क्या आप को पता है मानव जीवन के लिए अवतारी देवो ने क्या संदेश दिए !! ~ Balaji Kripa

Thursday, 26 November 2015

क्या आप को पता है मानव जीवन के लिए अवतारी देवो ने क्या संदेश दिए !!



सनातन धर्म में सर्वोच्च सत्ता 'ब्रह्म' को माना गया है। सभी देवी और देवता उस एक सर्वोच्च सत्ता के प्रतिनिधि मात्र हैं। 'भगवान' उसे कहते हैं जिसने मानव रूप में जन्म लेकर चेतना के सर्वोच्च शिखर को छू लिया है। हम आपको बताएंगे ऐसे ही 5 भगवानों के बारे में जिनका जीवन पंच तत्व (आकाश, अग्नि, वायु, जल और पृथ्वी) से मेल रखता है और जिनका जीवन कुछ संदेश देता है। बताए जा रहे सभी 5 भगवानों के जीवन के छोटे से संदेश को अपनाने से आपका जीवन बदल सकता है। उल्लेखनीय है कि हम उनके विचारों की या अनमोल वचन की बात नहीं कर रहे हैं।

भगवान शंकर : जीवन में जल, पानी या नीर जरूरी है। यह नहीं होगा तो जीवन नहीं चलेगा। जल की शुद्धता उतनी ही जरूरी है जितनी कि मन की। जल से मन शुद्ध होता है। जल हमारे शरीर और मन को शीतलता और शांति प्रदान करता है। जल का गुण है शांत रहना, लेकिन इसी जल में धरती को जलप्रलय से नष्ट करने की क्षमता भी है।
संदेश : अहिंसक और शांतिप्रिय बनो। प्रकृति में दखल मत दो। बदलाव के लिए जरूरी है ध्यान। ध्यान करो। ध्यान विचारों की मृत्यु है और मृत्यु ही जीवन है इसलिए मरना सीखो।
सर्वप्रथम जीवन की उत्पत्ति जल में ही हुई थी। जल को मन का कारक माना गया है। जल से मन शांत रहता है। मस्तिष्क में 80 प्रतिशत जल ही रहता है। शरीर में जल का संतुलन जरूरी है। भगवान शंकर को हिन्दू धर्म में सर्वोच्च और प्रथम माना गया है। पंच तत्वों में जल तत्व प्रधान देव को जलाभिषेक प्रिय है। इनका स्थान भी हिमालय में कैलाश पर्वत पर है, जहां शीतलता प्रधान है। वरुणदेव को जल तत्व का अधिपति माना गया है।
 

भगबान राम : राम एक आदर्श पुत्र हैं। पिता की आज्ञा उनके लिये सर्वोपरि है। पति के रूप में राम ने सदैव एकपत्नीव्रत का पालन किया। राजा के रूप में प्रजा के हित के लिये स्वयं के हित को हेय समझते हैं। विलक्षण व्यक्तित्व है उनका। वे अत्यन्त वीर्यवान, तेजस्वी, विद्वान, धैर्यशील, जितेन्द्रिय, बुद्धिमान, सुंदर, पराक्रमी, दुष्टों का दमन करने वाले, युद्ध एवं नीतिकुशल, धर्मात्मा, मर्यादापुरुषोत्तम, प्रजावत्सल, शरणागत को शरण देने वाले, सर्वशास्त्रों के ज्ञाता एवं प्रतिभा सम्पन्न हैं।
संदेश : भगबान राम ने मानव अवतार लेकर मृत्युलोक में मानवजाति को आदर्श जीवन का संदेश दिया ।

भगबान हनुमान : जगत में वायु नहीं होगी, तो प्राण चले जाएंगे। वायु का आधार है जल और जल का आधार है वायु। जल कुछ दिन नहीं मिलेगा तो चलेगा, लेकिन वायु तो पल-प्रतिपल चाहिए। वायु पर संयम से अपार शक्ति और सिद्धि मिलती है। अपार शक्ति और सिद्धि को संयमित रखने के लिए भक्ति जरूरी है।
संदेश : यदि शक्तिशाली हो तो भक्त बनो। खुद के भीतर की बुराइयों से लड़ो। कार्य शुरू करो तो खत्म करके ही उठो। सक्षम और योग्य व्यक्ति वह है, जो समझदार, सजग और सक्रिय है।
वायु का एक गुण यह भी है कि उससे शरीर और मन में शीतलता और बल का संचार होता है। वायु से ही बल मिलता है। वायु की शुद्धता से शरीर के सभी अंग पुष्ट और संतुष्ट रहते हैं। संपूर्ण शरीर में वायु से ही बल और शक्ति का संचार होता है। मस्तिष्क को जल से ज्यादा वायु की जरूरत होती है। पवनदेव को वायु का अधिपति माना गया है। हनुमानजी पवनपुत्र और राम के भ‍क्त हैं। उनकी बुद्धि वायु की गति से भी तेज है और उनका बल वायु के वेग से भी अधिक है। जब तूफान उठता है तो धरती के पहाड़ तक हिल जाते हैं, समुद्र उफनने लगता है, क्योंकि धरती पर जल से 10 गुना ज्यादा वायु तत्व ही मौजूद है।

भगवान श्रीकृष्ण : यह दिखाई देने वाला जगत जड़ तत्व है जिसे पृथ्वी तत्व भी कहते हैं। व्यावहारिक ज्ञान यही कहता है कि जीवन धरती के बिना अधूरा है। धरती नहीं होगी तो जीवन नहीं होगा। धरती पर जो भी व्यक्ति जीवित है, वह हर पल खुद को जीवित रखने के लिए संघर्ष कर रहा है या कर्म कर रहा है।
संदेश : जीवन एक संघर्ष है इसीलिए योग्य और कर्मवान बनो। कला, विद्या और शिक्षा से प्रेम करो। यही हर तरह के जीवन में काम आएगी।
जीवन में कर्म की प्रधानता को समझना जरूरी है। कर्म से ही भाग्य जाग्रत होता है। उन कर्महीन लोगों का भाग्य सोया रहता है, जो किसी चमत्कार की आशा करते हैं या जो अयोग्य हैं।
भगवान श्रीकृष्ण के अनुसार परिणाम की चिंता किए बगैर श्रेष्ठ और उत्तम कर्म करना चाहिए। कर्म से ही जीवन चलता है। कर्म एक जड़त्व प्रक्रिया है।

भगवान बुद्ध : पृथ्वी, जल, वायु और अग्नि का आधार है आकाश। आकाश स्वरूप है आत्मा। शून्य, निराकार, निर्विकार और निर्मल। आकाश का आधार आत्मा है। कोई व्यक्ति कितना ही हासिल कर ले लेकिन उसने खुद को हासिल नहीं किया है तो सब कुछ व्यर्थ है।
संदेश : अपना दीया खुद बनो अर्थात आत्मवान बनो। अपना रास्ता खुद चुनो। निर्विचार हो जाना ही आत्मवान बनने की ओर उठाया गया पहला कदम है।
भगवान बुद्ध दर्शन और धर्म का अंतिम वक्तव्य हैं। भगवान बुद्ध कहते हैं कि विचार से कर्म की उत्पत्ति होती है, कर्म से आदत की उत्पत्ति होती है, आदत से चरित्र की उत्पत्ति होती है और चरित्र से आपके प्रारब्ध की उत्पत्ति होती है। अत: आप जैसा सोचते हैं, वैसा ही बनते जाते हैं। कोई कर्ता-धर्ता नहीं है। तुम ही हो तुम्हारे कर्म और भाग्य के निर्माता इसीलिए खुद को समझो और मुक्त हो जाओ। आकाश समान हो जाओ।

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