगुणाश्रया ।।७।।

ॐ शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् ।।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत्सर्वविघ्नोपशान्तये ।।८।।

अथातः सम्प्रवक्ष्यामि ह्यभयामपराजिताम् ।।
या शक्तिर्मामकी वत्स रजोगुणमयी मता ।।९।।

सर्वसत्त्वमयी साक्षात्सर्वमन्त्रमयी च या ।।
या स्मृता पूजिता जप्ता न्यस्ता कर्मणि योजिता ।।
सर्वकामदुधा वत्स शृणुष्वैतां ब्रवीमि ते ।।१०।।

य इमामपराजितां परमवैष्णवीमप्रतिहतां पठति सिद्धां स्मरति सिद्धां महाविद्यां जपति पठति शृणोति स्मरति धारयति कीर्तयति वा न तस्याग्निवायुवज्रोपलाशनिवर्षभयं, न समुद्रभयं, न ग्रहभयं, न चौरभयं, न शत्रुभयं, न शापभयं वा भवेत् ।।

क्वचिद्रात्र्यन्धकारस्त्रीराजकुलविद्वेषि-विषगरगरदवशीकरण-विद्वेष्णोच्चाटनवधबन्धनभयं वा न भवेत् ।।
एतैर्मन्त्रैरुदाहृतैः सिद्धैः संसिद्धपूजितैः ।।

।। ॐ नमोऽस्तुते ।।

अभये, अनघे, अजिते, अमिते, अमृते, अपरे, अपराजिते, पठति, सिद्धे जयति सिद्धे, स्मरति सिद्धे, एकोनाशीतितमे, एकाकिनि, निश्चेतसि, सुद्रुमे, सुगन्धे, एकान्नशे, उमे ध्रुवे, अरुन्धति, गायत्रि, सावित्रि, जातवेदसि, मानस्तोके, सरस्वति, धरणि, धारणि, सौदामनि, अदिति, दिति, विनते, गौरि, गान्धारि, मातङ्गी कृष्णे, यशोदे, सत्यवादिनि, ब्रह्मवादिनि, कालि, कपालिनि, करालनेत्रे, भद्रे, निद्रे, सत्योपयाचनकरि, स्थलगतं जलगतं अन्तरिक्षगतं वा मां रक्ष सर्वोपद्रवेभ्यः स्वाहा ।।

यस्याः प्रणश्यते पुष्पं गर्भो वा पतते यदि ।।
म्रियते बालको यस्याः काकवन्ध्या च या भवेत् ।।११।।

धारयेद्या इमां विद्यामेतैर्दोषैर्न लिप्यते ।।
गर्भिणी जीववत्सा स्यात्पुत्रिणी स्यान्न संशयः ।।१२।।

भूर्जपत्रे त्विमां विद्यां लिखित्वा गन्धचन्दनैः ।।
एतैर्दोषैर्न लिप्येत सुभगा पुत्रिणी भवेत् ।।१३।।

रणे राजकुले द्यूते नित्यं तस्य जयो भवेत् ।।
शस्त्रं वारयते ह्योषा समरे काण्डदारुणे ।।१४।।

गुल्मशूलाक्षिरोगाणां क्षिप्रं नाश्यति च व्यथाम् ।।
शिरोरोगज्वराणां न नाशिनी सर्वदेहिनाम् ।।१५।।

इत्येषा कथिता विध्या अभयाख्याऽपराजिता ।।
एतस्याः स्मृतिमात्रेण भयं क्वापि न जायते ।।१६।।

नोपसर्गा न रोगाश्च न योधा नापि तस्कराः ।।
न राजानो न सर्पाश्च न द्वेष्टारो न शत्रवः ।।१७।।

यक्षराक्षसवेताला न शाकिन्यो न च ग्रहाः ।।
अग्नेर्भयं न वाताच्व न स्मुद्रान्न वै विषात् ।।१८।।

कार्मणं वा शत्रुकृतं वशीकरणमेव च ।।
उच्चाटनं स्तम्भनं च विद्वेषणमथापि वा ।।१९।।

न किञ्चित्प्रभवेत्तत्र यत्रैषा वर्ततेऽभया ।।
पठेद् वा यदि वा चित्रे पुस्तके वा मुखेऽथवा ।।२०।।

हृदि वा द्वारदेशे वा वर्तते ह्यभयः पुमान् ।।
हृदये विन्यसेदेतां ध्यायेद्देवीं चतुर्भुजाम् ।।२१।।

रक्तमाल्याम्बरधरां पद्मरागसमप्रभाम् ।।
पाशाङ्कुशाभयवरैरलङ्कृतसुविग्रहाम् ।।२२।।

साधकेभ्यः प्रयच्छन्तीं मन्त्रवर्णामृतान्यपि ।।
नातः परतरं किञ्चिद्वशीकरणमनुत्तमम् ।।२३।।

रक्षणं पावनं चापि नात्र कार्या विचारणा ।
प्रातः कुमारिकाः पूज्याः खाद्यैराभरणैरपि ।।
तदिदं वाचनीयं स्यात्तत्प्रीत्या प्रीयते तु माम् ।।२४।।

ॐ अथातः सम्प्रवक्ष्यामि विद्यामपि महाबलाम् ।।
सर्वदुष्टप्रशमनीं सर्वशत्रुक्षयङ्करीम् ।।२५।।

दारिद्र्यदुःखशमनीं दौर्भाग्यव्याधिनाशिनीम् ।।
भूतप्रेतपिशाचानां यक्षगन्धर्वरक्षसाम् ।।२६।।

डाकिनी शाकिनी-स्कन्द-कूष्माण्डानां च नाशिनीम् ।।
महारौद्रिं महाशक्तिं सद्यः प्रत्ययकारिणीम् ।।२७।।

गोपनीयं प्रयत्नेन सर्वस्वं पार्वतीपतेः ।।
तामहं ते प्रवक्ष्यामि सावधानमनाः शृणु ।।२८।।

एकान्हिकं द्व्यन्हिकं च चातुर्थिकार्द्धमासिकम् ।।
द्वैमासिकं त्रैमासिकं तथा चातुर्मासिकम् ।।२९।।

पाञ्चमासिकं षाङ्मासिकं वातिक पैत्तिकज्वरम् ।।
श्लैष्पिकं सात्रिपातिकं तथैव सततज्वरम् ।।३०।।

मौहूर्तिकं पैत्तिकं शीतज्वरं विषमज्वरम् ।
द्व्यहिन्कं त्र्यह्निकं चैव ज्वरमेकाह्निकं तथा ।।
क्षिप्रं नाशयेते नित्यं स्मरणादपराजिता ।।३१।।

ॐ हॄं हन हन, कालि शर शर, गौरि धम्, धम्, विद्ये आले ताले माले गन्धे बन्धे पच पच विद्ये नाशय नाशय पापं हर हर संहारय वा दुःखस्वप्नविनाशिनि कमलस्तिथते विनायकमातः रजनि सन्ध्ये, दुन्दुभिनादे, मानसवेगे, शङ्खिनि, चाक्रिणि गदिनि वज्रिणि शूलिनि अपमृत्युविनाशिनि विश्वेश्वरि द्रविडि द्राविडि द्रविणि द्राविणि केशवदयिते पशुपतिसहिते दुन्दुभिदमनि दुर्म्मददमनि ।।

शबरि किराति मातङ्गि ॐ द्रं द्रं ज्रं ज्रं क्रं क्रं तुरु तुरु ॐ द्रं कुरु कुरु ।।

ये मां द्विषन्ति प्रत्यक्षं परोक्षं वा तान् सर्वान् दम दम मर्दय मर्दय तापय तापय गोपय गोपय पातय पातय शोषय शोषय उत्सादय उत्सादय ब्रह्माणि वैष्णवि माहेश्वरि कौमारि वाराहि नारसिंहि ऐन्द्रि चामुन्डे महालक्ष्मि वैनायिकि औपेन्द्रि आग्नेयि चण्डि नैरृति वायव्ये सौम्ये ऐशानि ऊर्ध्वमधोरक्ष प्रचण्डविद्ये इन्द्रोपेन्द्रभगिनि ।।

ॐ नमो देवि जये विजये शान्ति स्वस्ति-तुष्टि पुष्टि-विवर्द्धिनि ।
कामाङ्कुशे कामदुधे सर्वकामवरप्रदे ।।
सर्वभूतेषु मां प्रियं कुरु कुरु स्वाहा ।
आकर्षणि आवेशनि-, ज्वालामालिनि-, रमणि रामणि, धरणि धारिणि, तपनि तापिनि, मदनि मादिनि, शोषणि सम्मोहिनि ।।
नीलपताके महानीले महागौरि महाश्रिये ।।
महाचान्द्रि महासौरि महामायूरि आदित्यरश्मि जाह्नवि ।।
यमघण्टे किणि किणि चिन्तामणि ।।
सुगन्धे सुरभे सुरासुरोत्पन्ने सर्वकामदुघे ।।
यद्यथा मनीषितं कार्यं तन्मम सिद्ध्यतु स्वाहा ।।

ॐ स्वाहा ।।
ॐ भूः स्वाहा ।।
ॐ भुवः स्वाहा ।।
ॐ स्वः स्वहा ।।
ॐ महः स्वहा ।।
ॐ जनः स्वहा ।।
ॐ तपः स्वाहा ।।
ॐ सत्यं स्वाहा ।।
ॐ भूर्भुवः स्वः स्वाहा ।।

यत एवागतं पापं तत्रैव प्रतिगच्छतु स्वाहेत्योम् ।।
अमोघैषा महाविद्या वैष्णवी चापराजिता ।।३२।।

स्वयं विष्णुप्रणीता च सिद्धेयं पाठतः सदा ।।
एषा महाबला नाम कथिता तेऽपराजिता ।।३३।।

नानया सद्रशी रक्षा. त्रिषु लोकेषु विद्यते ।।
तमोगुणमयी साक्षद्रौद्री शक्तिरियं मता ।।३४।।

कृतान्तोऽपि यतो भीतः पादमूले व्यवस्थितः ।।
मूलधारे न्यसेदेतां रात्रावेनं च संस्मरेत् ।।३५।।

नीलजीमूतसङ्काशां तडित्कपिलकेशिकाम् ।।
उद्यदादित्यसङ्काशां नेत्रत्रयविराजिताम् ।।३६।।

शक्तिं त्रिशूलं शङ्खं च पानपात्रं च विभ्रतीम् ।।
व्याघ्रचर्मपरीधानां किङ्किणीजालमण्डिताम् ।।३७।।

धावन्तीं गगनस्यान्तः तादुकाहितपादकाम् ।।
दंष्ट्राकरालवदनां व्यालकुण्डलभूषिताम् ।।३८।।

व्यात्तवक्त्रां ललज्जिह्वां भृकुटीकुटिलालकाम् ।।
स्वभक्तद्वेषिणां रक्तं पिबन्तीं पानपात्रतः ।।३९।।

सप्तधातून् शोषयन्तीं क्रुरदृष्टया विलोकनात् ।।
त्रिशूलेन च तज्जिह्वां कीलयनतीं मुहुर्मुहः ।।४०।।

पाशेन बद्ध्वा तं साधमानवन्तीं तदन्तिके ।।
अर्द्धरात्रस्य समये देवीं धायेन्महाबलाम् ।।४१।।

यस्य यस्य वदेन्नाम जपेन्मन्त्रं निशान्तके ।।
तस्य तस्य तथावस्थां कुरुते सापि योगिनी ।।४२।।

ॐ बले महाबले असिद्धसाधनी स्वाहेति ।।
अमोघां पठति सिद्धां श्रीवैष्ण्वीम् ।।४३।।

श्रीमदपराजिताविद्यां ध्यायेत् ।।
दुःस्वप्ने दुरारिष्टे च दुर्निमित्ते तथैव च ।।
व्यवहारे भेवेत्सिद्धिः पठेद्विघ्नोपशान्तये ।।४४।।

यदत्र पाठे जगदम्बिके मया, विसर्गबिन्द्वऽक्षरहीनमीडितम् ।।
तदस्तु सम्पूर्णतमं प्रयान्तु मे, सङ्कल्पसिद्धिस्तु सदैव जायताम् ।।४५।।

तव तत्त्वं न जानामि कीदृशासि महेश्वरि ।।
यादृशासि महादेवी तादृशायै नमो नमः ।।४६।।

इस स्तोत्र का विधिवत पाठ करने से सब प्रकार के रोग तथा सब प्रकार के शत्रु और बन्ध्या दोष नष्ट हो जाते हैं ।
विशेष रूप से मुकदमादि में सफलता और राजकीय कार्यों में अपराजित रहने के लिये यह पाठ रामबाण है ।

Monday, 23 November 2015

क्या आप को पता है माता भद्रकाली षोडशोपचार पूजन विधि सम्पूर्ण मंत्रों सहित !!




माता भद्रकाली काली का पूजन किस विधि से करना चाहिए सम्पूर्ण विधि नीचे दी जा रही है 

ध्यान:======

महामेघ प्रभां देवी कृष्णवस्त्रोसिधारिणीम् ।
ललज्जिह्वां घोरदंष्ट्रां कोटराक्षीं हसन्मुखीम् ॥
नागहारलतोपेतां चन्द्रार्द्धकृत शेखराम् ।
द्यां लिखन्तीं जटामेकां लेलिहानासवं पिबम् ॥
नाग यज्ञोपवीताङ्गी नागशय्या निषेदुषीम् ।
पञ्चाशन्मुण्डसंयुक्तं वनमाला महोदरीम् ॥
सहस्त्रफण संयुक्तमनन्तं शिरसोपरि ।
चतुर्दिक्षु नागफणा वेष्टितां भद्रकालिकाम् ॥
तक्षक सर्पराजेन वामकङ्कण भूषिताम् ।
अनन्त नागराजेन कृतदक्षिण कङ्कणम् ॥
नागेन रसनाहार कक्पितां रत्न नूपुराम् ।
वामे शिव स्वरूपं तत्कल्पितं वत्स्‌रूपकम् ॥
द्विभुजां चिन्तयेद्देत्नीं नागयज्ञोपवीतिनीम् ।
नरदेह समाबद्ध कुण्डल श्रुति मण्डिताम् ॥
प्रसन्नवदनां सौम्यां शिवमोहिनीम् ॥
अट्टहासां महाभीमां साधकाभीष्टदायिनीम् ॥

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पुष्प समर्पण :-
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ॐ देवेशि भक्ति सुलभे परिवार समन्विते
यावत्तवां पूजयिष्यामि तावद्देवी स्थिरा भव

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नमस्कार
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शत्रुनाशकरे देवि ! सर्व सम्पत्करे शुभे
सर्व देवस्तुते ! भद्रकालिके ! त्वां नमाम्यहम

१. आसन :- प्रथम दिन कि पूजा में माँ को काले रंग के कपडे का / आम कि लकड़ी का सिंहासन जो काले रंग से रंगा गया हो समर्पित करें एवं माँ को उस पर विराजित करने इसके बाद फिर प्रत्येक दिन माँ के चरणों में निम्न मंत्र को बोलते हुए पुष्प / अक्षत समर्पित करें

ॐ आसनं भास्वरं तुङ्गं मांगल्यं सर्वमंगले
भजस्व जगतां मातः प्रसीद जगदीश्वरी

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा आसनं समर्पयामि )

२. पाद्य :- इस क्रिया में शीतल एवं सुवासित जल से चरण धोएं और ऐसा सोचें कि आपके आवाहन पर माँ दूर से आयी हैं और पाद्य समर्पण से माँ को रास्ते में जो श्रम हुआ लगा है उसे आप दूर कर रहे हैं

ॐ गंगादि सलिलाधारं तीर्थं मंत्राभिमंत्रिम
दूर यात्रा भ्रम हरं पाद्यं तत्प्रति गृह्यतां

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा पाद्यं समर्पयामि )

३. उद्वर्तन :- इस क्रिया में माँ के चरणों में सुगन्धित / तिल के तेल को समर्पित करते हैं

ॐ तिल तण्डुल संयुक्तं कुश पुष्प समन्वितं
सुगंधम फल संयुक्तंमर्ध्य देवी गृहाण में

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा उद्वर्तन तैलं समर्पयामि )

४. आचमन :- इस क्रिया में माँ को आचमनी से या लोटे से आचमन जल प्रदान करते हैं ( याद रहे कि जल समर्पित करने का क्रम आप मूर्ति और यदि जल कि निकासी कि सुगम व्यवस्था है तो कर सकते हैं किन्तु यदि आपने कागज के चित्र को स्थापित किया हुआ है तो चित्र के सम्मुख एक पात्र रख लें और जल से सम्बंधित सारी क्रियाएँ करके जल उसी पात्र में डालते जाएँ )

ॐ स्नानादिक विधायापि यतः शुद्धिख़ाप्यते
इदं आचमनीयं हि कालिके देवी प्रगृह्यताम्

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा आचमनीयम् समर्पयामि )

५. स्नान :- इस क्रिया में सुगन्धित पदार्थों से निर्मित जल से स्नान करवाएं ( जल में इत्र , कर्पूर , तिल , कुश एवं अन्य वस्तुएं अपनी सामर्थ्य या सुविधानुसार मिश्रित कर लें यदि सामर्थ्य नहीं है तो सदा जल भी पर्याप्त है जो पूर्ण श्रद्धा से समर्पित किया गया हो )

ॐ खमापः पृथिवी चैव ज्योतिषं वायुरेव च
लोक संस्मृति मात्रेण वारिणा स्नापयाम्यहम्

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा स्नानं निवेदयामि )

६. मधुपर्क :- इस क्रिया में ( पंचगव्य मिश्रित करें प्रथम दिन ( गाय का शुद्ध दूध , दही , घी , चीनी , शहद ) अन्य दिनों में यदि व्यवस्था कर सकें तो बेहतर है अन्यथा सिर्फ शहद से काम लिया जा सकता है

ॐ मधुपर्क महादेवि ब्रह्मध्धे कल्पितं तव
मया निवेदितम् भक्तया गृहाण गिरिपुत्रिके

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा मधुपर्कं समर्पयामि )

विशेष :- ध्यान रखें चन्दन या सिन्दूर में से कोई भी चीज मस्तक पर समर्पित न करें बल्कि माँ के चरणों में समर्पित करें

७. चन्दन :- इस क्रिया में सफ़ेद चन्दन समर्पित करें

ॐ मळयांचल सम्भूतं नाना गंध समन्वितं
शीतलं बहुलामोदम चन्दम गृह्यतामिदं

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा चन्दनं समर्पयामि )

८. रक्त चन्दन :- इस क्रिया में माँ को रक्त / लाल चन्दन समर्पित करें

ॐ रुक्तानुलेपनम् देवि स्वयं देव्या प्रकाशितं
तद गृहाण महाभागे शुभं देहि नमोस्तुते

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा रक्त चन्दनं समर्पयामि )

९. सिन्दूर :- इस क्रिया में माँ को सिन्दूर समर्पित करें

ॐ सिन्दूरं सर्वसाध्वीनाम भूषणाय विनिर्मितम्
गृहाण वर दे देवि भूषणानि प्रयच्छ में

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा सिन्दूरं समर्पयामि )


१०. कुंकुम :- इस क्रिया में माँ को कुंकुम समर्पित करें

ॐ जपापुष्प प्रभम रम्यं नारी भाल विभूषणम्
भाष्वरम कुंकुमं रक्तं देवि दत्तं प्रगृह्य में

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा कुंकुमं समर्पयामि )

११. अक्षत :- अक्षत में चावल प्रयोग करने होते हैं जो काले रंग में रंगे हुए हों

ॐ अक्षतं धान्यजम देवि ब्रह्मणा निर्मितं पुरा
प्राणंद सर्वभूतानां गृहाण वर दे शुभे

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा अक्षतं समर्पयामि )

१२. पुष्प :- माता के चरणो में पुष्प समर्पित करें ( फूलों एवं फूलमालाओं का चुनाव करते समय ध्यान रखें कि यदि आपको काला गुलाब मिल जाये तो बहुत बढ़िया यदि नहीं मिलता तो लाल गुलाब उपयुक्त होगा किन्तु यदि स्थानीय या बाजारीय उपलब्धता के हिसाब से जो उपलब्ध हो वही प्रयोग करें )

ॐ चलतपरिमलामोदमत्ताली गण संकुलम्
आनंदनंदनोद्भूतम् कालिकायै कुसुमं नमः

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा पुष्पं समर्पयामि )

१३. विल्वपत्र :- माता के चरणों में बिल्वपत्र समर्पित करें ( कहीं कहीं पर उल्लेख मिलता कि देवी पूजा में बिल्वपत्र का प्रयोग नहीं किया जाता है तो इस स्थिति में आप अपने लोक/ स्थानीय प्रचलन का प्रयोग करें )

ॐ अमृतोद्भवम् श्रीवृक्षं शंकरस्व सदाप्रियम
पवित्रं ते प्रयच्छामि सर्व कार्यार्थ सिद्धये

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा बिल्वपत्रं समर्पयामि )

१४. माला :- इस क्रिया में माँ को फूलों कि माला समर्पित करें

ॐ नाना पुष्प विचित्राढ़यां पुष्प मालां सुशोभताम्
प्रयच्छामि सदा भद्रे गृहाण परमेश्वरि

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा पुष्पमालां समर्पयामि )

१५. वस्त्र :- इस क्रिया में माता को वस्त्र समर्पित किये जाते हैं ( एक बात ध्यान में रखनी चाहिए कि वस्त्रों कि लम्बाई १२ अंगुल से कम न हो - प्रथम दिन कि पूजा में काले वस्त्र समर्पित किये जाने चाहिए तत्पश्चात [ मौली धागा जिसे प्रायः पुरोहित रक्षा सूत्र के रूप में यजमान के हाथ में बांधते हैं वह चढ़ाया जा सकता है लेकिन लम्बाई १२ अंगुल ही होगी )

अ. ॐ तंतु संतान संयुक्तं कला कौशल कल्पितं
सर्वांगाभरण श्रेष्ठं वसनं परिधीयताम्

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा प्रथम वस्त्रं समर्पयामि )

ब. ॐ यामाश्रित्य महादेवि जगत्संहारकः सदा
तस्यै ते परमेशान्यै कल्पयाम्युत्रीयकम

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा द्वितीय वस्त्रं समर्पयामि )

१५. धूप :- इस क्रिया में सुगन्धित धुप समर्पित करनी है

ॐ गुग्गुलम घृत संयुक्तं नाना भक्ष्यैश्च संयुतम
दशांग ग्रसताम धूपम् कालिके देवि नमोस्तुते

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा धूपं समर्पयामि )

१६. दीप :- इस क्रिया में शुद्ध घी से निर्मित दीपक समर्पित करना है जो कपास कि रुई से बनी बत्तियों से निर्मित हो

ॐ मार्तण्ड मंडळांतस्थ चन्द्र बिंबाग्नि तेजसाम्
निधानं देवि कालिके दीपोअयं निर्मितस्तव भक्तितः

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा दीपं दर्शयामि )

१७. इत्र :- इस क्रिया में माता को इत्र / सुगन्धित सेंट समर्पित करना है

ॐ परमानन्द सौरभ्यम् परिपूर्णं दिगम्बरम्
गृहाण सौरभम् दिव्यं कृपया जगदम्बिके

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा सुगन्धित द्रव्यं समर्पयामि )

१८. कर्पूर दीप :- इस क्रिया में माँ को कर्पूर का दीपक जलाकर समर्पित करना है

ॐ त्वम् चन्द्र सूर्य ज्योतिषं विद्युद्गन्योस्तथैव च
त्वमेव जगतां ज्योतिदीपोअयं प्रतिगृह्यताम्

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा कर्पूर दीपम दर्शयामि )

१९. नैवेद्य :- इस क्रिया में माता को फल - फूल या भोजन समर्पित करते हैं भोजन कम से कम इतनी मात्रा में हो जो एक आदमी के खाने के लिए पर्याप्त हो बाकि सारा कुछ सामर्थ्यानुसार )

ॐ दिव्यांन्नरस संयुक्तं नानाभक्षैश्च संयुतम
चौष्यपेय समायुक्तमन्नं देवि गृहाण में

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा नैवेद्यं समर्पयामि )

२०. खीर :- इस क्रिया में ढूध से निर्मित खीर चढ़ाएं

ॐ गव्यसर्पि पयोयुक्तम नाना मधुर मिश्रितम्
निवेदितम् मया भक्त्या परमान्नं प्रगृह्यताम्

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा दुग्ध खीरम समर्पयामि )

२१. मोदक :- इस क्रिया में माँ को लड्डू समर्पित करने हैं

ॐ मोदकं स्वादु रुचिरं करपुरादिभिरणवितं
मिश्र नानाविधैर्द्रुव्यै प्रति ग्रह्यशु भुज्यतां

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा मोदकं समर्पयामि )

२२. फल :- इस क्रिया में माता को ऋतु फल समर्पित करने होते हैं

ॐ फल मूलानि सर्वाणि ग्राम्यांअरण्यानि यानि च
नानाविधि सुंगंधीनि गृहाण देवि ममाचिरम

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा ऋतुफलं समर्पयामि )

२३. जल :- इस क्रिया में खान - पान के पश्चात् अब माता को जल समर्पित करें

ॐ पानीयं शीतलं स्वच्छं कर्पूरादि सुवासितम्
भोजने तृप्ति कृद्य् स्मात कृपया प्रतिगृह्यतां

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा जलम समर्पयामि )

२४. करोद्वर्तन जल :- इस क्रिया में माता को हाथ धोने के लिए जल प्रदान करें

ॐ कर्पूरादीनिद्रव्याणि सुगन्धीनि महेश्वरि
गृहाण जगतां नाथे करोद्वर्तन हेतवे

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा करोद्वर्तन जलम समर्पयामि )

२५. आचमन :- इस क्रिया में माता को पुनः आचमन करवाएं

ॐ अमोदवस्तु सुरभिकृतमेत्तदनुत्तमम्
गृह्णाचमनीयम तवं माया भक्त्या निवेदितम्

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा पुनराचमनीयम् समर्पयामि )

२६. ताम्बूल :- इस क्रिया में माता को सुगन्धित पान समर्पित करें

ॐ पुन्गीफलम महादिव्यम नागवल्ली दलैर्युतम्
कर्पूरैल्लास समायुक्तं ताम्बूल प्रतिगृह्यताम्

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा ताम्बूलं समर्पयामि )

२७. काजल :- माता को काजल समर्पित करें

ॐ स्निग्धमुष्णम हृद्यतमं दृशां शोभाकरम तव
गृहीत्वा कज्जलं सद्यो नेत्रान्यांजय कालिके

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा कज्जलं समर्पयामि )

२८. महावर :- इस क्रिया में माँ को लाला रंग का महावर समर्पित करते हैं ( लाल रंग एवं पानी का मिश्रण जिसे ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं पैरों में लगाती हैं )

ॐ चलतपदाम्भोजनस्वर द्युतिकारि मनोहरम
अलकत्कमिदं देवि मया दत्तं प्रगृह्यताम्

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा महावरम समर्पयामि )

२९. चामर :- इस क्रिया में माँ को चामर / पंखा ढलना होता है

ॐ चामरं चमरी पुच्छं हेमदण्ड समन्वितम्
मायार्पितं राजचिन्ह चामरं प्रतिगृह्यताम्

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा चामरं समर्पयामि )

३० . घंटा वाद्यम् :- इस क्रिया में माँ के सामने घंटा / घंटी बजानी होती है ( यह ध्वनि आपके घर और आपसे सभी नकारात्मक शक्तियों को दूर करती है एवं आपके मन में प्रसन्नता और हर्ष को जन्म देती है )

ॐ यथा भीषयसे दैत्यान् यथा पूरयसेअसुरम
तां घंटा सम्प्रयच्छामि महिषधिनी प्रसीद में

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा घंटा वाद्यं समर्पयामि )

३१. दक्षिणा :- इस क्रिया में माँ को दक्षिणा धन समर्पित किया जाता है - ( जो कि सामर्थ्यानुसार है )

ॐ काञ्चनं रजतोपेतं नानारत्न समन्वितं
दक्षिणार्थम् च देवेशि गृहाण त्वं नमोस्तुते

( क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरी स्वाहा आसनं समर्पयामि )

३३. पुष्पांजलि :-

ॐ काली काली भद्रकाली कालिके पाप नाशिनी
काली कराली निष्क्रान्ते भद्रकाल्यै तवननमोस्तुते
ॐ उत्तिष्ठ देवी चामुण्डे शुभां पूजा प्रगृह्य में
कुरुष्व मम कल्याणमस्टाभि शक्तिभिः सह
भुत प्रेत पिशाचेभ्यो रक्षोभ्यश्च महेश्वरि
देवेभ्यो मानुषोभ्योश्च भयेभ्यो रक्ष मा सदा
सर्वदेवमयीं देवीं सर्व रोगभयापहाम
ब्रह्मेश विष्णु नमिताम् प्रणमामि सदा उमां
आय़ुर्ददातु में भद्रकाल्यै पुत्रानादि सदा शिवा
अर्थ कामो महामाया विभवं सर्व मङ्गला

क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं परमेश्वरि पुष्पांजलिं समर्पयामि

३४. नीराजन :- इस क्रिया में पुनः माँ कि प्राथमिक आरती उतारते हैं जिसमे सिर्फ कर्पूर का प्रयोग होता है

ॐ कर्पूरवर्ति संयुक्तं वहयिना दीपितंचयत
नीराजनं च देवेशि गृह्यतां जगदम्बिके

३५. क्षमा प्रार्थना :-

ॐ प्रार्थयामि महामाये यत्किञ्चित स्खलितम् मम
क्षम्यतां तज्जगन्मातः कालिके देवी नमोस्तुते
ॐ विधिहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं यदरचितम्
पुर्णम्भवतु तत्सर्वं त्वप्रसादान्महेश्वरी
शक्नुवन्ति न ते पूजां कर्तुं ब्रह्मदयः सुराः
अहं किं वा करिष्यामि मृत्युर्धर्मा नरोअल्पधिः
न जाने अहं स्वरुप ते न शरीरं न वा गुणान्
एकामेव ही जानामि भक्तिं त्वचर्णाबजयोः

३६. आरती :- इस क्रिया में माता कि आरती उतारते हैं और यह चरण आपकी उस काल कि साधना के समापन का प्रतीक है -( इसके लिए अलग से कोई आरती जलने कि कोई जरुरत नहीं है आप उसी दीपक का उपयोग करेंगे जो आपने पूजा के प्रारम्भ में घी का दीपक जलाया था )

Sunday, 22 November 2015

क्या आप को पता है हर प्रकार की सफलता के लिए करे राजमुखी देवी की साधना !!


जीवन में सभी व्यक्तियो का यह एक सुमधुर स्वप्न होता है की उसे सभी क्षेत्र में सफलता की प्राप्ति हो तथा उसे जीवन के सभी क्षेत्र में विजय श्री तिलक की प्राप्ति हो ! चाहे वह स्वयं के ज्ञान की बात हो, पारिवारिक सुख शांति, भौतिक रूप से सफलता, समाज में मान तथा सन्मान, अध्यात्मिक उन्नति, तथा जीवन के पूर्ण सुख रस का उपभोग करना हो, कौन व्यक्ति अपने जीवन में एसी सफलता की प्राप्ति नहीं करना चाहता ! निश्चित रूप से सभी व्यक्ति अर्वाचीन या प्राचीन दोनों ही काल में इस प्रकार की सफलता की कामना करते थे और इसकी पूर्ती के लिए अथाक परिश्रम भी करने वालो की कमी किसी भी युग में नहीं थी ! लेकिन ब्रह्माण्ड कर्म से बद्ध है, व्यक्ति अपने कार्मिक वृतियो के कारण चाहे वह इस जन्म से सबंधित हो या पूर्व जन्म से सबंधित, कई बार पूर्ण श्रम करने के बाद भी सफलता की प्राप्ति नहीं कर पता है ! इन सब के मूल में कई प्रकार के दोष हो सकते है ! लेकिन इन दोषों की निवृति के लिए व्यक्ति को स्वयं ही तो प्रयत्न करना पड़ेगा ! प्रस्तुत प्रयोग, साधक और उसकी सफलता के बिच में आने वाली बाधा को दूर करने का एक अद्भुत विधान है ! प्रस्तुत प्रयोग राजमुखी देवी से सबंधित है जो की आद्य देवी महादेवी का ही एक स्वरुप है, जो की साधक को राज अर्थात पूर्ण सुख भोग की प्राप्ति कराती है ! प्रस्तुत प्रयोग के कई प्रकार के लाभ है लेकिन कुछ महत्त्वपूर्ण पक्ष इस प्रकार से है ! यह त्रिबीज सम्पुटित साधना है जो की साधक की तीन शक्ति अर्थात, ज्ञान, इच्छा तथा क्रिया को जागृत करता है फल स्वरुप साधक की स्मरणशक्ति का विकास होता है तथा नूतन ज्ञान को समजने में सुभिधा मिलती है ! राजमुखी देवी को वशीकरण की देवी भी कहा गया है, साधक के चहरे पर एक ऐसा वशीकरण आकर्षण छा जाता है जिसके माध्यम से साधक कई कई क्षेत्र में सफलता की प्राप्ति कर सकता है तथा कई व्यक्ति स्वयं ही साधक को अपने से श्रेष्ठ व्यक्ति मान लेने के लिए आकर्षण बद्ध हो जाते है !मुख्य रूप से कार्यसिद्धि के लिए यह प्रयोग है लेकिन यहाँ सिर्फ कोई विशेष कार्य के लिए यह प्रयोग न हो कर साधक के सभी कार्यों की सिद्धि के लिए यह प्रयोग है ! इस प्रयोग को करने पर साधक को अपने कार्यों में सफलता का मिलना सहज होने लगता है साथ ही साथ साधक को समाज में मान सन्मान की भी प्राप्ति होने लगती है !
साधना की विधि :-
यह प्रयोग साधक किसी भी शुभदिन में शुरू कर सकता है ! साधक दिन या रात्री के कोई भी समय में यह साधना कर सकता है लेकिन रोज साधना का समय एक ही रहे ! साधक को स्नान आदि से निवृत हो कर गुलाबी वस्त्रों को धारण करना चाहिए, अगर गुलाबी वस्त्र किसी भी रूप में संभव न हो तो साधक को सफ़ेद वस्त्रों का प्रयोग करना चाहिए !इसके बाद साधक गुलाबी/सफ़ेद आसान पर बैठ जाए तथा गुरुपूजन एवं गुरुमन्त्र का जाप करे ! साधक को इसके बाद अपने सामने किसी पात्र में कुमकुम से एक अधः त्रिकोण का निर्माण करना चाहिए !इसके बाद साधक उस त्रिकोण के मध्य में एक दीपक स्थापित करे. यह दीपक तेल का हो ! इसे प्रज्वलित कर साधक न्यास क्रिया को सम्प्पन करे
करन्यास : –
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं अन्गुष्ठाभ्यां नमः
ॐ राजमुखी तर्जनीभ्यां नमः
ॐ वश्यमुखी मध्यमाभ्यां नमः
ॐ महादेवी अनामिकाभ्यां नमः
ॐ सर्वजन वश्य कुरु कुरु कनिष्टकाभ्यां नमः
ॐ सर्व कार्य साधय साधय  नमः करतल करपृष्ठाभ्यां नमः
अंगन्यास : –
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं हृदयाय नमः
ॐ राजमुखी शिरसे स्वाहा 
ॐ वश्यमुखी शिखायै वषट्
ॐ महादेवी कवचाय हूं
ॐ सर्वजन वश्य कुरु कुरु नैत्रत्रयाय वौषट्
ॐ सर्व कार्य साधय साधय  नमः अस्त्राय फट्

उसके बाद मूल मन्त्र की ११ माला मन्त्र का जाप करे !
यह जाप साधक स्फटिक/रुद्राक्ष/मूंगा/गुलाबीहकीक माला से कर सकता है.
मन्त्र : –
 ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं राजमुखी वश्यमुखी महादेवी सर्वजन वश्य कुरु कुरु सर्व कार्य साधय साधय  नमः

११ माला होने पर साधक देवी को मन ही मन वंदन करे तथा जाप उनको समर्पित कर दे ! इस प्रकार साधक को यह क्रम ३ दिन तक रखना चाहिए. ३ दिन बाद साधक दीपक तथा पात्र को धो सकता है तथा पुनः किसी भी कार्य में उपयोग कर सकता है. माला का विसर्जन नहीं करना है, इस माला का प्रयोग साधक आगे भी इस साधना हेतु कर सकता है !

Thursday, 19 November 2015

क्या आप को पता है आत्मा क्या है जानिए आत्मा के पाँच कोष और चार स्तर!!




हमारे वेद और उपनिषद मै आत्मा को पाँच कोष और चार स्तर में बाटा गया है !
'एक आत्मा है जो अन्नरसमय है-एक अन्य आंतर आत्मा है, प्राणमय जो कि उसे पूर्ण करता है- एक अन्य आत्मा के पाँच कोष :-

आंतर आत्मा है, मनोमय-एक अन्य आंतर आत्मा है, विज्ञानमय (सत्यज्ञानमय) -एक अन्य आंतर आत्मा है, आनंदमय।(तैत्तिरीयोपनिषद )
भावार्थ : जड़ में प्राण; प्राण में मन; मन में विज्ञान और विज्ञान में आनंद। यह चेतना या आत्मा के रहने के पाँच स्तर हैं। आत्मा इनमें एक साथ रहती है। यह अलग बात है कि किसे किस स्तर का अनुभव होता है। ऐसा कह सकते हैं कि यह पाँच स्तर आत्मा का आवरण है। कोई भी आत्मा अपने कर्म प्रयास से इन पाँचों स्तरों में से किसी भी एक स्तर का अनुभव कर उसी के प्रति आसक्त रहती है। सर्वोच्च स्तर आनंदमय है और निम्न स्तर जड़।
जो भी दिखाई दे रहा है उसे जड़ कहते हैं और हमारा शरीर जड़ जगत का हिस्सा है। जो लोग शरीर के ही तल पर जी रहे हैं वह जड़ बुद्धि कहलाते हैं, उनके जीवन में भोग और संभोग का ही महत्व है। शरीर में ही प्राणवायु है जिससे व्यक्ति भावुक, ईर्ष्यालु, क्रोधी या दुखी होता है। प्राण में ही स्थिर है मन। मन में जीने वाला ही मनोमयी है। मन चंचल है। जो रोमांचकता, कल्पना और मनोरंजन को पसंद करता है ऐसा व्यक्ति मानसिक है।मन में ही स्थित है विज्ञानमय कोष अर्थात ‍बुद्धि का स्तर। जो विचारशील और कर्मठ है वही विज्ञानमय कोष के स्तर में है। इस विज्ञानमय कोष के भी कुछ उप-स्तर है। विज्ञानमय कोष में ही स्थित है-आनंदमय कोष। यही आत्मवानों की ‍तुरीय अवस्था है। इसी ‍स्तर में जीने वालों को भगवान, अरिहंत या संबुद्ध कहा गया है। इस स्तर में शुद्ध आनंद की अनुभूति ही बच जाती है। जहाँ व्यक्ति परम शक्ति का अनुभव करता है। इसके भी उप-स्तर होते हैं। और जो इस स्तर से भी मुक्त हो जाता है-वही ब्रह्मलीन कहलाता है।ईश्वर एक ही है किंतु आत्माएँ अनेक। यह अव्यक्त, अजर-अमर आत्मा पाँच कोषों को क्रमश: धारण करती है, जिससे की वह व्यक्त (दिखाई देना) और जन्म-मरण के चक्कर में उलझ जाती है। यह पंच कोष ही पंच शरीर है। कोई आत्मा किस शरीर में रहती है यह उसके ईश्‍वर समर्पण और संकल्प पर निर्भर करता है।

आत्मा के चार स्तर :

आत्मा चार स्तरों में स्वयं के होने का अनुभव करती है- (1)जाग्रत (2) स्वप्न (3) सुषुप्ति और (4) तुरीय अवस्था। (छांदोग्य उपनिषद)

इसमें तीन स्तरों का अनुभव प्रत्येक जन्म लिए हुए मनुष्य को अनुभव होता ही है लेकिन चौथे स्तर में वही होता है जो आत्मवान हो गया है या जिसने मोक्ष पा लिया है। वह शुद्ध तुरीय अवस्था में होता है जहाँ न तो जाग्रति है, न स्वप्न, न सु‍षुप्ति ऐसे मनुष्य सिर्फ दृष्टा होते हैं-जिसे पूर्ण-जागरण की अवस्था भी कहा जाता है।

1-अनुभूति के स्तर:- जाग्रत, स्वप्न, सु‍षुप्ति और तुरीय अवस्था।
2-व्यक्त (प्रकट) होने के कोष:- जड़, प्राण, मन, बुद्धि और आनंद।

अंतत: जड़ या अन्नरसमय कोष दृष्टिगोचर होता है। प्राण और मन का अनुभव होता है किंतु जाग्रत मनुष्य को ही विज्ञानमय कोष समझ में आता है। जो विज्ञानमय कोष को समझ लेता है वही उसके स्तर को भी समझता है।अभ्यास और जाग्रति द्वारा ही उच्च स्तर में गति होती है। अकर्मण्यता से नीचे के स्तर में चेतना गिरती जाती है। इस प्रकृति में ही उक्त पंच कोषों में आत्मा विचरण करती है किंतु जो आत्मा इन पाँचों कोष से मुक्त हो जाती है ऐसी मुक्तात्मा को ही ब्रह्मलीन कहा जाता है। यही मोक्ष की अवस्था है।इस तरह वेदों में जीवात्मा के पाँच शरीर बताए गए हैं- जड़, प्राण, मन, विज्ञान और आनंद। इस पाँच शरीर या कोष के अलग-अलग ग्रंथों में अलग-अलग नाम हैं जिसे वेद ब्रह्म कहते हैं उस ईश्वर की अनुभूति सिर्फ वही आत्मा कर सकती है जो आनंदमय शरीर में स्थित है। देवता, दानव, पितर और मानव इस हेतु सक्षम नहीं।

वेद में सृष्टि की उत्पत्ति, विकास, विध्वंस और आत्मा की गति को पंचकोश के क्रम में समझाया गया है। पंचकोश ये हैं- 1.अन्नमय, 2.प्राणमय, 3.मनोमय, 4.विज्ञानमय और 5.आनंदमय। उक्त पंचकोश को ही पाँच तरह का शरीर भी कहा गया है। वेदों की उक्त धारणा विज्ञान सम्मत है, जो यहाँ सरल भाषा में प्रस्तुत है।जब हम हमारे शरीर के बारे में सोचते हैं तो यह पृथवि अर्थात जड़ जगत का हिस्सा है। इस शरीर में प्राणवायु का निवास है। प्राण के अलावा शरीर में पाँचों इंद्रियाँ (आँख, नाक, कान, जीभ और स्पर्शानुभूति) है जिसके माध्यम से हमें 'मन' और मस्तिष्क के होने का पता चलता है। मन के अलावा और भी सूक्ष्म चीज होती है जिसे बुद्धि कहते हैं जो गहराई से सब कुछ समझती और अच्छा-बुरा जानने का प्रयास करती है, इसे ही 'सत्यज्ञानमय' कहा गया है।मानना नहीं, यदि यह जान ही लिया है कि मैं आत्मा हूँ शरीर नहीं, प्राण नहीं, मन नहीं, विचार नहीं तब ही मोक्ष का द्वार ‍खुलता है। ऐसी आत्मा 'आनंदमय' कोश में स्थित होकर मुक्त हो जाती है। यहाँ प्रस्तुत है अन्नमय कोश का परिचय।

अन्नमय कोश : सम्पूर्ण दृश्यमान जगत, ग्रह-नक्षत्र, तारे और हमारी यह पृथवि, आत्मा की प्रथम अभिव्यक्ति है। यह दिखाई देने वाला जड़ जगत जिसमें हमारा शरीर भी शामिल है यही अन्न से बना शरीर अन्नरसमय कहलाता हैं। इसीलिए वैदिक ऋषियों ने अन्न को ब्रह्म कहा है।यह प्रथम कोश है जहाँ आत्मा स्वयं को अभिव्यक्त करती रहती है। शरीर कहने का मतलब सिर्फ मनुष्य ही नहीं सभी वृक्ष, लताओं और प्राणियों का शरीर।‍जो आत्मा इस शरीर को ही सब कुछ मानकर भोग-विलास में निरंतर रहती है वही तमोगुणी कहलाती है। इस शरीर से बढ़कर भी कुछ है। इस जड़-प्रकृति जगत से बढ़कर भी कुछ है।जड़ का अस्तित्व मानव से पहिले का है। प्राणियों से पहिले का है। वृक्ष और समुद्री लताओं से पहिले का है। पहिले पाँच तत्वों (अग्नि, जल, वायु, पृथवि, आकाश) की सत्ता ही विद्यमान थी। इस जड़ को ही शक्ति कहते हैं- अन्न रसमय कहते हैं। यही आत्मा की पूर्ण सुप्तावस्था है। यह आत्मा की अधोगति है। फिर जड़ में प्राण, मन और बुद्धि आदि सुप्त है। इस शरीर को पुष्‍ट और शुद्ध करने के लिए यम, नियम और आसन का प्रवधान है।इस अन्नमय कोश को प्राणमय कोश ने, प्राणमय को मनोमय, मनोमय को विज्ञानमय और विज्ञानमय को आनंदमय कोश ने ढाँक रखा है। यह व्यक्ति पर निर्भर करता है कि वह क्या सिर्फ शरीर के तल पर ही जी रहा है या कि उससे ऊपर के आवरणों में। किसी तल पर जीने का अर्थ है कि हमारी चेतना या जागरण की स्थिति क्या है। जड़बुद्धि का मतलब ही यही है वह इतना बेहोश है कि उसे अपने होने का होश नहीं जैसे पत्थर और पशु।

प्राणमय कोश : जड़ में ही प्राण के सक्रिय होने से अर्थात वायु तत्व के सक्रिय होने से प्राण धीरे-धीरे जाग्रत होने लगा। प्रथम वह समुद्र के भीतर लताओं, वृक्षों और न दिखाई देने वाले जीवों के रूप में फिर क्रमश: जलचर, उभयचर, थलचर और फिर नभचर प्रणियों के रूप में अभिव्यक्त हुआ।जहाँ भी साँस का आवागमन दृष्टिगोचर होता है, महसूस होता है वहाँ प्राण सक्रिय है। आत्मा ने स्वयं को स्थूल से ऊपर उठाकर 'प्राण' में अभिव्यक्त किया। जब आत्मा ने स्वयं को स्थूल (जड़) में सीमित पाया तब शुरू हुई विकास की प्रक्रिया। इस तरह पृथवि में स्थूल का एक भाग जाग्रत या सक्रिय होकर प्राणिक होने लगा।यह प्राण ही है जिसके अवतरण से जड़ जगत में हलचल हुई और द्रुत गति से आकार-प्रकार का युग प्रारम्भ हुआ। प्रकृति भिन्न-भिन्न रूप धारण करती गई। प्राण को ही जीवन कहते हैं। प्राण के निकल जाने पर प्राणी मृत अर्थात जड़ माना जाता है। यह प्राणिक शक्ति ही संपूर्ण ब्रह्मांड की आयु और वायु है अर्थात प्राणवायु ही आयु है, स्वास्थ्य है।पत्थर, पौधे, पशु और मानव के प्राण में जाग्रति और सक्रियता का अंतर है। देव, मनुष्य, पशु आदि सभी प्राण के कारण चेष्ठावान है। मानव में मन ज्यादा सक्रिय है किंतु जलचर, उभयचर, नभचर और पशुओं में प्राण ज्यादा सक्रिय है, इसीलिए पशुओं को प्राणी भी कहा जाता है। ऐसा तैतरिय उपषिद के ऋषि कहते हैं। उपनिषद वेद का हिस्सा है। ईर्ष्या, द्वैष, संघर्ष, वासना, आवेग, क्रोध और इच्छा यह प्राण के स्वाभाविक गुण है। जो मानव इन गुणों से परिपूर्ण है वह प्राणी के अतिरिक्त कुछ नहीं। प्राण को पुष्ट और शुद्ध करने के लिए 'प्राणायाम' का प्रवधान है।

मनोमय कोश : यह मनुष्य प्रकृति की अब तक की शुद्धतम कृति माना गया है। यह प्रकृति के सभी आकारों में अब तक का शुद्ध व ऐसा सुविधाजन आकार है जहाँ 'आत्मा' रहकर अपने को अन्यों से अधिक स्वतंत्र महसूस करती है। दूसरी ओर यह एक ऐसा आकार है जहाँ 'मन' का अवतरण आसान है।उक्त आकार में अन्य प्राणियों की अपेक्षा 'मन' के अधिक जाग्रत होने से ही मनुष्य को मनुष्य या मानव कहा गया है। यही मनोमय कोश है। जगत के मनोमय कोश में मानव ही में 'मन' सर्वाधिक प्रकट है अन्यों में मन सुप्त है। मन भी कई तरह के होते हैं। यह विस्तार की बातें हैं।आत्मा ने जड़ से प्राण और प्राण से मन में गति की है। सृष्‍टि के विकास में मन एक महत्वपूर्ण घटना थी। मन के गुण भाव और विचारों के प्रत्यक्षों से है। मन पाँच इंद्रियों के क्रिया-कलापों से उपजी प्रतिक्रिया मात्र नहीं है- इस तरह के मन को सिर्फ ऐंद्रिक मन ही कहा जाता है जो प्राणों के अधिन है।औसत मन जो संस्कारबद्ध होता है अर्थात जो उन्हीं विचारों को सुनने के लिए तैयार रहता है जिसे ग्रहण करने की उसे शिक्षा मिल चुकी है। फिर भी वह अपने कार्यो में जितना अपने हित, आवेश और पक्षपातों द्वारा संचालित होता है उतना विचारों द्वारा नहीं- यही ऐंद्रिक मन है। 99 प्रतिशत लोग ऐंद्रिक मन में ही जीते हैं। जो भी मन किसी भी प्रकार के ऐंद्रिक ज्ञान से उपजे विचारों के प्रति आग्रही हैं वह ऐंद्रिक मन है। ऐंद्रिक मन में स्‍थित आत्मा भी जड़बुद्धि ही मानी गई है। विचार कितना ही महान हो वह ऐंद्रिक मन की ही उपज है।उसी आत्मा का मन उच्चतर रूपों में रूपांतरित हो जाता है जिसने इंद्रियों तथा इनसे उपजने वाले भावों से संचालित होना छोड़ दिया है। समूह की मानसिकता में जिना 'मन' की प्राथमिक अवस्थाओं का लक्षण है और जो इससे ऊपर उठता है वह उच्चतर मन के अवतरण के लिए यथा-योग्य भूमि तैयार करता है।इसीलिए मन के क्रिया-कलापों के प्रति जाग्रत रहकर जो विचारों की सुस्पष्टता और शुद्ध अवस्था में स्थित हो पूर्वाग्रहों से मुक्त होता है वही विज्ञानमय कोश में स्थित हो सकता है।मन को उच्चतर रूपों में रूपांतरित कहने के लिए प्रत्याहार और धारणा को साधने का प्रावधान है। इसके सधने पर ही आत्मा विज्ञानमय कोश के स्तर में स्थित होती है। मनुष्यों मन की मनमानी के प्रति जाग्रत रहो वेदों में यही श्रेष्ठ उपाय बताया गया है।

विज्ञानमय कोश : सत्यज्ञानमय या विज्ञानमय कोश। सत्यज्ञामय कोश अर्थात जिसे सांसारिक सत्य का ज्ञान होने लगे और जो माया-भ्रम का जाल काटकर साक्षित्व में स्थित होने लगे या जो जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति के स्तर से मुक्ति पाकर निर्विचार की दशा में होने लगे उसे ही सत्यज्ञान पर चलने वाला कहते हैं। दूसरा इस कोश को विज्ञानमय कोश भी कहते हैं। विज्ञान का अर्थ साइंस से न ले। विज्ञान का अर्थ विशेष ज्ञान या विशेष बोध। सत्यज्ञानमय कोश बोधपूर्वक जीने से मिलता है।मनोमय कोश से मुक्त होकर विज्ञानमय अर्थात सत्यज्ञानमय कोश में स्थित आत्मा को ही हम सिद्ध या संबुद्ध कहते हैं। इस कोश में स्थित आत्माएँ मन से मुक्त हो चुकी होती है। इस कोश के भी कुछ स्तर माने गए है जिस तरह की मनोमय के है।जब मनुष्य को अपने अज्ञान में पड़े रहने का ज्ञान होता है तब शुरू होता है मन पर नियंत्रण। मन को नियंत्रित कर उसे बुद्धि-संकल्प में स्थित करने वाला ही विवेकी कहलाता है। विवेकी में तर्क और विचार की सुस्पष्टता होती है।विवेकी को ही विज्ञानमय कोश का प्रथम स्तर माना जाता है किंतु जो बुद्धि का भी अतिक्रमण कर जाता है उसे अंतर्दृष्टि संपन्न मनस कहते हैं। अर्थात जिसका साक्षित्व गहराने लगा। इसे ही ज्ञानीजन संबोधि का लक्षण कहते हैं, जो विचार से परे निर्विचार में स्‍थित है।ऐसे अंतरदृष्टि संपन्न 'आत्मा' विज्ञानमय कोश के प्रथम स्तर में स्थित होकर सुक्ष्मातित दृष्टिवाला होता है। जब अंतरदृष्टि की पूर्णता आ जाती है तो मोक्ष के द्वार खुलने लगते हैं। इस सत्यज्ञानमय या विज्ञानमय कोश को पुष्ट-शुद्ध करने के लिए ध्यान का प्रावधान है। ध्‍यान तो प्राण और मन को साधने का उपाय भी है।

आनंदमय कोश : ईश्वर और जगत के मध्य की कड़ी है आनंदमय कोश। एक तरफ जड़, प्राण, मन, और बुद्धि (विज्ञानमय कोश) है तो दूसरी ओर ईश्वर है और इन दोनों के बीच खड़ा है- आनंदमय कोश में स्थित आत्मा। महर्षि अरविंद के अनुसार इस कोश में स्थित आत्मा अतिमानव कहलाती है। अतिमानव को सुपरमैन भी कह सकते हैं।योगयुक्त समाधि पुरुष को ही हम भगवान कहते हैं। यह भगवान ही अतिमानव है। उसे ही हम ब्रह्मा, विष्णु और शिव कहते हैं। यही अरिहंतों और बुद्ध पुरुषों की अवस्था है। ऐसा अतिमानव ही सृष्टा और दृष्टा दोनों है। इस आनंदमय कोश से ही ब्रह्मांड चलायमान है। अन्य सभी कोश सक्रिय है। मानव और ईश्वर के मध्य खड़ा हैं- अतिमानव। मनुष्यों में शक्ति है भगवान बनने की। दुर्लभ है वह मनुष्य जो भगवतपद प्राप्त कर लेता हैं। इसे ही विष्णु पद भी कहा गया है। भगवान सर्वशक्तिमान, अंतर्यामी और सबका रक्षक है। उसमें ज्ञाता, ज्ञान, ज्ञेय का कोई अंतर नहीं वह स्वयं के चरम आनंद के सर्वोच्च शिखर पर स्थित होता है। ऐसा ब्रह्म स्वरूप पुरुष जब देह छोड़ देता है तब ब्रह्मलीन होकर पंचकोश से मुक्त हो जाता है। अर्थात वह स्वयं ब्रह्ममय हो जाता है। ऐसे पुरुष का लक्षण है समाधि। समाधि या मोक्ष के भी भेद है।अंतत: जड़ या अन्नरसमय कोश दृष्टिगोचर होता है अर्थात दिखाई देता है। फिर प्राण और मन का हम अनुभव ही कर सकते हैं किंतु जाग्रत मनुष्य को ही विज्ञानमय कोश समझ में आता है। जो विज्ञानमय कोश को समझ लेता है वहीं उसके स्तर को भी समझता है। अभ्यास और जाग्रति द्वारा ही उच्च स्तर में गति होती है। अकर्मण्यता से नीचे के स्तर में चेतना गिरती जाती है। इस प्रकृति में ही उक्त पंचकोशों में आत्मा विचरण करती है किंतु जो आत्मा इन पाँचों कोश से मुक्त हो जाती है ऐसी मुक्तात्मा को ही ब्रह्मलीन कहा जाता है। यही मोक्ष की अवस्था है।इस तरह वेदों में जीवात्मा के पाँच शरीर बताएँ गए है- जड़, प्राण, मन, विज्ञान और आनंद। इस पाँच शरीर या कोश के अलग-अलग ग्रंथों में अलग-अलग नाम है जिसे वेद ब्रह्म कहते हैं उस ईश्वर की अनुभूति सिर्फ वही आत्मा कर सकती है जो आनंदमय शरीर में स्थित है। देवता, दानव, पितर और मानव इस हेतु सक्षम नहीं। उस सच्चिदानंद परब्रह्म परमेश्वर को तो भगवान ही जान सकते हैं। भगवान को ईश्वर स्वरूप माना जाता है ईश्वर नहीं। ईश्वर तो अनंत और व्यापक है।

Wednesday, 18 November 2015

क्या आप को पता है ध्यान क्या है ध्यान लगने की बिधि ,लाभ, अनुभव और महत्व !!


'भीतर से जाग जाना ध्यान है। सदा निर्विचार की दशा में रहना ही ध्यान है।' ध्यान का मूल अर्थ है जागरूकता, साक्ष‍ी भाव और दृष्टा भाव।योग का आठवां अंग ध्यान अति महत्वपूर्ण हैं। एक मात्र ध्यान ही ऐसा तत्व है कि उसे साधने से सभी स्वत: ही सधने लगते हैं, लेकिन योग के अन्य अंगों पर यह नियम लागू नहीं होता। ध्यान दो दुनिया के बीच खड़े होने की स्थिति है।

ध्यान की परिभाषा : तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम।। 3-2 ।।-योगसूत्र अर्थात- जहां चित्त को लगाया जाए उसी में वृत्ति का एकतार चलना ध्यान है। धारणा का अर्थ चित्त को एक जगह लाना या ठहराना है, लेकिन ध्यान का अर्थ है जहां भी चित्त ठहरा हुआ है उसमें वृत्ति का एकतार चलना ध्यान है। उसमें जाग्रत रहना ध्यान है।

ध्यान का अर्थ : ध्यान का अर्थ एकाग्रता नहीं होता। एकाग्रता टॉर्च की स्पॉट लाइट की तरह होती है जो किसी एक जगह को ही फोकस करती है, लेकिन ध्यान उस बल्ब की तरह है जो चारों दिशाओं में प्रकाश फैलाता है। आमतौर पर आम लोगों का ध्यान बहुत कम वॉट का हो सकता है, लेकिन योगियों का ध्यान सूरज के प्रकाश की तरह होता है जिसकी जद में ब्रह्मांड की हर चीज पकड़ में आ जाती है।

क्रिया नहीं है ध्यान : बहुत से लोग क्रियाओं को ध्यान समझने की भूल करते हैं- जैसे सुदर्शन क्रिया, भावातीत ध्यान और सहज योग ध्यान। दूसरी ओर विधि को भी ध्यान समझने की भूल की जा रही है।बहुत से संत, गुरु या महात्मा ध्यान की तरह-तरह की क्रांतिकारी विधियां बताते हैं, लेकिन वे यह नहीं बताते हैं कि विधि और ध्यान में फर्क है। क्रिया और ध्यान में फर्क है। क्रिया तो साधन है साध्य नहीं। क्रिया तो ओजार है। क्रिया तो झाड़ू की तरह है।आंख बंद करके बैठ जाना भी ध्यान नहीं है। किसी मूर्ति का स्मरण करना भी ध्यान नहीं है। माला जपना भी ध्यान नहीं है। अक्सर यह कहा जाता है कि पांच मिनट के लिए ईश्वर का ध्यान करो- यह भी ध्यान नहीं, स्मरण है। ध्यान है क्रियाओं से मुक्ति। विचारों से मुक्ति।
 

ध्यान का स्वरूप : हमारे मन में एक साथ असंख्य कल्पना और विचार चलते रहते हैं। इससे मन-मस्तिष्क में कोलाहल-सा बना रहता है। हम नहीं चाहते हैं फिर भी यह चलता रहता है। आप लगातार सोच-सोचकर स्वयं को कम और कमजोर करते जा रहे हैं। ध्यान अनावश्यक कल्पना व विचारों को मन से हटाकर शुद्ध और निर्मल मौन में चले जाना है।ध्यान जैसे-जैसे गहराता है व्यक्ति साक्षी भाव में स्थित होने लगता है। उस पर किसी भी भाव, कल्पना और विचारों का क्षण मात्र भी प्रभाव नहीं पड़ता। मन और मस्तिष्क का मौन हो जाना ही ध्यान का प्राथमिक स्वरूप है। विचार, कल्पना और अतीत के सुख-दुख में जीना ध्यान विरूद्ध है।ध्यान में इंद्रियां मन के साथ, मन बुद्धि के साथ और बुद्धि अपने स्वरूप आत्मा में लीन होने लगती है। जिन्हें साक्षी या दृष्टा भाव समझ में नहीं आता उन्हें शुरू में ध्यान का अभ्यास आंख बंद करने करना चाहिए। फिर अभ्यास बढ़ जाने पर आंखें बंद हों या खुली, साधक अपने स्वरूप के साथ ही जुड़ा रहता है और अंतत: वह साक्षी भाव में स्थिति होकर किसी काम को करते हुए भी ध्यान की अवस्था में रह सकता है।मृत्यु आए उससे पहले पूर्णिमा का चांद निकले उस मुकाम तक ले जाओ अपने होश को।

मूलत: ध्यान को चार भागों में बांटा जा सकता है-
1. देखना,
2. सुनना,
3. श्वास लेना और
4. आंखें बंदकर मौन होकर सोच पर ध्‍यान देना।
देखने को दृष्टा या साक्षी ध्यान, सुनने को श्रवण ध्यान, श्वास लेने को प्राणायाम ध्यान और आंखें बंदकर सोच पर ध्यान देने को भृकुटी ध्यान कह सकते हैं। उक्त चार तरह के ध्यान के हजारों उप प्रकार हो सकते हैं।उक्त चारों तरह का ध्यान आप लेटकर, बैठकर, खड़े रहकर और चलते-चलते भी कर सकते हैं। उक्त तरीकों को में ही ढलकर योग और हिन्दू धर्म में ध्यान के हजारों प्रकार बताएं गए हैं जो प्रत्येक व्यक्ति की मनोदशा अनुसार हैं। भगवान शंकर ने मां पार्वती को ध्यान के 112 प्रकार बताए थे जो 'विज्ञान भैरव तंत्र' में संग्रहित हैं।

देखना : ऐसे लाखों लोग हैं जो देखकर ही सिद्धि तथा मोक्ष के मार्ग चले गए। इसे दृष्टा भाव या साक्षी भाव में ठहरना कहते हैं। आप देखते जरूर हैं, लेकिन वर्तमान में नहीं देख पाते हैं। आपके ढेर सारे विचार, तनाव और कल्पना आपको वर्तमान से काटकर रखते हैं। बोधपूर्वक अर्थात होशपूर्वक वर्तमान को देखना और समझना (सोचना नहीं) ही साक्षी या दृष्टा ध्यान है।

सुनना : सुनकर श्रवण बनने वाले बहुत है। कहते हैं कि सुनकर ही सुन्नत नसीब हुई। सुनना बहुत कठीन है। सुने ध्यान पूर्वक पास और दूर से आने वाली आवाजें। आंख और कान बंदकर सुने भीतर से उत्पन्न होने वाली आवाजें। जब यह सुनना गहरा होता जाता है तब धीरे-धीरे सुनाई देने लगता है- नाद। अर्थात ॐ का स्वर।

श्वास पर ध्यान : बंद आंखों से भीतर और बाहर गहरी सांस लें, बलपूर्वक दबाब डाले बिना यथासंभव गहरी सांस लें, आती-जाती सांस के प्रति होशपूर्ण और सजग रहे। बस यही प्राणायाम ध्यान की सरलतम और प्राथमिक विधि है।

भृकुटी ध्यान : आंखें बंद करके दोनों भोओं के बीच स्थित भृकुटी पर ध्यान लगाकर पूर्णत: बाहर और भीतर से मौन रहकर भीतरी शांति का अनुभव करना। होशपूर्वक अंधकार को देखते रहना ही भृकुटी ध्यान है। कुछ दिनों बाद इसी अंधकार में से ज्योति का प्रकटन होता है। पहले काली, फिर पीली और बाद में सफेद होती हुई नीली।

अब हम ध्यान के पारंपरिक प्रकार की बात करते हैं। यह ध्यान तीन प्रकार का होता है-
1. स्थूल ध्यान,
2. ज्योतिर्ध्यान और
3. सूक्ष्म ध्यान।

1. स्थूल ध्यान- स्थूल चीजों के ध्यान को स्थूल ध्यान कहते हैं- जैसे सिद्धासन में बैठकर आंख बंदकर किसी देवता, मूर्ति, प्रकृति या शरीर के भीतर स्थित हृदय चक्र पर ध्यान देना ही स्थूल ध्यान है। इस ध्यान में कल्पना का महत्व है।

2. ज्योतिर्ध्यान- मूलाधार और लिंगमूल के मध्य स्थान में कुंडलिनी सर्पाकार में स्थित है। इस स्थान पर ज्योतिरूप ब्रह्म का ध्यान करना ही ज्योतिर्ध्यान है।

3. सूक्ष्म ध्यान- साधक सांभवी मुद्रा का अनुष्ठान करते हुए कुंडलिनी का ध्यान करे, इस प्रकार के ध्यान को सूक्ष्म ध्यान कहते हैं।

ध्यान की विधियां :-

ध्यान करने की अनेकों विधियों में एक विधि यह है कि ध्यान किसी भी विधि से किया नहीं जाता, हो जाता है। ध्यान की योग और तंत्र में हजारों विधियां बताई गई है। हिन्दू, जैन, बौद्ध तथा साधु संगतों में अनेक विधि और क्रियाओं का प्रचलन है। विधि और क्रियाएं आपकी शारीरिक और मानसिक तंद्रा को तोड़ने के लिए है जिससे की आप ध्यानपूर्ण हो जाएं। यहां प्रस्तुत है ध्यान की सरलतम विधियां, लेकिन चमत्कारिक।

विशेष : ध्‍यान की हजारों विधियां हैं। भगवान शंकर ने माँ पार्वती को 112 विधियां बताई थी जो 'विज्ञान भैरव तंत्र' में संग्रहित हैं। इसके अलावा वेद, पुराण और उपनिषदों में ढेरों विधियां है। संत, महात्मा विधियां बताते रहते हैं। उनमें से खासकर 'ओशो रजनीश' ने अपने प्रवचनों में ध्यान की 150 से ज्यादा विधियों का वर्णन किया है।

1- सिद्धासन में बैठकर सर्वप्रथम भीतर की वायु को श्वासों के द्वारा गहराई से बाहर निकाले। अर्थात रेचक करें। फिर कुछ समय के लिए आंखें बंदकर केवल श्वासों को गहरा-गहरा लें और छोड़ें। इस प्रक्रिया में शरीर की दूषित वायु बाहर निकलकर मस्तिष्‍क शांत और तन-मन प्रफुल्लित हो जाएगा। ऐसा प्रतिदिन करते रहने से ध्‍यान जाग्रत होने लगेगा।

2- सिद्धासन में आंखे बंद करके बैठ जाएं। फिर अपने शरीर और मन पर से तनाव हटा दें अर्थात उसे ढीला छोड़ दें। चेहरे पर से भी तनाव हटा दें। बिल्कुल शांत भाव को महसूस करें। महसूस करें कि आपका संपूर्ण शरीर और मन पूरी तरह शांत हो रहा है। नाखून से सिर तक सभी अंग शिथिल हो गए हैं। इस अवस्था में 10 मिनट तक रहें। यह काफी है साक्षी भाव को जानने के लिए।

3- किसी भी सुखासन में आंखें बंदकर शांत व स्थिर होकर बैठ जाएं। फिर बारी-बारी से अपने शरीर के पैर के अंगूठे से लेकर सिर तक अवलोकन करें। इस दौरान महसूस करते जाएं कि आप जिस-जिस अंग का अलोकन कर रहे हैं वह अंग स्वस्थ व सुंदर होता जा रहा है। यह है सेहत का रहस्य। शरीर और मन को तैयार करें ध्यान के लिए।

4. चौथी विधि क्रांतिकारी विधि है जिसका इस्तेमाल अधिक से अधिक लोग करते आएं हैं। इस विधि को कहते हैं साक्षी भाव या दृष्टा भाव में रहना। अर्थात देखना ही सबकुछ हो। देखने के दौरान सोचना बिल्कुल नहीं। यह ध्यान विधि आप कभी भी, कहीं भी कर सकते हैं। सड़क पर चलते हुए इसका प्रयोग अच्छे से किया जा सकता है।देखें और महसूस करें कि आपके मस्तिष्क में 'विचार और भाव' किसी छत्ते पर भिनभिना रही मधुमक्खी की तरह हैं जिन्हें हटाकर 'मधु' का मजा लिया जा सकता है।उपरोक्त तीनों ही तरह की सरलतम ध्यान विधियों के दौरान वातावरण को सुगंध और संगीत से तरोताजा और आध्यात्मिक बनाएं। चौथी तरह की विधि के लिए सुबह और शाम के सुहाने वातावरण का उपयोग करें।

ध्यान का स्थान:-

यदि आप सच में ही ध्यान के प्रति गंभीर है और आप बैठकर ध्यान करना चाहते हैं तो आपके लिए जरूरी है कि आप अच्छा सा स्थान चयन करें। ध्यान करने हेतु शुरुआत में स्थान की जरूरत तो होती ही है। वैसे ध्यान करने का स्थान तो मंदिर होता है। मंदिर इसलिए बनाए गए थे कि लोग वहां जाकर ध्‍यान करें, , लेकिन चूंकि अब मंदिरों में पूजा, पाठ और भजन होते हैं इसलिए वहां ध्यान नहीं कर सकते। प्राचीन मंदिरों की बनावट ही ध्यान के अनुसार हुई थी।ध्यान करने का स्थान ऐसा हो जहां शोरगुल और ‍प्रदूषण न हो। स्थान साफ-सुथरा और सामान्य तापमान वाला हो। आप कानों में रुई लगाकर भी शोरगुल से बच सकते हैं। मच्छरदानी लगाकर मच्छरों से बच सकते हैं, लेकिन यदि हवा में प्रदूषण है तो कैसे बचेंगे यह तय करें।गर्मी से त्रस्त व्यक्ति को जैसे एक पेड़ की छांव या शीतल कुटिया का आश्रय राहत देता है, उसी प्रकार सांसारिक झंझटों से पीड़ित व त्रस्त वैरागी के लिए हठयोग और सांसारिकों के लिए एकांत आश्रय माना है।

क्या आप साधना करना चाहते हैं:-

तब जहां तक संभव हो शहर के शोरगुल से दूर प्राकृतिक संपदा से भरपूर ऐसे माहौल में रहें, जहां धार्मिक मनोवृत्ति वाले लोग हों और वहां अन्न, जल, फल, मूल आदि से परिपूर्ण व्यवस्था हो। यही आपकी उचित साधनास्थली है। इस तरह के एकांत स्थान का चयन कर वहां एक छोटी-सी कुटिया का निर्माण करें।

कैसी हो कुटिया : ध्यान रखें कि कुटिया के चारों ओर पत्थर, अग्नि या जल न हो। उसके लिए अलग स्थान नियु‍क्त करें। कुटी का द्वार छोटा हो, दीवारों में कहीं तीड़ या छेद न हो, जमीन में कहीं बिल न हो जिससे चूहे या सांप आदि का खतरा बढ़े। कुटिया की जमीन समतल हो, गोबर से भली प्रकार लिपी-पुती हो, कुटिया को अत्यंत पवित्र रखें अर्थात वहां कीड़े-मकोड़े नहीं हों।कुटिया के बाहर एक छोटा-सा मंडप बनाएं जिसके नीचे हवन करने के लिए उसमें वेदी हो जहां चाहें तो धूना जलाकर रख सकते हैं। यह सर्दियों में बहुत काम आएगा। पास में ही एक अच्छा कुआं या कुंडी हो, जिसकी पाल दीवारों से घिरी हो। कुआं नहीं हो तो इस बात का ध्यान रखें क‍ि आपको पानी लाने के लिए किसी प्रकार की मेहनत न करना पड़े और पानी साफ-सुथरा हो।अंतत:- अतः जो साधक जिस प्रकार के स्थान में रहता हो, वहाँ भी यथासंभव एकांत प्राप्त कर अभ्यास में सफलता प्राप्त कर सकता है, परंतु हठयोगियों का अनुभव है कि पवित्र वातावरण ही साधना को आगे बढ़ाने और शीघ्र सफलता प्राप्त कराने में काफी अधिक सहायक सिद्ध होता है।

ध्‍यान का लाभ:::

हम ध्यान है। सोचो की हम क्या है- आंख? कान? नाक? संपूर्ण शरीर? मन या मस्तिष्क? नहीं हम इनमें से कुछ भी नहीं। ध्यान हमारे तन, मन और आत्मा के बीच लयात्मक सम्बन्ध बनाता है। स्वयं को पाना है तो ध्यान जरूरी है। वहीं एकमात्र विकल्प है।

आत्मा को जानना : ध्यान का नियमित अभ्यास करने से आत्मिक शक्ति बढ़ती है। आत्मिक शक्ति से मानसिक शांति की अनुभूति होती है। मानसिक शांति से शरीर स्वस्थ अनुभव करता है। ध्यान के द्वारा हमारी उर्जा केंद्रित होती है। उर्जा केंद्रित होने से मन और शरीर में शक्ति का संचार होता है एवं आत्मिक बल मिलता है। ध्यान से विजन पॉवर बढ़ता है तथा व्यक्ति में निर्णय लेने की क्षमता का विकास होता है। ध्यान से सभी तरह के रोग और शोक मिट जाते हैं। ध्यान से हमारा तन, मन और मस्तिष्क पूर्णत: शांति, स्वास्थ्य और प्रसन्नता का अनुभव करते हैं।

क्या होगा ध्यान से : हर तरह का भय जाता रहेगा। चिंता और चिंतन से उपजे रोगों का खात्मा होगा। शरीर में शांति होगी तो स्वस्थ अनुभव करेंगे। कार्य और व्यवहार में सुधार होगा। रिश्तों में तनाव की जगह प्रेम होगा। दृष्टिकोण सकारात्मक होगा। सफलता के बारे में सोचने मात्र से ही सफलता आपके नजदीक आने लगेगी।

ध्यान का महत्व : ध्यान से वर्तमान को देखने और समझने में मदद मिलती है। शुद्ध रूप से देखने की क्षमता बढ़ने से विवेक जाग्रत होगा। विवेक के जाग्रत होने से होश बढ़ेगा। होश के बढ़ने से मृत्यु काल में देह के छूटने का बोध रहेगा। देह के छूटने के बाद जन्म आपकी मुट्‍ठी में होगा। यही है ध्यान का महत्व।

सिर्फ तुम : खुद तक पहुंचने का एक मात्र मार्ग ध्‍यान ही है। ध्यान को छोड़कर बाकी सारे उपाय प्रपंच मात्र है। यदि आप ध्यान नहीं करते हैं तो आप स्वयं को पाने से चूक रहे हैं। स्वयं को पाने का अर्थ है कि हमारे होश पर भावना और विचारों के जो बादल हैं उन्हें पूरी तरह से हटा देना और निर्मल तथा शुद्ध हो जाना। ज्ञानीजन कहते हैं कि जिंदगी में सब कुछ पा लेने की लिस्ट में सबमें ऊपर स्वयं को रखो। मत चूको स्वयं को। 70 साल सत्तर सेकंड की तरह बीत जाते हैं। योग का लक्ष्य यह है कि किस तरह वह तुम्हारी तंद्रा को तोड़ दे इसीलिए यम, नियम, आसन, प्राणायम, प्रत्याहार और धारणा को ध्यान तक पहुँचने की सीढ़ी बनाया है।

ध्यान के लाभ:

ध्यान से मानसिक लाभ- शोर और प्रदूषण के माहौल के चलते व्यक्ति निरर्थक ही तनाव और मानसिक थकान का अनुभव करता रहता है। ध्यान से तनाव के दुष्प्रभाव से बचा जा सकता है। निरंतर ध्यान करते रहने से जहां मस्तिष्क को नई उर्जा प्राप्त होती है वहीं वह विश्राम में रहकर थकानमुक्त अनुभव करता है। गहरी से गहरी नींद से भी अधिक लाभदायक होता है ध्यान।

विशेष : आपकी चिंताएं कम हो जाती हैं। आपकी समस्याएं छोटी हो जाती हैं। ध्यान से आपकी चेतना को लाभ मिलता है। ध्यान से आपके भीतर सामंजस्यता बढ़ती है। जब भी आप भावनात्मक रूप से अस्थिर और परेशान हो जाते हैं, तो ध्यान आपको भीतर से स्वच्छ, निर्मल और शांत करते हुए हिम्मत और हौसला बढ़ाता है।

ध्यान से शरीर को मिलता लाभ- ध्यान से जहां शुरुआत में मन और मस्तिष्क को विश्राम और नई उर्जा मिलती है वहीं शरीर इस ऊर्जा से स्वयं को लाभांवित कर लेता है। ध्यान करने से शरीर की प्रत्येक कोशिका के भीतर प्राण शक्ति का संचार होता है। शरीर में प्राण शक्ति बढ़ने से आप स्वस्थ अनुभव महसूस करते हैं।

विशेष : ध्यान से उच्च रक्तचाप नियंत्रित होता है। सिरदर्द दूर होता है। शरीर में प्रतिरक्षण क्षमता का विकास होता है, जोकि किसी भी प्रकार की बीमारी से लड़ने में महत्वपूर्ण है। ध्यान से शरीर में स्थिरता बढ़ती है। यह स्थिरता शरीर को मजबूत करती है।

आध्यात्मिक लाभ- जो व्यक्ति ध्यान करना शुरू करते हैं, वह शांत होने लगते हैं। यह शांति ही मन और शरीर को मजबूती प्रदान करती है। ध्यान आपके होश पर से भावना और विचारों के बादल को हटाकर शुद्ध रूप से आपको वर्तमान में खड़ा कर देता है। ध्यान से काम, क्रोध, मद, लोभ और आसक्ति आदि सभी विकार समाप्त हो जाते हैं। निरंतर साक्षी भाव में रहने से जहां सिद्धियों का जन्म होता है वहीं सिद्धियों में नहीं उलझने वाला व्यक्ति समाधी को प्राप्त लेता है।

कैसे उठाएं ध्यान से लाभ : ध्यान से भरपूर लाभ प्राप्त करने के लिए नियमित अभ्यास करना आवश्यक है। ध्यान करने में ज्यादा समय की जरूरत नहीं मात्र पांच मिनट का ध्यान आपको भरपूर लाभ दे सकता है बशर्ते की आप नियमित करते हैं।यदि ध्यान आपकी दिनचर्या का हिस्सा बन गया है तो यह आपके दिन का सबसे बढ़िया समय बन जाता है। आपको इससे आनंद की प्राप्ति होती है। फिर आप इसे पांच से दस मिनट तक बढ़ा सकते हैं। पांच से दस मिनट का ध्यान आपके मस्तिष्क में शुरुआत में तो बीज रूप से रहता है, लेकिन 3 से 4 महिने बाद यह वृक्ष का आकार लेने लगता है और फिर उसके परिणाम आने शुरू हो जाते हैं।


ध्यान के चमत्कारिक अनुभव:

ध्यान के अनुभव निराले हैं। जब मन मरता है तो वह खुद को बचाने के लिए पूरे प्रयास करता है। जब विचार बंद होने लगते हैं तो मस्तिष्क ढेर सारे विचारों को प्रस्तुत करने लगता है। जो लोग ध्यान के साथ सतत ईमानदारी से रहते हैं वह मन और मस्तिष्क के बहकावे में नहीं आते हैं, लेकिन जो बहकावे में आ जाते हैं वह कभी ध्यानी नहीं बन सकते।प्रत्येक ध्यानी को ध्यान के अलग-अलग अनुभव होते हैं। यह उसकी शारीरिक रचना और मानसिक बनावट पर निर्भर करता है कि उसे शुरुआत में क‍िस तरह के अनुभव होंगे। लेकिन ध्यान के एक निश्चित स्तर पर जाने के बाद सभी के अनुभव लगभग समान होने लगते हैं।

शुरुआती अनुभव : शुरुआत में ध्यान करने वालों को ध्यान के दौरान कुछ एक जैसे एवं कुछ अलग प्रकार के अनुभव होते हैं। पहले भौहों के बीच आज्ञा चक्र में ध्यान लगने पर अंधेरा दिखाई देने लगता है। अंधेरे में कहीं नीला और फिर कहीं पीला रंग दिखाई देने लगता है।यह गोलाकार में दिखाई देने वाले रंग हमारे द्वारा देखे गए दृष्य जगत का रिफ्‍लेक्शन भी हो सकते हैं और हमारे शरीर और मन की हलचल से निर्मित ऊर्जा भी। गोले के भीतर गोले चलते रहते हैं जो कुछ देर दिखाई देने के बाद अदृश्य हो जाते हैं और उसकी जगह वैसा ही दूसरा बड़ा गोला दिखाई देने लगता है। यह क्रम चलता रहता है।कुछ ज्ञानीजन मानते हैं कि नीला रंग आज्ञा चक्र का एवं जीवात्मा का रंग है। नीले रंग के रूप में जीवात्मा ही दिखाई पड़ती है। पीला रंग जीवात्मा का प्रकाश है। इस प्रकार के गोले दिखना आज्ञा चक्र के जाग्रत होने का लक्षण भी माना जाता है।

इसका लाभ : कुछ दिनों बाद इसका पहला लाभ यह मिलता है कि व्यक्ति के मन और मस्तिष्क से तनाव और चिंता हट जाती है और वह शांति का अनुभव करता है। इसके साथ ही मन में पूर्ण आत्मविश्वास जाग्रत होता है जिससे वह असाधारण कार्य भी शीघ्रता से संपन्न कर लेता है। ऐसा व्यक्ति भूत और भविष्य की कल्पनाओं में नहीं जिता।

दूसरा लाभ यह कि लगातार भृकुटी पर ध्यान लगाते रहने से कुछ माह बाद व्यक्ति को भूत, भविष्य-वर्तमान तीनों प्रत्यक्ष दीखने लगते हैं। ऐसे व्यक्ति को भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं के पूर्वाभास भी होने लगते हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि उसकी छटी इंद्री जाग्रत होने लगी है और अब उसे ज्यादा सतर्क रहने की जरूरत है। यदि आगे प्रगति करना है तो ऐसे व्यक्ति को लोगो से अपने संपर्क समाप्त करने की हिदायत दी जाती है, लेकिन जो व्यक्ति इसका दुरुपयोग करता है उसे योगभ्रष्ट कहा जाता है।ध्यान करना अद्भुत है। हमारे यूं तो मूलत: तीन शरीर होते हैं। भौतिक, सूक्ष्म और कारण, लेकिन इस शरीर के अलावा और भी शरीर होते हैं। हमारे शरीर में मुख्यत: सात चक्र हैं। प्रत्येक चक्र से जुड़ा हुआ है एक शरीर। बहुत अद्भुत और आश्चर्यजनक है हमारे शरीर की रचना। दिखाई देने वाला भौतिक शरीर सिर्फ खून, हड्डी और मांस का जोड़ ही नहीं है इसे चलायमान रखने वाले शरीर अलग हैं। कुंडलिनी जागरण में इसका अनुभव होता है।जो व्यक्ति सतत चार से छह माह तक ध्यान करता रहा है उसे कई बार एक से अधिक शरीरों का अनुभव होने लगता है। अर्थात एक तो यह स्थूल शरीर है और उस शरीर से निकलते हुए 2 अन्य शरीर। ऐसे में बहुत से ध्यानी घबरा जाते हैं और वह सोचते हैं कि यह ना जाने क्या है। उन्हें लगता है कि कहीं मेरी मृत्यु न हो जाए। इस अनुभव से घबराकर वे ध्यान करना छोड़ देते हैं। जब एक बार ध्यान छूटता है तो फिर मुश्किल होती है पुन: उसी अवस्था में लौटने में।इस अनुभव को समझे- जो दिखाई दे रहा है वह हमारा स्थूल शरीर है। दूसरा सूक्ष्म शरीर हमें दिखाई नहीं देता, लेकिन हम उसे नींद में महसूस कर सकते हैं। इसे ही वेद में मनोमय शरीर कहा है। तीसरा शरीर हमारा कारण शरीर है जिसे विज्ञानमय शरीर कहते हैं।

सूक्ष्म शरीर की क्षमता : सूक्ष्म शरीर ने हमारे स्थूल शरीर को घेर रहा है। हमारे शरीर के चारों तरफ जो ऊर्जा का क्षेत्र है वही सूक्ष्म शरीर है। सूक्ष्म शरीर भी हमारे स्थूल शरीर की तरह ही है यानि यह भी सब कुछ देख सकता है, सूंघ सकता है, खा सकता है, चल सकता है, बोल सकता है आदि। इसके अलावा इस शरीर की और भी कई क्षमता है जैसे वह दीवार के पार देख सकता है। किसी के भी मन की बात जान सकता है। वह कहीं भी पल भर में जा सकता है। वह पूर्वाभास कर सकता है और अतीत की हर बात जान सकता है आदि।

कारण शरीर की क्षमता : तीसरा शरीर कारण शरीर कहलाता है। कारण शरीर ने सूक्ष्म शरीर को घेर के रखा है। इसे बीज शरीर भी कहते हैं। इसमें शरीर और मन की वासना के बीज विद्यमान होते हैं। यह हमारे विचार, भाव और स्मृतियों का बीज रूप में संग्रह कर लेता है। मृत्यु के बाद स्थूल शरीर कुछ दिनों में ही नष्ट हो जाता और सूक्ष्म शरीर कुछ महिनों में विसरित होकर कारण की ऊर्जा में विलिन हो जाता है, लेकिन मृत्यु के बाद यही कारण शरीर एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाता है और इसी के प्रकाश से पुनः मनोमय व स्थूल शरीर की प्राप्ति होती है अर्थात नया जन्म होता है। कारण शरीर कभी नहीं मरता।इसी कारण शरीर से कई सिद्ध योगी परकाय प्रवेश में समर्थ हो जाते हैं। जब व्यक्ति निरंतर ध्यान करता है तो कुछ माह बाद यह कारण शरीर हरकत में आने लगता है। अर्थात व्यक्ति की चेतना कारण में स्थित होने लगती है। ध्यान से इसकी शक्ति बढ़ती है। यदि व्यक्ति निडर और होशपूर्वक रहकर निरंतर ध्यान करता रहे तो निश्चित ही वह मृत्यु के पार जा सकता है। मृत्यु के पार जाने का मतलब यह कि अब व्यक्ति ने स्थूल और सूक्ष्म शरीर में रहना छोड़ दिया।

ध्यान का महत्व:-

अग्नि की तरह है ध्यान। बुराइयां उसमें जलकर भस्म हो जाती हैं। ध्यान है धर्म और योग की आत्मा। ध्यानियों की कोई मृत्यु नहीं होती। लेकिन ध्यान से जो अलग है बुढ़ापे में उसे वह सारे भय सताते हैं, जो मृत्यु के भय से उपजते हैं। अंत काल में उसे अपना जीवन नष्ट ही जान पड़ता है। इसलिए ध्यान करना जरूरी है। ध्‍यान से ही हम अपने मूल स्वरूप या कहें कि स्वयं को प्राप्त कर सकते हैं अर्थात हम कहीं खो गए हैं। स्वयं को ढूंढने के लिए ध्यान ही एक मात्र विकल्प है।दुनिया को ध्यान की जरूरत है चाहे वह किसी भी देश या धर्म का व्यक्ति हो। ध्यान से ही व्यक्ति की मानसिक संवरचना में बदलाव हो सकता है। ध्यान से ही हिंसा और मूढ़ता का खात्मा हो सकता है। ध्यान के अभ्यास से जागरूकता बढ़ती है जागरूकता से हमें हमारी और लोगों की बुद्धिहिनता का पता चलने लगता है। ध्यानी व्यक्ति चुप इसलिए रहता है कि वह लोगों के भीतर झांककर देख लेता है कि इसके भीतर क्या चल रहा है और यह ऐसा व्यवहार क्यों कर रहा है। ध्यानी व्यक्ति यंत्रवत जीना छोड़ देता है।ध्यान अनावश्यक विचारों को मन से निकालकर शुद्ध और आवश्यक विचारों को मस्तिष्क में जगह देता है।

आत्मिक शक्ति का विकास : ध्यान तन, मन और आत्मा के बीच लयात्मक सम्बन्ध बनाता है और उसे बल प्रदान करता है। ध्यान का नियमित अभ्यास करने से आत्मिक शक्ति बढ़ती और मानसिक शांति की अनुभूति होती है। ध्यान का अभ्यास करते समय शुरू में 5 मिनट भी काफी होता है। अभ्यास से 20-30 मिनट तक ध्यान लगा सकते हैं।

मौन कर देता है ध्यान : ध्यान बहुत शांति प्रदान करता है। ध्यानस्थ होंगे, तो ज्यादा बात करने और जोर से बोलने का मन ही नहीं करेगा। जिनके भीतर व्यर्थ के विचार हैं वे ज्यादा बात करते हैं। वे प्रवचनकार भी बन जाते हैं। यदि गौर से देखा जाए तो वे जिंदगीभर वही वहीं बातें करते रहते हैं जो अतीत में करते रहे हैं। भटके हुए मन के लोग जिंदगी भर व्यर्थ की बकवास करते रहते हैं जैसे आपने टीवी चैनलों पर बहस होते देखी होगी। समस्याओं का समाधान बहस में नहीं ध्यानमें है।

क्या आप को पता है हिंदू धर्म के मंगल प्रतीक क्या है !!


हिंदू धर्म में मंगल प्रतीकों का खासा महत्व है ! इनके घर में होने से किसी भी कार्य में बाधा उत्पन्न नहीं होती ! सभी कार्य मंगलमय तरीके से संपन्न होते हैं ! क्या आप जानते हैं कि वो मंगल प्रतीक कौन कौन से हैं !

ॐ है सर्वोपरि मंगल प्रतीक : यह संपूर्ण ब्रह्मांड का प्रतीक है ! बहुत-सी आकाश गंगाएँ इसी तरह फैली हुई है ! ॐ शब्द तीन ध्वनियों से बना हुआ है- अ, उ, म इन तीनों ध्वनियों का अर्थ उपनिषद में भी आता है ! यह ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रतीक भी है और यह भू: लोक, भूव: लोक और स्वर्ग लोग का प्रतीक है ! ओम का घर में होना जरूरी है ! यह मंगलकर्ता ओम ब्रह्म और गणेश का साक्षात् प्रतीक माना गया है !

स्वस्तिक : स्वस्तिक को शक्ति, सौभाग्य, समृद्धि और मंगल का प्रतीक माना जाता है ! हर मंगल कार्य में इसको बनाया जाता है ! स्वस्तिक का बायां हिस्सा गणेश की शक्ति का स्थान 'गं' बीजमंत्र होता है ! इसमें, जो चार बिन्दियां होती हैं, उनमें गौरी, पृथ्वी, कच्छप और अनन्त देवताओं का वास होता है ! इस मंगल-प्रतीक का गणेश की उपासना, धन, वैभव और ऐश्वर्य की देवी लक्ष्मी के साथ, बहीखाते की पूजा की परम्परा आदि में विशेष स्थान है ! इसकी चारों दिशाओं के अधिपति देवताओं, अग्नि, इन्द्र, वरुण एवं सोम की पूजा हेतु एवं सप्तऋषियों के आशीर्वाद को प्राप्त करने में प्रयोग किया जाता है !

मंगल कलश : सुख और समृद्धि के प्रतीक कलश का शाब्दिक अर्थ है- घड़ा ! यह मंगल-कलश समुद्र मंथन का भी प्रतीक है ! ईशान भूमि पर रोली, कुंकुम से अष्टदल कमल की आकृति बनाकर उस पर यह मंगल कलश रखा जाता है ! एक कांस्य या ताम्र कलश में जल भरकल उसमें कुछ आम के पत्ते डालकर उसके मुख पर नारियल रखा होता है ! कलश पर रोली, स्वास्तिक का चिन्ह बनाकर, उसके गले पर मौली (नाड़ा) बांधी जाती है  !

शंख : शंख को नादब्रह्म और दिव्य मंत्री की संज्ञा दी गई है ! शंख समुद्र मथंन के समय प्राप्त चौदह अनमोल रत्नों में से एक है ! लक्ष्मी के साथ उत्पन्न होने के कारण इसे लक्ष्मी भ्राता भी कहा जाता है ! यही कारण है कि जिस घर में शंख होता है वहां लक्ष्मी का वास होता है ! शंख सूर्य व चंद्र के समान देवस्वरूप है जिसके मध्य में वरुण, पृष्ठ में ब्रह्मा तथा अग्र में गंगा और सरस्वती नदियों का वास है ! तीर्थाटन से जो लाभ मिलता है, वही लाभ शंख के दर्शन और पूजन से मिलता है !

रंगोली : रंगोली या मांडना हमारी प्राचीन सभ्यता एवं संस्कृति की समृद्धि के प्रतीक हैं, इसलिए 'चौंसठ कलाओं' में मांडना को भी स्थान प्राप्त है ! इससे घर परिवार में मंगल रहता है ! उत्सव-पर्व तथा अनेकानेक मांगलिक अवसरों पर रंगोली से घर-आंगन को खूबसूरती के साथ अलंकृत किया जाता है !

दीपक : सुन्दर और कल्याणकारी, आरोग्य और संपदा को देने वाले दीपक समृद्धि के साथ ही अग्नि और ज्योति का प्रतीक है ! पारंपरिक दीपक मिट्टी का ही होता है ! इसमें पांच तत्व हैं मिट्टी, आकाश, जल, अग्नि और वायु ! हिंदू अनुष्ठान में पंचतत्वों की उपस्थिति अनिवार्य होती है !

हाथी : विष्‍णु तथा लक्ष्‍मी को हाथी प्रिय रहा है ! शक्‍ति, समृद्धि और सत्ता के प्रतीक हाथी को भगवाण गणेश का रूप माना जाता है ! समुद्र मंथन में प्राप्‍त हुआ था ऐरावत हाथी, जो सफेद था ! घर में ठोस चांदी या सोने का हाथ रखना चाहिए ! इसके होने से घर में शांति रहती है !

मंगल सूत्र : हिंदू विवाहित नारी गले में मंगल सूत्र पहनती है ! इसकी तुलना किसी अन्य आभूषण से नहीं की जाती। यह पति द्वारा पत्नी को विवाह के समय पहनाया  जाता है ! यह मंगल सूत्र पति की कुशलता से जुड़ी मंगल कामना का प्रतीक है ! इसका खोना या टूटना अपशकुन माना गया है ! जहां मंगल सूत्र का काला धागा और काला मोती स्त्री को बुरी नजर से बचाता है वहीं उसमें लगे सोने के पेंडिल से स्त्री में तेज और ऊर्जा का संचार बना रहता है ! इस से पत्नी हमेशा प्रसन्न रहती है !

गरुढ़ घंटी : जिन स्थानों पर घंटी बजने की आवाज नियमित आती है वहां का वातावरण हमेशा शुद्ध और पवित्र बना रहता है ! इससे नकारात्मक शक्तियां हटती है और सकारात्मक शक्तियों का प्रभाव बढता है ! नकारात्मकता हटने से समृद्धि के द्वारा खुलते हैं !

Monday, 16 November 2015

क्या आप को पता है साधना के साथ ध्यान लगाना आसान है !!


योग शास्त्र के अनुसार हमारे शरीर में नाड़ियों के गुच्छों के रूप में सात चक्र स्थापित हैं जिन्हें सुप्त अवस्था में रहने देना है या जागृत करके उनसे मिलने वाले लाभों से खुद के जीवन को संवारना है यह स्वत: हम पर निर्भर करता है ! यह बात हर उस आम व्यक्ति पर लागू होती है जिसे साधनाओं से कोई लेना देना नहीं होता पर जो व्यक्ति अपने जीवन में साधनाएं करते हैं वो जानते हैं की इन चक्रों की उन्के साधनात्मक जीवन में क्या महत्ता है !वैसे तो हर चक्र का अपना एक विशेष महत्व है पर हमारे भूमध्य में स्थित आज्ञाचक्र का हमारे साधनात्मक जीवन से बड़ा लेनादेना है और वो इसलिए क्योंकि यह चक्र हमारी आँखों के बिलकुल मध्य में स्थित है जहाँ तीसरा नेत्र स्थापित होता है और साधना में आप कितनी तल्लीनता से बैठे हैं या आपका ध्यान कितना भटक रहा है ये सारा खेल यहीं से शुरू होता है
“ यदि भ्रम से बचना है तो भ्रम से होने वाले फायदों और नुक्सान को तिलांजली दे दो “
इस कथन का सरल सा अर्थ यह है की वो चीज़ जिसे आप जानते हो की नहीं है उसके पीछे भागना व्यर्थ है पर साधना के समय ऐसा नहीं हो पाता उस समय तो हमारी मानसिक स्थिति ऐसी होती है जैसे ईश्वर ने समस्त ब्रह्मांड का दायितत्व हमारे कंधो पर ड़ाल दिया हो और यह स्थिति तब तक ज्यों की त्यों रहती है जब तक हम साधना से उठ नहीं जाते, ऐसा होता है यह हम सब जानते हैं पर क्यों होता है इस पर यदा-कदा ही विचार करते हैं| पर असल में यह कभी-कभी नहीं बल्कि रोज विचारने वाला विषय है क्योंकि साधना या मंत्र जाप करने का अर्थ होता है की वो समय हमारा और हमारे इष्ट का है पर उस समय में भी अगर हम ज़माने भर की बातें सोच रहे हैं तो उससे अच्छा है हम आसन पर बैठे ही नहीं क्योंकि मात्र माला चला लेने से, या आँखें मूंद कर बैठ जाने से कोई भगवान कभी खुश नहीं होते और साधना में हमारी ऐसी दशा का कारण होता है हमारा मन क्योंकि  
 “ जो ज्ञानी होते है वो जानते हैं की मन ना तो भरोसेमंद मित्र है और ना ही आज्ञाकारी सेवक, हम इसे निर्देशित तो कर सकते हैं पर नियंत्रित कदापि नहीं “
पर जो सिद्ध सन्यासी होते हैं उनके साथ उनका मन ऐसा खेल कभी नहीं खेलता क्योंकि वो इस तथ्य से पूर्णतः परिचित होते हैं की असल में मन जैसी कोई चीज होती ही नहीं यह सिर्फ एक भ्रम है, छलावा है और अगर विज्ञान की दृष्टि से इस बात की पुष्टि की जाए तो आपको चिकित्सक कभी किसी ऐसे शारीरिक अंग के बारे में नहीं बताएंगे जिसका नाम “ मन “ हो क्योंकि ऐसा कुछ होता ही नहीं है ! हमारे मस्तिष्क से निकलने वाली एक विशेष प्रकार की ऊर्जा या यूँ कहें की तरंग को हमने मन का नाम दे दिया है जिस पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं हैं क्योंकि ऊर्जा हमेशा तब तक अनियंत्रित रहती है जब तक आपको उसका सदुपयोग समझ में ना आ जाये| हमारे अंदर निरंतर बनने वाली ऊर्जा को नियंत्रण में करने के लिए पहले हमें इसके मूल को समझना पड़ेगा जहाँ से इस ऊर्जा का निर्माण होता है ! हम शरीर में सत, रज, और तम तीनों गुण कम या अधिक अनुपात में मौजूद हैं और हमारे मन या विचारों की गति और कार्य करने की क्षमता इन तीनों गुणों से हमेशा प्रभावित होती है और जिस समय आपके अंदर जिस गुण की प्रधानता होगी उस समय मस्तिष्क से निकलने वाली ऊर्जा, जिसे हमने मन का संबोधन दिया है, उसी तरफ जायेगी क्योंकि यह एक प्राकृतिक नियम है की ऊर्जा का प्रवाह हमेशा शक्ति के घनत्व की तरफ ही होता है और यही कारण है की हम हमेशा एक जैसे काम कभी नहीं करते कभी हम साधू होते है तो कभी साधना में मन या अपने विचारों को स्थिर रखने के लिए ध्यान मार्ग, योग मार्ग इत्यादि में हजारों तरीके बताए गए हैं पर उन सब विधियों से उपर अगर कोई शक्ति या क्रिया है जो आपको अंधकार से प्रकाश की ओर अग्रसर करती सकती है ! तो वो हैं आप खुद हो क्योंकि आपको आपसे ज्यादा अच्छे से ओर कोई नहीं जानता| इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता की आपने आज तक अपने विचारों को एकाग्र करने के लिए किन-किन नियमों का पालन किया है क्योंकि आपके द्वारा किये गए सारे क्रिया कलाप व्यर्थ हो जाते हैं जब तक आपकी आँखे स्थिर नहीं हो जाती ओर आँखों को स्थिर करने के लिए आपको खुद को थकाने की कोई जरूरत नहीं है ! यदि किसी चीज़ की जरूरत है तो वो है खुद को दोष मुक्त करने की हम सब यह तो जानते हैं की मन या विचारों को नियंत्रित करना अत्यंत दुष्कर है ! पर हमें यह तथ्य भी पता होना चाहिए की चेतना कभी मलीन या दूषित नहीं होती, ये तो हमारी आत्मा की एक तरंग है जिसे हमें बस सही दिशा दिखानी होती है और इस चेतना को हम सही दिशा तभी दिखा पायेंगे जब हमें इसका सही मार्ग पता हो| हठयोग में ६ तरह की अलग – अलग क्रियाएँ बताई गयी हैं जिनमें से त्राटक को श्रेष्ठ माना गया है क्योंकि यह हमारी मानसिक शान्ति के साथ-साथ आध्यात्मिक शक्ति को भी बढ़ाता है| हमारे मस्तिष्क में तरंगों के रूप में विचार हमेशा आते-जाते रहते हैं पर जब हम त्राटक का अभ्यास करते हैं तो इन विचारों के आने जाने से शतिग्र्स्त होने वाली ऊर्जा का ७० प्रतिशत हम पुन्ह: प्राप्त कर लेते हैं और वो इसलिए क्योंकि अब हमारी दौड़ विचारों को पकड़ने की ना होकर आँखों को स्थिर करने की है और यदि आप कोशिश करेंगे तो आप जानेंगे की विचारों की तुलना में आँखों की पुतलियों को स्थिर करना ज्यादा सहज भी है और कारागार भी ! और यह एक बार नहीं हजारों बार अनुभूत की गयी क्रिया है की जैसे ही आपकी आँखों की पुतलियाँ स्थिर होती हैं ! आपका मन भी आपके नियंत्रण में आ जाता है और इसका पता हमें चलता है शक्ति चक्र के मध्य में स्थित बिंदु के स्थिर हो जाने से|
त्राटक दो तरीकों से किया जा सकता है-
१) बाह्य त्राटक
२) आंतरिक त्राटक

बाह्य त्राटक में आपको अपना ध्यान शक्ति चक्र के मध्य में स्थित बिंदु पर केंद्रित करना होता है जिससे आध्यात्मिक स्तर पर आप अपने विचारों पर नियंत्रण करने की कला सीखते हो और भौतिक स्तर पर आपकी आँखों में स्वत: ही किसी को भी सम्मोहित करने की क्षमता पैदा हो जाती है ! आंतरिक त्राटक में आपको अपने आज्ञाचक्र पर ध्यान केंद्रित करना होता है और इस क्रिया में आपको अपनी आँखों की पुतलियों को भूमध्य में केंद्रित करना पड़ता है जिससे शुरूआती दिनों में थोड़ा दर्द हो सकता है ! इस त्राटक को सफलतापूर्वक करने से जहाँ आपके आज्ञाचक्र में स्पंदन होना शुरू हो जाता है वहीँ आप काल विखंडन साधना को करने की पात्रता भी अर्जित कर लेते हो ! भौतिक स्तर पर त्राटक का नियमित अभ्यास आपके सोचने, समझने की क्षमता को कई गुना बढ़ा देता है और आपने अंदर नाकारात्मक ऊर्जा को नष्ट भी करता है बस आपको एक बात हमेशा ध्यान में रखनी है की आप जब भी त्राटक का अभ्यास करो तो आपके चारों तरफ शान्ति हो और इसीलिए सुबह का समय इसके लिए सबसे श्रेष्ठ माना जाता है ! यहाँ दिया गया मंत्र त्राटक की इस क्रिया में शीघ्रातिशीघ्र सफल होने में आपकी सहायता करेगा पर मंत्र अपना काम तभी दक्षता से करेगा जब आप नियमित रूप से इस क्रिया का अभ्यास करेंगे वो भी बस १० से १५ मिनट तक ! आपको मात्र शांत बैठ कर सदगुरुदेव प्रदत्त निम्न मंत्र का १०-१५ मिनट गुंजरन करना है.ये सुषुम्ना को जाग्रत कर आपके लक्ष्य प्राप्ति को सरल और सुगम कर देता है.
 मंत्र:-

!! ॐ क्लीं क्लीं क्रीं क्रीं हुं हुं फट् !!

भगवान राम के कैसे करे दर्शन साधना और उन के नियम !!


भगवान राम से सबंधित साधनाए इसी लिए ज्यादातर उपलब्ध नहीं हो पाती है ! इन साधनाओ मे श्रद्धा की खास आवश्यता होती है. साधक के लिए इसमें इष्ट से एकीकरण की भावना विशेष रूप से होनी चाहिए. भगवान राम की साधना भी अपने आप मे उच्चकोटि की है ! वस्तुतः यह भगवान विष्णु के अवतार रहे है ! हनुमान उपासको के लिए तो यह साधना वरदान स्वरुप ही है ! क्यों की हनुमान साधना से पहले श्री राम से सबंधित साधना करने पर भगवान हनुमान साधक पर प्रस्सन होते है ! इस प्रकार कई द्रष्टिओ मे यह साधना उपयोगी है ! जीवन मे आध्यात्मिक वृति लेन के लिए भी यह साधना संपन्न करनी चाहिए !
 

साधना का विधान व नियम :- जिनके इष्ट राम है उनके लिए एक ऐसा ही विधान यहाँ पर दिया जा रहा है ! यह पूर्ण रूप से सात्विक विधान है !

इसमें साधक को निम्न मंत्र की ५१ माला ११ दिन तक करनी चाहिए ! यह जाप तुलसी की माला से हो ! दिशा उत्तर या पूर्व हो ! साधक सफ़ेद सूती वस्त्र तथा आसान का प्रयोग करे ! साधक को यह साधना एसी जगह पर करनी चाहिए जहा पर साधना काल मे कोई और व्यक्ति प्रवेश न करे ! इस प्रयोग के साथ ही साथ साधक हनुमान का भी यथा योग्य ध्यान जाप पूजा करे तो उत्तम है ! इस साधना मे साधक को भूमिशयन, ब्रम्हचर्य का पालन, संभव हो उतना मौन तथा एक समय सात्विक भोजन का पालन करना चाहिए ! इस साधना को किसी भी शुभ दिन से शुरू की जा सकती है ! समय रात्रि मे १० बजे के बाद का रहे तथा साधक राम चिंतन मे ही लीन रहे !श्रद्धा और विश्वास के साथ की गई साधना मे साधक को अंतिम दिन भगवान श्री राम के बिम्बात्मक दर्शन होते है तथा मनोकामना पूर्ण होती है !
 

मंत्र :-
 

रां रामाय दर्शयामि नमः

Sunday, 15 November 2015

क्या आप को पता है सुख-समृद्धिकारक हनुमान साधना क्या है !!


श्री हनुमान साधना एवं मंत्रों के संदर्भ में मंत्र महार्णव, मंत्र महोदधि, हनुमदोपासना, श्री विद्यार्णव आदि ग्रंथों में कई प्रयोग वर्णित हैं। कलि युग में हनुमान साधना समस्त बाधाओं, कष्टों और अड़चनों को तुरंत मिटाने में पूर्णतः सहायक है। हनुमान शक्तिशाली, पराक्रमी, संकटों का नाश करने वाले और दुःखों को दूर करने वाले महावीर हैं। इनके नाम का स्मरण ही अपने आप में सहायता और शक्ति प्रदान करने वाला है। सश्त्रो में भगवान श्री हनमुनजी से संबंधित अनेक साधनाएं वर्णित की गयी हैं, जो अलग-अलग परिस्थितियों को ध्यान में रख कर रची गयी हैं। यह उनकी विराटता और उनके वरदायक स्वरूप का ही उदाहरण है। शत्रु भय हो, या आकस्मिक राज्य बाधा, अथवा भूत-प्रेत आदि का प्रकोप, प्रत्येक स्थिति के लिए अलग-अलग ढंग से मंत्रों और होम की व्यवस्था बनायी गयी है। इन्हीं सैकड़ों प्रयोगों में से आयु, धन-वृद्धि एवं समस्त प्रकार के उपद्रवों को दूर करने के संबंध में एक अचूक मंत्र ‘‘अष्टादशाक्षर मंत्र’’ का उल्लेख मिलता है, जिसका उपयोग कर कोई भी व्यक्ति शीघ्र लाभ प्राप्त कर सकता है। इस अष्टादशाक्षर मंत्र के संदर्भ में मंत्र महोदधि में कहा गया है। यः कपीश् सदा गेह पूजयेज्जपतत्परः। आयुर्लक्ष्म्यौ प्रवद्र्धेते तस्य नश्यन्त्युपद्रवा।।अर्थात, जो व्यक्ति अपने घर में सदैव हनुमान जी का पूजन करता है और इस मंत्र का जप करता है, उसकी आयु तथा लक्ष्मी (संपत्ति) नित्य बढ़ती रहती है तथा उसके समस्त उप्रदव अपने आप नष्ट हो जाते हैं। वास्तव में हनुमान जी समस्त अभीष्ट फलों को प्रदान करने वाले श्रेष्ठ देवता हैं:- ‘‘हनुमान देवता प्रोक्तः सर्वाभीष्टफलप्रदः’’ अष्टादशाक्षर मंत्र: ‘नमो भगवते आजनेयाय महाबलाय स्वाहा’’। इस मंत्र के ईश्वर ऋषि हैं, अनुष्टुप छंद हैं, हनुमान देवता हैं, हुं बीज है तथा अग्निप्रिया (स्वाहा) शक्ति है। मंत्र संख्या: दस हजार पुरश्चरण: उक्त जप का तिलों से दशांश होम करना चाहिये। साधना विधि: सर्वप्रथम प्राण प्रतिष्ठित (चैतन्य) हनुमान यंत्र को प्राप्त कर, किसी मंगलवार (विशेष कर शुक्ल पक्ष) की रात्रि से इस साधना को दस दिन के लिए प्रारंभ करें। इसमें प्रतिदिन एक निश्चित समय पर ही पूजन एवं दस माला जप करें। इस साधना में स्नान कर, लाल वस्त्र धारण कर के, दक्षिणाभिमुख हो कर लाल रंग के ऊनी आसन पर बैठ कर पूजन एवं जप करना आवश्यक है। जप हेतु मूगे की माला, या लाल चंदन की माला, या रुद्राक्ष की माला आवश्यक है। सर्वप्रथम हनुमान यंत्र को लकड़ी की चैकी पर, लाल वस्त्र बिछा कर मध्य में ताम्र पात्र में स्थापित करें। गुरु का ध्यान कर घी का दीपक तथा धूप बत्ती जलाएं।
अब दिये गये क्रमानुसार पूजन प्रारंभ करें:
 

विनियोग: -
 

दायें हाथ में जल, पुष्प तथा चावल ले कर, निम्न मंत्र को बोल कर, किसी पात्र में हाथ की सामग्री छोड दें। ‘अस्य श्री हनुमन्मन्त्रस्य ईश्वर ऋषिरनुष्टुप् छन्दः हनुमान देवता हुं बीजं स्वाहा शक्तिरात्मानोऽभीष्टसिद्ध्यर्थं जपे विनियोगः।’’
 

षङ्गन्यास: -
 

अब निम्न क्रमानुसार न्यास विधि करें: ओउम आजनेयाय हृदयाय नमः, ओउम् रुद्रमूर्तये शिरसे स्वाहा, ओउम् वायुपुत्राय शिखायै वषट्, ओउम् अग्निगर्भाय कवचाय हुम्, ओउम् रामदूताय नेत्रत्रयाय वौषट्, ओउम् ब्रह्मास्त्रविनिवारणाय अस्त्राय फट्।। ध्यान मंत्र: दाहिने हाथ में सिंदूर से रंगे चावल तथा लाल पुष्प ले कर, निम्न मंत्र बोल कर, ‘हनुमान यंत्र’ पर छोड़ देवें। साधक संस्कृत न बोल सके, तो हिंदी का भावार्थ बोलें। ‘‘दहनतप्तसुवर्णसमप्रभं भयहरं हृदये विहिता अजलिम्। श्रवणकुण्डलशोभिमुखाम्बुजं नमत वानरराजमिहाद्भुतम्।।’’ भावार्थ: मैं तपाये गये सुवर्ण के समान जगमगाते हुए, भय को दूर करने वाले, हृदय पर अंजलि बांधे हुए, कानों में लटकते कुंडलों से शोभायमान मुख कमल वाले, अद्भुत स्वरूप वाले वानर राज को प्रणाम करता हूं। अब हनुमान यंत्र को शुद्ध जल से स्नान करा कर यज्ञोपवीत अर्पित करें। इसके बाद यंत्र को तिल के तेल में मिश्रित सिंदूर का तिलक अर्पित करें तथा अंगुली पर बचे हुए सिंदुर को अपने मस्तिष्क पर तिलक के रूप में धारण करें। श्री हनुमान यंत्र पर लाल पुष्पों की माला अर्पित कर नैवेद्य रूप में गुड़, घी तथा आटे से बनी रोटी को मिला कर बनाये गये लड्डू अर्पित करें। श्री विग्रह (यंत्र) को फल अर्पित कर, मुखशुद्धि हेतु पान, सुपाड़ी, लौंग तथा इलायची अर्पित करें। अब उसी स्थान पर बैठ कर ही अष्टादशाक्षर मंत्र की 10 माला, यानी एक हजार जप कर, भगवान हनुमान जी को षाष्टांग प्रणाम करें। पूजन काल में भूलवश यदि त्रुटि रह गयी हो, तो क्षमा मांगें। यही क्रम 10 दिन करना है। दसवें दिन, किसी योग्य विद्वान के सान्निध्य में, तिलों से दशांश होम कर, ब्राह्मण को भोजन-दक्षिणा दे कर, संतुष्ट कर, विदा करें। विशेष: अर्पित नैवेद्य को अगले दिन हटा कर किसी पात्र में इकट्ठा करते रहें। साधना पूर्ण होने के अगले दिन एकत्रित नैवेद्य को किसी गरीब को दें। इस प्रकार उक्त दिव्य मंत्र सिद्ध हो जाता है।
 

सिद्ध मंत्र से कामना पूर्ति प्रयोग:-
 

1-धन एवं आयु वृद्धि के साथ-साथ समस्त प्रकार के उपद्रवों की शांति हेतु नित्य हनुमान जी की आराधना एवं एक माला जप आजीवन करते रहें।
2-अल्पकालिक रोगों से पीड़ित होने पर, इंद्रियों को वश में रख कर, केवल रात्रि में भोजन करें तथा तीन दिन 108 संख्या में इस मंत्र का जप करें, तो अल्पकालिक रोगों से छुटकारा मिल जाता है।
3-असाध्य एवं दीर्घकालीन रोगों से मुक्ति पाने के लिए प्रतिदिन एक हजार की संख्या में जप आवश्यक है।
4- ‘‘महारोगनिवृत्त्यै तु सहस्रं प्रत्यहं जपेत्’’ हनुमान जी का ध्यान कर मंत्र का जप करता हुआ व्यक्ति अपना अभीष्ट कार्य पूर्ण कर शीघ्र ही घर लौट आता है।
5-‘‘प्रयाणसमये ध्यायन्हनुमन्तं मनुं जपन्।साधयित्वाग्रहं व्रजेत्।।’’ इस मंत्र के नित्य जपने से पराक्रम में वृद्धि होती है तथा सोते समय चोरों से रक्षा होती है एवं दुःस्वप्न भी दिखायी नहीं देते हैं। साथ ही उपद्रवी तत्वों से रक्षा होती है।
6- अजनीगभर्सम्भतू कपीन्दस्र चिवात्मम रामप्रियं नमस्तुभ्यं हनुमन् रक्ष सर्वदा।।वास्तव में विपत्तियों से छुटकारा तथा सुख-समुद्धि में वृद्धि हेतु यह प्रयोग अपने आप में अचूक और अद्वितीय है।
 

साधना के आवश्यक नियम: -
 

1-पूर्ण साधना काल में अखंड ब्रह्मचर्य का पालन अवश्य करें।
2-मंत्र जप करते समय दृष्टि सदैव यंत्र पर ही टिकी रहे।
3-शयन साधना स्थल पर ही धरती पर करें।
4-इस साधना में घी से एक या पांच बत्तियों वाला दीपक जलाएं।
5-भोजन सिर्फ एक बार ही करें।

क्या आप को पता है लोहे से चोट लगने के पीछे शनि का प्रभाव !!


कई बार छोटी-छोटी लापरवाहियों या किसी और की गलती के कारण हमें चोट लग जाती है। वैसे तो यह एक सामान्य सी बात है लेकिन इस प्रकार की चोट यदि लोहे से लगती है तो ये बात गंभीर हो जाती है। ज्योतिष के अनुसार लोहे से चोट लगने के पीछे शनि का प्रभाव होता है। शनिदेव सभी नौ ग्रहों में विशेष स्थान रखते हैं क्योंकि इन्हें न्यायाधिश का पद प्राप्त है। शनि महाराज ही व्यक्ति के सभी अच्छे-बुरे कर्मों का फल प्रदान करते हैं। साढ़ेसाती और ढैय्या के काल में शनि राशि विशेष के लोगों को उनके कर्मों का फल देते हैं। यदि किसी व्यक्ति ने जाने-अनजाने कोई गलत कार्य किया है तो शनि उसे वैसी ही सजा देते हैं। इसी वजह से इन्हें क्रूर ग्रह भी माना जाता है।यदि आपको बार-बार लोहे की वस्तुओं से चोट लगती रहती है तो ध्यान रखें ज्योतिष के अनुसार यह गंभीर बात है। इसका सीधा इशारा यही है आपसे जाने-अनजाने कोई गलती हो गई है। ऐसे में लोहे से चोट लगाने के पीछे शनि का ही प्रभाव बताया जाता है। चूंकि लोहा शनि की प्रिय धातु है अत: इससे हमें किसी प्रकार का नुकसान होना शनि के नाराज होने की सूचना मात्र समझना चाहिए। यदि किसी व्यक्ति के साथ ऐसा बार-बार होता है तो उसे शनि के निमित्त विशेष पूजन आदि कार्य किया जाना चाहिए। प्रति शनिवार तेल का दान करें और भगवान शनि के दर्शन करें। कार्यों में पूरी तरह सावधानी रखें।